एक सबसे अद्भुत और मौलिक प्रश्न है कि क्या ईश्वर को देखा जा सकता है ? अर्थात् ईश्वर को "साकार विग्रह" मेँ कोई भक्त देख सकता है या नहीँ ? ये वो प्रश्न है जिसको सुलझाने के लिए एक लम्बे समय से एक लम्बी बहस जारी है । आज जब "विज्ञान" अपने चरमोत्कर्ष पे है, तब उन लोगोँ का साहस ये कहते हुए और अधिक बढ जाता है कि ईश्वर का वास्तव मेँ साकार दर्शन हो ही नहीँ सकता क्योँकि वो अब ये जानते है कि यदि कोई व्यक्ति या कोई मेरे जैसा व्यक्ति ये कहे कि "ईश्वर के साकार दर्शन होते है !" तो वो कहेगा "हाँ, तो ठीक है, हमारे सामने ला कर दिखा दो; हम मान जायेँगे ।" ये बेहद मूढतापूर्ण प्रश्न है और ये पूरी की पूरी तर्कशृंखला एक तरह से मूढताप्रधान शृंखला ही है । इसके पीछे के रहस्य को हमेँ भलीभाँति समझना चाहिए ।....सर्वप्रथम "शास्त्र" क्या कहता है क्योँकि शास्त्र ही "प्रमाण" है । प्राचीन काल से लेकर अब तक रहस्यशास्त्रोँ नेँ ही मनुष्य का मार्ग प्रश्स्त किया है । आज; जब "धर्म" की बडी हानि हो रही है, और "भक्त" लगातार व्याकुल हो रहे है और तरह तरह के "तर्कशास्त्री" तरह तरह के "तथाकतथित विज्ञानवादी" और कुछ "तथाकथित धर्म से भयभीत रहनेवाले व्यक्ति" अनेकोँ प्रकार के कुतर्क देते है और ये प्रमाणित करने का प्रयास करते है कि ईश्वर को साकार रुप मेँ तो देखा ही नहीँ जा सकता और इसके लिए वो कुछ "कथित सबूत" और "झूठे प्रमाण" और "तथ्य-आँकडे" तुम्हारे सम्मुख लाकार प्रस्तुत कर सकते है, लेकिन "तुम अपने दर्शन को दृढ रखना क्योँकि धर्म नेँ सदैव तुम्हारा मार्गदर्शन किया है ।" धर्म क्या कहता है ? कि क्या ईश्वर को देखा जा सकता है ? सर्वप्रथम हमेँ अपने भारतीय वाङ्गमय को जब हम टटोलते है तो उसे बारीकी से देखना होगा । ईश्वर को दो स्वरुपोँ मेँ जाना गया है, प्रथम "निर्गुण ब्रह्म"; जो निराकार है, अजन्मा है, नित्य है, सर्वव्यापक है, आनन्दमय है, तेजोमय है, जिसके भीतर ये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड लीन है, जिस से ये उत्पन्न हुआ; जिसके भीतर ये है; और जिसके भीतर ये पुनः समा जायेगा वही "ब्रह्म" है । जिस ब्रह्म के सिवा दुसरा कोई तत्त्व इस सृष्टि मेँ है ही नहीँ वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही भगवान है, लेकिन दुसरा प्रश्न; कि यदि भगवान अजन्मा है वो पैदा नहीँ होते तो "भगवान राम" कौन है ? "भगवान ईसा मसीह" कौन है ? या "मोहम्मद पयगम्बर" खुद आकर "किसका" सन्देश देकर जाते है मानवता को ? इसका अर्थ है चाहे "गुरु नानक" हो चाहे "महावीर" हो या कोई "सन्त" होँ "तुलसीदास", "मीराबाई", "रैदास" या "भक्त ध्यानु" सब के सब किसी "साकार विग्रह" की तरफ भी इशारा करते है, और जो "अवतारी पुरुष" है वो कौन है ? इसे तुम एक छोटे उदाहरण से समझोँ....एक समुद्र है, बहोत बडा, बहोत विशाल ! समुद्र अपनेँ आप मेँ "देवता" है । बहोत ऊँचे हिमालय पर्वतोँ के निकट जहाँ वन प्रदेश था । एक ऊँचे से टीले पर एक विशाल गाँव बना हुआ था, उस गाँव से पहली बार एक व्यक्ति समुद्र देखने गया और जब वो समुद्र के तट पर पहुँचा तो भयभीत होकर समुद्र को देखने लगा ! क्योँकि उसकी लगभग आधी आयु बीत चूकी थी लेकिन उसने विशालकाय समुद्र को कभी नहीँ देखा था, तब उसके ह्रदय मेँ ये विचार आया कि 'मेँ अपनेँ गाँव से इतने दूर इस समुद्र को देखने आया हुँ, तो क्योँ न इस समुद्र की इस लहरोँ को कैद कर अपनेँ घर ले जाऊँ !' तो उसने एक छोटे से पात्र मेँ समुद्र का जल भर लिया और उसे लेकर अपनेँ गाँव लौटा । जैसे ही वो अपनेँ गाँव लौटा तो गाँव के सभी लोग उसे घेरकर बैठ गये कि तुम क्या लेकर आये हो ! तो उसनेँ कहा कि "कि मेँ समुद्र को अपने पास लेकर आया हुँ ।" और जो समुद्र का जल था उसने सभी को वो जल दिखाया । तो क्या उन्होँने समुद्र का जल नहीँ देखा ? जिस प्रकार उस कलश उस पात्र के भीतर रखा हुआ जल स्वयं मेँ समुद्र ही है, समुद्र का ही जल है ठीक उसी प्रकार से "अवतारी पुरुष" होते है । कोई भी अवतारी आत्मा कोई भी अवतारी चेतना कोई भी अवतारी देह जब इस पृथ्वी पर रहती है तो वो उस "अनन्त-विराट परमात्मा का एक साकार विग्रह" होता है, अर्थात् महासागर का एक छोटा सा कलश मेँ आया हुआ हिस्सा मात्र, इसलिए कुतर्क देनेँवाले ये कहते है कि यदि "राम" भगवान थे तो वो "क्राइस्ट" को नहीँ जानते थे और यदि "जीजस" भगवान थे तो वो "भगवान श्रीकृष्ण" को नहीँ जानते थे और "भगवान श्रीकृष्ण" यदि भगवान थे तो वो "महात्मा बुद्ध" को नहीँ जानते थे । ये बडा ही ओछा और निम्न कोटि का तर्क है, और सावधान रहना; तुम्हे इसी तरह के तर्क देकर कुछ "तथाकथित बुद्धिमान" तुम्हारी "महामति" को भ्रमित कर सकते है, और इसे "माया" ही कहा जाता है क्योँकि माया क्या है ये वो नहीँ समझ सकते । माया का अर्थ है सबकुछ झूठ है; जबकि माया का ये अर्थ नहीँ है, और अभी मेरा ये विषय भी नहीँ है । पुनः मूल बिन्दु पर आता हुँ । एक भक्त ध्यानु हुए । जो माँ को इतना प्रेम करते थे; माँ दुर्गा के इतने प्रचण्ड भक्त थे कि भक्ति करते करते उन्होने एक बार जब वो पराकाष्ठा की स्थिति पर पहुँच गये तो अपना ही सर गरदन से काटकर देवी माँ के चरणोँ पे अर्पित कर दिया और कथा ये कहती है कि देवी माँ प्रकट हुई ! उन्होनेँ उनकी कटी हुई गरदन को पुनः जोड दिया और उसे कुशलतापूर्वक वरदान देते हुए प्रत्यक्ष दर्शन देते हुए अतर्ध्यान हो गयी । अब यहाँ दुसरे बिन्दु पर बात करता हुँ । मान लो तुम बहोत अधिक प्रेम ईश्वर से करते हो । ये कहते हो कि "मेँ सदा भोलेनाथ की भक्ति करता हुँ । मेँ उनकी स्तुति करता हुँ । सुबह उठता हुँ तो भोले की स्तुति, शाम होती है तो भोलेनाथ का नाम, दिन होता है तो ॐ नमः शिवाय, सुबह होती है तो केवल शिव, केवल शिव और केवल शिव । तुम साँस लेते हो तब भी शिव; तुम साँस छोडते हो तब भी शिव । तो क्या इसका तात्पर्य ये हो गया, कि तुम यदि वर्षोँ से ऐसा अभ्यास कर रहे हो और तुम्हे ये लगने लगे कि तुम्हारे स्वप्नोँ मेँ शिव है, तुम्हारे आसपास शिव है, तुम्हारे संग संग शिव है और एक दिन तुम ये "मूरखता" करो कि शिवलिंग के पास जाकर ये कहो कि 'हे महादेव ! अब तो तुम्हे प्रकट होना ही होगा; प्रत्यक्ष होना ही होगा । मेँ तुम्हारा सर्वोच्च भक्त हुँ । मुझे तुम पर विश्वास है' और ये कहकर तुम एक धारदार हथियार से अपनी गरदन काट डालो...तो क्या तुम्हारी गरदन जुड जायेगी ? कभी नहीँ । तुम कहोगे ये मेँ दोहरी बात क्युँ कर रहा हुँ ? मेँ दोहरी बात नहीँ कर रहा । मेँ शास्त्र की उस श्रुति को तुम्हे समझाने का प्रयास कर रहा हुँ जो आवश्यक है । सर्वप्रथम ईश्वर निर्गुण, निराकार, दिव्य, चैतन्य और तेजस्वी है, सर्वकला और सर्वगुणोँ से सम्पन्न है; लेकिन वो "ईश्वर" तुम्हारे एक स्तरविशेष पर पहुँच जाने पर तुम्हे सगुण मेँ आकर दर्शन देते है; लेकिन कौन व्यक्ति है जो उनके दर्शन प्राप्त कर सकता है ? ये प्रत्यक्ष भोजन करने जैसा नहीँ है; कि तुमने एक बार भोजन तैयार किया, अपनी थाली मेँ परोस लिया औ उसको आहार की भाँति ग्रहण कर लिया । जीवन मेँ जैसे "ज्ञान" दुर्लभ और दुरुह है...मेँ पहले ही समझा देता हुँ...जब एक छोटा सा बालक जो पैदा होता है वो पैदा होते ही चलना नहीँ जानता । उसे चलने के लिए बहोत बार अभ्यास करना होता है । आज तुम दौड सकते हो लेकिन याद रखना, जब तुम उत्पन्न हुए थे तो तुम्हारी माता नेँ तुम्हारे घिसटते हुए चलनेँ के लिए भी महीनोँ प्रतिक्षा की थी ! लगातार तुम्हारी ऊँगली थामेँ हुए तुम्हे आगे बढना और चलना सिखाया था, तभी तुम आज इस स्थिति तक पहुँचे हो कि आज तुम दौड सकते हो । ठीक उसी प्रकार ईश्वर के सगुण और साकार दर्शन केवल वही कर सकता है जो उसके "लायक-पात्र" हो । अन्यथा हर नास्तिक को, अन्यथा हर कुकर्मी को, अन्यथा हर पातकी को सहज ही ईश्वर के दर्शन हो जाते । तब ईश्वर को एक पापी और एक पुण्यात्मा मेँ... हालाँकि ईश्वर दोनोँ मेँ अन्तर नहीँ मानता लेकिन एक पापी व्यक्ति और एक पुण्यात्मा मेँ अन्तर ही शेष नहीँ रहता । तब कोई भी व्यक्ति इस सृष्टि मेँ "चेतना को उर्ध्वमुखी" नहीँ करता । कोई भी "विराट" नहीँ बनता । कोई भी "परिश्रम" नहीँ करता । इस जीवन मेँ कोइ भी "कर्म के सिद्धान्त" को नहीँ मानता । ये जगत कर्म पर चलता है; और "अध्यात्म" भी तो कर्म पर ही चलता है । कैसे ?... ईश्वर को कौन व्यक्ति देख सकता है इसके लिए "भारतीय वाङ्मय" का अध्ययन करो । जहाँ एक ओर योग, ज्योतिष, तन्त्र, कर्मकाण्ड और अनेकोँ प्रकार की ललित कलाओँ का अभ्यास करवाया जाता है । वहीँ समाधि की ओर गति, व्रत, संयम, इन्द्रियनिग्रह, सत्य, आस्तेय और धर्मपथ पर चलना ये सब अनिवार्य कहा गया । एक साधारण से सांसारिक व्यक्ति को देख लो, वो दैहिकरुप से उतना ह्रष्टपुष्ट और तीव्र नहीँ हो सकता जितना एक दिव्य योगी और नित्य योग का अभ्यासी हो सकता है । एक व्यक्ति जो योग को सम्पूर्णता से अपने जीवन मेँ उतारता है उसका मस्तिष्क कितना दिव्य और कितना तीव्र हो सकता है इसकी कोई कल्पना नहीँ कर सकता । ये इस बात पर निर्मर करता है कि वो कितनी अधिक मेहनत करता है, उस योग का कितना जटिल अभ्यास करता है । तो एक योगी योगासन, प्राणायाम, नियम, यम, आहार से लेकर विहार से लेकर, वाणी-संयम से लेकर, दृष्टि-संयम से लेकर मनोसंयम तक प्रत्येक तत्त्व पर अभ्यास करता है...निरन्तर...निरन्तर.... कुण्डलिनी जागरण का अभ्यास करता है, मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूर-अनाहत-विशुद्ध-आज्ञा-सहस्रहार कमलदल का जागरण करता है । उसके पश्चात मन्त्र-साधना करता है और कर्मकाण्ड करता है । भक्ति और यन्त्र इत्यादि का साकारात्मक विग्रह बनाते हुए "स्थूल पूजन" भी करता है । तब जाकर निरन्तर कठोर तप करनेँ के पश्चात....आप पुराणोँ को पढिए-शास्त्रोँ को पढिए...जिस जिस को परमात्मा नेँ साकार दर्शन दिए वो युगोँ युगोँ तक तपस्या करता रहा है, सदियोँ तक अनेको प्रकार के जप-तप करता रहा है । तत्पश्चात ही उसे दर्शन हुए है और कोई व्यक्ति ये सोच लेँ कि आज ही प्रत्यक्ष परमात्मा को दिखाया जा सकता है ये असम्भव है । ये पुण्य तो केवल तभी मिल सकता है जब स्वयं परमात्मा साकार शरीर धारण कर तुम्हारे मध्य होँ और तुम्हारे पास ऐसी दृष्टि हो कि तुम उसे देख सको । लेकिन... तुम इस व्यर्थ के प्रपंच मेँ न पडना... तुम ये न सोचना कि ईश्वर साकार दर्शन नहीँ देते । मेँ ये पूरे दावे से कहता हुँ, पूरे प्रमाण के साथ कहता हुँ कि यदि तुम शास्त्रीय कथन को, यदि तुम निम्न स्तर से योग के सभी अंगो का लगातार अभ्यास करो, अपनी चेतना को महाविराट बनने का अवसर प्रदान करो, निरन्तर उस दिव्यता मेँ जाने के लिए प्रयत्नशील रहो तो अवश्य तुम्हे ईश्वर के दर्शन होते है और साकार रुप मेँ दर्शन होते है । भले ही समस्त संसार अपना पूरा बल झोँक दे, भले ही वो हम जैसे संतो को प्रताडित करे लेकिन हम जैसी अवतारी चेतनाएँ सदा से ये कहती रही है कि ईश्वर को तुम "साकार" देख सकते हो, अपनी भाँति देख सकते हो, अपने पास देख सकते हो । बस, तुम्हारे भीतर वो क्षमता होनी चाहिए । एक छोटी सी बात मैँ अन्त मेँ कहना चाहता हुँ । मान लीजिए कि सारी दुनिया के मनुष्य एक तरफ हो जाए और ये कहने लग जाए कि, "सूर्य "सूर्य" है ही नहीँ; वो तो अन्धकार का पिण्ड है ।" और उसके लिए वैज्ञानिक तर्क देनेँ लग जाए, उसके लिए नास्तिक तर्क देनेँ लग जाए तो क्या तुम मानोगे ? नहीँ । तुम तो अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करोगे । लेकिन जब ईश्वर साकार है या नहीँ ? ईश्वर कैसा है ? जब इस पर कभी भी "तर्कशास्त्री" या "मनोविज्ञानी" या "आधुनिक विद्वान" जिन्होनेँ "आधुनिक कथित शिक्षा" ग्रहण कर रखी है, इस प्रकार के लोगोँ के समूह जब इकठ्ठा होकर-मिलकर ये प्रमाणित करनेँ की कोशिश और चेष्ठा करते है 'कि भगवान तो साकार होते ही नहीँ है ये तो "अन्धविश्वास" है है ये तो "भ्रम" है' तो तुम मानने लग जाते हो ! जैसे वो लोग उस "तत्त्व" को नहीँ जानते वैसे ही तुम भी उस "तत्त्व" को नहीँ जानते हो । इसे सूक्ष्मता से समझना....वो केवल उस तथ्य को "मानकर" बैठे है कि ईश्वर साकार नहीँ होता । उन्होने उसे "जाननेँ" के लिए "सम्पूर्ण योग प्रणाली" का अध्ययन नहीँ किया और ना ही उन्होने अपने कई युगोँ के जीवन और अपने जीवन-संयम को उस परम्परा मेँ ढाला है.....और ये याद रखना चाहिए तुम्हेँ कि जितनेँ भी ये तथाकथित मनघडंत किस्म के तर्कशास्त्री है और इस तरह के तथाकथित बुद्धिजीवी है उन्हेँ ये लगता है कि जितनेँ भी वेद, पुराण और शास्त्र तुम्हारे बाजारोँ मेँ उपलब्ध है सारा का सारा ज्ञान भारतीय धर्मदर्शन का केवल उतना ही है । ये वो भूल रहे है कि यहाँ "रहस्य पीठ" है; यहाँ रहस्य योगी है; यहाँ रहस्य विज्ञानी है जिन्हेँ तुम नहीँ जानते....और उनका एक साधारण सा तर्क होता है कि यदि है तो उन्हेँ उनके सामनेँ लाया जाए । अरे वाह ! "पाँच हजार गीदड" मिलकर ये कह रहे है कि 'जंगल मेँ कोई "शेर" है ही नहीँ यदि है तो "शेर" को हमारे सामनेँ लाया जाए क्योँकि ये तो लोकतन्त्र है ।' याद रखो, गीदडोँ की सेना "गीदडोँ की सेना" ही रहेगी और सिंघ अपने आप मेँ "महासिंघ" ही रहेगा ये प्रकृति का सिद्धान्त है, और प्रकृति ये कहती है कि "सत्य" ही सार्वभौमिक है और ये प्रमाणित किया जाता है कि "सत्य" वही केवल अर्वाचीन था-प्राचीन था और वही सदा और सदैव रहनेवाला है और "सत्यमेव जयते ।"-"केवल सत्य की ही विजय होती है ।" ये श्रुतिवाक्य है और "सत्य ही ईश्वर है ।" तुम केवल अपने ह्रदय के कपाट खोलो ! ईश्वर तुम्हारे सदृश होँगे ।....और तुम्हे एक और विशेष बात मैँ बता देता हुँ, कि तुम्हारे शास्त्रोँ नेँ प्रथम पूर्व मेँ हीँ ये वर्णित कर रखा था कि "कलियुग" आते ही ये सब प्रश्न तो उठेँगे ही । ऐसा नहीँ है कि प्राचीनकाल मेँ उठते नहीँ थे...तब लोग इतने कुमति नहीँ थे; तब उनका भोजन इतना निम्नस्तरीय नहीँ था; तब उनकी प्राणवायु इतनी निम्नस्तरीय नहीँ थी; तब अरण्योँ से विहीन वो नहीँ थे; तब वो केवल अपनेँ कक्षोँ मेँ दुबके हुए से नहीँ रहते थे । वो विशाल वनोँ के मध्य विचरते थे । वो प्राणियोँ के मध्य रहते थे । पशु-पक्षीओँ को चहचहाता हुआ देखते थे । "कृत्रिम" पदार्थोँ के मध्य नहीँ रहते थे । आज तो तुम्हारा जीवन कृत्रिमताओँ से भरा पडा है । ऐसे मे शायद ये तुम्हेँ बेहद जटिल लगे कि जो मैँ कह रहा हुँ इसे तुम कैसे समझोगे...और "रहस्य योगी" सीधे सीधे सरलता से तो अपनेँ तथ्य प्रकाशित नहीँ करते । ईश्वर है और प्रत्यक्ष दिखते है, प्रत्यक्ष मिलते है उसका क्या तरीका है ये केवल "रहस्य योगियोँ" के पास ही सुप्त और लुप्त पद्धति मेँ विद्यमान है । अब मुस्कुराते है ये सुनकर "तर्कशास्त्री", ये सुनकर "मलेच्छ" हँसते है क्योँकि उन्हेँ ये मालूम है कि अब तो वो ये कहेँगे कि देखो, इनके पास दिखानेँ को कुछ नहीँ है तो कहेँगे 'ये रहस्य है' ।.....अगर तुम्हारे पास हीरा होगा तो क्या तुम उसे चौराहे पर दिखाते फिरोगे ? अगर मेरे पास ईश्वर को जाननेँ कि पद्धति और रीत होगी तो क्या मैँ मलेच्छोँ को बाँटता फिरुँगा ? नहीँ । हालाँकि समस्त जगत मेरा है । सम्पूर्ण सृष्टि मेरी है । उसके लिए मेँ कल्याण कामना करता हुँ लेकिन "नकारात्मक शक्तियोँ" के लिए नहीँ । नकारात्मक शक्तियोँ का "वध" हो ! नकारात्मक शक्तियोँ का "नाश" हो ! कुमतियोँ का "अन्त" इस सृष्टि मेँ हो ! ये मेरी ह्रदय से प्रार्थना है...और मैँ ये चाहता हुँ कि एक दिन ये सृष्टि केवल "ईश्वरत्व के पथिकोँ" के लिए बनेँ । ये "स्वर्ग" केवल उन्हीँ के लिए है जो केवल ईश्वर के पथिक हो । वो फिर चाहे "किसी भी धर्म" के होँ, "किसी भी पंथ" के होँ, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीँ । तुम मोहम्मद-के बताये पथ पर चलो, तुम ईसा मसीह-उनके बताये पथ पर चलो, तुम महावीर-उनके बताये पथ पर चलो, तुम गुरु नानकदेव जी-उनके पथ पर चलो अथवा तुम महात्मा बुद्ध के बताये मार्ग पर चलो । लेकिन जब तुम आगे बढोगे तो तुम एक सगुण साकार परमात्मा को अवश्य प्राप्त करोगे और उससे भी उस पार... निर्गुण, सत्यमय, परम शाश्वत "ब्रह्म" को अवश्य प्राप्त कर पाओगे...इसलिए भ्रमित न होना और ये याद रखना कि ऋषि-मुनियोँ को पूर्व मेँ ही ये ज्ञात था कि ऐसा भविष्य मेँ होनेवाला है इसीलिए उन्होने इसे "कलियुग" कहा । तुम्हारे चारोँ तरफ सूचना का जो तन्त्र है वो निरन्तर तुम्हे ये समझाने की कोशिश करेगा कि परमात्मा है ही नहीँ, वो साकार होता ही नहीँ है, वो तुम्हारे जीवन मेँ आता ही है...और ये सत्य भी है । अगर परमात्मा हर दिन, हर क्षण, हर पल तुम्हारे जीवन मेँ दखलंदाजी करने लग जाए तो तुम्हारा जीवन अपनेँ आप मेँ नर्क हो जाएगा । तब तो कोई पाप-पुण्य बचेगा ही नहीँ, इसलिए परमात्मा नेँ तुम्हेँ "निजीता" दी है; जीवन की निजीता, मृत्यु की निजीता, भावनाओँ की निजीता और पृथ्वी पर रहनेँ की निजीता...इसलए केवल उसी सत्य को "सत्य" मानकर मत बैठ जाना जो केवल दिखाई देता हो, आँखोँ की दृष्टि से उस पार भी कुछ सूक्ष्म है । लोग कहते है प्रमाण लाओ, प्रमाण लाओ, प्रमाण लाओ । हम प्रमाण लेकर आए भी तो तुम जैसे मूढोँ के सामनेँ क्योँ आए ? "प्रमाण..प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने है ।" यदि तुम उसे जान सको, यदि तुम उसे पहचान सको तो वो तुम्हारी इन्द्रिय और तुम्हारी चेतना पर निर्भर करता है । अभी प्रत्यक्ष ईश्वरीय प्रश्न का उत्तर केवल इतना ही है कि "हाँ, ईश्वर को प्रत्यक्ष भी देखा जा सकता है और उसके वास्तविक स्वरुप मे साधक "लीन" भी हो सकता है...इसी कारण न केवल हिन्दु धर्म वरन् सम्पूर्ण भूमण्डल पर जितनेँ भी धर्म है वो किसी न किसी रुप मेँ ईश्वर को, अमरता को, नित्यता को सदैव स्वीकारता आया है । अभी केवल इतना ही । ॐ नमः शिवाय ! प्रणाम ! - कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज (ईशपुत्र)

1 Comments:
Please koi ishaputra ji se sampark kar saku margdarshan kare mera unse milna mere liye param aawashyak hai.
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