कौलान्तक वाणी: यन्त्र

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मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

ब्रह्मांड रचयिता देवी कूष्मांडा
मार्कंडेय पुराण के अनुसार चतुर्थ नवरात्र की देवी का नाम कूष्मांडा देवी है, प्राचीन कथा के अनुसार जब ये ब्रह्माण्ड बना ही नहीं था, तब माँ योगमाया ने सृष्टि की उत्त्पति के लिए ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया, किन्तु ब्रह्मा जी तो मन में कामना करते की ऐसी सृष्टि पैदा हो लेकिन उसे पूरा कैसे किया जाए तो योगमाया से ब्रह्मा जी ने सहायता मांगी,देवी को स्तुति से प्रसन्न कर ब्रह्मा जी को देवी से सृष्टि निर्माण की कला प्राप्त हुई, तब देवी ने सबसे पहले अंड अर्थात ब्रह्माण्ड पैदा किया, तथा सृष्टि में गर्भ के अतिरिक्त अण्डों से जीवन पैदा करने की शक्ति भी ब्रह्मा जी को दी, स्वयं भी देवी करोड़ों सूर्य के सामान तेजस्वी स्वरुप में, ब्रहमां में सूर्य मंडल के भीतर स्थित रहती हैं, ऐसी सामर्थ्य देवी के अतिरिक्त किसी और में नहीं है, देवी आठ भुजाओं वाली हैं, जिनमें कमल पुष्प, धनुष, तीर, कमंडल, चक्र, गदा,माला तथा अमृत कलश है धारण किये हुये हैं व सिंह के आसन पर सवार हैं, देवी साधक को अमरत्व का वरदान देने में समर्थ हैं, इच्छा मृत्यु का वर देने वाली देवी, साधक के सब दुखों को हरने में क्षण मात्र भी देर नहीं करती, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी पारलौकिक विद्याओं की जननी है, जीवन को धर्म एवं कृपा से भर देने में सामर्थ है

                                                                                  ब्रह्माण्ड को पैदा करने के कारण देवी का नाम पड़ा कूष्मांडा, महाशक्ति कूष्मांडा योगमाया का दिव्य तेजोमय स्वरुप हैं जो सृष्टि को पैदा करने के लिए उत्पन्न हुआ, संसार में अण्डों से जीवन की उत्त्पत्ति कराने की शक्ति ब्रह्मा जी को देने के कारण भी देवी को कूष्मांडा कहा जाता है, देवी के उपासक अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं तथा इछामृतु का वर देने वाली यही देवी हैं, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी को प्रसन्न करने के लिए चौथे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पांचवें व छठे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी कूष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है

मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै नम:

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें

जैसे मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै स्वाहा:

माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ

 यन्त्र-
          775 732 786
          151 181 102
          762 723 785


यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को भगवे रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार भगवे रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को केसर, लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा कभी भी की जा सकती है, रात्री की पूजा का देवी कूष्मांडा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है
मंत्र जाप के लिए भी संध्या व रात्री मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक बड़ा घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व कलश को लाल कपडे से ढक कर रखें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को भगवे वस्त्र, रुद्राक्ष माला तथा गेंदे के फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए
मंदिर में भगवे रंग की ध्वजा चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, अनाहत चक्र में देवी का ध्यान करने से चौथा चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में कपूर व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, चौथे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और दो अन्य नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे संतान प्राप्ति की समस्या हो या विदेश यात्रा की, या पद्दोंन्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ क्षूं क्षुधास्वरूपिन्ये देव बन्दितायै नम:

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें

ॐ शरणागतदीनार्त परित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणी नमोस्तुते

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा चौथे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी गुफा वाले शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज चौथे नवरात्र को चार कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ आभूषण देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, चौथे नवरात्र को अपने गुरु से "ब्रहमांड दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप देवत्व प्राप्त कर लेते हैं व ब्रह्म विद्या की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, चौथे नवरात्र पर होने वाले हवन में काले तिलों की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले चौथे नवरात्र का ब्रत ठीक सात पंद्रह बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर का प्रसाद बांटना चाहिए
आज सुहागिन स्त्रियों को भगवे अथवा पीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और भगवे या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

चांद सी सुंदर चंद्रघंटा
मार्कंडेय पुराण के अनुसार तृतीय नवरात्र की देवी का नाम चंद्रघंटा देवी है, निगम ग्रंथों में निहित कथा के अनुसार जब भगवान् शिव ने देवी को समस्त विद्ययों का ज्ञान प्रदान करना शुरू किया तो देवी उस ज्ञान का तप के लिए प्रयोग करने लगी, लगातार आगम निगमों का ज्ञान प्राप्त कर देवी महातेजस्विनी हो गयी व सभी कलाओं सहित तेज पुंज बन योगमाया के रूप में स्थित हो गयी, तब प्रसन्न हो कर शिव ने देवी को अपने साथ एकाकार कर अर्धनारीश्वर रूप धरा, उस समय देवी पार्वती जी को अपने वास्तविक स्वरुप का बोद्ध हुआ, तब शिव से अलग हो आकाश में देवी ने सिंह पर स्वर हो दस भुजाओं वाला एक अद्भुत रूप धारण किया, हाथों में कमल पुष्प धनुष त्रिशूल,गदा, तलवार सहित वर अभी मुद्रा धारण की, क्योंकि देवी तपस्विनी रूप में थी तो एक हाथ में माला और एक हाथ में उनहोंने कमंडल धारण कर लिया, सभी ऋषि मुनि देवता देवी के तेज को सः नहीं पा रहे थे तो भगवान शिव ने चन्द्रमा को देवी के शीर्ष स्थान पर बिराजने को कहा, जिससे उनका तेजस्वी स्वरूप अब और भी सुन्दर तथा शीतल हो गया, तब सभी देवताओं नें देवी की जय जयकार की तथा उनको चंद्रघंटा देवी के नाम से पुकारा,जो भी भक्त देवी के ऐसे दिव्य रूप की पूजा करता है, वो एक साथ संसार में भी तथा मुक्ति के मार्ग पर भी एक ही समय चल सकता है, भौतिक संसार में तो आगे बढ़ता ही है साथ अध्यात्म में भी शिखर पर रहता है, सभी विद्यार्थियों, साधको, भक्तों को ऐसी देवी के दर्शनों से महासिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, ऐसे व्यक्ति को अहंकार रहित ज्ञान प्राप्त होता है, देवी को पूजने वाले को सवयम देवता भी पूजते हैं

                                         आकाश मंडल में चन्द्रमा को अपने शीश पर धारण करने के कारण देवी का नाम पड़ा चंद्रघंटा, महाशक्ति चंद्रघंटा माँ पार्वती जी का तेजोमय स्वरुप हैं जो सर्व कलाओं को धारण करने से उत्पन्न हुआ
अपनी सभी कलाओं को अध्यात्म धर्म सहित धारण करने के कारण ही देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है, देवी के उपासक एक साथ ही संसार में जीते हुये परम मुक्ति के मार्ग पर भी चल सकते है, जिस कारण देवी की बड़ी महिमा गई जाती है, देवी कृपा से ही भक्त को संसार के सभी सुख तथा मुक्ति प्राप्त होती है, देवी को प्रसन्न करने के लिए तीसरे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है
यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,

महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं चंद्रघंटा देव्यै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं चंद्रघंटा देव्यै स्वाहा:
माता के मंत्र का जाप करने के लिए रक्त चन्दन की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ

 यन्त्र-
          539 907 234
          227 876 191
          654 812 902

यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को लाल रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार लाल रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा केवल सायकाल को ही की जाती है, शाम की पूजा का चंद्रघंटा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी संध्या मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को कमल पुष्प, रक्त चन्दन की माला तथा सफेद फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए,मंदिर में लाल रंग की चुनरी चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, मणिपुर चक्र में देवी का ध्यान करने से तृतीय चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में केसर मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए,

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, तीसरे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और बर्फ (हिमजल) का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए
तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे घरेलु कलह से मुक्ति हो, विवाह नहीं हो पा रहा हो, प्रेम प्राप्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ रं रक्त स्वरूपिन्ये महिषासुर मर्दिन्ये नम:
(न आधा लगेगा व न की जगह ण होगा )

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें,

ॐ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके
शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणि नमोस्तुते

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा तीसरे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी नाड़ी के निकट स्थित शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज तीसरे नवरात्र को तीन कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ चूड़ियाँ व श्रृंगार प्रसाद देना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, तीसरे नवरात्र को अपने गुरु से "उज्जवल दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, तीसरे नवरात्र पर होने वाले हवन में खीर से हवन करना चाहिए
ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले तीसरे नवरात्र का ब्रत आठ बीस साय खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर हलवा पूरी का प्रसाद बांटना चाहिए,आज सुहागिन स्त्रियों को लाल वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और हल्के लाल रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

रविवार, 16 दिसंबर 2018

बृहस्पति कल्प और उसका कोर्स
सिद्ध धर्म के अनुसार, ‘बृहस्पति कल्प’ यह बृहस्पति जी के द्वारा किया गया सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। बृहस्पति कल्प को गहराई से समझने के बाद बृहस्पति जी के सम्पूर्ण कुलों को समझना संभव है।
सिद्ध धर्म के अनुसार, ‘बृहस्पति जी के आस्तिक और नास्तिक दोनों दर्शनों के लिये ‘बृहस्पति कल्प’ सर्वोच्च ग्रंथ है। बृहस्पति कल्प को समझने के लिए एक व्यक्ति को पहले उसके आधार में स्थित लौकिक और अलौकिक कुल और विचारधारा को समझना होगा। प्रमुख कुल और प्राथमिक विचारधाराओं में पारंगत होने पर ही कोई व्यक्ति बृहस्पति कल्प में पारंगत हो सकता है।
बृहस्पति कल्प के पांच खंड है और उन्ही को और अधिक स्पष्ट करने के लिये उपखंड भी है। तथा ‘आंतरराष्ट्रीय कौलान्तक सिद्ध विद्यापीठ’ भी बृहस्पति कल्प पर आधारित सात दिनों का कोर्स आयोजित करता है।

बृहस्पति कल्प के खंड और उसके उपखंडों के बारे में नीचे लिखा गया है

बृहस्पति कल्प खण्ड-1

-बृहस्पति योग आगम
-योग की उत्पत्ति
-108 योगों में श्रेष्ठ योग कौन ?
-योग के उपयोगी और अनुपयोगी भाग
-समाधी और पूर्णता में अंतर
-बृहस्पतिकृत योग ‘क्रिया योग’ का सार
-क्रिया योग और कुण्डलिनी
-क्रिया योग के उपप्रकार
-क्रिया योग की विधियां
-क्रिया योग की उपलब्धि
-क्रिया समाधी

खण्ड-2

बृहस्पति दर्शन
देवगुरु के 12 स्वरुप और आवश्यकता
-सत्व गुण, सत्व सृष्टि और सात्विक मनुष्य
-रजस् गुण, रजस् सृष्टि और राजसिक मनुष्य
-तमस् गुण, तमस् सृष्टि और तामसिक मनुष्य
-मनुष्य : आत्मा या शरीर ?
-ब्रह्माण्ड में अकेला या परित्यक्त?
-मनुष्य का प्रकृति पर अधिकार
-आवश्यकताएं और नियम
-मनुष्य के लिए सर्वोपरि नियम

उपखण्ड-1

-आस्तिक दर्शन
-आस्तिकता क्या है?
-आस्तिक क्यों हों?
-आस्तिकता का अंत कहाँ है?
-आस्तिकता गुण या दोष?
-मनुष्य आस्तिक क्यों नहीं हैं?
-आस्तिकता के प्रयोग
-क्या आस्तिकता मृत्यु के पार ले जाती है?
-क्या आस्तिकता से सत्य मिलता है?
-आस्तिकता का सार

उपखण्ड-2

-नास्तिक दर्शन
-नास्तिकता क्या है?
-नास्तिक क्यों हों?
-नास्तिकता का अंत कहाँ है?
-नास्तिकता गुण या दोष?
-मनुष्य नास्तिक क्यों नहीं हैं?
-नास्तिकता के प्रयोग
-क्या नास्तिकता मृत्यु के पार ले जाती है?
-क्या नास्तिकता से सत्य मिलता है ?
-नास्तिकता का सार

खण्ड-3

-कर्मकाण्ड
-कर्मकाण्ड क्या है?
-कर्मकाण्ड की कितनी उपयोगिता?
-कर्मकाण्ड के गुण और दोष
-कर्मकाण्ड और देश, काल, परिस्थिति
-कर्मकाण्ड के नियम
-कर्मकाण्ड का परिचय

उपखण्ड-1

-वैदिक कर्मकाण्ड का परिचय
-वैदिक कर्मकाण्ड की शैली
-वैदिक कर्मकाण्ड के मंत्र
-वैदिक कर्मकाण्ड के यन्त्र
-वैदिक कर्मकाण्ड के गुण दोष
-वैदिक कर्मकाण्ड का सार

उपखण्ड-2

-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड का परिचय
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड की शैली
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड के मंत्र
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड के यन्त्र
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड के गुण दोष
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड का सार

उपखण्ड-3

-अकुल कर्मकाण्ड का परिचय
-अकुल कर्मकाण्ड की शैली
-अकुल कर्मकाण्ड के मंत्र
-अकुल कर्मकाण्ड के यन्त्र
-अकुल कर्मकाण्ड के गुण दोष
-अकुल कर्मकाण्ड का सार

खण्ड-4

-पुराण और तंत्र विरोध मार्ग क्यों?
-सत्य कौन पुराण या तंत्र?

उपखण्ड-1

पुराणिक कोष
-पुरातन ज्ञान क्यों आवश्यक?
-इतिहास कितना सत्य और असत्य?
-षडयंत्र और क्षात्र वासना
-षडयंत्र और दुर्बुद्धि वासना
-तथ्य और जनप्रसार
-रणनीति, कुप्रचार और असत्य
-जीवन के दुःख और उनका उपयोग
-हृदय, 5 विकार और षडयंत्र

उपखण्ड-2

-तांत्रिक कोष
-तांत्रिक होना क्यों आवश्यक?
-इतिहास निर्माण क्या है?
-सिद्धि क्या है और इसका महत्त्व क्या है?
-सिद्धि और छल में क्या समानता और असमानता?
-जीवन क्या है प्राप्ति या त्याग?
-तांत्रिक षट्कर्म आवश्यक और दोषपूर्ण क्यों?
-मनुष्य अतृप्त क्यों?

खंड-5

काम्य प्रयोग और चिकित्सा
–तांत्रिक विधि
–वैदिक विधि
–देह और स्वास्थ्य
–देह और सौंदर्य
–देह और वासनाएं
–वासनापूर्ती और वासना त्याग
–काम क्या है?
–काम की सीमा क्या है?
–कामवासना पाप या पुण्य?
–वासना का मनोलोक
–गृहस्थ धर्म, आकर्षण और पाप
–नियोग, वैश्यावृत्ति और प्रेम सम्बन्ध
–जीवन दर्शन का सार
–मृत्यु की प्रतीक्षा

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

देवी लक्ष्मी की लघु साधना-दीपावली विशेष
दीपावली स्वतः सिद्ध मुहूर्त है. तंत्र पथ अथवा मंत्र साधकों को किसी मुहूर्त विशेष को शोधने की जरूरत नहीं होती. वो केवल साधना करता है. दीपावली धन, यश, मान, स्वास्थ्य, गृहस्थ सुख तो देती ही है लेकिन ये समय आपके जीवन को अनेक लाभ दे सकता है यदि आप जानते हों कि कौन सी साधना अप पर ठीक बैठती है. गुरु से दीक्षा लेने के लिए भी ये मुहूर्त बड़ा ही श्रेष्ठ माना जाता है. लक्ष्मी देवी या कहें माँ श्री विद्या का काल होने से गरीब से गरीब भी साधना कर जीवन में उत्थान को प्राप्त कर सकता है. इस काल में श्री सूक्त का पाठ अथवा श्रवण आम भक्त के लिए वरदान स्वरुप होता है. मंत्र का जाप भी अत्यंत लाभदायक होता है.
मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले जाग्रय-जाग्रय हुं

इस काल में बीसा यन्त्र या श्रीयंत्र घर में स्थापित करना बड़ा ही शुभ प्रभाव देता है. हत्था जोड़ी, श्वेतार्क गणपति, रुद्राक्ष, मानिंक आदि घर में स्थापित करना धनदायक होता है. यदि आप रोजगार प्राप्त नहीं कर पा रहे तो निम्न यन्त्र को बना कर अपने पास रखें व दीवाली की रात ही इसे लिखें और पूजन करें.
यन्त्र-
६६६ ९९९ ६६६
९९९ ३३३ ९९९
३३३ ९९९ ३३३
देवी के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला का ही प्रयोग करें. उत्तर दिशा की और या पूर्व की और मुख रखना चाहिए. लाल रंग का आसन बिछाना चाहिए. अपनी रक्षा या तंत्र प्रयोगों से बचाव के लिए गुरु मंत्र या हिमालय मंत्र का जाप करें. इससे किसी भी तरह का जादू टोना तंत्र मंत्र प्रभावहीन हो जायेगा.
मंत्र-
ॐ महाकालाय विकर्तनाय मायाधराय नमो नम:
उपरोक्त सभी मन्त्रों की कम से कम पांच माला तो जरूर करें यदि आप साधक है तो ५० माला करने से लाभ मिलता है. देवी को लाल फूल व खीर पंचमेवे का भोग लगायें. यदि आपके पास धन अथवा समय का आभाव है तो एक लाल कपडे का टुकड़ा या चुनरी ले कर पांच दीये देवी के मंदिर ले जा कर चढ़ा दें. देवी अवश्य कृपा करेंगी.
-कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

वज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान


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बज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान



जब बक्तों के प्यारे बजरंगबली पैदा हुए थे, शिव ने भक्तों की रक्षा के लिए व भगवान् राम जी की सेवा व राम काज को पूरा करने के लिए मृत्यु लोक अर्थात पृथ्वी पर पवनदेव के तेज से बानर राज केसरी और रानी अंजनी के घर जन्म लिया, अत्यंत बलशाली होने के कारण नाम पड़ा महाबीर बजरंगबळी, बाल्यकाल से अद्भुत सिद्धियाँ होने व पवन पुत्र होने के कारण हवा में उड़ने व किसी भी लोक तक चले जाने की क्षमता उनमें थी, बाल्यकाल से ही उनहोंने कई राक्षसों का बध करना शुरू कर दिया था, सूर्य को आकाश में देख कर उसे निगल लिया तब सभी देववी देवताओं नें प्रार्थना कर उनसे सूर्य को मुक्त करने को कहा तो बजरंगबळी ने सूर्य को बाहर उगला, सूर्य भगवान् नें प्रसन्न हो कर उनको अपना शिष्य बना लिया, भगवान् सूर्य जैसे गुरु से ज्ञान पा कर महाबीर का सामना करने का साहस तीनों लोकों में किसी के पास नहीं रहा, लेकिन महाबीर बालक होने के कारण अक्सर तपस्यारत र्तिशी मुनियों से भी छेड़ छाड़ करते कुपित हो कर ऋषियों ने उनको शक्तियां भूल जाने का शाप दिया, क्षमा याचना पर ऋषियों नें कहा की समय अनुसार आवशयकता पड़ने पर तुम्हारी शक्तियां वापिस आ जाएँगी, जब राम जी को माता सीता का वियोग हुआ तब हनुमान जी से उनका मिलन हुआ, राम लक्ष्मण को कन्धों पर उठा कर वायु मार्र्ग से सुग्रीव तक ले गए,समय आने पर महाबीर ने लंका कूद कर पार कर ली, मार्ग में आने वाली बाधाओं व परीक्षाओं को धैर्य व नीति पूर्वक पूरण किया, अशोक वाटिका उजाड़ कर राक्षस वीरों को स्वर्ग पहुंचाया, मरणासन लक्ष्मण को बचाने के लिए हिमालय पर्वत से एक पहाड़ ही उठा कर ले आये, जब मेघनाद नें भगवान् राम और लक्षमण को नागपाश में बाँध लिया तब वैकुण्ठ जा कर गरुड़ जी को ले कर आये, युद्ध में कई वीरों को यमलोक पहुंचाया, सीता माता की सबसे पहले सुधि लाने वाले हनुमान जी ही थे, अयोध्या वासियों तक सीता राम के आगमन का उनहोंने ही समाचार पहुँचाया, रावण की कैद से शनि को मुक्त करवाया, जब शनि नें पिता से अभद्रता की तो, सूर्य के कहने पर शनि को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और भगवान् सूर्य के सामने उपस्थित कर दिया, सीता माता द्वारा दी गयी मोतियों की माला को तोड़ कर दरवारियों के कहने पर हन्मुमान जी नें सीना चीर दिया और अपने प्रब्न्हू राम सीता की युगल मूर्ती के दर्शन संसार को करवाए, लवकुश से युद्ध के दौरान बुद्धि संयम का अद्भुत परिचय दिया, बालकों के पाश में बांध गए, भगवान् राम जी के सरयू नाड़ी में सनान्न के बाद वैकुण्ठ लौटने पर भी महाबीर भक्तों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए पृथवी पर ही रहे, रामायणकाल के अतिरिक्त महाभारतकाल में जब भीम को अपने बल का घमंड हो गया तो हनुमान जी नें उनको कहा कि भीम तुम मेरी पूंछ उठा कर एक और कर दो, लेकिन पूरा प्रयास करने पर भी भीम पूंछ को हिला तक नहीं पाए, भगवान् श्रीकृष्ण जी और अर्जुन के रथ पर ध्वजा में स्वयं महाबीर उपस्थित रहे, इसीलिए युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ धमाके के साथ नष्ट हो गया, क्योंकि हनुमान जी नें रथ को छोड़ दिया था, कलियुग में भी हनुमान जी जीवित ही माने जाते है क्योंकि उनको चिरंजीवी होने का आशीर्वाद मिला है, महाभारत के अनुसार महाबीर हनुमान आज भी गंधमादन नाम के पर्वत पर रहते हैं, कहा जाता है की जहाँ जहाँ रामायण का पाठ होता है हनुमान जी सूक्ष्म रूप या प्रत्यक्ष रूप में जरूर वहां आते हैं, कलियुग में गोस्वामी तुलसीदास जी को राम लक्ष्मण जी के दर्शन भी हनुमान जी ने ही करवाए थे, हनुमान जी का इतना बल है की पातळ में अहिरावन को मार कर महाबीर हनुमान जी नें उसकी भुजाएं ही उखाड़ ली थी, ज्ञानियों में प्रथम रहने वाले, भक्तों को ज्ञान देने वाले, भूत प्तेतों का नाश करने वाली महाबीर का सुमिरन ही सब दुखों का नाश करने वाला है, नीच ग्रह यक्ष, किन्नर,किरात आदि सब इनके भय से थर-थर कांपते हैं, तो मान्गियें शीघ्र प्रसन्न होने वाले हनुमान जी से सकल मनोरथ, मानिये हनुमान जी को और शत्रुओंका रोगों का दुखों का नाश कीजिये, पाइए धन वैभव, नीच ग्रहों से मुक्ति पा कर सुखद जीवन का आशीर्वाद पाइए 
                                                              शत्रु नाश के लिए, रोग मुक्ति के लिए, रोजगार व व्यापार में लाभ के लिए,विद्या व बुद्धि के लिए, बलशाली शरीर के लिए,शनि मंगल राहु केतु जैसे नीच ग्रहों से मुक्ति के लिए, अकाल मृत्यु व दुर्घटना आदि से बचाव, हनुमान जी की कृपा पाने व दर्शन करने के लिए महामंत्र 

ॐ हं हनुमते नम:

हनुमान गायत्री

शाबर स्तुति मंत्र

स्तुति मंत्र

-कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

श्री मातंगी महाविद्या साधना
मातंगी के बिना पूरा जीवन अधूरा है । जिस व्यक्ति को अपने जीवन में प्रेम अनुभव नहीं हुआ हो, जिस व्यक्ति को अपने जीवन में "गुरुत्व" का एहसास नहीं हुआ हो, किस व्यक्ति को अपने होने का अभी तक बोध नहीं हुआ हो उसके लिए मातंगी साधना बड़ी ही अनिवार्य है, क्योंकि हम पैदा तो हो जाते हैं हम ज्ञान विज्ञान सीख लेते हैं, बुद्धि-बल और विवेक भी हमें आ जाता है और हम पूरी जिंदगी जीते चले जाते हैं लेकिन धीरे धीरे धीरे सब नष्ट होता जाता है और जीवन का जो आखिरी भाग हमारे पास आता है वह बहुत ही खराब भाग होता है; तब हमारे पास कुछ नहीं होता जब तक हम सुंदर है, सौंदर्यशाली हैं, सामर्थ्यवान है तब तक ही हमारी जय जयकार होती है, तो मातंगी आपको नित्य बनाती है इसलिए शब्द है नित्य कन्या और नित्य पुरुष; जो पहले भी थे आज भी है और भविष्य में भी रहेंगे ! जिनको "चिरंजीवी" भी कहा जाता है, तो आपकी चेतना भी चिरंजीवी हो जाए, आपके भीतर भी स्थायित्व हो जाए वह सब आपको मातंगी देती है और याद रहे हम पृथ्वी पर कोई भी काम तब तक नहीं कर सकते जब तक उसमें आनंद ना हो, जब तक उसमें रस ना हो, जब तक उसमें दिव्यता ना हो और वह रस जो है वह आपको मातंगी देगी । अब आपको अगर मैं आप लोग कहीं से आ रहे हो और इतना बड़ा फूलों का गुलदस्ता बनाकर आपको समर्पित करुं । अगर आपने फूलों के प्रति उसका सौंदर्य है, मेरे प्रेम को समझने की बुद्धि है तब तो आप उस को संभाल कर रखेंगे लेकिन अगर नहीं है तो सामने भैंस आ रही होंगी उसको खिला देंगे कि, "ले जी तेरे लिए बढ़िया वाला चारा है ।" तो फर्क तो एक ही चीज का है केवल उस स्थिति का है, इसलिए धर्म को भी सभी लोग नहीं समझ सकते । आप कोशिश करके देखिए । किसी नास्तिक को जाकर धर्म समझाइए जरा, मैं मान जाऊंगा यदि आप समझाने में कामयाब हो गए । क्यों ? क्योंकि उसके पास वो तन्तु ही नहीं हैं, उसके पास वह सामर्थ्य ही नहीं है ।जब आप धर्म को समझ सकते हैं तो वह भी तो समझ सकता होगा, दिमाग तो उसके पास भी वही है, मेरे पास भी वही है....अगर मैंने भी विज्ञान की पढ़ाई की है, अगर मेरे भी मस्तिष्क में नास्तिकतावाद है, आस्तिकतावाद है, धर्म है, दर्शन है, तब भी मेरे मन में दृढ़ विश्वास है कि, 'धर्म का यह पक्ष सत्य है', तो मुझे कहीं से तो वह विचार आ रहा है, कोई तो मुझे वह दे रहा है और उसको भी यदि वह नहीं समझ आ रहा है वह नहीं समझ पा रहा है तो उसे भी वह तत्व कोई दे रहा है । तो वो सब संचालित करने वाली शक्ति मातंगी होती है ।मातंगी के कारण ही मुनि  मातंग हुए थे उनकी कथा कहीं ढूंढिएगा पढ़िएगा की कितनी अद्भुत कथा उनकी थी । तो मातंगी शक्ति के बिना मैंने कहा  कि जीवन अधूरा है ।आपके पास सामर्थ्य होनी चाहिए समझने की, आपके पास सामर्थ्य होनी चाहिए किसी भी चीज को ग्रहण करने की । ये ठीक वैसे ही कि आप संध्या के समय कहीं बैठे हो और कोई व्यक्ति सामने से आए, आने के बाद वह आपकी स्तुति करें, आपकी प्रशंसा करें और बहुत ज्यादा आपकी तारीफ करें इतनी ज्यादा कि इससे पहले पृथ्वी पर किसी की तारीफ ना हुई हो और बाद में उसे पता चले कि आप तो बहरे थे । तो उस प्रशंसा का कोई सार नहीं रह जाएगा । वैसे ही सृष्टि है, ये प्रतिपल आपको आनंद देना चाहती है क्योंकि माया है । योगमाया है वह तो आपकी मां है और अगर वह हमारी मां है तो सागर भी मुझे आनंद देगा, यह लाइट्स भी मुझे आनंद देगी, यह पर्दे भी आनंद देंगे, आप लोग भी मुझे आनंद देंगे क्योंकि सब मेरी मां का ही तो है ! वह मेरे विरुद्ध कैसे जाएगा लेकिन मुझे वह आनंद सुनाई नहीं देगा क्योंकि मैं अभी बहरा हूं । तो वो कान खोलने के लिए, उस आनंद को जानने के लिए मातंगी अपने आप में एक प्रमुख विद्या है ।
- महासिद्ध ईशपुत्र

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

प्रथम नवरात्र - वर देंगी महाशक्ति शैलपुत्री
मार्कंडेय पुराण के अनुसार प्रथम नवरात्र की देवी का नाम शैलपुत्री देवी है, इन शैलपुत्री देवी को गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में हम जानते हैं, शैलपुत्री के नाम से माँ पार्वती जी को त्रिलोकी भर में पूजा जाता है, और यही देवी सबकी अधीश्वरी है, एक समय की बात है कि पर्वत राज हिमालय ने  कठोर तप कर माँ योगमाया को प्रसन्न किया, जब योगमाया के उनको दिव्य दर्शन हुये तो माता ने हिमालय को वर माँगने को कहा, तब पर्वत राज हिमालय ने योगमाया से कहा कि वे उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेँ, माता ने प्रसन्न हो कर पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लिया, हिमालय की  पुत्री पार्वती के रूप में हिमाचल के घर पैदा हुई, पर्वत राज की पुत्री होने के कारण व कठोर तपस्वी सवभाव के कारण उनका नाम शैल पुत्री पड़ गया, माता शैल पुत्री का भक्त जीवन में कभी हारता नहीं, दुःख कोसों दूर से भक्त को देख कर भाग जाते हैं, शैल पुत्री के भक्त दृद निश्चयी, विश्वविजेता होते हैं, यदि आप सदा भयभीत रहते हों, जीवन कि सही दिशा नहीं ढून्ढ पा रहे हों, उदास जीवन में कोई सहारा न बचा हो, सब और शत्रु ही शत्रु हो गए हों, तो माता को मनाने का सबसे सही वक्त आ गया है, अब माता की पूजा आपकी सदा रक्षा करेगी,शुम्भ-निशुम्भ जैसे राक्षसों का नाश करने वाली देवी आपके जीवन के सब संकट हर लेगी, नवरात्रों में देवी स्वयं भक्तों के पास चल कर आती हैं, केवल उनको सच्चे मन से पुकारने की जरूरत होती है, आज हम आपको बताएँगे कि कैसे होंगी देवी शैलपुत्री प्रसन्न, वो कौन से मंत्र हैं जो माँ को खींच कर आपकी और ले आयेंगे, वो कौन सा यन्त्र हैं जिसकी सथापना से शैलपुत्री की सथापना हो जायेगी, किस रंग के वस्त्र माता को पहनाएं अथवा माता का श्रृंगार कैसे करें ? यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो आज हम आपको बताएँगे सही बिधि-बिधान जो माता कि कृपा ले कर आएगा





हिमालय के घर पैदा होने के करण देवी का नाम पड़ा शैलपुत्री,शैलपुत्री माँ पार्वती जी का ही नाम है , कठोर तपस्वी स्वभाव के कारण भी देवी को शैल पुत्री कहा जाता है , देवी शैलपुत्री का भक्त जीवन में कभी नहीं हारता, देवी का नाम भर लेने से दुःख कोसों दूर से भाग जाते हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए पहले नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय का पाठ करना चाहिए, जब भी पाठ करें तो पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर कवच का अर्गला स्तोत्र फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करना चाहिए, सकाम इच्छा के लिए तो विशुद्ध संस्कृत में ही पाठ होना चाहिए लेकिन निष्काम भक्त हिंदी में व संस्कृत दोनों में पाठ कर सकते हैं, यदि आप किसी मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का भी पाठ करें, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो देवी के नवारण महामंत्र का जाप पूरे नवरात्र भर करते रहें


महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)


देवी शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए पहले दिन का प्रमुख मंत्र है

मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं शैलपुत्री देव्यै नम:


दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें

जैसे मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं शैलपुत्री देव्यै स्वाहा:


माता के मात्र का जाप करने के लिए स्फटिक या रत्नों से बनी माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ पर बना लेँ

 यन्त्र-

          578      098     395

          842      576     998

          224      862     627


यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को गुलाबी रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, शैलपुत्री देवी का श्रृंगार गुलाबी रंग के वस्त्रों से किया जाता है, इसी रंग के फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की पूजा सुबह और शाम दोनों समय की जाती है, शाम की पूजा मध्य रात्री तक होती है और रात्री की पूजा का ही सबसे ज्यादा महत्त्व माना गया है

मंत्र जाप के लिए भी रात्री के समय का ही प्रयोग करें, यदि आप पूरे नवरात्रों की पूजा कर रहे हों तो एक अखंड दीपक जला लेना चाहिए, देवी की पूजा में नारियल सहित कलश स्थापन का बड़ा ही महत्त्व है, आप भी एक कलश में गंगाजल भर कर अक्षत (चाबलों) की ढेर पर इसे स्थापित करें, पूजा स्थान पर एक भगवे रंग की ध्वजा जरूर स्थापित करें जो सब बाधाओं का नाश करती है, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें

यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए,

मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं


मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी के वाहन बृषभ यानि कि बैल कि पूजा करनी चाहिए तथा बैलों को भोजन घास आदि देना चाहिए, मंदिर में त्रिशूल दान देने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, मूलाधार चक्र में देवी का ध्यान करने से प्रथम चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए


चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै


ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, पहले दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और तीन नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए

नवरात्रों में तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, सुहागिन स्त्रियों को श्रृंगार करके व मेहंदी आदि लगा कर ही सौभाग्यशालिनी बन ब्रत व पूजा करनी चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे घर, वाहन, की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं,

देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ ह्रीं रेत: स्वरूपिन्ये मधु कैटभमर्दिन्ये नम:

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें

व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसी देवी भगवती ही सा

  बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति


यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा पहले नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी परवत पर स्थित शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज प्रथम नवरात्र को एक कन्या का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ पत्थर का एक शिवलिंग देना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, प्रथम नवरात्र को अपने गुरु से "बज्र दीक्षा"लेनी चाहिए, जिससे आप पूर्व जन्म की स्मृति व भविष्य बोध की स्मृति शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, प्रथम नवरात्र पर होने वाले हवन में गुगुल की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व गूगुल जलना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले प्रथम नवरात्र का ब्रत सवा आठ बजे खोलेंगे,ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर बूंदी का प्रसाद बांटना चाहिए, श्रृंगार अवश्य करें,किन्तु अति और अभद्र श्रृंगार से बचाना चाहिए न ही ऐसे वस्त्र धारण करने चाहिए, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए



-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज

शनिवार, 8 सितंबर 2018

रसेश्वरी साधना दीक्षा एवं पारद विज्ञान प्रयोग
रस का अर्थ होता है पारा और पारा शिव का तेजस कहलाता है। शिव अघोर हैं और उनकी प्रिय धातु पारा भी उनसा ही अघोर है। शिव और पारे के अनेकों अनसुलझे रहस्य हैं, जिनकी कोई थाह नहीं। जिस प्रकार ह्रदय के रस भाव होते हैं, उसी प्रकार धातुओं का भाव और रस पारे में हैं। पारा यूँ तो एक तरल धातु है लेकिन ये सिद्धों का बड़ा ही प्रिय है। प्राचीन काल से भारत से ले कर मिस्र, रोम, यूनान, चीन, फारस सहित लगभग सभी स्थानों पर पारे का रहस्यमय प्रयोग किया गया है। जिसे उनहोंने अपने-अपने नाम दिए। हम बात भारत की करते हैं जहाँ पारद विज्ञान रस शास्त्र के अंतर्गत आता है जिसे "रस वेद" भी कहा गया है। हिमालय के सिद्धों नें पारे से भस्म बना कर अनेकों-अनेक जटिल रोगों का उपचार किया है व सिद्ध नाम की चिकित्सा पद्धति संसार को दी, जो आज भी प्रचलित है, अनेकों वृहद् भाग हैं। लेकिन हम आपको वो कारण बताने बताने जा रहे हैं जिस कारण पारद विज्ञान दुनिया भर में फैला। १) लोहे और ताम्बे जैसी धातुओं को स्वर्ण में बदलना-शिव स्वयम शक्ति को आगम निगमों में ये बताते हैं की "देवी पारद सर्वश्रेष्ठ है और उसमें मेरा निवास है। पारद को कल्पवृक्ष जानना चाहिए। यदि कोई सिद्ध पारे को बाँध कर उसके संस्कार भली प्रकार कर ले तो वो पदार्थ परिवर्तन सहित कई गोपनीय सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। किन्तु रस को बांधना पाप के अंतर्गत आता है। इसलिए मैं ये अधिकार केवल शैव और कौलाचारियों को प्रदान करता हूँ। इस गोपनीय विद्या को पापी, कुकर्मी, व्यसनी, अपराधी, व्यभिचारी, अश्रद्धावान और अदीक्षित को कभी भी प्रदान नहीं करना चाहिए। देवी! इस विद्या द्वारा निश्चित ही धातुओं को स्वर्ण अथवा चंडी में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी विधि द्वारा अनेकों गुप्त कामना सिद्धि मणियों का निर्माण किया जा सकता है। चिंतामणि, लालमणि, दिव्यमणि, अमृतमणि, तेजस मणि, पारस मणि आदि का निर्माण इसी पारद क्रिया द्वारा होता है। कायाकल्प , चिरंजीवी व नित्य तरुण आदि क्रियाएं भी इसी विद्या से संभव हैं। रसायन सब पर फलीभूत नहीं होता क्योंकि ये कोई सांसारिक विद्या नहीं है, की जिसका सब पर एक सामान प्रभाव हो। गुरु भक्त, नाथ कुल सेवक, शक्ति संगम मार्गीय, सूर्योपासकों सहित मेरे भक्त ही इस विद्या के रहस्यों को जान पाते हैं।"-रसेश्वर कौतुक तंत्र यही कारण रहा की विश्व भर से बड़े-बड़े तन्त्रचारी, आयुर्वेदाचारी, चिकित्सक, ज्योतिषी, नक्षत्रवेता, सम्राट व जादूगर-जादुगरनियाँ इस विद्या को सीखने के लिए भारत के दुर्गम हिमालयों तक पहुंचे। कश्मीर, कुलूत, महाचीन, त्रिगर्त , कामख्या, बंगाल, वीरक्षेत्र व नेपाल आदि देशों में इस विद्या का बहुत प्रचार था क्योंकि ये भूमि सिद्धों व नाथो की गोपनीय साधना भूमि थी। पराचीन सिद्ध और नाथ शैव और शाक्त थे व तंत्रमार्गी थे। इन सिद्धों की भैरवियां व स्वयं सिद्ध कभी बूढ़े नहीं होते थे, साथ ही इनकी आयु सैकड़ों वर्ष होती थी। यही सिद्ध भारत के राजाओं व व्यापारियों को अपनी सेवाओं के बदले स्वर्ण व चाँदी दिया करते थे। जिस कारण भारत सबसे ज्यादा सोने-चांदी वाला देश बन गया। इतना सोना-चंडी हुआ की देश को कई-कई बार लूट लेने के बाद भी सोना-चांदी कम नहीं हुआ। बड़े-बड़े जादूगर सिद्ध किये गए पारे को हासिल करने के लिए विश्व भर से भारत आने लगे। वो यहाँ से सिद्ध पारा ले जा कर उससे अपने-अपने देशों में चमत्कार करते और धन व शौहरत कमाते। जादुगरनियाँ और सम्राट लम्बी आयु और खोई जवानी वापिस पाने की चाहत में सिद्ध पारद हासिल करने भारत आते। बड़े-बड़े ज्योतिषी संस्कारित पारद गुट्टीका को हासिल करने के लिए नाथ सिद्धों की सेवा करते और गुट्टीका मिलने पर अपने देश जा कर सटीक भविष्यवाणियाँ करते। सबसे अनोखा विषय तो ये है की सिद्ध पारद को छूने से ही बहुत से असाध्य रोग तीन दिन के भीतर ठीक हो जाते थे। इसलिए मिस्र जैसे क्षेत्रों के लोग भी सिद्ध पारद के लिए कौलदेश यानि भारत आते। सबसे मजेदार बात तो ये है की पारा भारत में तब आसानी से उपलब्ध नहीं था। सारा पारा विदेशों से ही लाया जाता था। जिसे लाना आसान नहीं होता था क्योंकि पारा पृथ्वी की सबसे भारी धातु है। मणियाँ बनाने के लिए विश्व के लगभग हर महाद्वीप के सम्राट या उनके प्रतिनिधि कौलदेश यानि भारत आये और शुभ नक्षत्रों व काल में बनी मणियाँ अपने साथ ले गए।
२)दिव्य आध्यात्मिक और जदुआई शक्तियां-पारे के अनेक शोधन व संस्कार होते हैं, जिससे पारा सिद्ध हो जाता है। पारे के पूर्ण १०८ संस्कार होते है। जिनमेंसे १६ अति प्रमुख हैं व २६ संस्कारों तक का विवरण ग्रंथों में आपको मिल जाएगा। लेकिन मंत्र बद्ध और तांत्रोक्त पारा बेहद चमत्कारी हो जाता है। जिसका मनचाहा प्रयोग हो सकता है। जैसे प्राचीन विमान सिद्ध पारे की ऊर्जा से उड़ान भरते थे, कुण्डलिनी जागरण व शक्तिपात प्राप्त व प्रदान करने के लिए पारद का प्रयोग गुप्त रूप से होता था। सिद्ध पारे के प्रयोग से ही तांत्रिक जलगमन, वायुगमन व अदृश्य होने जैसी क्षमताएं प्राप्त करते थे। चक्रवर्ती सम्राट पारे का सेवन वीर बनने हेतु किया करते थे। साथ ही पारे के सिद्ध शिवलिंग की पूजा कर अजेय व मृत्युजयी हो जाते थे। सिद्ध पारद के आध्यात्म में इतने प्रयोग थे की जिनको बताना यहाँ संभव ही नहीं है। संक्षेप में कहा जाए तो तंत्र के षट्कर्म पारद विज्ञान के लिए खेल ही थे। ये दो बड़े कारण रहे की विश्व का कोई देश या बुद्धिजीवी रसायन और पारद विज्ञान से अछूता नहीं रहा। यही रसायन और पारद विज्ञान आधुनिक कैमिस्ट्री का जनक है ये बात सभी जानते हैं। हालांकि आधुनिक कैमिस्ट्री तत्व की ठीक-ठीक भौतिक व्याख्या करता है व सभी प्रश्नों का ठीक उत्तर भी देता है। स्वयं "ईशपुत्र कौलान्तक नाथ" आधुनिक कैमिस्ट्री के छात्र रहे हैं। लेकिन आधुनिक कैमिस्ट्री केवल तत्वों के दृश्य विज्ञान को ही आधार मानती है जबकि प्राचीन रसायन शास्त्र का मानना है की धातुओं आदि में अपने कुछ पारलौकिक गुण होते हैं। बस यहीं से आधुनिक और प्राचीन अलग होते हैं अन्यथा दोनों में कोई ज्यादा भेद नहीं है। प्राचीन समय में रसायन को बड़ा ही श्रेष्ठ स्थान प्राप्त था लेकिन भारत को अपनी विद्याओं की अधिक प्रसिद्धि का खामियाजा भुगतना पडा और न विद्यायों को हासिल करने के लिए अनेक देशों के राजाओं और हमलावरों नें ग्रथों को लूट लिया व कई सिद्धों को उठा कर अपने देश ले गए और जो नहीं माने उनका बढ़ कर दिया। जिससे नए विद्यार्थियों नें भय के कारण इसे सीखना कम कर दिया और इसके जानकार एकांत में अपने प्रयोगों के लिए चले गए। आज रसायन यानि रस वेद को आधुनिक विज्ञान केवल एक कल्पना और कैमिस्ट्री का कम ज्ञान मानता है। वर्तमान काल में अब इसके जानकारों का मिलना ही अपने में बड़ी बात हो गई है। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ऐसा वातावरण दुनिया भर में बना दिया है की कोई भी इस पुरानी विद्या पर काम न कर सके, इसलिए इसके विरुद्ध किताबे लिखी गई, सेमीनार किये गए, पर्दाफाश जैसी कार्यशालाएं लगाई गई और इसे अंधविश्वास करार दे दिया गया। अब हालत ये है की न तो कोई इसे सीखेगा और ना ही किसी को सीखने दिया जाएगा। यदि आप और हम प्रयास करते हैं तो कहा जाएगा की ये गुमराह कर रहे हैं और धन हड़पने की साजिश रच रहे हैं साथ ही कानूनी कार्यवाही की धमकियां देंगे। लेकिन हम कहते हैं की पैसा हमारा है, हमने कमाया है और हम अपना प्रयोग करना चाहते हैं और उसमें धन लगायेंगे, क्योंकि ये हमारी स्वतंत्रता है। भले ही कुछ मिले या ना मिले। चंद शब्दों में इतना बता देने से ही शायद आपको पारे और रसायन का महत्त्व पता चल गया होगा। लेकिन ये सब बताने का अर्थ ये बिलकुल नहीं की आप प्रस्तुत साधन करें ही करें। हम आपको कोई लालच या धोखा नहीं दे रहे व आपको वैधानिक रूप से चेतावनी देते हैं की आप हमारी साधनाओं व प्रयोगों में शामिल ना हों व दक्षिणा आदि ना दें। ये सभी प्रयोग व साधनाएँ केवल "कौलान्तक सम्प्रदाय" को मानने वालों के हैं। यदि इसके बाबजूद भी आप हमें प्रार्थना भेजते हैं तो उसके जिम्मेवार आर्थिक, मानसिक व शारीरिक रूप के साथ साथ समय हानि के आप स्वयं जिम्मेवार होंगे। यदि आपको लगता है की कोई ऐसी विद्या थी और खोजी जानी चाहिए व सीखी जानी चाहिए तो आप तभी अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग कर साधना में सम्मिलित हों।
कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें- १) पारद विज्ञान और रसायन विज्ञान को कुशल मार्गदर्शक व कौल गुरु अथवा महाचेतना के सान्निध्य में ही संपन्न करें क्योंकि ये विज्ञान जटिलतम व गोपनीय होने के साथ ही अत्यंत प्राणघातक है। आपकी असावधानियों से व गुरु आज्ञा अह्वेलना से आपकी जान जा सकती है या स्थिति गंभीर हो सकती है। याद रखें की किताबों से देख कर या इंटरनेट देख कर अथवा कहीं पढ़-सुन कर रसायन और पारद के प्रयोग बिलकुल ना करें। अन्यथा स्थिति ऐसी हो सकती है की ना तो प्राण जाएँ और ना ही आप ठीक हों। २) सिद्ध पंथ और नाथ पंथ में ये ज्ञान परम्परानुगत है। हिमालय के सिद्धों कौलाचारियों और महयोगियों को पारद विज्ञान व रसायन का पूर्ण ज्ञान होता है अत: उनकी कहानियां सुन कर वैसा ही करने का प्रयास ना करें। उनके पास जो पारा होता है वो रासायनिक विधियों व औषधियों द्वारा शोधित व मर्दित किया गया होता है। जिसमें कोई भी हानिकारक तत्व नहीं होते। बल्कि वो पारद अत्यंत बलशाली व चमतकारी होता है। ३) पारे को अभक्ष्य यानि नहीं खाए जाने वाला तत्व कहा गया है।पारा पूरी तरह से जहरीला होता है इसलिए किसी भी कारण इसका सेवन नहीं करना चाहिए। पारद भस्म का सेवन करने से पहले चिकित्सक की राय व पारद भस्म की शुद्धता का आंकलन करना बेहद जरूरी है क्योंकि ये आपकी जिंदगी का प्रश्न है। संस्कार करने के बाद भी पहले पारे का परीक्षण किया जाता है की कहीं ये जहरीला तो नहीं। इसके बाद कुशल गुरु और योग्य चिकित्सक की देख रेख में ही सिद्ध पारद गुट्टीका व भस्म का सेवन आदि किया जाता है। हम एक बार फिर आग्रह करते हैं की आप पारे का सेवन बिलकुल ना करें व इससे दूर ही रहें। ४) पारे को गर्म करने से बचें व पारद प्रयोगों के दौरान उत्पन्न होने वाली अत्यंत विषैली गैसों से विशेष सावधानी रखें। पारद व रसायन प्रयोगों के लिए कहीं दूर एकांत में अपने यंत्र आदि स्थापित कर ही पारद और रसायन प्रयोग करना चाहिए। पारे को मुख बंद पात्र में रखें व बच्चों की पहुँच से दूर रखें। यदि आपका प्रयोग संपन्न नहीं हुआ या किसी कारण पारे का प्रयोग नहीं हो सका तो उसे हर कहीं ना फेकें। क्योंकि पारे को फैकना शिव द्रोह कहलाता है। अत: पारे को किसी कबाड़ी या किसी प्रयोगशाला को दे दें। कसी भी कीमत पर नदी या पानी में पारे को ना फेकें। ५) आयुर्वेदिक जडी-बूटियों व अम्ल, रसायन का प्रयोग सावधानी से करें। अम्ल से अपनी त्वचा, आँखों को बचाए रखें व अम्लीय साँसे ना ले ये फेफड़ों को तुरंत गंभीर हानि पहुंचाता है। कहने तात्पर्य ये है की हर और से आपको पूर्ण सावधानी रखनी होगी। हाथों में आधुनिक चिकित्सीय दस्ताने पहन कर ही पारे को अपने हाथों में लेना चाहिए। हालांकि सावधान साधक सीधे अपने हाथों पर भी इसे ले सकता है। लेकिन थोड़ी सी मात्रा का शरीर में जाना कभी-कभी बड़ी मुसीबत बन सकता है। ६) क्योंकि ये सारी प्रणाली साधनात्मक है ना की कैमिस्ट्री इसलिये आपका सर्वप्रथम रसायन में अधिकार होना चाहिए। जो आपको गुरु दीक्षा यानी की "रसेश्वरी दीक्षा" से प्राप्त होगा। "रसेश्वरी साधना" ही पारद और रसायन की प्रथम साधना है जिससे आपको निश्चित ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त होती हैं। लेकिन "रासेश्वरी साधना" भी अपने आप में एक खतरनाक साधना दीक्षा है अत: किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए साधक को "स्वर्णाकर्षण भैरव" के मन्त्रों का जाप व साधना नित्य करनी चाहिए। जिससे अखंड धन लाभ व स्वर्ण की प्राप्ति होती है। ७) ये समस्त प्रयोग शिव आधीन है व श्रीविद्या के अंतर्गत आते हैं। इसलिए आपको देवक्रम का ध्यान पूजन भी करना होगा जैसे की देवी महालक्ष्मी जी का पूजन, श्री गणेश जी का पूजन, श्री कुबेर जी का पूजन आदि। "कौलान्तक सम्प्रदाय" में शिव के रूद्र स्वरूप की कुल्लुका का कुलाचार विधि से शिरोस्थापन किया जाता है। याद रहे की यदि आपको कभी शैव और शाक्त दो पारद और रसायन सिद्धांत मिलें तो आपको शैव सिद्धांत को ही प्रमुखता देनी चाहिए। क्योंकि शक्त मत में दैत्य मत भी मिश्रित है जो आपको कभी भी हानि पहुंचा सकता है। किन्तु "कौलान्तक संप्रदाय" के साधक दोनों को करने के सर्वथा योग्य है क्योंकि ये ज्ञान "गुरु शुक्राचार्य" द्वारा कौल मत को दिया गया है। ८) जब भी आप पारे को ठोस करें तो सबसे पहले "पारद शिवलिंग" नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि पारद शिवलिंग को पूर्ण विधि व समय, काल गणना व शिव वास के अनुसार बनाना चाहिए। अन्यथा कभी भी पारद और रसायन के क्षेत्र में सफलता नहीं मिलेगी। ये अमोघ वचन है। ९ ) पारद विज्ञान और रसायन में "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" को भैरवी मृगाक्षी जी व उनके दिव्य गुरु "श्री सिद्ध रसेश्वर नाथ जी महाराज" से भी अनन्य ज्ञान प्राप्त हुआ है। स्वयं भैरवी मृगाक्षी नें "गुह्य मुद्रा पारद" बना कर "कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज" को दिया है कहा जाता है की इसका प्रयोग विपत्ति काल में करने पर "ईशपुत्र" संसार की किसी भी स्त्री से मनचाहा कार्य करवा सकते हैं। लेकिन ये सिद्ध पारद "ईशपुत्र" नें हिमालय की गुप्त गुफाओं में योग्य समय के लिए छुपा कर रखा है। ऐसी कथा और मान्यता "कौलान्तक सम्प्रदाय" में प्रसिद्द है १०) याद रखें की इस विद्या के बहुत से मंत्र है जो की कौलक्रम, चीनक्रम, समयक्रम, संहारक्रम, अघोरक्रम सहित वामक्रम आदि अनेकों क्रमों में विभक्त है। योग्य गुरु ही इसे जानता है व बता सकता है। प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों में व भूत लिपि सहित टांकरी लिपि में इसके बहुत से विधान, प्रयोग व मंत्र वर्णित हैं। इस ज्ञान के अभाव में बेचारे दीन-हीन साधक संस्कृत के स्तुति स्त्रोतों से काम चलाते हैं जैसे की श्री सूक्त, सुवर्णधारा, कनक धारा स्तोत्र आदि आदि व ऐसे निम्न याचक मंत्रो से पूजन करते हैं जो की भिखारी वृत्ति के होते हैं अथवा अच्छी भाषा में कहा जाए तो दास भाव के होते हैं जैसे यशम देहि, धनम देहि, सौभाग्यम देहि आदि-आदि। पारद और रसायन याचना का नहीं वीर भाव का विषय है साथ ही इसमें कुबेर, लक्ष्मी की प्रधानता नहीं वरन माँ योगमाया शक्ति के "रसेश्वरी स्वरूप" की ही प्रधानता रहती है और उनकी साधना की जाती है। ११) यदि आपको सौभाग्य से "रसेश्वरी मंडल व आवरण पूजा" का अवसर मिल जाए, तो जानना चाहिए की आप वास्तव में पारद विज्ञानी व रसायनी साधक होने के लायक है व एक दिन अवश्य रसेश्वर बन पायेंगे। आपकी श्रद्धा, भक्ति व ईशपुत्र के प्रति एक अखंड निष्ठा आपको सर्वोच्च बना कर ही रहेगी तो पारद और रसायन एक भाग भर ही हैं। इस तरह ये तो केवल एक झलक हमने यहाँ प्रस्तुत की है लेकिन ये बहुत गंभीर, बड़ा और रोमांचक है। समझ नहीं आता की इसकी शुरुआत कहाँ से की जाए। लेकिन जब स्वयं "ईशपुत्र" हैं तो इसकी चिंता हमें नहीं करनी चाहिए। भारत की अति दुर्लभ विद्या को सीखना व ऋषियों के अद्भुत ज्ञान से परिचित होना अपने आप में बड़ी संपत्ति है। यहाँ अब हम इससे अधिक नहीं बताने वाले क्योंकि ये वेबसाईट सार्वजनिक मंच है और इस ज्ञान पर केवल सर्वोच्च अवतारी साधकों का ही अधिकार है अन्यों के लिए इसकी कथा सुनना ही पाप नाशक माना गया है। शिव के ज्ञान पर उनके निरंकुश साधकों का अधिकार होता है और मातृभूमि के तेज से ये विद्या सीखने का महाअवसर अब आपके सम्मुख है। तो बोलो "जय भोले नाथ-सदा हमारे साथ"।-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
इस साधना में योग्यता व पात्रता हेतु आपको "स्वर्णाकर्षण भैरव" के मन्त्र का रुद्राक्ष की माला पर उन्नीस माला का मंत्र जाप करना होता है।

रविवार, 12 अगस्त 2018

वास्तु दोष मिटाइए बिना तोड़ फोड़
आज आपको मिलेगा संम्पति सुख
बिना तोड़ फोड़-दूर होगा वास्तु दोष
घर में होगी सुख शान्ति
धर्म कर्म और अन्न धन से भर उठेगी गृहस्थी
क्योंकि आपके घर सब सुख लाने वाला है
सागर का एक चमत्कारी कछुआ

आपने बाजार में मिटटी अथवा धातुओं के बहुत से कछुयों को देखा होगा जिनको शुभ प्रतीक मान कर बेचा जाता है, जो लोग फेग शुई से जुडी चीजे खरीदते है वो अच्छी तरह से जानते है कि एक कछुआ जीवन में धन संपत्ति का बरदान ले कर आ सकता है, इसलिए भारत ही नहीं विदेशों तक सुख शान्ति वास्तु दोष और धन प्राप्ति के लिए घरों में धातु या मिटटी के बने कछुए रखे जाते हैं, आपके घर पर भी आपने या आपके बच्चों ने भी एक आध कछुया जरूर रखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये साधारण सा कछुआ भगवान विष्णु जी का कूर्म अवतार है आइये हम आपको बताते हैं-कूर्म का अर्थ होता है कछुआ, पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन का बृहद विवरण है, सुखसागर में निहित कथा कहती है कि दैत्यराज बलि के राज्य में दैत्य, असुर तथा दानव बहुत बहुत शक्तिशाली हो गए थे। क्योंकि उनको दैत्यगुरु शुक्राचार्य की महाशक्ति प्राप्त थी। अपने घमंड से चूर रहने वाले देवराज इन्द्र को किसी कारण से नाराज हो कर महारिषि दुर्वासा ने शक्तिहीन होने का शाप दे दिया, जिस कारण इन्द्र शक्तिहीन हो गये थे। मौका पा कर दैत्यराज बलि नें युद्द कर तीनों लोकों पर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। अब इन्द्र सहित सभी देवतागण डर डर भटक रहे थे तथा दैत्यों से भयभीत रहते थे। अपनी इस दुर्दशा के निवारण के लिए वे बैकुण्ठनाथ विष्णु जी के पास ब्रह्मा जीसहित पहुचे। उनकी स्तुति करके उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाई। तब भगवान मधुर वाणी में बोले कि इस समय तुम लोगों के लिये संकट काल है। तुम दैत्यों से मित्रता कर लो और क्षीर सागर को मथ कर उसमें से अमृत निकाल कर पान कर लो। दैत्यों की सहायता से यह कार्य सुगमता से हो जायेगा। इस कार्य के लिये उनकी हर शर्त मान लो और अपना काम निकाल लो। अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे और तुममें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा। भगवान के आदेशानुसार इन्द्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकलने की बात दैत्यराज बलि को बताई। दैत्यराज बलि ने देवराज इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। लेकिन जब मन्दराचल पर्वत को सागर में डाला गया तो वो डूबने लगा, जिससे मथन असंभव हो गया, तब स्वयं भगवान श्री विष्णु कूर्म अर्थात कच्छप अवतार लेकर समुद्र में गए, उनहोंने मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखा और स्वयं उसका आधार बन गये। उस समय समस्त लोकपाल दिक्पाल उनकी कूर्म आकृति में स्थित हो गए,योगमाया नें सभी दिशाओं के प्रभाव को स्तंभित कर दिया, तब भगवान् विष्णु जी की सभी देवताओं नें स्तुति की और भगवान् विष्णु ने अपना एक पुरुष रूप दिखाया जिसे वस्तु पुरुष कहा जाता है, क्योंकि मूलतया कूर्म और वस्तु पुरुष एक ही होने से उनकी स्तुति और गणना कछाप अवतार के रूप में की गयी, इस दिव्य रूप में योगमाया आधारशक्ति के रूप में उनके साथ स्थित हुई, इसी लिए वस्तु शतर सहिओत कर्मकांड और पुराण कूर्म को ही प्रधान आसन मानते हैं और वास्तु पुरुष और कूर्म को देख कर ही निर्माण, शुभ दिशा,स्थान आदि का विचार किया जाता है, जिस दिन भगवान विष्णु जी ने कूर्म का रूप धारण किया था उसी को कूर्म जयंती के रूप में मनाया जाता है,शास्त्रों नें इस दिन की बड़ी महिमा गई हैं,इस दिन से निर्माण कार्य शुरू किया जाना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि योगमाया स्तम्भित शक्ति के साथ कूर्म में निवास करती है तो ऐसे में यदि आप वास्तु से जुड़े दोषों को नष्ट अथवा शांत करना चाहते हैं तो इससे सुन्दर अवसर दूसरा नहीं होगा, यदि आपने नया घर भूमि आदि खरीदी है तो उनके पूजन का भी यही समय सबसे उत्तम होता है, सबसे महत्वपूरण तथ्य तो ये है कि इस आप कुछ मंत्र जाप और उपाय कर बिना तोड़ फोड़ के भी वास्तु बदल सकते हैं, या बुरे वास्तु को शुभ में बदल सकते हैं, कूर्म अवतार के समय भगवान् की पीठ का घेरा एक लाख योजन का था। कूर्म की पीठ पर मन्दराचल पर्वत स्थापित करने से ही समुद्र मंथन सम्भव हो सका था। 'पद्म पुराण' में भी इसी आधार पर विष्णु का कूर्मावतार वर्णित है।
1) महावास्तु दोष निवारक मंत्र
दुर्भाग्य बश यदि आपका पूरा मकान निवास स्थान या फ्लेट ही वास्तु विरुद्ध बन गया हो और आप किसी भी हालत में उसमें सुधार नहीं कर सकते
तो केवल महावास्तु मंत्र का जाप एवं कूर्म देवता की पूजा करनी चाहिए जिसका विधान है कि
सबसे पहले लाल चन्दन और केसर कुमकुम मिला कर एक पवित्र स्थान पर कछुए की आकृति बना लेँ
कछुए के मुख की ओर सूर्य तथा पूछ की ओर चन्द्रमा बना लेँ
सुबिधानुसार आप धातु का बना कछुआ भी पूजन हेतु प्रयुक्त कर सकते हैं
फिर धूप दीप फल ओर गंगाजल या समुद्र का जल अर्पित करें
भूमि पर ही आसन बिछ कर रुद्राक्ष माला से 11 माला मंत्र का जाप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं कूर्माय वास्तु पुरुषाय स्वाहा
जाप पूरा होने के बाद घर अथवा निवास स्थान के चारों ओर एक एक कछुए का छोटा निशान बना दें
ऐसा करने से पूरी तरह वास्तु दोष से ग्रसित घर भी दोष मुक्त हो जाता है दिशाएं नकारात्मक प्रभाव नहीं दे पाती उर्जा परिवर्तित हो जाती है

2)वास्तु दोष निवारक महायंत्र
यदि आप ऐसी हालत में भी नहीं हैं कि पूजा पाठ या मंत्र का जाप कर सकें और आप नकारात्मक वास्तु के कारण बेहद परेशान है
घर दूकान या आफिस को बिना तोड़े फोड़े सुधारना चाहते हैं तो उसका दिव्य उपाय है महायंत्र
वास्तु का तीब्र प्रभावी यन्त्र
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   121 177 944
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   533 291 311
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   657 111 312
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यन्त्र को आप सादे कागज़ भोजपत्र या ताम्बे चाँदी अष्टधातु पर बनवा सकते हैं
यन्त्र के बन जाने पर यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए
प्राण प्रतिष्ठा के लिए पुष्प धूप दीप अक्षत आदि ले कर यन्त्र को अर्पित करें
पंचामृत से सनान कराते हुये या छींटे देते हुये 21 बार मंत्र का उच्चारण करें
मंत्र-ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:
अब पीले रंग या भगवे रंग के वस्त्र में लपेट कर इस यन्त्र को घर दूकान या कार्यालय में स्थापित कर दीजिये
पुष्प माला अवश्य अर्पित करें
इस प्रयोग से एक बार में ही वास्तु दोष हट जाएगा

3) कूर्म चिन्ह के सरल टोटके
चांदी के गिलास बर्तन या पात्र पर कछुए का चिन्ह बना कर भोजन करने व पानी पीने से भारी से भारी तनाब नष्ट होता है
चार पायी बेड अथवा शयन कक्ष में धातु का कूर्म अर्थात कछुआ रखने से गहरी और सुखद निद्रा आती है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होती है
पूजा के स्थान पर ऐसा श्रीयंत्र स्थापित करें जो कछुए की पीठ पर बना हो इससे घर में सुख शान्ति के साथ साथ धन एवं अच्छे संस्कार आते हैं
रसोई घर में कूर्म की स्थापना करने से वहां पकने वाला भोजन रोगमुक्ति के गुण लिए भक्त को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाता है
यदि नया भवन बना रहे हैं तो आधार में चाँदी का कछुआ ड़ाल देने से घर में रहने वाला परिवार खूब फलता-फूलता है
बच्चों को विद्या लाभ व राजकीय लाभ मिले इसके लिए उनसे कूर्म की उपासना करवानी चाहिए तथा मिटटी के कछुए उनके कक्ष में स्थापित करें
यदि आपका घर किसी विवाद में पड़ गया हो या घर का संपत्ति का विवाद कोर्ट कचहरी तक पहुँच गया हो तो लोहे का कूर्म बना कर शनि मंदिर में दान करना चाहिए
घर की छत में कूर्म की स्थापना से शत्रु नाश होता है

4)राशि अनुसार किस रंग का कूर्म देगा धन लाभ
यदि आप व्यापारी है, नौकरी पेशेवाले है, अपना कोई काम करते हैं और धन लाभ प्राप्त ही नहीं कर पाते,
आपका व्यवसाय नौकरी स्थायी नहीं है धन लाभ हो नहीं पाता या होते होते बंद हो जाता है तो
आपको पूजा स्थान में अपनी राशी के अनुसार धनप्रदा कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
आइये राशिबार जानते है धनप्रदा कूर्म के बारे में
5)मेष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सुनहरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 3 का अंक लिख दें
मिथुन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए मटमैले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 9 का अंक लिख दें
कर्क राशि के जातकों को धनलाभ के लिए आसमानी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
सिंह राशि के जातकों को धनलाभ के लिए लाल रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 2 का अंक लिख दें
कन्या राशि के जातकों को धनलाभ के लिए भूरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
तुला राशि के जातकों को धनलाभ के लिए पीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृश्चिक राशि के जातकों को धनलाभ के लिए नीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 4 का अंक लिख दें
धनु राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 1 का अंक लिख दें
मकर राशि के जातकों को धनलाभ के लिए जमुनी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
कुम्भ राशि के जातकों को धनलाभ के लिए काले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 8 का अंक लिख दें
मीन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सफेद रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें

6)भूमि दोष नाशक मंत्र उपाय
यदि आपका घर या जमीन ऐसी जगह है जहाँ भूमि में ही दोष है
आपका घर किसी श्मशान भूमि कब्रगाह दुर्घट स्थल या युद्ध भूमि पर बना है
कोई अशुभ साया या जमीनी अशुभ तत्व स्थान में समाहित हों
जिस कारण सदा भय कलह हानि रोग तानाब बना रहता हो तो जमीन में मिटटी के कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
एक मिटटी का कछुआ ले कर उसका पूजन करें
पूजन के लिए भूमि पर लाल वस्त्र बिछा लेँ
फिर गंगाजल से स्नान करवा कर कुमकुम से तिलक करें
पंचोपचार पूजा करें अर्थात धूप दीप जल वस्त्र फल अर्पित करें
चने का प्रसाद बनाये व बांटे
7 माला मंत्र जाप पूर्व दिशा की और मुख रख कर करें
मंत्र-ॐ आधार पुरुषाय जाग्रय-जाग्रय तर्पयामि स्वाहा
साथ ही एक माला पूरी होने पर एक बार कछुए पर पानी छिड़कें
संध्या के समय भूमि में तीन फिट गढ्ढा कर गाद दें
समस्त भूमि दोष दूर होंगे

7)अदृश्य शक्ति नाशक प्रयोग
यदि आपको लगता है कि आपके घर में कोई अदृश्य शक्ति है
किसी तरह की कोई बाधा है तो
कूर्म की पूजा कर उसे मौली बाँध दें
लाल कपडे में बंद कर धूप दीप करें
21 बार मंत्र पढ़े
मंत्र-ॐ हां ग्रीं कूर्मासने बाधाम नाशय नाशय
रात के समय इसे द्वार पर रखे तथा सुबह नदी में प्रवाहित कर दें
इससे घर में तुरन शांति हो जायेगी
8)भूमि भवन सुख दायक प्रयोग
यदि आपको लगता है कि आपके पास ही घर क्यों नहीं है? आपके पास ही संपत्ति क्यों नहीं है?
क्या इतनी बड़ी दुनिया में आपको थोड़ी सी जगह मिलेगी भी या नहीं तो परेशान मत होइए केवल कूर्म स्वरुप विष्णु जी की पूजा कीजिये
विष्णु जी की प्रतिमा के सामने कूर्म की प्रतिमा रखें या कागज पर बना कर स्थापित करें
इस कछुए के नीचे नौ बार नौ का अंक लिख दें
भगवान् को पीले फल व पीले वस्त्र चढ़ाएं
तुलसी दल कूर्म पर रखें और पुष्प अर्पित कर भगवान् की आरती करें
आरती के बाद प्रसाद बांटे व कूर्म को ले जा कर किसी अलमारी आदि में छुपा कर रख लेँ
इस प्रयोग से भूमि संपत्ति भवन के योग रहित जातक को भी इनका सुख प्राप्त होता है

9)वास्तु स्थापन प्रयोग
यदि आपका दरवाजा खिड़की कमरा रसोई घर सही दिशा में नहीं हैं तो उनको तोड़ने की बजाये
उनपर कछुए का निशान इस तरह से बनाये कि कछुए का मुख नीचे जमीन की ओर हो और पूंछ आकाश की ओर
ये प्रयोग शाम को गोधुली की बेला में करना चाहिए
कछुए को रंग से या रक्त चन्दन कुमकुम केसर से भी बनाया जा सकता है
कछुए का निर्माण करते समय मानसिक मंत्र का जाप करते रहें
मंत्र-ॐ कूर्मासनाय नम:
कछुया बन जाने पर धूप दीप कर गंगा जल के छीटे दें
इस तरह प्रयोग करने से गलत दिशा में बने द्वार खिड़की कक्ष आदि को तोड़ने की आवश्यकता नहीं होती ऐसा शास्त्रीय कथन है
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

प्रेम प्राप्ति हेतु लघु उपाय एवं साधना
क्या आपका मन किसी को पाने के लिए या जीवन साथी बनाने के लिए मचल रहा है? क्या आपके पास सबकुछ होते हुये भी प्यार नहीं है? क्या आपकी शादी नहीं नहीं हो पा रही? तो ये परेशान मत होइए आज हम आपके लिए लाये हैं वो सभी उपाय जिनको करने के बाद आपकी प्रेमिका कहेगी कि मैं जोगन तेरे प्रेम की.........
 जब भी किसी को प्रेम करें तो याद रखें कि संयम और प्रतीक्षा सबसे उत्तम उपाय है
ईश्वर से प्रेम के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि दुआओं में असर होता है
प्रेम प्राप्ति के लिए आप भगवान् कामदेव और देवी रति के साथ साथ शिव-शक्ति,गणपति,और भगवान विष्णु जी की पूजा कर सकते हैं
इन्द्र देवता,अग्नि देवता,चन्द्रमा देवता,अप्सराओं व यक्षिणी देवियों की उपासना भी प्रेम प्रदान करती हैं
देवी दुर्गा जी से मांगी गयी प्रेम व सुख शान्ति सौभाग्य की तत्काल पूर्ती होती है
यदि प्रेम विवाह करना चाहते हैं तो ब्रत एवं दान बहुत सहायक होते हैं
प्रेम प्राप्ति के कुछ अति सरल दिव्य मंत्र
कृष्ण जी का मंत्र -ॐ क्लीं कृष्णाय गोपीजन बल्लभाय स्वाहा ॥
कृष्ण मंदिर में मुरली बांसुरी ले जा कर अर्पित करें
पान अर्पण से प्रेम प्राप्ति होती है
यदि प्रेम में फूट पड़ गयी हो तो उसे पुनह पाने के लिए भैरव जी की पूजा अचूक उपाय है
भैरव देवता को मीठी रोटी का प्रसाद बना कर अर्पित करें
मानसिक तौर से उत्तरनाथ भैरव का मंत्र जपें
भैरव जी का मंत्र-ॐ ज्लौं र्हौं क्रौं उत्तरनाथ भैरवाय स्वाहा ॥
यदि आप किसी को अपना बनाना चाहते हैं तो माँ शक्ति की पूजा करे
माता को लाल रंग का झंडा अर्थात ध्वजा चढ़ाएं व मनोकामना मांगें
माँ शक्ति का मंत्र-ॐ नमो मोहिनी महामोहिनी अमृत वासिनी स्वाहा:
देवराज इन्द्र की पत्नी इंद्रायणी की स्तुति को अमोघ माना जाता हैं कई ऋषि पुत्रियों ने उनकी स्तुति कर वर पाया है
इंद्रायणी देवी की पूजा उन्हें करनी चाहिए जो नहीं जानते की उनके जीवन में कौन आने वाला है
तब देवी प्रसन्न हो कर अत्यंत स्रेष्ठ प्रेमिका व पति या पत्नी प्रदान करती है
इंद्रायणी देवी का मंत्र-ॐ देवेंद्राणी विवाहं भाग्यमारोग्यम देहि मे
बीस के अंक को विवाह का अंक माना जाता है विवाह में समस्या पर चार खाने बना कर केवल बीस बीस लिखना चाहिय
बीस के इस यन्त्र को धारण करने से या पास रखने से विवाह हो जाता है


यन्त्र- 20 20 20 20
          20 20 20 20
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गोमेद नामक रत्न को गलें में पहनने से विवाह लाभ होगा
चांदी में मोती की अंगूठी पहनने से प्रेम बढेगा
हीरे अथवा जरकन के आभूषण प्रेम में बृद्धि करेंगे
नीलम की अंगूठी प्रतिष्ठित कर पहनने से और संकल्पित करने से प्रेम में सफलता मिलती है
शहद के रुद्राभिषेक से मनचाहा प्रेम मिलेगा
सोलह सोमवार के ब्रत से योग्य सुन्दर सुशील पति मिलेगा
अन्न दान करने से प्रेम विवाह संपन्न होता है
गौरी देवी को चुनरी श्रृंगार चढाने व मौली बांधने से मनमीत मिलता है
मधुर व्यबहार मीठी बाणी जीवन में स्थाई प्रेम प्रदान करने में समर्थ हैं
धीरज और संतोष के साथ साथ सकारात्मक आत्मविश्वास भी होना चाहिए
योग मेडिटेशन और संगीत सहित शाकाहार को अपनाएँ
नशों से दूर रहना चाहिए

कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज