"अक्षोभ्य पुरुष" की शक्ति है "माँ तारा" ! जिसे माँ तारिणी कहा गया है ! मध्यरात्रि के पश्चात का जो समय है वो माँ तारा का ही है ! ये वही महाविद्या है जिन्हेँ तारिणी का नाम इसलिए प्रदान किया गया क्योँकि यही शक्ति हमेँ इस भवरुपी बन्धन से तारती है ! मानवदेह मेँ जब ये जीवात्मा बन्धनयुक्त पडी रहती है तो उस समय जीवात्मा निरन्तर छटपटाती रहती है ! कभी उसका ह्रदय "भोग" चाहता है तो कभी "योग" ! लेकिन वह दोनोँ को पाने का प्रयत्न तो करता है लेकिन किसी एक को भी ठीक तरह से प्राप्त नहीँ कर पाता ! तो माँ तारा की साधना एवं आराधना ऐसी विलक्षण है कि यदि साधक सब कुछ न्योछावर कर यदि तन्त्रमार्ग से इनकी साधना एवं आराधना करे तो वह "भोग" एवं "मोक्ष" दोनोँ को प्राप्त करता है ! "तारा तन्त्र" यद्यपि वामाचारी क्रिया से सम्पन्न होता है क्योँकि यह चीनाचारा पद्धति के द्वारा चलनेवाला है लेकिन यदि साधक इस सम्पूर्ण रहस्य को अपने श्रीगुरु के चरणोँ मेँ बैठकर समझे तो इस महाविद्या की कृपा वह अवश्य प्राप्त करता है ! तारा भगवती "ब्रह्म" का ज्ञान प्रदान करनेवाली महाशक्ति है ! यह वह शक्ति है जो हमेँ सम्पूर्ण मानसिक पीडाओँ से मुक्ति प्रदान करती है ! भगवती के सम्बन्ध मेँ कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के सदृश होगा ! अतः साधक को चाहिए की वह दस महाविद्याओँ की साधना एवं आराधना लगातार करता रहे ! माँ भगवती के स्तोत्र एवं मन्त्रोँ को वीरभाव से पढा अथवा उनका उच्चारण किया जाता है ! ये मन्त्र जितने भयानक और जितने गम्भीर कण्ठ स्वर से पढे जाते है उतने ही अधिक फलदायी होते है ! इन मन्त्रोँ की "सामर्थ्य" को एक "योग्य साधक" ही जान सकता है ! लेकिन यदि साधारण मनुष्य भी यदि पद्मासन अथवा सुखासन मेँ बैठकर इन मन्त्रोँ को सुनेँ, इनका श्रवण करे तो वह अपने जीवन की सभी बाधाओँ से मुक्ति प्राप्त कर सकता है ! उसके अनेकोँ रोग नष्ट होते है ! सम्पूर्ण भय नष्ट होता है ! व्यक्ति का मानसिक विकास होता है अथवा आध्यात्मिक विकास प्राप्त करते हुए वह "भोग-मोक्ष" दोनोँ को प्राप्त करता है !
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024
बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
1) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं अक्षोभ्य भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं अक्षोभ्य भैरवाय फट्।
2) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं काल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं काल भैरवाय फट्।
3) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं नील भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं नील भैरवाय फट्।
4) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं विकराल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं विकराल भैरवाय फट्।
5) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं कंकाल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं कंकाल भैरवाय फट्।
6) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं पाताल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं पाताल भैरवाय फट् ।
7) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं काम भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं काम भैरवाय फट्।
8) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं जड़ भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं जड़ भैरवाय फट्।
9) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं स्थूल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं स्थूल भैरवाय फट्।
10) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं नाद भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं नाद भैरवाय फट्।
11) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं वीर भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं वीर भैरवाय फट्।
12) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रलय भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रलय भैरवाय फट्।
13) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं उच्चाट भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं उच्चाट भैरवाय फट्।
14) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं दुर्मुख भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं दुर्मुख भैरवाय फट्।
15) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं पावक भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं पावक भैरवाय फट्।
16) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रेत भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रेत भैरवाय फट्।
17) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं स्तंभ भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं स्तंभ भैरवाय फट्।
18) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रमाद भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रमाद भैरवाय फट्।
19) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं सूचि भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं सूचि भैरवाय फट्।
20) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं मैथून भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं मैथुन भैरवाय फट्।
21) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं चाण्डाल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं चाण्डाल भैरवाय फट्।
बुधवार, 26 जून 2024
तारा महाविद्या-बौद्धाचार-कौलाचार-चीनाचार-गोम्पा
बुधवार, जून 26, 2024
Posted By:
Kaulantak Vani
''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना'' एक अत्यंत जटिल और उच्च कोटि की साधना मानी गयी है। लेकिन इस ''दिव्य महाविद्या'' को समझ पाना सरल नहीं है। ''महर्षि विश्वामित्र और वशिष्ठ'' जैसे सर्वोच्च ऋषियों नें भी ''तारा महाविद्या'' को जानना चाहा। लेकिन उनका साहस भी आखिर टूट गया। तब महाचीन जा कर उनहोंने एक ''बुद्ध से चीनाचार'' द्वार तारा को सिद्ध किया। आज चीनाचार बदल गया है। आज काल और काल की गति बदल गयी है। तंत्र का दक्षिण मारग और वाम मारग मानों आखिरी साँसे गिन रहा हो। साहित्यकार और शोधार्थी तो ये तक नहीं ढूंढ पा रहे की भारत का तंत्र प्राचीन है या चीन का? बौद्ध धर्म के बज्रयान नें तारा को प्रमुख आराध्या माना और आज तक वो अपने 'गोम्पा में तारा को स्थान दिए हैं। ''कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज'' नें बाल्यावस्था में हिमाचल प्रदेश के ''लौहुल-स्पीती'' क्षेत्रों में भोटी भाषा और बौद्ध धर्म के तन्त्रयान को लामाओं से निकटता से समझा है। लगभग पांच वर्ष का अभ्यास और कौलमत नें ''कौलान्तक नाथ'' को बहुत कुछ प्रदान किया है। आज भी ''कौलान्तक नाथ'' का ''बौद्ध धर्म'' के प्रति 'मैत्री पूर्ण' प्रेम कम नहीं हुआ है।
जैसे ही गुजरात के अहमदाबाद में 19-20 जनबरी 2013 को ''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना शिविर'' की घोषणा हुयी। ''कौलान्तक नाथ'' हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के निकट स्थित बोद्ध गोम्पा गए। वहां उनहोंने ''चीनाचार और बोद्धाचार'' को याद किया। माँ तारा से पूर्णता व ''हिन्दू और बोद्धों'' के मध्य मैत्री, प्रेम व शांति बनाये रखने की प्रार्थना की। आपकी सेवा में प्रस्तुत है। बोद्ध गोम्पा में ''कौलान्तक नाथ'' की एक छोटी सी दुर्लभ विडिओ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय
जैसे ही गुजरात के अहमदाबाद में 19-20 जनबरी 2013 को ''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना शिविर'' की घोषणा हुयी। ''कौलान्तक नाथ'' हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के निकट स्थित बोद्ध गोम्पा गए। वहां उनहोंने ''चीनाचार और बोद्धाचार'' को याद किया। माँ तारा से पूर्णता व ''हिन्दू और बोद्धों'' के मध्य मैत्री, प्रेम व शांति बनाये रखने की प्रार्थना की। आपकी सेवा में प्रस्तुत है। बोद्ध गोम्पा में ''कौलान्तक नाथ'' की एक छोटी सी दुर्लभ विडिओ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय
मंगलवार, 12 अप्रैल 2022
तंत्र ज्योतिष समस्त जीवो पर.. पशु पक्षियों पर भी समान रूप से लागू होता है, इसलिए हमें तंत्र ज्योतिष को समझना होगा। लेकिन गहरी बात... कि हमारा भविष्य पूरी तरह से निश्चित नहीं इसलिए बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी कोई कभी ना कर पाएगा! भगवान राम का राज्याभिषेक का मुहूर्त निकाला गया था, उसी मुहूर्त में वनवास हो गया! इसका कारण है सटीक भविष्यवाणी इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि भविष्य आधा कोरा पन्ना है ! जिसमें कुछ लकीरें है, हम बस इन लकीरों को गिन कर बता सकते हैं!
जैसे एक उदाहरण से हम समझे कि, हम यदि दो टांगो पर खड़े हो जाए और कोई कहे कि हम उन दोनो में से एक टांग को मोड़ ले तो हम उसे ऊपर की तरफ मोड़ सकते हैं; थोड़ी कठिनाई होगी, लेकिन फिर कोई कहे कि अब दोनो को मोड़ लो, ये तो संभव नहीं! इसका गहरा कारण है! सहज सी बात है कि हम गिर जाएंगे, क्योंकि 50% तो हम अपने ऊपर निर्भर है कि एक टांग स्वेच्छा से मोड़ सकते हैं लेकिन दूसरी नहीं मोड़ सकते; क्योंकि वो दूसरी प्रकृति पर, परिवेश पर अथवा परमात्मा पर निर्भर करती हैं!
तो जो आपके कर्म है और जो कुछ एक आपका प्रारब्ध है उसके आधार पर कुछ हद तक आपके भविष्य को देखा जा सकता है, यही वास्तविक ज्योतिष है; और ज्योतिष का कार्य कल क्या होगा यह बताना नहीं, आपको कल क्या करना चाहिए यह बताना है ताकि आपका जीवन खुशहाल हो सके ! तो आप अपना कर देखिए इस तंत्र ज्योतिष को, कितना अलौकिक, कितना विचित्र है यह तंत्र ज्योतिष!
- कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज
मंगलवार, 17 दिसंबर 2019
"ईश्वर सदाशिव महादेव" इस नाम में जो उच्चता है, जो गरिमा है, जो पवित्रता है वो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में किसी तत्व में नहीं। उनके अनंत नाम है और वे हिमालय के शिखरों पर विराजते है। एक और जहां हिमालय के मध्य में रत्न के समान कैलाश पर्वत चमकता है उसी प्रकार वह कैलाश पर्वत हर भक्त के भीतर उसके हृदय में, इसके आज्ञाचक्र में, ब्रह्मरंध्र और कपाल में भी स्थित है! यही विराट दिव्य कैलाश इस ब्रह्मांड के बाहर दिव्य ब्रह्मांड में भी अन्य अन्य रूपों में प्रकट होता रहता है! महादेव ज्ञान के वोे भंडार है, महादेव सृष्टि के वह प्रथम पुरुष है जहां से ज्ञान की ये अविरल धारा, ये दिव्य गंगा प्रवाहित होती है। एक ओर जहां योग है, अध्यात्म है, तपस्या है और गरिमा है वही महादेव अपने आपको इस ब्रह्मांड का नायक होने के बाद भी मनुष्य के रूप में, साधारण देह धारण करके मां पार्वती को भी उसी शरीर में आबद्ध कर के कैलाश के दिव्य शिखर पर ज्ञान प्रदान करते हैं! बहुत कम लोग ऐसे हैं जो यह जानते हैं कि, क्या महादेव ने मनुष्य शरीर धारण किया? यदि नहीं किया तो कैलाश के शिखर पर जो महादेव भस्म लगाए हुए हैं देह पर, चंद्रमा को धारण किए हुए हैं, बाघम्बर अपने शरीर पर धारण करने वाले हैं, त्रिशूल धारण करके जो मां पार्वती को ज्ञान दे रहे हैं, आगम और निगम की उत्पत्ति कर्ता वो महादेव कौन है? यह अपने आप में एक रहस्य है और इसे शायद वेद, पुराण, शास्त्र भी प्रकट नहीं करना चाहते! इस तथ्य को लेकर वह भी मौन रहना ही उत्तम समझते हैं।
किंतु प्रश्न यह भी है कि वह सदाशिव ईश्वर महादेव उस स्वरूप को कब और कैसे धारण करते हैं? क्या शिव में, महेश में, महादेव में कोई अंतर है? क्या रूद्र कोई और है और काल के नियंता महाकाल कोई और ? क्या सदाशिव कोई और है और पारब्रह्म ईश्वर कोई और? अनेकों प्रश्न है। और इनका उत्तर केवल एक है। और वह है कैलाश का रम्य शिखर। कैलाश का वह रम्य शिखर जहां साक्षात् योग माया, साक्षात जगत जननी, साक्षात सूक्ष्मा रूप में, शक्ति के रूप में सर्वत्र उपस्थित रहने वाली मां शक्ति स्वयं देवाधिदेव ईश्वर से प्रार्थना करती है और उनसे प्रश्न करती है; अपनी जिज्ञासाएं प्रकट करती है एक साधारण मनुष्य की भांति। और महादेव भी अपने पारब्रह्म वाले स्वरूप को भूलकर, अपने आप को गुरु के रूप में स्थित कर के एक एक शंका, प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करते हैं। जितने विचित्र महादेव है उतने ही विचित्र उनके अलंकरण है। जितनी अद्भुत और श्रेष्ठ मां पार्वती है, मां शक्ति है उतने ही अद्भुत उनके प्रश्न! ऐसा लगता है कि मां पार्वती आपका और मेरा प्रतिनिधित्व कर रही है! हमारे प्रश्नों को वह महादेव के सम्मुख रखती है, एक श्रेष्ठ गुरू के सम्मुख रखती है। और विचित्र अद्भुत, अवधूतेश्वर, महाकपालिक, परम तांत्रिक, परम योगी, समस्त विद्याओं को धारण करने वाले, 64 कलाओं के अधिपति, स्वयं भूत भावन महादेव समस्त प्रश्नों का उत्तर अपनी विचित्र रीति से प्रदान करते हैं !
एक अद्भुत ग्रंथ है जिसे कहा जाता है "विज्ञान भैरव"! याद रखिए यह ज्ञान भैरव नहीं है... विज्ञान भैरव। ज्ञान परिचर्चा का विषय है । मैंने आपको कुछ कहा, आपने सीख लिया यह ज्ञान है। लेकिन मैंने आपको कुछ दिया और उस प्रणाली से आपने कुछ प्राप्त कर लिया वह विज्ञान है! जो प्रयोगात्मक होता है वही विज्ञान होता है। और जो तथ्यात्मक होता है, परिचर्चा जिस पर की जा सके वह ज्ञान होता है! ज्ञान में भी कमियां हो सकती है लेकिन विज्ञान में कमी नहीं होती क्योंकि विज्ञान केवल तर्कों पर नहीं अपितु प्रयोगों पर चलता है, उसके पीछे पूरा एक गंभीर धरातल रहता है। तो प्रश्न ज्ञान के रूप में प्रकट होते हैं और उत्तर विज्ञान के रूप में दिए जाते हैं। अद्भुत ग्रंथ है विज्ञान भैरव। लेकिन क्या है विज्ञान भैरव? कौन है यह विज्ञान भैरव? वास्तव में स्वयं महादेव ही अपने आप को "भैरव" कहते हैं और मां शक्ति को "है भैरवी!" कहते हुए संबोधित करते हैं! और वही मां भैरवी.. भैरव रूप महादेव से प्रश्न करती है! किस महादेव के सहस्त्रों सहस्त्र नाम है। जिस महादेव का ना आदी है ना अंत है! जो अत्यंत प्रखरतम है! और जिनकी माया इतनी अभिभूत कर देने वाली है कि आज तक कोई मनुष्य इस धरा पर उत्पन्न नहीं हो सका जो महादेव के दिव्य स्वरूपों को जान सके! जितना जानते हैं उतना कम रहता है! जितना हम प्रयास करते हैं उतना अधूरा रह जाता है! महादेव जटा जूट थारी है, महादेव काल को संचालित करने वाली सत्ता है, महादेव आपके और मेरे भीतर है,वह सृष्टि को नष्ट करने का अद्भुत सौंदर्य तांडव के रूप में संजोकर रखते हैं! जो स्वयं नटराज है! स्वयं संगीत को धारण करने वाले हैं! जिनकी माया अपरंपार है वह स्वयं को महादेव, शिव, रूद्र, अथवा अन्य नामों से पुकारने की अपेक्षा, यह ज्यादा रुचिकर उनको लगता है, प्रतीत होता है कि उन्हें कोई "भैरव" कहे! साक्षात मां भैरवी, मां जोगमाया उनको भैरव कह कर पुकारती है।
जहां एक और पृथ्वी के कैलाश मंडल पर महादेव विराजमान है, वहीं आपके और मेरे भीतर के कैलाश मंडल पर भी वही महादेव विराजमान है! और वही महाभैरव इस ब्रह्मांड में अनेकों तत्वों के रूप में अन्य अन्य स्थानों पर भी प्रकट होते हैं!
भैरव-भयों से मुक्त जो है एकमात्र, न जीवन, ना मान अपमान, न मृत्यु, ना काल... हर तत्व से उस पार है; और वही महाभैरव अपनी शक्ति को भैरवी कहते हैं! इसी महा भैरव के द्वारा देवी को जो दिया गया वह ज्ञान नहीं है! आगम निगम में ज्ञान अवश्य दिखाई देता है लेकिन उसकी गहराई में उतर जाए तो वहां विज्ञान है! इसी कारण महादेव ने जो कहा, महा भैरव ने जो कहा वह महाविज्ञान अपने आप में "विज्ञान भैरव" बन जाता है! यह एक अभूतपूर्व ग्रंथ भी है! और प्रयोग का इतना सुंदर ग्रंथ कि महादेव देवी को ज्यों ज्यों वह प्रश्न करती है क्यों क्यों धीमे धीमे धीमे ध्यान के बारे में बताते चले जाते हैं! ध्यान के भीतर उतरकर जीवन के प्रश्नों को खोजने की और उनका चित्त प्रेरित करते हैं! महादेव देवी को ज्ञान नहीं देते! उन्हें सूत्र देते चले जाते हैं! उन्हें परंपराएं नहीं देते बल्कि उन्हें प्रयोग देते चले जाते हैं! यह एक प्राचीन विद्या है, प्राचीन परंपरा है और एक पुस्तक में 112 से अधिक ध्यान की परंपराओं, ध्यान की विधियों के बारे में स्वयं महादेव बताते हैं और देवी उस ज्ञान को धारण करती है! प्रश्न होते हैं, उसका उत्तर मिलता है, और प्रणालियां उतनी अद्भुत कि यह केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं है कि केवल पुरुष ही ध्यान में उतर जाए; स्त्रियों के लिए विशेष तौर पर एक अलग सी प्रणाली ध्यान की महादेव पार्वती माता को प्रदान करते हैं! उनके माध्यम से वह हमको, आपको, समस्त सृष्टि को प्राप्त होता है। तो वही ध्यान की प्रणालियां, वही योग की प्रणालियां, वही तंत्र की संपुटित प्रणालियां भेरवो के लिए है, भैरवियों के लिए है।
भैरव कौन? भैरवियां कौन?जिनको महादेव रूद्र से इतना प्रेम हो जाए कि वह अपने हृदय में महादेव का ही प्रतिबिंब देखने लग जाए; ऐसा ही ह्रदय अपने आप में भैरव हो जाता है! जो उस महाभैरव को देखकर कहें कि मैं भी भैरव हूं! उस शिव को देखकर कहे कि मैं भी शिव हूं! उस पार्वती को देखकर जो कहे कि मैं भी भैरवी हूं! उस पार्वती मां की झलक, उस शक्ति की झलक अपने हृदय प्रांगण में देख सके! वही भैरवी है। तो आपको भैरव और भैरवी तत्व को धारण करना है, इस हृदय को धारण करना है! और वह जो ग्रंथ है विज्ञान भैरव.. उसके भीतर की सूक्ष्म प्रणालियों को गुरु के सानिध्य में ग्रहण करना है! बेहद अद्भुत परंपराएं, रीतियां, उसके भीतर का सूक्ष्म ज्ञान आपको न जाने किस दूसरे आध्यात्मिक संसार में ले जा सकता है लेकिन उसके लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि आप के भीतर यह भैरव तत्व हो और दूसरा आपके भीतर विज्ञान नाम का तत्व भी हो! इस विज्ञान को अगर आप धारण करना चाहते हो,भीतर के इस विज्ञान को यदि आप समझना चाहते हैं तो शिव के सूत्रों को समझना होगा। शिव ज्ञान जाता है लेकिन ज्ञान धारण करने के लिए मां शक्ति बैठी है। आपको भी ज्ञान धारण करना होगा तो गुरु के चरणों में आपको बैठना ही पड़ेगा और गुरु के ज्ञान को शिव मानना होगा और स्वयं को मां शक्ति पार्वती की तरह हृदय प्रधान... क्योंकि मां पार्वती का ह्रदय ममता से भरा है, स्नेह से भरा है, प्रेम से भरा है... उसमें श्रद्धा है और समर्पण है महादेव के प्रति! आपको भी जब हृदय में इसी प्रकार गुरु के प्रति समर्पण, प्रेम, स्नेह और श्रद्धा अनुभव होने लगे तो विज्ञान भैरव के द्वार आपके लिए खुलने लगते हैं! किंतु विज्ञान भैरव का पात्र कौन? कौन पुरुष, कौन सा भैरव अपने भीतर इस विज्ञान भैरव नाम के इस दिव्य भैरव को उतार सकता है? कौन भैरव अपने नाम के आगे विज्ञान भैरव जोड़ सकता है? और कौन सा पुरुष इस पृथ्वी पर, भूमंडल पर है जो विचरण करें और समस्त संसार उसको विज्ञान भैरव के दृष्टिकोण से देखें! इसके लिए आपको अपने भीतर उतरना पड़ेगा!आपको अपने भीतर की यात्रा करनी होगी और उस यात्रा का प्रारंभ होता है विज्ञान भैरव नाम की दीक्षा से...
विज्ञान भैरव दीक्षा! एक दीक्षा तो वह है जो आपको भैरव बना देती है, एक दीक्षा वह है जो भैरव के मन मस्तिष्क के भीतर विज्ञान की दृष्टि उत्पन्न कर देती है! विज्ञान यदि ना हो तो भ्रमों का संसार है! आप ध्यान भी करेंगे तो किसी को रंग दिखाई देते हैं! किसी को सुगंध आती, है तो किसी को अमृत का स्वाद अनुभव होता है! किसी को कंप कंपी महसूस होती है, तो किसी के सभी चक्रों में स्पंदन होने लगता है... यह सभी भ्रम है, सत्य नहीं है और यदि आप इन भ्रमों में फंसे रह गए, यदि आपने इन भ्रमों को सत्य मान लिया तो आप ज्ञानी तो कहला सकते हो विज्ञानी नहीं कहलाने वाले; विज्ञान वह है जो अपने मस्तिष्क और मन के सारे तलों से उस पार विशुद्ध सत्य की ओर जाए, उसे नहीं लेना देना कि कौन सी गंध है, उसे नहीं लेना देना कि कौन सा अनुभव हो रहा है, उत्तर नहीं लेना देना कि मैं 4 घंटे या 10 घंटे समाधि में हूं, वह अपनी यात्रा जारी रखेगा और इन सभी तत्वों को असत्य के रूप में स्वीकार करेगा। विज्ञान बड़ा कठोर है, वह आपके हृदय की भावनाओं के बारे में सोचता नहीं है! आधुनिक विज्ञान से प्रेरणा लीजिए... आप आसमान में चंद्रमा देखते हो, बचपन से चंद्रमा की कहानी सुनाते हो, अपनी प्रेमिका को कहते हो तुम चांद सी सुंदर हो,बचपन में बालक को कहते हो कि यह चंदा तुम्हारे मामा है, न जाने चांद की कितनी कहानियां, चांद पर कैसी कैसी दादियां और नानियां है! लेकिन ज्यों ही आप बड़े होते हैं, विज्ञान से आप का सामना होता है तो आपकी सारी इन कहानियों को टूट जाना होगा, इनको गिर जाना होगा, इनको नष्ट हो जाना होगा क्योंकि यह चंद्रमा जो आपके हृदय में बसने वाला है, आपके हृदय में कल्पना के रूप में स्थापित है वह चंद्रमा छद्म है! विज्ञान उस काल्पनिक चंद्रमा को नष्ट कर देगा। आपको पीड़ा हो सकती है, आपके हृदय में चोट पहुंच सकती है किंतु विज्ञान इस तत्व की चिंता नहीं करेगा। वह तो कहेगा भले ही तुम पीड़ा में से गुजरो, भले ही तुम इस सत्य को न स्वीकारो लेकिन सत्य तो यही है कि यह चंद्रमा एक पिंड है और इस पृथ्वी के चारों तरफ घूमने वाला एक और छोटा लघु उपग्रह है!
आप अक्सर धर्मगुरुओं के पास, धर्मगुरुओं के सानिध्य में जाने वाले आध्यात्मिक लोगों के पास जाइए, न जाने कैसी कैसी कूड़ा करकट रूपी भ्रांतियों से भरे पड़े हैं उनके मस्तिष्क। कोई अपने आप को भगवान का अवतार मानता है, किसी को लगता है मैं ही शिव हूं, कोई अपने आप को भगवान विष्णु का अवतार बताने पर जुटा है, कोई अपने आपको कल्कि कहता है, तो कोई अपने आप को दैत्य या रावण कहने से से भी नहीं चुकता, कोई अपने आप को ऋषि मुनि बताता है, तो कोई अपने आप को दिव्य सत्ता बताता है...अजीबो गरीब किस्म के ये भ्रम मस्तिष्क में घर कर गए है। लगता है मनासोपचर की जगह मानस मानस के उपचार की आवश्यकता है...पूजन की नहीं चिकित्सा कि आवश्यकता है! मस्तिष्क के ततुओंं में न जाने ऐसे कौन कौन से भ्रम और ऐसे कौन कौन से तत्त्व और रसायन है जो अजीबो गरीब भ्रम पैदा कर देते हैं। योगी ध्यान कर रहे है और कहते है में ब्रह्मांड में गति कर रहा हूं, मेरे पांच शरीर बन गए हैं, मेरे सौ शरीर बन गए है...लेकिन शिव कहते है कि तुम्हे प्रयोग करना है उस प्रयोग में भीतर उतरते चले जाना है। विज्ञान भैरव कौन है? आप और हम विज्ञान भैरव है लेकिन कब? जब हमारे ये भ्रम जब हमारी ये भ्रांतियां एक ओर हो जाएं, हम इनसे दूर हो जाए, ये छन जाए, परिष्कृत हो जाए, संस्कारित हो जाए। अध्यात्म को छानते जाइए, भक्ति को छानते जाइए, श्रद्धा को छानते जाइए, हृदय को छानते जाइए, जिव्हा को छानते जाइए, अध्यात्म के तमाम रसों को छानते जाइए तो अंत में बुद्धि जो उत्पन्न होगी सत्यमय वह विज्ञानमय होगी।
तो आप और हम... वह सभी लोग जो शिव के भैरव है, अपने हृदय में शिव को प्राप्त करते हैं, शिव को मानते हैं और जो इस शिव की योगिनी कौल सिद्ध परंपरा से जुड़े हैं, जो कुल्लू की कौलांतक दिव्य परंपरा से जुड़े हैं, जो कौलांतक पीठ से जुड़े हैं, शास्त्र जिस कौलांतक पीठ को कुलांत पीठ कहकर संबोधित करता है; कुरुकुल्ला इत्यादि शक्तियां जिसकी नायिका है, चौसठ योगिनीयां जहां योग को प्रकट करने वाली है! एक एक योगिनी एक एक योग की परंपरा की नायिका शक्तियां है, तो 64 योग की परंपराएं उन योगिनियों ने संभाल कर रखी है और तंत्र ने उसका तांत्रिक स्वरूप सहेज कर रखा है लेकिन कितनों को आप और हम जानते हैं? इसका सा केवल वह भैरव धारण करता है जो गुरु रूपी शिव के सानिध्य में बैठकर सर्वप्रथम दीक्षा तत्व को शाक्त कुल से प्राप्त करता है...शैव कुल से नहीं! विज्ञान भैरव पुरुष प्रधान है लेकिन इसके ध्यान के भीतर जब जाएंगे...कुछ प्रणालियां केवल शाक्त प्रधान (स्त्री प्रधान) है। समझना होगा शिव अर्धनारीश्वर है, शक्ति भी स्वयं है और शिव के रूप में स्थूल भी स्वयं है! वही शिव आपके और मेरे भीतर भी विद्यमान है बस हमें उसकी यात्रा में उतरना है। विज्ञान रूपी ज्ञान प्राप्त करना है, छद्मता नहीं।
इसीलिए गुरु के पास जाकर विज्ञान भैरव दीक्षा प्राप्त करनी होगी! विज्ञान भैरव वह दीक्षा है जो आपके भीतर एक प्रणाली के रूप में बस जाएगी इसलिए उसे तंत्र का नाम दिया! तंत्र कोई खून खराबा नहीं है, कोई हिंसा नहीं है, कोई शोषण नहीं है, तंत्र एक पद्धति है! तो विज्ञान भैरव के इस तंत्र रूपी सिद्धांत को अपने भीतर दीक्षा के माध्यम से उतार लेना! शाक्ति दीक्षा आवश्यक है इसमें ! शाक्ति दीक्षा के माध्यम से आपके भीतर वह तत्व उतर जाए फिर योग को समझ लेना, 64 योग की परंपराओं को समझ लेना; की एक-एक योगिनी के पास आखिर कौन-कौन सा योग अवस्थित है, कौन सी योग की और तंत्र की वो परंपराएं है जिसकी वो नायिका शक्तियां है और क्यों शिव बिना उनका नाम लिए मां पार्वती को अत्यंत सहज सूत्र देते हैं लेकिन सहज दिखने वाले सूत्र की थाह कितनी गहरी है! ज्यों ही दीक्षा घटित हुई त्यों ही योग की यात्रा में उतर आना, क्यों ही समाधि की ओर दृष्टिपात करना, त्यों ही कुंडलिनी को समझने की कोशिश करना, त्यों ही शिव और शक्ति को जानने के रहस्य में जूट जाना और त्यों ही विज्ञान भैरव तंत्र के अद्भुत ग्रंथ को सीने से लगा लेना! यह वह अद्भुत ग्रंथ है कि इस पृथ्वी पर महात्मा बुद्ध जैसे अवतार भी आए, उन्होंने भी विज्ञान भैरव तंत्र के सूत्र को अपना कर ध्यान के लिए उसी के सूत्र को अपने जीवन में उतारा है... हालांकि कालांतर में बहुत सारे लोग यह कहते हैं कि बौद्ध धर्म से यह सूत्र विज्ञान भैरव में आया... लेकिन याद रखिए, विज्ञान और भैरव है... भैरव याचक नहीं है; भैरव ज्ञान के किसी उपाय, किसी शैली, किसी पद्धति के याचक या उसे एकत्रित करने वाले, बीनने वाले काक अर्थात् कौवे नहीं है! भैरव सत्य के ऊपर चलने वाले, सत्य को अपने गंभीर मति से समझने वाले, और सत्य यदि समझ में ना आए तो अपने मस्तिष्क में नवीन नाड़ी तंत्र का विकास करने वाले अद्भुत शिव के गण होते हैं! आप और हम याचक नहीं है! आप और हम पुरुषार्थी है! कर्मयोग को समझने वाले हैं। इसलिए हम विज्ञान भैरव को एक नई दृष्टि से समझते हैं, हमारे भीतर विज्ञान भैरव का एक एक हिस्सा ऐसे बसा है, एक एक श्लोक, एक एक पन्ना, एक एक शब्द ऐसे बसा है जैसे हमारी इन नलिकाओं में रक्त बसा है! हम शिव की परंपराओं में पैदा होने वाले, पलने बढ़ने वाले वह नन्हे शिशु है जो युवा हो जाते है, फिर योगी बनते हैं, वृद्ध हो कर भी अपनी गरिमा को नष्ट नहीं होने देते, अपने इस विज्ञान को नष्ट नहीं होने देते,अपनी बुद्धि को भ्रमों में नहीं जाने देते! हम बाह्य आडंबरों से मुक्त है । हम विज्ञान भैरव को पढ़ते नहीं है, हम विज्ञान भैरव के सिद्धांतों को सीखते नहीं है हम उनको जीते हैं! हम गुरु से विज्ञान भैरव दीक्षा प्राप्त कर स्वयं को विज्ञान भैरव बनाने के पथ पर अग्रसर होते हैं और एक एक सांस हमारी अपने आप में विज्ञान भैरव के सूत्र है!
आपके जीवन में यह विज्ञान भैरव उतर जाए, आप यह समझ सके कि आपके भीतर भी एक स्त्री है, आप यह समझ जाए कि आपके भीतर भी एक पुरुष है, आप यह समझ जाए कि आप स्त्री और पुरुष के तत्व से भी ऊपर हो, आप किसी तत्व से भयभीत ना हो। कुछ लोग, कुछ धर्म ऐसे हैं मूर्तियों को देखकर कांप जाते हैं कहते हैं यह भगवान नहीं! और कुछ धर्म ऐसे हैं जो कहते हैं कि वह सूक्ष्म भगवान नहीं, कुछ जीवित मनुष्यों में भगवान को देखते हैं,कुछ प्रकृति के तत्वों में भगवान को देखते हैं लेकिन विज्ञान भैरव वह है जो कहीं भी भ्रमित नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से, परम प्रज्ञा से बेहद उत्तम, पवित्र, स्थिर बुद्धि से उस परम ज्ञान को समजते है, धारण करते है... इसीलिए वो विज्ञान भैरव है!
क्या आप विज्ञान भैरव हो? क्या आपके अंदर विज्ञान भैरव तत्व है? क्या आपके भीतर मां पार्वती, मां शक्ति, मां विज्ञान भैरवी आपके मस्तिष्क और हृदय में निवास करने वाली शक्ति है? जीवन में ग्रंथ केवल ग्रंथ नहीं है... याद रखिए तंत्र के ग्रंथ ग्रंथ या पुस्तकें नहीं है, कि कोई लेखक उसे लिख से और आप उसे पढ़ ले, या कोई तंत्र आचार्य या कोई तांत्रिक एक पुस्तक लिखे और कहे, "देखिए मैंने विज्ञान भैरव की व्याख्या लिख दी है और मै तुम्हे इसका उपदेश करता हूं, तुम इसे समझ जाओगे!"...गुरु का स्पर्श लीजिए ; यहां स्पर्श की अनिवार्यता है! ये तुम्हारी मनघड़ंत व्याख्याओं पर नहीं चलेगा, यहां तुम्हारे कुतर्क नहीं चलेंगे, यहां पर तुम्हारे बहाने नहीं चलेंगे! यहां को गुरु कहेगा वो तुम्हे धारण करना ही होगा। यहां जो शिव ने परंपरा दी उसको तुम्हे सत्य स्वरूप में स्वीकारना ही होगा! यहां तुम्हे इसे परंपरा के साथ इसे धारण करना होगा, तब ये ग्रंथ नहीं रहेगा, तब ये जीवित पुरुष हो जाएगा !विज्ञान भैरव तंत्र के भीतर इतने रहस्य छिपे हैं कि जानना बड़ा जटिल लगता है लेकिन परेशान होने की आवश्यकता नहीं है; गुरु शिष्य परंपरा है, मै अभी जीवित हूं! तुम भी अभी जीवित हो! मेरे बाद भी इस रहस्य को बतनेवाले हमारी परम्पराओं के पुरोधा आगे आएंगे! जिन पुरोधाओं से मैंने सीखा उन्होंने मेरे भीतर भी इसका बीज डालकर स्थापित किया था, आज अंकुरित है! आज मै चाहता हूं कि ये परंपरा मुझ तक न रहे; तुम इसे स्वीकारो, धारण करो। एक ओर भैरव जहां विकराल है वहीं सौंदर्यशाली! एक ओर जहां वो तांडव करते हैं वहीं को लास नृत्य में भी भगवती के स्वरूप के भीतर ही विद्यमान रहते हैं! जहां वो रूद्र वीणा धारण करनेवाले है, नाद और संगीत के अधिपति है, उस सदाशिव ईश्वर महादेव के बारे में मै केवल ये कह सकता हूं कि, "वही विज्ञान भैरव है!" उनके सूत्रों को समझने के लिए आपको भी विज्ञान भैरव ही होना होगा! इससे कम में समझौता होने की गुंजाइश नहीं है, संभावनाएं नहीं है; इसलिए जीवन में जितनी भी तकलीफें हो तुम्हारी मुझे नहीं पता; तुम भैरव हो लडो, पैदा ही लड़ने के लिए हुए हो; हारने के लिए नहीं। विज्ञान भैरव हो तो अपने भीतर की वीरता को जागृत रखना, अपने भयों को रोंद कर रखना और भयों से उस पार निकाल जाओ। आओ हम इस विज्ञान भैरव के एक एक पृष्ठ पर अपने आप को बिछा देते हैं! विज्ञान भैरव के एक एक शब्द को सत्य स्वरूप अपने भीतर प्रयोगात्मक रीति से उतारते है, इसे समझते हैं! मै गुरु के सानिध्य में इसे समझ रहा हूं, स्वीकार रहा हूं; तुम्हे अपने गुरु के सानिध्य में इसे समझना है! श्रेष्ठ गुरु..श्रेष्ठ शिष्य...महा भैरव.. महा भैरव के महा भैरव पुत्र... इसी प्रकार ये परंपरा आगे बढ़ रही है, बढ़ेगी। इसलिए विज्ञान भैरव को पढ़ना नहीं धारण करना! स्वीकारना नहीं आत्मसात् कर लेना! इसे गुरु से खरीद मत लेना, धारण कर लेना! आज्ञा चक्र से ब्रह्मरंध में स्थापित कर लेना, यहां से विज्ञान भैरव की शुरुआत होगी । पुस्तक से उस पार एक और विज्ञान भैरव आपकी प्रतीक्षा कर रहा है उसकी तलाश में निकल जाओ, अभी इसी समय।
- महासिद्ध ईशपुत्र
मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019
आन्तरराष्ट्रीय कौलान्तक सिद्ध विद्यापीठ वज्र योगिनी तंत्र पर आगामी पाठ्यक्रम की घोषणा करते हुए प्रसन्नता अनुभव कर रही है।
इस धरा पर वज्र योगिनी तंत्र की विशालता को समाहित करने वाला यह अभूतपूर्व कोर्स है। वज्र योगिनी तंत्र की शिक्षाओं और ज्ञान के विस्तार को किसी भी परंपरा में इससे पहले कभी गहराई से नहीं बताया गया है।
वज्र योगिनी तंत्र जो हिंदू धर्म, बुद्धाचार और कई अन्य परंपराओं में संदर्भित है, वज्र योगिनी तंत्र की विशालता का केवल कुछ पहलू मात्र है।
आइए और सिद्ध धर्मानुसार सीखिए वज्र योगिनी के विशाल तंत्र, उनके विभिन्न रूप, वज्र योगिनी तांत्रिक नृत्य, डाकिनी गीत, उनकी गुप्त मुद्रा माला, शामानिक शाबर मंत्र परंपरा और जानिए उनके बारह भैरवों और उनके मुखौटों के बारे में ।
आप यह भी सीखेंगे कि वज्र योगिनी भाव समाधि को कैसे प्राप्त किया जाए और वज्र वैरोचिनी, उग्रा तारा और वज्र वाराही के साथ उसका क्या संबंध है।
इस सर्टिफिकेशन कोर्स में संपूर्ण वज्र योग और इसकी उत्पत्ति, नास्तिकों की तांत्रिक और यौगिक परंपरा भी सिखाई जाएगी।
आप कुल कुंडलिनी के साथ वज्र योगिनी का संबंध और कैसे वज्र योगिनी अपने साधकों के भीतर सुप्त अनंत शक्ति को जागृत करती है यह भी जानेंगे।
तांत्रिक वज्र योग और वज्र योगिनी का यन्त्र और वज्रयोगिनी का दर्शन भी इस पाठ्यक्रम में समाहित होगा।
आप यह भी सीखेंगे की वज्रयोगिनी का अपने दैनिक जीवन में कैसे उपयोग करें । यह पाठ्यक्रम आपको अपने जीवन में नकारात्मकता और भय को दूर करने और नेतृत्व के गुणों को विकसित करने के लिए सहायक सिद्ध होगा।
महासिद्ध ईशपुत्र इस भ्रम को स्पष्ट करेंगे कि वज्र योगिनी योगिनी है या डाकिनी या देवी या यक्षिणी।
पंजीकरण के लिए कृपया देखें,
Upcoming Events
आन्तरराष्ट्रीय कौलान्तक सिद्ध विद्यापीठ के इस कोर्स को प्रायोजित और सहप्रयोजित महासिद्ध ईशपुत्र के मार्गदर्शन में कौलान्तक पीठ, हिमालय द्वारा किया गया है।
इस धरा पर वज्र योगिनी तंत्र की विशालता को समाहित करने वाला यह अभूतपूर्व कोर्स है। वज्र योगिनी तंत्र की शिक्षाओं और ज्ञान के विस्तार को किसी भी परंपरा में इससे पहले कभी गहराई से नहीं बताया गया है।
वज्र योगिनी तंत्र जो हिंदू धर्म, बुद्धाचार और कई अन्य परंपराओं में संदर्भित है, वज्र योगिनी तंत्र की विशालता का केवल कुछ पहलू मात्र है।
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2018
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बज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018
मातंगी के बिना पूरा जीवन अधूरा है । जिस व्यक्ति को अपने जीवन में प्रेम अनुभव नहीं हुआ हो, जिस व्यक्ति को अपने जीवन में "गुरुत्व" का एहसास नहीं हुआ हो, किस व्यक्ति को अपने होने का अभी तक बोध नहीं हुआ हो उसके लिए मातंगी साधना बड़ी ही अनिवार्य है, क्योंकि हम पैदा तो हो जाते हैं हम ज्ञान विज्ञान सीख लेते हैं, बुद्धि-बल और विवेक भी हमें आ जाता है और हम पूरी जिंदगी जीते चले जाते हैं लेकिन धीरे धीरे धीरे सब नष्ट होता जाता है और जीवन का जो आखिरी भाग हमारे पास आता है वह बहुत ही खराब भाग होता है; तब हमारे पास कुछ नहीं होता जब तक हम सुंदर है, सौंदर्यशाली हैं, सामर्थ्यवान है तब तक ही हमारी जय जयकार होती है, तो मातंगी आपको नित्य बनाती है इसलिए शब्द है नित्य कन्या और नित्य पुरुष; जो पहले भी थे आज भी है और भविष्य में भी रहेंगे ! जिनको "चिरंजीवी" भी कहा जाता है, तो आपकी चेतना भी चिरंजीवी हो जाए, आपके भीतर भी स्थायित्व हो जाए वह सब आपको मातंगी देती है और याद रहे हम पृथ्वी पर कोई भी काम तब तक नहीं कर सकते जब तक उसमें आनंद ना हो, जब तक उसमें रस ना हो, जब तक उसमें दिव्यता ना हो और वह रस जो है वह आपको मातंगी देगी । अब आपको अगर मैं आप लोग कहीं से आ रहे हो और इतना बड़ा फूलों का गुलदस्ता बनाकर आपको समर्पित करुं । अगर आपने फूलों के प्रति उसका सौंदर्य है, मेरे प्रेम को समझने की बुद्धि है तब तो आप उस को संभाल कर रखेंगे लेकिन अगर नहीं है तो सामने भैंस आ रही होंगी उसको खिला देंगे कि, "ले जी तेरे लिए बढ़िया वाला चारा है ।" तो फर्क तो एक ही चीज का है केवल उस स्थिति का है, इसलिए धर्म को भी सभी लोग नहीं समझ सकते । आप कोशिश करके देखिए । किसी नास्तिक को जाकर धर्म समझाइए जरा, मैं मान जाऊंगा यदि आप समझाने में कामयाब हो गए । क्यों ? क्योंकि उसके पास वो तन्तु ही नहीं हैं, उसके पास वह सामर्थ्य ही नहीं है ।जब आप धर्म को समझ सकते हैं तो वह भी तो समझ सकता होगा, दिमाग तो उसके पास भी वही है, मेरे पास भी वही है....अगर मैंने भी विज्ञान की पढ़ाई की है, अगर मेरे भी मस्तिष्क में नास्तिकतावाद है, आस्तिकतावाद है, धर्म है, दर्शन है, तब भी मेरे मन में दृढ़ विश्वास है कि, 'धर्म का यह पक्ष सत्य है', तो मुझे कहीं से तो वह विचार आ रहा है, कोई तो मुझे वह दे रहा है और उसको भी यदि वह नहीं समझ आ रहा है वह नहीं समझ पा रहा है तो उसे भी वह तत्व कोई दे रहा है । तो वो सब संचालित करने वाली शक्ति मातंगी होती है ।मातंगी के कारण ही मुनि मातंग हुए थे उनकी कथा कहीं ढूंढिएगा पढ़िएगा की कितनी अद्भुत कथा उनकी थी । तो मातंगी शक्ति के बिना मैंने कहा कि जीवन अधूरा है ।आपके पास सामर्थ्य होनी चाहिए समझने की, आपके पास सामर्थ्य होनी चाहिए किसी भी चीज को ग्रहण करने की । ये ठीक वैसे ही कि आप संध्या के समय कहीं बैठे हो और कोई व्यक्ति सामने से आए, आने के बाद वह आपकी स्तुति करें, आपकी प्रशंसा करें और बहुत ज्यादा आपकी तारीफ करें इतनी ज्यादा कि इससे पहले पृथ्वी पर किसी की तारीफ ना हुई हो और बाद में उसे पता चले कि आप तो बहरे थे । तो उस प्रशंसा का कोई सार नहीं रह जाएगा । वैसे ही सृष्टि है, ये प्रतिपल आपको आनंद देना चाहती है क्योंकि माया है । योगमाया है वह तो आपकी मां है और अगर वह हमारी मां है तो सागर भी मुझे आनंद देगा, यह लाइट्स भी मुझे आनंद देगी, यह पर्दे भी आनंद देंगे, आप लोग भी मुझे आनंद देंगे क्योंकि सब मेरी मां का ही तो है ! वह मेरे विरुद्ध कैसे जाएगा लेकिन मुझे वह आनंद सुनाई नहीं देगा क्योंकि मैं अभी बहरा हूं । तो वो कान खोलने के लिए, उस आनंद को जानने के लिए मातंगी अपने आप में एक प्रमुख विद्या है ।
- महासिद्ध ईशपुत्र
- महासिद्ध ईशपुत्र
रविवार, 12 अगस्त 2018
श्री रक्ततारा तंत्रादि भूतबाधा नाशक महामंत्र
रविवार, अगस्त 12, 2018
Posted By:
Kaulantak Vani
।।श्री रक्ततारा तंत्रादि भूतबाधा नाशक महामंत्र।।
रक्तवर्णकारिणी, मुण्ड मुकुटधारिणी, त्रिलोचने शिव प्रिये, भूतसंघ विहारिणी
भालचंद्रिके वामे, रक्त तारिणी परे, पर तंत्र-मंत्र नाशिनी, प्रेतोच्चाटन कारिणी
नमो कालाग्नि रूपिणी,ग्रह संताप हारिणि, अक्षोभ्य प्रिये तुरे, पञ्चकपाल धारिणी
नमो तारे नमो तारे, श्री रक्त तारे नमो।
ॐ स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं रं रं रं रं रं रं रं रं रक्तताराय हं हं हं हं हं घोरे-अघोरे वामे खं खं खं खं खं खर्पपरे सं सं सं सं सं सकल तन्त्राणि शोषय-शोषय सर सर सर सर सर भूतादि नाशय-नाशय स्त्रीं हुं फट।
om streem streem streem ram ram ram ram ram ram ram ram rakttaraya ham ham ham ham ham ghore Aghore Vaame kham kham kham kham kham Kharpare sam sam sam sam sam Sakal Tantrani Shoshaya-Shoshaya Sar sar sar sar sar Bhootadi Naashaya Naashaya Streem Hum Phat.
वास्तु दोष मिटाइए बिना तोड़ फोड़
रविवार, अगस्त 12, 2018
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Kaulantak Vani
आज आपको मिलेगा संम्पति सुख
बिना तोड़ फोड़-दूर होगा वास्तु दोष
घर में होगी सुख शान्ति
धर्म कर्म और अन्न धन से भर उठेगी गृहस्थी
क्योंकि आपके घर सब सुख लाने वाला है
सागर का एक चमत्कारी कछुआ
आपने बाजार में मिटटी अथवा धातुओं के बहुत से कछुयों को देखा होगा जिनको शुभ प्रतीक मान कर बेचा जाता है, जो लोग फेग शुई से जुडी चीजे खरीदते है वो अच्छी तरह से जानते है कि एक कछुआ जीवन में धन संपत्ति का बरदान ले कर आ सकता है, इसलिए भारत ही नहीं विदेशों तक सुख शान्ति वास्तु दोष और धन प्राप्ति के लिए घरों में धातु या मिटटी के बने कछुए रखे जाते हैं, आपके घर पर भी आपने या आपके बच्चों ने भी एक आध कछुया जरूर रखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये साधारण सा कछुआ भगवान विष्णु जी का कूर्म अवतार है आइये हम आपको बताते हैं-कूर्म का अर्थ होता है कछुआ, पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन का बृहद विवरण है, सुखसागर में निहित कथा कहती है कि दैत्यराज बलि के राज्य में दैत्य, असुर तथा दानव बहुत बहुत शक्तिशाली हो गए थे। क्योंकि उनको दैत्यगुरु शुक्राचार्य की महाशक्ति प्राप्त थी। अपने घमंड से चूर रहने वाले देवराज इन्द्र को किसी कारण से नाराज हो कर महारिषि दुर्वासा ने शक्तिहीन होने का शाप दे दिया, जिस कारण इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे। मौका पा कर दैत्यराज बलि नें युद्द कर तीनों लोकों पर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। अब इन्द्र सहित सभी देवतागण डर डर भटक रहे थे तथा दैत्यों से भयभीत रहते थे। अपनी इस दुर्दशा के निवारण के लिए वे बैकुण्ठनाथ विष्णु जी के पास ब्रह्मा जीसहित पहुचे। उनकी स्तुति करके उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाई। तब भगवान मधुर वाणी में बोले कि इस समय तुम लोगों के लिये संकट काल है। तुम दैत्यों से मित्रता कर लो और क्षीर सागर को मथ कर उसमें से अमृत निकाल कर पान कर लो। दैत्यों की सहायता से यह कार्य सुगमता से हो जायेगा। इस कार्य के लिये उनकी हर शर्त मान लो और अपना काम निकाल लो। अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे और तुममें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा। भगवान के आदेशानुसार इन्द्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकलने की बात दैत्यराज बलि को बताई। दैत्यराज बलि ने देवराज इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। लेकिन जब मन्दराचल पर्वत को सागर में डाला गया तो वो डूबने लगा, जिससे मथन असंभव हो गया, तब स्वयं भगवान श्री विष्णु कूर्म अर्थात कच्छप अवतार लेकर समुद्र में गए, उनहोंने मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखा और स्वयं उसका आधार बन गये। उस समय समस्त लोकपाल दिक्पाल उनकी कूर्म आकृति में स्थित हो गए,योगमाया नें सभी दिशाओं के प्रभाव को स्तंभित कर दिया, तब भगवान् विष्णु जी की सभी देवताओं नें स्तुति की और भगवान् विष्णु ने अपना एक पुरुष रूप दिखाया जिसे वस्तु पुरुष कहा जाता है, क्योंकि मूलतया कूर्म और वस्तु पुरुष एक ही होने से उनकी स्तुति और गणना कछाप अवतार के रूप में की गयी, इस दिव्य रूप में योगमाया आधारशक्ति के रूप में उनके साथ स्थित हुई, इसी लिए वस्तु शतर सहिओत कर्मकांड और पुराण कूर्म को ही प्रधान आसन मानते हैं और वास्तु पुरुष और कूर्म को देख कर ही निर्माण, शुभ दिशा,स्थान आदि का विचार किया जाता है, जिस दिन भगवान विष्णु जी ने कूर्म का रूप धारण किया था उसी को कूर्म जयंती के रूप में मनाया जाता है,शास्त्रों नें इस दिन की बड़ी महिमा गई हैं,इस दिन से निर्माण कार्य शुरू किया जाना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि योगमाया स्तम्भित शक्ति के साथ कूर्म में निवास करती है तो ऐसे में यदि आप वास्तु से जुड़े दोषों को नष्ट अथवा शांत करना चाहते हैं तो इससे सुन्दर अवसर दूसरा नहीं होगा, यदि आपने नया घर भूमि आदि खरीदी है तो उनके पूजन का भी यही समय सबसे उत्तम होता है, सबसे महत्वपूरण तथ्य तो ये है कि इस आप कुछ मंत्र जाप और उपाय कर बिना तोड़ फोड़ के भी वास्तु बदल सकते हैं, या बुरे वास्तु को शुभ में बदल सकते हैं, कूर्म अवतार के समय भगवान् की पीठ का घेरा एक लाख योजन का था। कूर्म की पीठ पर मन्दराचल पर्वत स्थापित करने से ही समुद्र मंथन सम्भव हो सका था। 'पद्म पुराण' में भी इसी आधार पर विष्णु का कूर्मावतार वर्णित है।
1) महावास्तु दोष निवारक मंत्र
दुर्भाग्य बश यदि आपका पूरा मकान निवास स्थान या फ्लेट ही वास्तु विरुद्ध बन गया हो और आप किसी भी हालत में उसमें सुधार नहीं कर सकते
तो केवल महावास्तु मंत्र का जाप एवं कूर्म देवता की पूजा करनी चाहिए जिसका विधान है कि
सबसे पहले लाल चन्दन और केसर कुमकुम मिला कर एक पवित्र स्थान पर कछुए की आकृति बना लेँ
कछुए के मुख की ओर सूर्य तथा पूछ की ओर चन्द्रमा बना लेँ
सुबिधानुसार आप धातु का बना कछुआ भी पूजन हेतु प्रयुक्त कर सकते हैं
फिर धूप दीप फल ओर गंगाजल या समुद्र का जल अर्पित करें
भूमि पर ही आसन बिछ कर रुद्राक्ष माला से 11 माला मंत्र का जाप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं कूर्माय वास्तु पुरुषाय स्वाहा
जाप पूरा होने के बाद घर अथवा निवास स्थान के चारों ओर एक एक कछुए का छोटा निशान बना दें
ऐसा करने से पूरी तरह वास्तु दोष से ग्रसित घर भी दोष मुक्त हो जाता है दिशाएं नकारात्मक प्रभाव नहीं दे पाती उर्जा परिवर्तित हो जाती है
2)वास्तु दोष निवारक महायंत्र
यदि आप ऐसी हालत में भी नहीं हैं कि पूजा पाठ या मंत्र का जाप कर सकें और आप नकारात्मक वास्तु के कारण बेहद परेशान है
घर दूकान या आफिस को बिना तोड़े फोड़े सुधारना चाहते हैं तो उसका दिव्य उपाय है महायंत्र
वास्तु का तीब्र प्रभावी यन्त्र
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121 177 944
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533 291 311
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657 111 312
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यन्त्र को आप सादे कागज़ भोजपत्र या ताम्बे चाँदी अष्टधातु पर बनवा सकते हैं
यन्त्र के बन जाने पर यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए
प्राण प्रतिष्ठा के लिए पुष्प धूप दीप अक्षत आदि ले कर यन्त्र को अर्पित करें
पंचामृत से सनान कराते हुये या छींटे देते हुये 21 बार मंत्र का उच्चारण करें
मंत्र-ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:
अब पीले रंग या भगवे रंग के वस्त्र में लपेट कर इस यन्त्र को घर दूकान या कार्यालय में स्थापित कर दीजिये
पुष्प माला अवश्य अर्पित करें
इस प्रयोग से एक बार में ही वास्तु दोष हट जाएगा
3) कूर्म चिन्ह के सरल टोटके
चांदी के गिलास बर्तन या पात्र पर कछुए का चिन्ह बना कर भोजन करने व पानी पीने से भारी से भारी तनाब नष्ट होता है
चार पायी बेड अथवा शयन कक्ष में धातु का कूर्म अर्थात कछुआ रखने से गहरी और सुखद निद्रा आती है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होती है
पूजा के स्थान पर ऐसा श्रीयंत्र स्थापित करें जो कछुए की पीठ पर बना हो इससे घर में सुख शान्ति के साथ साथ धन एवं अच्छे संस्कार आते हैं
रसोई घर में कूर्म की स्थापना करने से वहां पकने वाला भोजन रोगमुक्ति के गुण लिए भक्त को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाता है
यदि नया भवन बना रहे हैं तो आधार में चाँदी का कछुआ ड़ाल देने से घर में रहने वाला परिवार खूब फलता-फूलता है
बच्चों को विद्या लाभ व राजकीय लाभ मिले इसके लिए उनसे कूर्म की उपासना करवानी चाहिए तथा मिटटी के कछुए उनके कक्ष में स्थापित करें
यदि आपका घर किसी विवाद में पड़ गया हो या घर का संपत्ति का विवाद कोर्ट कचहरी तक पहुँच गया हो तो लोहे का कूर्म बना कर शनि मंदिर में दान करना चाहिए
घर की छत में कूर्म की स्थापना से शत्रु नाश होता है
4)राशि अनुसार किस रंग का कूर्म देगा धन लाभ
यदि आप व्यापारी है, नौकरी पेशेवाले है, अपना कोई काम करते हैं और धन लाभ प्राप्त ही नहीं कर पाते,
आपका व्यवसाय नौकरी स्थायी नहीं है धन लाभ हो नहीं पाता या होते होते बंद हो जाता है तो
आपको पूजा स्थान में अपनी राशी के अनुसार धनप्रदा कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
आइये राशिबार जानते है धनप्रदा कूर्म के बारे में
5)मेष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सुनहरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 3 का अंक लिख दें
मिथुन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए मटमैले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 9 का अंक लिख दें
कर्क राशि के जातकों को धनलाभ के लिए आसमानी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
सिंह राशि के जातकों को धनलाभ के लिए लाल रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 2 का अंक लिख दें
कन्या राशि के जातकों को धनलाभ के लिए भूरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
तुला राशि के जातकों को धनलाभ के लिए पीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृश्चिक राशि के जातकों को धनलाभ के लिए नीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 4 का अंक लिख दें
धनु राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 1 का अंक लिख दें
मकर राशि के जातकों को धनलाभ के लिए जमुनी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
कुम्भ राशि के जातकों को धनलाभ के लिए काले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 8 का अंक लिख दें
मीन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सफेद रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
6)भूमि दोष नाशक मंत्र उपाय
यदि आपका घर या जमीन ऐसी जगह है जहाँ भूमि में ही दोष है
आपका घर किसी श्मशान भूमि कब्रगाह दुर्घट स्थल या युद्ध भूमि पर बना है
कोई अशुभ साया या जमीनी अशुभ तत्व स्थान में समाहित हों
जिस कारण सदा भय कलह हानि रोग तानाब बना रहता हो तो जमीन में मिटटी के कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
एक मिटटी का कछुआ ले कर उसका पूजन करें
पूजन के लिए भूमि पर लाल वस्त्र बिछा लेँ
फिर गंगाजल से स्नान करवा कर कुमकुम से तिलक करें
पंचोपचार पूजा करें अर्थात धूप दीप जल वस्त्र फल अर्पित करें
चने का प्रसाद बनाये व बांटे
7 माला मंत्र जाप पूर्व दिशा की और मुख रख कर करें
मंत्र-ॐ आधार पुरुषाय जाग्रय-जाग्रय तर्पयामि स्वाहा
साथ ही एक माला पूरी होने पर एक बार कछुए पर पानी छिड़कें
संध्या के समय भूमि में तीन फिट गढ्ढा कर गाद दें
समस्त भूमि दोष दूर होंगे
7)अदृश्य शक्ति नाशक प्रयोग
यदि आपको लगता है कि आपके घर में कोई अदृश्य शक्ति है
किसी तरह की कोई बाधा है तो
कूर्म की पूजा कर उसे मौली बाँध दें
लाल कपडे में बंद कर धूप दीप करें
21 बार मंत्र पढ़े
मंत्र-ॐ हां ग्रीं कूर्मासने बाधाम नाशय नाशय
रात के समय इसे द्वार पर रखे तथा सुबह नदी में प्रवाहित कर दें
इससे घर में तुरन शांति हो जायेगी
8)भूमि भवन सुख दायक प्रयोग
यदि आपको लगता है कि आपके पास ही घर क्यों नहीं है? आपके पास ही संपत्ति क्यों नहीं है?
क्या इतनी बड़ी दुनिया में आपको थोड़ी सी जगह मिलेगी भी या नहीं तो परेशान मत होइए केवल कूर्म स्वरुप विष्णु जी की पूजा कीजिये
विष्णु जी की प्रतिमा के सामने कूर्म की प्रतिमा रखें या कागज पर बना कर स्थापित करें
इस कछुए के नीचे नौ बार नौ का अंक लिख दें
भगवान् को पीले फल व पीले वस्त्र चढ़ाएं
तुलसी दल कूर्म पर रखें और पुष्प अर्पित कर भगवान् की आरती करें
आरती के बाद प्रसाद बांटे व कूर्म को ले जा कर किसी अलमारी आदि में छुपा कर रख लेँ
इस प्रयोग से भूमि संपत्ति भवन के योग रहित जातक को भी इनका सुख प्राप्त होता है
9)वास्तु स्थापन प्रयोग
यदि आपका दरवाजा खिड़की कमरा रसोई घर सही दिशा में नहीं हैं तो उनको तोड़ने की बजाये
उनपर कछुए का निशान इस तरह से बनाये कि कछुए का मुख नीचे जमीन की ओर हो और पूंछ आकाश की ओर
ये प्रयोग शाम को गोधुली की बेला में करना चाहिए
कछुए को रंग से या रक्त चन्दन कुमकुम केसर से भी बनाया जा सकता है
कछुए का निर्माण करते समय मानसिक मंत्र का जाप करते रहें
मंत्र-ॐ कूर्मासनाय नम:
कछुया बन जाने पर धूप दीप कर गंगा जल के छीटे दें
इस तरह प्रयोग करने से गलत दिशा में बने द्वार खिड़की कक्ष आदि को तोड़ने की आवश्यकता नहीं होती ऐसा शास्त्रीय कथन है
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ
बिना तोड़ फोड़-दूर होगा वास्तु दोष
घर में होगी सुख शान्ति
धर्म कर्म और अन्न धन से भर उठेगी गृहस्थी
क्योंकि आपके घर सब सुख लाने वाला है
सागर का एक चमत्कारी कछुआ
आपने बाजार में मिटटी अथवा धातुओं के बहुत से कछुयों को देखा होगा जिनको शुभ प्रतीक मान कर बेचा जाता है, जो लोग फेग शुई से जुडी चीजे खरीदते है वो अच्छी तरह से जानते है कि एक कछुआ जीवन में धन संपत्ति का बरदान ले कर आ सकता है, इसलिए भारत ही नहीं विदेशों तक सुख शान्ति वास्तु दोष और धन प्राप्ति के लिए घरों में धातु या मिटटी के बने कछुए रखे जाते हैं, आपके घर पर भी आपने या आपके बच्चों ने भी एक आध कछुया जरूर रखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये साधारण सा कछुआ भगवान विष्णु जी का कूर्म अवतार है आइये हम आपको बताते हैं-कूर्म का अर्थ होता है कछुआ, पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन का बृहद विवरण है, सुखसागर में निहित कथा कहती है कि दैत्यराज बलि के राज्य में दैत्य, असुर तथा दानव बहुत बहुत शक्तिशाली हो गए थे। क्योंकि उनको दैत्यगुरु शुक्राचार्य की महाशक्ति प्राप्त थी। अपने घमंड से चूर रहने वाले देवराज इन्द्र को किसी कारण से नाराज हो कर महारिषि दुर्वासा ने शक्तिहीन होने का शाप दे दिया, जिस कारण इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे। मौका पा कर दैत्यराज बलि नें युद्द कर तीनों लोकों पर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। अब इन्द्र सहित सभी देवतागण डर डर भटक रहे थे तथा दैत्यों से भयभीत रहते थे। अपनी इस दुर्दशा के निवारण के लिए वे बैकुण्ठनाथ विष्णु जी के पास ब्रह्मा जीसहित पहुचे। उनकी स्तुति करके उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाई। तब भगवान मधुर वाणी में बोले कि इस समय तुम लोगों के लिये संकट काल है। तुम दैत्यों से मित्रता कर लो और क्षीर सागर को मथ कर उसमें से अमृत निकाल कर पान कर लो। दैत्यों की सहायता से यह कार्य सुगमता से हो जायेगा। इस कार्य के लिये उनकी हर शर्त मान लो और अपना काम निकाल लो। अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे और तुममें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा। भगवान के आदेशानुसार इन्द्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकलने की बात दैत्यराज बलि को बताई। दैत्यराज बलि ने देवराज इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। लेकिन जब मन्दराचल पर्वत को सागर में डाला गया तो वो डूबने लगा, जिससे मथन असंभव हो गया, तब स्वयं भगवान श्री विष्णु कूर्म अर्थात कच्छप अवतार लेकर समुद्र में गए, उनहोंने मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखा और स्वयं उसका आधार बन गये। उस समय समस्त लोकपाल दिक्पाल उनकी कूर्म आकृति में स्थित हो गए,योगमाया नें सभी दिशाओं के प्रभाव को स्तंभित कर दिया, तब भगवान् विष्णु जी की सभी देवताओं नें स्तुति की और भगवान् विष्णु ने अपना एक पुरुष रूप दिखाया जिसे वस्तु पुरुष कहा जाता है, क्योंकि मूलतया कूर्म और वस्तु पुरुष एक ही होने से उनकी स्तुति और गणना कछाप अवतार के रूप में की गयी, इस दिव्य रूप में योगमाया आधारशक्ति के रूप में उनके साथ स्थित हुई, इसी लिए वस्तु शतर सहिओत कर्मकांड और पुराण कूर्म को ही प्रधान आसन मानते हैं और वास्तु पुरुष और कूर्म को देख कर ही निर्माण, शुभ दिशा,स्थान आदि का विचार किया जाता है, जिस दिन भगवान विष्णु जी ने कूर्म का रूप धारण किया था उसी को कूर्म जयंती के रूप में मनाया जाता है,शास्त्रों नें इस दिन की बड़ी महिमा गई हैं,इस दिन से निर्माण कार्य शुरू किया जाना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि योगमाया स्तम्भित शक्ति के साथ कूर्म में निवास करती है तो ऐसे में यदि आप वास्तु से जुड़े दोषों को नष्ट अथवा शांत करना चाहते हैं तो इससे सुन्दर अवसर दूसरा नहीं होगा, यदि आपने नया घर भूमि आदि खरीदी है तो उनके पूजन का भी यही समय सबसे उत्तम होता है, सबसे महत्वपूरण तथ्य तो ये है कि इस आप कुछ मंत्र जाप और उपाय कर बिना तोड़ फोड़ के भी वास्तु बदल सकते हैं, या बुरे वास्तु को शुभ में बदल सकते हैं, कूर्म अवतार के समय भगवान् की पीठ का घेरा एक लाख योजन का था। कूर्म की पीठ पर मन्दराचल पर्वत स्थापित करने से ही समुद्र मंथन सम्भव हो सका था। 'पद्म पुराण' में भी इसी आधार पर विष्णु का कूर्मावतार वर्णित है।
1) महावास्तु दोष निवारक मंत्र
दुर्भाग्य बश यदि आपका पूरा मकान निवास स्थान या फ्लेट ही वास्तु विरुद्ध बन गया हो और आप किसी भी हालत में उसमें सुधार नहीं कर सकते
तो केवल महावास्तु मंत्र का जाप एवं कूर्म देवता की पूजा करनी चाहिए जिसका विधान है कि
सबसे पहले लाल चन्दन और केसर कुमकुम मिला कर एक पवित्र स्थान पर कछुए की आकृति बना लेँ
कछुए के मुख की ओर सूर्य तथा पूछ की ओर चन्द्रमा बना लेँ
सुबिधानुसार आप धातु का बना कछुआ भी पूजन हेतु प्रयुक्त कर सकते हैं
फिर धूप दीप फल ओर गंगाजल या समुद्र का जल अर्पित करें
भूमि पर ही आसन बिछ कर रुद्राक्ष माला से 11 माला मंत्र का जाप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं कूर्माय वास्तु पुरुषाय स्वाहा
जाप पूरा होने के बाद घर अथवा निवास स्थान के चारों ओर एक एक कछुए का छोटा निशान बना दें
ऐसा करने से पूरी तरह वास्तु दोष से ग्रसित घर भी दोष मुक्त हो जाता है दिशाएं नकारात्मक प्रभाव नहीं दे पाती उर्जा परिवर्तित हो जाती है
2)वास्तु दोष निवारक महायंत्र
यदि आप ऐसी हालत में भी नहीं हैं कि पूजा पाठ या मंत्र का जाप कर सकें और आप नकारात्मक वास्तु के कारण बेहद परेशान है
घर दूकान या आफिस को बिना तोड़े फोड़े सुधारना चाहते हैं तो उसका दिव्य उपाय है महायंत्र
वास्तु का तीब्र प्रभावी यन्त्र
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121 177 944
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533 291 311
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657 111 312
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यन्त्र को आप सादे कागज़ भोजपत्र या ताम्बे चाँदी अष्टधातु पर बनवा सकते हैं
यन्त्र के बन जाने पर यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए
प्राण प्रतिष्ठा के लिए पुष्प धूप दीप अक्षत आदि ले कर यन्त्र को अर्पित करें
पंचामृत से सनान कराते हुये या छींटे देते हुये 21 बार मंत्र का उच्चारण करें
मंत्र-ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:
अब पीले रंग या भगवे रंग के वस्त्र में लपेट कर इस यन्त्र को घर दूकान या कार्यालय में स्थापित कर दीजिये
पुष्प माला अवश्य अर्पित करें
इस प्रयोग से एक बार में ही वास्तु दोष हट जाएगा
3) कूर्म चिन्ह के सरल टोटके
चांदी के गिलास बर्तन या पात्र पर कछुए का चिन्ह बना कर भोजन करने व पानी पीने से भारी से भारी तनाब नष्ट होता है
चार पायी बेड अथवा शयन कक्ष में धातु का कूर्म अर्थात कछुआ रखने से गहरी और सुखद निद्रा आती है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होती है
पूजा के स्थान पर ऐसा श्रीयंत्र स्थापित करें जो कछुए की पीठ पर बना हो इससे घर में सुख शान्ति के साथ साथ धन एवं अच्छे संस्कार आते हैं
रसोई घर में कूर्म की स्थापना करने से वहां पकने वाला भोजन रोगमुक्ति के गुण लिए भक्त को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाता है
यदि नया भवन बना रहे हैं तो आधार में चाँदी का कछुआ ड़ाल देने से घर में रहने वाला परिवार खूब फलता-फूलता है
बच्चों को विद्या लाभ व राजकीय लाभ मिले इसके लिए उनसे कूर्म की उपासना करवानी चाहिए तथा मिटटी के कछुए उनके कक्ष में स्थापित करें
यदि आपका घर किसी विवाद में पड़ गया हो या घर का संपत्ति का विवाद कोर्ट कचहरी तक पहुँच गया हो तो लोहे का कूर्म बना कर शनि मंदिर में दान करना चाहिए
घर की छत में कूर्म की स्थापना से शत्रु नाश होता है
4)राशि अनुसार किस रंग का कूर्म देगा धन लाभ
यदि आप व्यापारी है, नौकरी पेशेवाले है, अपना कोई काम करते हैं और धन लाभ प्राप्त ही नहीं कर पाते,
आपका व्यवसाय नौकरी स्थायी नहीं है धन लाभ हो नहीं पाता या होते होते बंद हो जाता है तो
आपको पूजा स्थान में अपनी राशी के अनुसार धनप्रदा कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
आइये राशिबार जानते है धनप्रदा कूर्म के बारे में
5)मेष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सुनहरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 3 का अंक लिख दें
मिथुन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए मटमैले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 9 का अंक लिख दें
कर्क राशि के जातकों को धनलाभ के लिए आसमानी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
सिंह राशि के जातकों को धनलाभ के लिए लाल रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 2 का अंक लिख दें
कन्या राशि के जातकों को धनलाभ के लिए भूरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
तुला राशि के जातकों को धनलाभ के लिए पीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृश्चिक राशि के जातकों को धनलाभ के लिए नीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 4 का अंक लिख दें
धनु राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 1 का अंक लिख दें
मकर राशि के जातकों को धनलाभ के लिए जमुनी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
कुम्भ राशि के जातकों को धनलाभ के लिए काले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 8 का अंक लिख दें
मीन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सफेद रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
6)भूमि दोष नाशक मंत्र उपाय
यदि आपका घर या जमीन ऐसी जगह है जहाँ भूमि में ही दोष है
आपका घर किसी श्मशान भूमि कब्रगाह दुर्घट स्थल या युद्ध भूमि पर बना है
कोई अशुभ साया या जमीनी अशुभ तत्व स्थान में समाहित हों
जिस कारण सदा भय कलह हानि रोग तानाब बना रहता हो तो जमीन में मिटटी के कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
एक मिटटी का कछुआ ले कर उसका पूजन करें
पूजन के लिए भूमि पर लाल वस्त्र बिछा लेँ
फिर गंगाजल से स्नान करवा कर कुमकुम से तिलक करें
पंचोपचार पूजा करें अर्थात धूप दीप जल वस्त्र फल अर्पित करें
चने का प्रसाद बनाये व बांटे
7 माला मंत्र जाप पूर्व दिशा की और मुख रख कर करें
मंत्र-ॐ आधार पुरुषाय जाग्रय-जाग्रय तर्पयामि स्वाहा
साथ ही एक माला पूरी होने पर एक बार कछुए पर पानी छिड़कें
संध्या के समय भूमि में तीन फिट गढ्ढा कर गाद दें
समस्त भूमि दोष दूर होंगे
7)अदृश्य शक्ति नाशक प्रयोग
यदि आपको लगता है कि आपके घर में कोई अदृश्य शक्ति है
किसी तरह की कोई बाधा है तो
कूर्म की पूजा कर उसे मौली बाँध दें
लाल कपडे में बंद कर धूप दीप करें
21 बार मंत्र पढ़े
मंत्र-ॐ हां ग्रीं कूर्मासने बाधाम नाशय नाशय
रात के समय इसे द्वार पर रखे तथा सुबह नदी में प्रवाहित कर दें
इससे घर में तुरन शांति हो जायेगी
8)भूमि भवन सुख दायक प्रयोग
यदि आपको लगता है कि आपके पास ही घर क्यों नहीं है? आपके पास ही संपत्ति क्यों नहीं है?
क्या इतनी बड़ी दुनिया में आपको थोड़ी सी जगह मिलेगी भी या नहीं तो परेशान मत होइए केवल कूर्म स्वरुप विष्णु जी की पूजा कीजिये
विष्णु जी की प्रतिमा के सामने कूर्म की प्रतिमा रखें या कागज पर बना कर स्थापित करें
इस कछुए के नीचे नौ बार नौ का अंक लिख दें
भगवान् को पीले फल व पीले वस्त्र चढ़ाएं
तुलसी दल कूर्म पर रखें और पुष्प अर्पित कर भगवान् की आरती करें
आरती के बाद प्रसाद बांटे व कूर्म को ले जा कर किसी अलमारी आदि में छुपा कर रख लेँ
इस प्रयोग से भूमि संपत्ति भवन के योग रहित जातक को भी इनका सुख प्राप्त होता है
9)वास्तु स्थापन प्रयोग
यदि आपका दरवाजा खिड़की कमरा रसोई घर सही दिशा में नहीं हैं तो उनको तोड़ने की बजाये
उनपर कछुए का निशान इस तरह से बनाये कि कछुए का मुख नीचे जमीन की ओर हो और पूंछ आकाश की ओर
ये प्रयोग शाम को गोधुली की बेला में करना चाहिए
कछुए को रंग से या रक्त चन्दन कुमकुम केसर से भी बनाया जा सकता है
कछुए का निर्माण करते समय मानसिक मंत्र का जाप करते रहें
मंत्र-ॐ कूर्मासनाय नम:
कछुया बन जाने पर धूप दीप कर गंगा जल के छीटे दें
इस तरह प्रयोग करने से गलत दिशा में बने द्वार खिड़की कक्ष आदि को तोड़ने की आवश्यकता नहीं होती ऐसा शास्त्रीय कथन है
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ
मंगलवार, 7 अगस्त 2018
विकराल कुरुकुल्ला कवच मंत्र
मंगलवार, अगस्त 07, 2018
Posted By:
Kaulantak Vani
-------Goddess Kurukulla Mantra-----------
तू महाभैरवी देवी डाकिनी, तू गंधर्वपूजिता...
शांत रूप तेरा तू विकराला देवपूजिता...
तू वरदायिनी कैलाशवासिनी कुरुकुल्ला...
दुर्गा दुर्गतिनाशिनी तू अंबा हे जगदंबा...
ॐ ह्रीं वज्रपुष्पं हुं फट् आः सुरेखे वज्ररेखे स्त्रींकारी ह्रींकारी क्लींकारिणी कुरुकुल्ले कुल्लुकतारिणी कुल्लुकेशी हुं ऐं स्त्रीं ह्रीं फट् कीली-कीली युं हुं हुं ऐं त्रीं द्रीं क्षीं स्हूं सर्वार्थसाधिनी जग्रय-जग्रय ॥
(tu mahabhairavi devi dakini, tu gandharv poojitaa...
shant roop tera tu, vikaralaa Dev poojitaa.......
tu vardayini kailashwasini , kurukulla..........
durgaa durgati naashini tu, Ambaa he! jagdambaa.......)
( om hreem vjrapushpm hum phat aa: surekhe vajrrekhe streengkaaree hreengkaaree kleengkaarini kurukulle kulluktaarini kullukeshee hum aim streem hreem phat kili-kili yum hum hum aim treem dreem ksheem sahoom sarvarth sadhini jagraya-jagraya...........)
मंगलवार, 10 जुलाई 2018
गुप्त नवरात्रि में दश महाविद्याओं की साधना
मंगलवार, जुलाई 10, 2018
Posted By:
Kaulantak Vani
कथा एवं सार
एक समय ऋषि श्रृंग प्रजाजनों को दर्शन दे रहे थे अचानक भीड़ से एक स्त्री निकाल कर आई, और करबद्ध ऋषि श्रृंग से बोली कि, मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं,जिस कारण में कोई पूजा पाठ नहीं कर पाती, न ही ऋषि दर्शन एवं सेवा कर पाती हूँ, यहाँ तक कि ऋषियों को भेजे जाने वाला अन्न का भाग भी में नहीं दे पाती, मेरा पति मांसाहारी हैं, जुआरी है, लेकिन में माँ शक्ति दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूँ, उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूँ, तो ऋषि श्रृंग बोले कि, माता जिस प्रकार दो नवरात्र ग्रीष्म और शारदीय प्रतिवर्ष मनाये जाते हैं, ठीक वैसे ही दो नवरात्र और भी एक वर्ष में होते हैं जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है, जिस प्रकार नवरात्र नौ देवियों के होते हैं उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं,यदि कोई दस महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना कर ले तो जीवन धन धान्य राज्यसत्त ऐश्वर्य से भर जाता है, इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है, यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो माँ उसके जीवन को सफल कर देती हैं,लोभी,कामी,व्यसनी,सहित यदि मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि इन दिनों माता की पूजा कर ले तो जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती....इस प्रकार उस स्त्री ने ऋषि श्रृंग के वचनों पर श्रद्धा कर गुप्त नवरात्र की पूजा की और जीवन में परिवर्तन आने लगा,घर में सुख शान्ति आ गयी,पति सद्मार्ग पर आ गया,और जीवन माता की कृपा से खिल उठा.यदि आप भी कभी कभी शराब पी लेते हैं,मांसाहार कर लेते हैं और चाहते हैं की माता की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि आये, तो इस अवसर को नहीं चूकिएगा,ये भी बता दें की तंत्र और शाक्त मत का तो ये सबसे अहम् पर्व माना जाता है,वैशनो,पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का ये अहम् पर्व माना जाता है,पाकिस्तान स्थित हिन्गुलाज देवी की सिद्धि का भी यही अहम् समय होता है,शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किया लेकिन सिद्धि नहीं मिली तो उनहोंने काल ज्ञान द्वारा ये पता किया कि गुप्त नवरात्र ही वो समय है जब शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है, ऋषि विश्वामित्र ने तो शक्तिया प्राप्त कर नयी सार्ष्टि तक रच डाली......लंकापति रावन का पुत्र मेघनाद अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करना चाहता था ताकि कोई उसे जीत ना सके....तो मेघनाद ने अपने गुरु शुक्राचार्य से परामश किया तो शुक्राचार्य ने गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करने को कहा,मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की,राम राबण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही राम भगवान् सहित लक्षण जी को नागपाश मेमन बाँध कर मृत्यु के द्वार तक प[अहुंचा दिया था,ये भी कहा जाता है की यदि नास्तिक की परिहास्वश इन समय मंत्र साधना कर ले तो भी उसे फल मिल ही जाता है,यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है,यदि आप चाहते हैं मंत्र साधना करना,लेकिन काम-काज की उलझनों के कारण नहीं कर पाते नियमों का पालन तो ये समय आपके लिए ही माता की कृपा ले कर आया है,बिना किसी नियम को पाले बस कीजिये माँ शक्ति की मंत्र साधना और पाइए मनचाही मुराद,इस साधना के बारे में कहा जाता है की साधना से मनोकामना पूरी होने की 100 % गारंटी है,बस केवल बात ही ध्यान रखना होगा की आपके मंत्र,देवी का स्वरुप और पूजा रखनी होगी गुप्त,बिना किसी को बताये,घर पर ही करें माँ को प्रसन्न,और इसका आसान सा तरीका हम आपको आज बताने जा रहे हैं,तो कीजिये गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की महासिद्ध पूर्णमनोरथी साधना...................................
--------माँ शक्ति को प्रसन्न करने का प्रमुख मंत्र-------
धूप दीप प्रसाद माता को अर्पित करें
रुद्राक्ष की माला से ग्यारह माला का मंत्र जप करें
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
मंत्र-ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम: ।।
पेठे का भोग लगाएं
दस महाविद्याओं से पाइए मनचाही कामना
---------------------
काली----------------------
लम्बी आयु,बुरे ग्रहों के प्रभाव,कालसर्प,मंगलीक बाधा,अकाल मृत्यु नाश आदि के लिए देवी काली की साधना करें
हकीक की माला से मंत्र जप करें
नौ माला का जप कम से कम करें
मंत्र-क्रीं ह्रीं ह्रुं दक्षिणे कालिके स्वाहा ॥
---------------------तारा-----------------------
तीब्र बुद्धि रचनात्मकता उच्च शिक्षा के लिए करें माँ तारा की साधना
नीले कांच की माला से मंत्र जप करें
बारह माला का जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् ॥
-------------------त्रिपुर सुंदरी--------------------
व्यक्तित्व विकास पूर्ण स्वास्थ्य और सुन्दर काया के लिए त्रिपुर सुंदरी देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें
दस माला मंत्र जप अवश्य करें
मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदर्यै नमः ॥
------------------भुवनेश्वरी------------------------
भूमि भवन बाहन सुख के लिए भुबनेश्वरी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला का प्रयोग करें
ग्यारह माला मंत्र जप करें
मन्त्र-ॐ ह्रीं भुबनेश्वर्यै ह्रीं नमः ॥
------------------छिन्नमस्ता----------------------
रोजगार में सफलता,नौकरी पद्दोंन्ति के लिए छिन्नमस्ता देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिन्यै ह्रीं फट स्वाहा ॥
-----------------त्रिपुर भैरवी-----------------------
सुन्दर पति या पत्नी प्राप्ति,प्रेम विवाह,शीघ्र विवाह,प्रेम में सफलता के लिए त्रिपुर भैरवी देवी की साधना करें
मूंगे की माला से मंत्र जप करें
पंद्रह माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा ॥
------------------धूमावती------------------------
तंत्र मंत्र जादू टोना बुरी नजर और भूत प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए धूमावती देवी की साधना करें
मोती की माला का प्रयोग मंत्र जप में करें
नौ माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा ॥
-----------------बगलामुखी-----------------------
शत्रुनाश,कोर्ट कचहरी में विजय,प्रतियोगिता में सफलता के लिए माँ बगलामुखी की साधना करें
हल्दी की माला या पीले कांच की माला का प्रयोग करें
आठ माला मंत्र जप को उत्तम माना गया है
मन्त्र-ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम: ॥
-------------------मातंगी-------------------------
संतान प्राप्ति,पुत्र प्राप्ति आदि के लिए मातंगी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला से मंत्र जप करें
बारह माला मंत्र जप करें
ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा ।।
-------------------कमला-------------------------
अखंड धन धान्य प्राप्ति,ऋण नाश और लक्ष्मी जी की कृपा के लिए देवी कमला की साधना करें
कमलगट्टे की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा ॥
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज
एक समय ऋषि श्रृंग प्रजाजनों को दर्शन दे रहे थे अचानक भीड़ से एक स्त्री निकाल कर आई, और करबद्ध ऋषि श्रृंग से बोली कि, मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं,जिस कारण में कोई पूजा पाठ नहीं कर पाती, न ही ऋषि दर्शन एवं सेवा कर पाती हूँ, यहाँ तक कि ऋषियों को भेजे जाने वाला अन्न का भाग भी में नहीं दे पाती, मेरा पति मांसाहारी हैं, जुआरी है, लेकिन में माँ शक्ति दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूँ, उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूँ, तो ऋषि श्रृंग बोले कि, माता जिस प्रकार दो नवरात्र ग्रीष्म और शारदीय प्रतिवर्ष मनाये जाते हैं, ठीक वैसे ही दो नवरात्र और भी एक वर्ष में होते हैं जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है, जिस प्रकार नवरात्र नौ देवियों के होते हैं उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं,यदि कोई दस महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना कर ले तो जीवन धन धान्य राज्यसत्त ऐश्वर्य से भर जाता है, इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है, यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो माँ उसके जीवन को सफल कर देती हैं,लोभी,कामी,व्यसनी,सहित यदि मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि इन दिनों माता की पूजा कर ले तो जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती....इस प्रकार उस स्त्री ने ऋषि श्रृंग के वचनों पर श्रद्धा कर गुप्त नवरात्र की पूजा की और जीवन में परिवर्तन आने लगा,घर में सुख शान्ति आ गयी,पति सद्मार्ग पर आ गया,और जीवन माता की कृपा से खिल उठा.यदि आप भी कभी कभी शराब पी लेते हैं,मांसाहार कर लेते हैं और चाहते हैं की माता की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि आये, तो इस अवसर को नहीं चूकिएगा,ये भी बता दें की तंत्र और शाक्त मत का तो ये सबसे अहम् पर्व माना जाता है,वैशनो,पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का ये अहम् पर्व माना जाता है,पाकिस्तान स्थित हिन्गुलाज देवी की सिद्धि का भी यही अहम् समय होता है,शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किया लेकिन सिद्धि नहीं मिली तो उनहोंने काल ज्ञान द्वारा ये पता किया कि गुप्त नवरात्र ही वो समय है जब शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है, ऋषि विश्वामित्र ने तो शक्तिया प्राप्त कर नयी सार्ष्टि तक रच डाली......लंकापति रावन का पुत्र मेघनाद अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करना चाहता था ताकि कोई उसे जीत ना सके....तो मेघनाद ने अपने गुरु शुक्राचार्य से परामश किया तो शुक्राचार्य ने गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करने को कहा,मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की,राम राबण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही राम भगवान् सहित लक्षण जी को नागपाश मेमन बाँध कर मृत्यु के द्वार तक प[अहुंचा दिया था,ये भी कहा जाता है की यदि नास्तिक की परिहास्वश इन समय मंत्र साधना कर ले तो भी उसे फल मिल ही जाता है,यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है,यदि आप चाहते हैं मंत्र साधना करना,लेकिन काम-काज की उलझनों के कारण नहीं कर पाते नियमों का पालन तो ये समय आपके लिए ही माता की कृपा ले कर आया है,बिना किसी नियम को पाले बस कीजिये माँ शक्ति की मंत्र साधना और पाइए मनचाही मुराद,इस साधना के बारे में कहा जाता है की साधना से मनोकामना पूरी होने की 100 % गारंटी है,बस केवल बात ही ध्यान रखना होगा की आपके मंत्र,देवी का स्वरुप और पूजा रखनी होगी गुप्त,बिना किसी को बताये,घर पर ही करें माँ को प्रसन्न,और इसका आसान सा तरीका हम आपको आज बताने जा रहे हैं,तो कीजिये गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की महासिद्ध पूर्णमनोरथी साधना...................................
--------माँ शक्ति को प्रसन्न करने का प्रमुख मंत्र-------
धूप दीप प्रसाद माता को अर्पित करें
रुद्राक्ष की माला से ग्यारह माला का मंत्र जप करें
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
मंत्र-ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम: ।।
पेठे का भोग लगाएं
दस महाविद्याओं से पाइए मनचाही कामना
---------------------
काली----------------------
लम्बी आयु,बुरे ग्रहों के प्रभाव,कालसर्प,मंगलीक बाधा,अकाल मृत्यु नाश आदि के लिए देवी काली की साधना करें
हकीक की माला से मंत्र जप करें
नौ माला का जप कम से कम करें
मंत्र-क्रीं ह्रीं ह्रुं दक्षिणे कालिके स्वाहा ॥
---------------------तारा-----------------------
तीब्र बुद्धि रचनात्मकता उच्च शिक्षा के लिए करें माँ तारा की साधना
नीले कांच की माला से मंत्र जप करें
बारह माला का जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् ॥
-------------------त्रिपुर सुंदरी--------------------
व्यक्तित्व विकास पूर्ण स्वास्थ्य और सुन्दर काया के लिए त्रिपुर सुंदरी देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें
दस माला मंत्र जप अवश्य करें
मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदर्यै नमः ॥
------------------भुवनेश्वरी------------------------
भूमि भवन बाहन सुख के लिए भुबनेश्वरी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला का प्रयोग करें
ग्यारह माला मंत्र जप करें
मन्त्र-ॐ ह्रीं भुबनेश्वर्यै ह्रीं नमः ॥
------------------छिन्नमस्ता----------------------
रोजगार में सफलता,नौकरी पद्दोंन्ति के लिए छिन्नमस्ता देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिन्यै ह्रीं फट स्वाहा ॥
-----------------त्रिपुर भैरवी-----------------------
सुन्दर पति या पत्नी प्राप्ति,प्रेम विवाह,शीघ्र विवाह,प्रेम में सफलता के लिए त्रिपुर भैरवी देवी की साधना करें
मूंगे की माला से मंत्र जप करें
पंद्रह माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा ॥
------------------धूमावती------------------------
तंत्र मंत्र जादू टोना बुरी नजर और भूत प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए धूमावती देवी की साधना करें
मोती की माला का प्रयोग मंत्र जप में करें
नौ माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा ॥
-----------------बगलामुखी-----------------------
शत्रुनाश,कोर्ट कचहरी में विजय,प्रतियोगिता में सफलता के लिए माँ बगलामुखी की साधना करें
हल्दी की माला या पीले कांच की माला का प्रयोग करें
आठ माला मंत्र जप को उत्तम माना गया है
मन्त्र-ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम: ॥
-------------------मातंगी-------------------------
संतान प्राप्ति,पुत्र प्राप्ति आदि के लिए मातंगी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला से मंत्र जप करें
बारह माला मंत्र जप करें
ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा ।।
-------------------कमला-------------------------
अखंड धन धान्य प्राप्ति,ऋण नाश और लक्ष्मी जी की कृपा के लिए देवी कमला की साधना करें
कमलगट्टे की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा ॥
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज

शनिवार, 26 मई 2018
योनि तंत्र जैसे सामाजिक रूप से कलंकित और जटिल तंत्र के बारे में 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' कहते हैं की-भारत के ऋषियों नें जो भी मनुष्य को दिया वो अत्यंत श्रेष्ठ और उच्चकोटि का ज्ञान ही था. जिसमें तंत्र भी एक है. तंत्र में एक दिव्य शब्द है 'योनी पूजा' जिसका बड़ा ही गूढ़ और तात्विक अर्थ है. किन्तु कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों व वासना और भोग की इच्छा रखने वाले कथित धर्म पुरोधाओं ने स्त्री शोषण के लिए तंत्र के महान रहस्यों को निगुरों की भांति स्त्री शरीर तक सीमित कर दिया. हालांकि स्त्री शरीर भी पुरुष की भांति ही सामान रूप से पवित्र है. लेकिन तंत्र की योनी पूजा सृष्टि उत्पत्ति के बिंदु को 'योनी' यानि के सृजन करने वाली कह कर संबोधित करता है. माँ शक्ति को 'महायोनी स्वरूपिणी' कहा जाता है. जिसका अर्थ हुआ सभी को पैदा करने वाली. उस 'दिव्य योनी' का यांत्रिक चित्र ही 'श्री यन्त्र' है. वो 'महायोनी' ही 'श्री विद्या' हैं.
किन्तु तंत्र मार्गी साधक को सावधान रहना चाहिए.....विशेषतया स्त्री साधिकाओं को की कहीं योनी तंत्र के नाम पर उनको कुछ अनर्गल सिखा कर कोई उन्हें कूकर्म के मार्ग पर न ले जाए. ऐसा बहुत सी साधिकाओं के साथ पूर्व व वर्तमान में हुआ है......हो रहा है. इसीलिए कथित तांत्रिक समाज को गलत दिशा दे सकता है. बातों में या तर्क द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है. पर योनी तंत्र चर्चा का नहीं प्रत्यक्ष सिद्धि का क्षेत्र है. इसलिए तंत्र की खोज करने वाले रहस्य चित्रों को यथारूप न ले कर उसे 'स्वरुप रहस्यानुसार' समझें. योनी तंत्र सृष्टि उत्पत्ति का परा विज्ञान है. न की स्त्री शरीर का अवयव. 'माँ करुणाकारिणी स्वर्ण सिंहासनमयी कामरूपिणी कामाख्या योनी' ब्रह्माण्ड उत्तपत्ति का प्रतीक हैं व शक्ति उतपत्ति का प्रतीक....वो प्रत्यक्ष विग्रह है. जिसकी तुलना किसी अंग विशेष से करना.......'मातृस्वरूपिनी पराम्बा' का घोर अपमान ही होगा.
योनी तंत्र का इतिहास परम पवित्र और बेदाग़ है इसलिए सामाजिक लोगों को इसे कलंकित या विकृत नहीं समझना चाहिए, बस तांत्रिकों की शक्ल में छिपे भेड़ियों से सावधान रहना चाहिए'-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.
किन्तु तंत्र मार्गी साधक को सावधान रहना चाहिए.....विशेषतया स्त्री साधिकाओं को की कहीं योनी तंत्र के नाम पर उनको कुछ अनर्गल सिखा कर कोई उन्हें कूकर्म के मार्ग पर न ले जाए. ऐसा बहुत सी साधिकाओं के साथ पूर्व व वर्तमान में हुआ है......हो रहा है. इसीलिए कथित तांत्रिक समाज को गलत दिशा दे सकता है. बातों में या तर्क द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है. पर योनी तंत्र चर्चा का नहीं प्रत्यक्ष सिद्धि का क्षेत्र है. इसलिए तंत्र की खोज करने वाले रहस्य चित्रों को यथारूप न ले कर उसे 'स्वरुप रहस्यानुसार' समझें. योनी तंत्र सृष्टि उत्पत्ति का परा विज्ञान है. न की स्त्री शरीर का अवयव. 'माँ करुणाकारिणी स्वर्ण सिंहासनमयी कामरूपिणी कामाख्या योनी' ब्रह्माण्ड उत्तपत्ति का प्रतीक हैं व शक्ति उतपत्ति का प्रतीक....वो प्रत्यक्ष विग्रह है. जिसकी तुलना किसी अंग विशेष से करना.......'मातृस्वरूपिनी पराम्बा' का घोर अपमान ही होगा.
योनी तंत्र का इतिहास परम पवित्र और बेदाग़ है इसलिए सामाजिक लोगों को इसे कलंकित या विकृत नहीं समझना चाहिए, बस तांत्रिकों की शक्ल में छिपे भेड़ियों से सावधान रहना चाहिए'-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.









