कौलान्तक वाणी: मन्त्र

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शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

करवा चौथ व्रत

 

'करवा चौथ' के पावन अवसर पर उन सभी भैरव-भैरवियों हेतु मंत्र प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने अपने भैरव या भैरवी हेतु पवित्र व्रत धारण किया है। दिन भर इस मंत्र का मानसिक जाप करना श्रेष्ठ है व इसके प्रभाव से पति-पत्नी की लम्बी आयु के साथ ही धन-धान्य व दाम्पत्य सुख आदि की भी प्राप्ति होती है। ब्रत के दिन शिव-पार्वती का ध्यान व गुरु वंदना सहित अपने कुल देवी-देवताओं की स्तुति व पूजन भी करना चाहिए। यदि भैरव-भैरावियाँ कुंवारे हैं तो भी सुन्दर पति-पत्नी की कामना हेतु ब्रत धारण करने का विधान है। यदि आपका विवाह नहीं हुआ है तो आप अपने प्रेमी या प्रेमिका हेतु भी व्रत धारण कर सकते हैं। 'कौलान्तक संप्रदाय' में जिन भैरवियों या भैरवों की पत्नी अथवा पति इस लोक में नहीं हैं वो भैरव-भैरवी अपने गुरु या इष्ट के निम्मित भी इस व्रत को धारण कर सकते हैं। व्रत चन्द्रमा के दर्शन तक स्थित रहता है। किन्तु बिना मंत्र जाप 'कौलान्तक संप्रदाय' व्रत को महत्त्व नहीं देता। ये व्रत एक गोपनीय 'तांत्रिक साधना' है। इस व्रत की बहुत सी मनघडंत और व्यर्थ की कथाएं पुस्तक बाजारों में उपलब्ध है। जिस पर 'कौलान्तक पीठ' विश्वास नहीं करता। क्योंकि इस व्रत के नियम कथा आदि हमारी परम्परा में बिलकुल भिन्न हैं। अत: आप मंत्र पूर्वक व्रत को संपन्न करें। करवा चौथ के पर्व की हार्दिक शुभ कामनाएं और हाँ जाते-जाते ये बताना जरुरी है की भारत के कुछ मनहूस मीडिया घराने जो की हमेशा इस व्रत विपरीत कुछ न कुछ बताते रहते हैं हम उनको 'मलेच्छ संगठन' करार देते हैं व हिन्दू धर्म विरोधी घोषित कर उनका व उनके कर्मचारियों का मुँह काला करते हैं-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

  ह्रौं श्रीं ऐं ह्रीं सर्वसौभाग्य चक्र स्वामिन्यै नमः

'करवा चौथ' के सम्बन्ध में एक और बात की क्या पुरुषों को व्रत रखना चाहिए क्योंकि धर्म ग्रंथों व कथाओं में ऐसा कोई विवरण नहीं मिलता? इसका उत्तर ये है की करवा चौथ एक खगोलीय मुहूर्त है जिसका प्रयोग स्त्री व पुरुष सामान रूप से कर सकते हैं। आम जान व्रत के साधनात्मक पक्ष को नहीं जानते इस कारण व्रत कर महिलाये इसे पूर्ण समझ लेती है। हाँ ये जरूर है की भक्ति और श्रद्धा में शक्ति होती है तो व्रत फलीभूत हो जाता है। लेकिन इस पर्व विशेष में साधना आवश्यक होती है। साधना से ही सती स्त्रियां बल प्राप्त कर उसका बड़ा भाग पति को सौंपती थी जो आज भी संभव है साधना द्वारा। जो साधक काल ज्ञान के ज्ञाता हैं वो जानने हैं की इस काल खंड में की गई साधना से सर्व सौभाग्य आता है। इस कारण हिमालय के सिद्धों नें व्रत की परम्परा को बढ़ावा दिया। 'कौलान्तक संप्रदाय' में बहुत से वीर योद्धाओं का विवरण है व साथ ही 'देवराज इंद्रा द्वारा अपनी पत्नी शची' के व्रत काल में व्रत धारण करने की कथा का भी उल्लेख है। महाकैलाश पर देवी पार्वती के व्रतकाल में शिव भी व्रती होते हैं। इस प्रकार ये सिद्ध होता है की व्रत केवल स्त्री-पुरुष के भेद से नहीं अपितु ज्योतिषीय भेद से चलता है। हाँ पुरुषों के लिए ये व्रत रखना जटिल है उनके स्वभाव के कारण क्योंकि इस व्रत के नियमों में से कुछ अति आवश्यक है जिनका पालन कभी-कभी पुरुषों से नहीं हो पाता इस कारण अधिकांश पुरुष इससे दूर रहते है। पर जो स्त्री अपने पुरुष से अमर्यादित सम्भाषण करती हो। पुरुष से श्रेष्ठता चाहती हो, पुरुष के तर्कों को तर्कों से आंकती हो, पुरुष को प्रथम स्थान न देती हो ऐसी स्त्री द्वारा किया गया व्रत केवल ढोंग होता है व निष्फल ही रहता है। तो ऐसी स्त्री को भी ब्रत नहीं करना चाहिए। जो पुरुष पराई औरतों पर आसक्त है अपनी स्त्री में देवी का अंश नहीं देखता उसे न तो व्रत का अधिकार है ना ही अपनी अर्धांगिनी से पूजा ग्रहण का अधिकार। इस प्रकार बहुत से नियम और साधना मत 'करवा चौथ' से जुड़े हैं। जिनका भैरव-भैरवियों को अध्ययन कर व्रत साधना में उतरना चाहिए। ये व्रत पौराणिक व तांत्रिक दोनों मतों द्वारा प्रतिपादित है। शेष ज्ञान अपने श्री गुरु से ग्रहण करें। इस व्रत की रक्षा धर्मावलम्बियों का कार्य है। क्योंकि पतिव्रत को नष्ट करने का कार्य मलेच्छ करेंगे ऐसा पूर्व भविष्यवाणियों से सिद्ध होता है। कलियुग में कुलटा स्त्रियां व मलेच्छा पुरष तथा उनके विविध संगठन इस कार्य में जुट जाएंगे। क्योंकि अकारण भी सतित्व से भयभीत रहते मलेच्छों के ह्रदय को ऐसे पर्वों से अपार दुःख पहुँचता है तो वे षड्यंत्र व कृत्रिम बौद्धिक तर्कों व कुतर्कों द्वारा इन व्रतों की महिमा को खंडित करने का प्रयास करते है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

।। ॐ ह्रौं श्रीं ऐं ह्रीं सर्वसौभाग्य चक्र स्वामिन्यै नमः ।।

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

तारा महाविद्या महात्म्य

 

"अक्षोभ्य पुरुष" की शक्ति है "माँ तारा" ! जिसे माँ तारिणी कहा गया है ! मध्यरात्रि के पश्चात का जो समय है वो माँ तारा का ही है ! ये वही महाविद्या है जिन्हेँ तारिणी का नाम इसलिए प्रदान किया गया क्योँकि यही शक्ति हमेँ इस भवरुपी बन्धन से तारती है ! मानवदेह मेँ जब ये जीवात्मा बन्धनयुक्त पडी रहती है तो उस समय जीवात्मा निरन्तर छटपटाती रहती है ! कभी उसका ह्रदय "भोग" चाहता है तो कभी "योग" ! लेकिन वह दोनोँ को पाने का प्रयत्न तो करता है लेकिन किसी एक को भी ठीक तरह से प्राप्त नहीँ कर पाता ! तो माँ तारा की साधना एवं आराधना ऐसी विलक्षण है कि यदि साधक सब कुछ न्योछावर कर यदि तन्त्रमार्ग से इनकी साधना एवं आराधना करे तो वह "भोग" एवं "मोक्ष" दोनोँ को प्राप्त करता है ! "तारा तन्त्र" यद्यपि वामाचारी क्रिया से सम्पन्न होता है क्योँकि यह चीनाचारा पद्धति के द्वारा चलनेवाला है लेकिन यदि साधक इस सम्पूर्ण रहस्य को अपने श्रीगुरु के चरणोँ मेँ बैठकर समझे तो इस महाविद्या की कृपा वह अवश्य प्राप्त करता है ! तारा भगवती "ब्रह्म" का ज्ञान प्रदान करनेवाली महाशक्ति है ! यह वह शक्ति है जो हमेँ सम्पूर्ण मानसिक पीडाओँ से मुक्ति प्रदान करती है ! भगवती के सम्बन्ध मेँ कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के सदृश होगा ! अतः साधक को चाहिए की वह दस महाविद्याओँ की साधना एवं आराधना लगातार करता रहे ! माँ भगवती के स्तोत्र एवं मन्त्रोँ को वीरभाव से पढा अथवा उनका उच्चारण किया जाता है ! ये मन्त्र जितने भयानक और जितने गम्भीर कण्ठ स्वर से पढे जाते है उतने ही अधिक फलदायी होते है ! इन मन्त्रोँ की "सामर्थ्य" को एक "योग्य साधक" ही जान सकता है ! लेकिन यदि साधारण मनुष्य भी यदि पद्मासन अथवा सुखासन मेँ बैठकर इन मन्त्रोँ को सुनेँ, इनका श्रवण करे तो वह अपने जीवन की सभी बाधाओँ से मुक्ति प्राप्त कर सकता है ! उसके अनेकोँ रोग नष्ट होते है ! सम्पूर्ण भय नष्ट होता है ! व्यक्ति का मानसिक विकास होता है अथवा आध्यात्मिक विकास प्राप्त करते हुए वह "भोग-मोक्ष" दोनोँ को प्राप्त करता है !

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

'तारा महाविद्या के २१ प्रमुख भैरवों का वाहण मंत्र'


'तारा महाविद्या के २१ प्रमुख भैरवों का वाहण मंत्र' नीचे मंत्र क्रम दिया गया है 'कौलान्तक सिद्धों' का ये मंत्र एक महाकवच व सुरक्षा भी है जो सभी साधनाओं से पहले स्थापित होता है जिसकी विधि 'गुरुगम्य' ही है-

1) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं अक्षोभ्य भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं अक्षोभ्य भैरवाय फट्।
2) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं काल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं काल भैरवाय फट्।
3) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं नील भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं नील भैरवाय फट्।
4) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं विकराल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं विकराल भैरवाय फट्।
5) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं कंकाल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं कंकाल भैरवाय फट्।
6) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं पाताल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं पाताल भैरवाय फट् ।
7) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं काम भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं काम भैरवाय फट्।
8) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं जड़ भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं जड़ भैरवाय फट्।
9) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं स्थूल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं स्थूल भैरवाय फट्।
10) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं नाद भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं नाद भैरवाय फट्।
11) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं वीर भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं वीर भैरवाय फट्।
12) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रलय भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रलय भैरवाय फट्।
13) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं उच्चाट भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं उच्चाट भैरवाय फट्।
14) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं दुर्मुख भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं दुर्मुख भैरवाय फट्।
15) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं पावक भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं पावक भैरवाय फट्।
16) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रेत भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रेत भैरवाय फट्।
17) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं स्तंभ भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं स्तंभ भैरवाय फट्।
18) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रमाद भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रमाद भैरवाय फट्।
19) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं सूचि भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं सूचि भैरवाय फट्।
20) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं मैथून भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं मैथुन भैरवाय फट्।
21) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं चाण्डाल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं चाण्डाल भैरवाय फट्।




बुधवार, 16 मार्च 2022

होली - प्रेम का उत्सव
होली की साधना एवं महत्त्व संक्षेप में :
होली जीवन की प्रफुल्लता का पर्व है, प्रकृति के श्रृंगार, जीवों से सुख, मानव की प्रसन्नता का काल होली कहलाता है, होली ज्योतिषीय आधार सहित चिकित्सीय आधार और साधना का विशिष्ट समय लिए आने वाला दुर्लभ पर्व भी माना जाता है, रस और श्रृंगारमय वातावरण होने के कारण इसे प्रेम का उत्सव कहा जाता है, इस दिन प्रेम की ऐसी वयार बहती है की शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, धार्मिक आधार ये भी है कि ये काल बुरे पर अच्छे की जीत का समय है, शास्त्रों के अनुसार स्वत: सिद्ध मुहूर्तों में से एक होली भी है, होली को कल्पतरु काल भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन अनेक मन्त्रों कि सिद्धियाँ प्राप्त कि जाती है, होली के दिन किये गए सभी प्रयोग चमत्कारी रूप से त्वरित और दिव्य परिणाम ले कर आते हैं, इस दिन गुरु से परलौकिक दीक्षाएं प्राप्त कि जाती हैं, जीवन के अभावों को दूर करने के लिए इस काल में अवश्य साधना करें,शीघ्र विवाह, प्रेम प्राप्ति,शत्रु वशीकरण, सहित सर्वजन मोहन जैसे प्रयोग इस दिन किये जाते हैं, ईश्वर के सच्चे भक्तों को इस दिन निःस्वार्थ साधनाएँ ही करनी चाहियें, सौंदर्य-सम्मोहन के साथ ही कुण्डलिनी जागरण का मंत्र मार्गीय प्रोग भी इसी दिन से शुरू किया जा सकता है, होली के कुछ गुप्त रहस्य भी होते हैं जिन्हें गुरु केवल योग्य शिष्यों को ही बताता है।
आइये अब होली के कुछ दिव्य प्रयोगों के बारे में जानते हैं

धन लक्ष्मी प्रयोग-
लाल रंग से माथे को रंग कर लक्ष्मी माता के मन्त्रों का जाप करें लक्ष्मी कि कृपा बरसेगी
मंत्र-ॐ श्रीं श्रीं महालक्ष्मी आगच्छ आगच्छ धनं देहि देहि स्वाहा ॥
कमल गट्टे की माला से मंत्र का जाप करें
लाल गुलाल में कुछ दक्षिणा राशि रख कर दान करें व मंत्र का एक बार उच्चारण करें
मंत्र-श्री महालक्षमयै नम: दक्षिणां समर्पयामि।

रोग एवं ग्रह बाधा नाश हेतु प्रयोग-
हरे रंग से माथे को रंग कर सूर्य देवता के मन्त्रों का जाप करें तो बार-बार आने वाली मुसीबतों का नाश होता है
मंत्र-ॐ ऐं आदित्याय विद्महे सर्वारिष्ट निवृत्तये फट् ॥
हल्दी से स्वस्तिक का चिन्ह बना कर पुजा करें
यथा शक्ति अन्न दान करें

शत्रु वशीकरण प्रयोग-
पीले रंग से माथे को रंग कर हनुमान जी के मन्त्रों का जाप करें तो, जो अकारण शत्रु बन जाते है तो भी वे मित्र हो जायेंगे
मंत्र-ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ॥
मंत्र जाप के बाद गौग्रास अवश्य दें
हनुमान जी को सिन्दूर भेंट करें

मनोवांछित शीघ्र विवाह प्रयोग-
गुलाबी रंग से माथे को रंग कर कामाख्या देवी जी के मंत्र का जाप करें, तो मनोवांछित वर अथवा कन्या से विवाह होता है और शीघ्र विवाह होता है
मंत्र-स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये प्रसीद प्रसीद स्वाहा ॥
माता को पुष्प माला अर्पित करें
रुद्राक्ष माला का जाप करें

होली के दिन देवी कामाख्या जी की सोलह शक्तियों का नाम लेने से देवी प्रसन्न हो कर सब दुखों का नाश करती है, सावधानी पूर्वक नाम लिख कर उनको बार बार कहना चाहिए, देवी के ये सोलह नाम हैं-अन्नदा, धनदा, सुखदा, जयदा, रसदा, मोहदा, ऋद्धिदा, सिद्धिदा, वृद्धिदा, शुद्धिदा, भुक्तिदा, मुक्तिदा, मोक्षदा, शुभदा, ज्ञानदा, कान्तिदा, यदि आप दिव्य तेजस्विता प्राप्त करना चाहते हैं आध्यात्मिक तेज चाहते हैं तो होलिकाग्नि पर मंत्र ध्यान लगाना चाहिए

मंत्र-ॐ ह्रौं तेजस्विनी ज्वल्ल होलिकाग्ने स्वाहा ॥
विशेष बात यह है कि किसी 64 कला संपन्न दिव्य गुरु से दीक्षा अवश्य लेँ और होली जैसे पर्व के दौरान गुरुपूजन करें, शास्त्र कहता है कि संत-दर्शन और उनके चरणवंदन से आयुआरोग्य प्राप्त होता है, तपस्वी गुरु कि चरणपादुका-पूजन से दिव्य प्रज्ञा प्राप्त होती है

कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ


बुधवार, 31 जुलाई 2019

षोडशस्वरीय अष्ट सिद्धि मंत्र
'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करता है 'षोडशस्वरीय अष्ट सिद्धि मंत्र'। प्रस्तुत मंत्र की साधना व जाप और श्रवण से अष्टसिद्धियाँ योगियों को प्राप्त होती है। ये मंत्र दो भागों में विभक्त होता है जिसे शिव-शक्ति क्रम कहते हैं। अष्टसिद्धियों का ये मंत्र भैरव-भैरवियों को उच्चता प्रदान करेगा। इसी कामना के साथ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
         'षोडशस्वरीय अष्ट सिद्धि मंत्र'
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ अणिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ महिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लघिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ प्राप्ति सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ र्इषिता सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ वशित्व सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ प्राकाम्य सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ कामवसायिता सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं

ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः अणिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः महिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः लघिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः प्राप्ति सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः र्इषिता सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः वशित्व सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः प्राकाम्य सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः कामवसायिता सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं 


सोमवार, 17 जून 2019

मानसिक शांति के लिए मंत्र
"मनुष्य जिस दिन विज्ञान के चरमोत्कर्ष पर पहुंचेगा....उस दिन भी वो मानसिक शांति के लिए मंत्र जाप की शरण में ही लौट कर आएगा.....क्योंकि सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही ऋषियों नें मन के अन्दर झांक कर...मन्त्र की रचना को अलौकिकता से पूर्ण पाया था. आज भी साधक केवल मंत्र जाप द्वारा इष्ट और गुरु को प्रसन्न कर सकते हैं....किन्तु मंत्र मन से जुड़ा है....अगर मन में भाव न हों......अगर मन में विश्वास न हो...संदेह हो तो...मंत्र केवल व्यर्थ का एक शब्द मात्र है.......शास्त्र कहते हैं....पाषाण ह्रदय के लिए कविता नहीं होती और मूढ़ बुद्धि के लिए मंत्र.......इसलिए गुरु कोई भी मंत्र केवल पात्र को ही प्रदान करते हैं-कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज"-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.

गुरुवार, 30 मई 2019

अग्नि देवता का महत्व
"ISHPUTRA" this morning worshiped AGNI (FIRE) God and also the described the importance of AGNI god. "KAULANTAK NATH" says in VEDAS the worship of AGNI God is of the prime focus. AGNI is the main and visible god. The visible AGNI OR FIRE is just a small part of the big BRAHMA AGNI. AGNI resides in various forms like YOGAGNI, SURYAGNI, CHANDRAGNI, MULAGNI. The base of all YAGYA is AGNI itself. Everything is the manifestion of AGNI itself. AGNI resides in both dualities of heaven and hell, life and death. Because its the visible manifestion of "MAHAHIRANYAGARBHA" and it delivers the sacrifise of yagya to the gods so THE DIVINE AGNI is known as "JATABHEDA AGNI".Its due to this fact that the body is cremated in an open air and AGNI reducing the body to the ashes. One day the whole universe is going to be the sacrifise of AGNI God. This is why the worship of AGNI is done by the scholars. Its secrets and mysteries are only known by SIDDHAS. The most worshiped among all gods "AGNI" is the master of all wisdom and bestows activeness. The Divine god AGNI can be worshiped with this short mantra - OM AAM AGNE NAMAH. This mantra is used for both worshiping AGNI GOD and also for recitation. The worshiper of AGNI god is bestowed with all SIDDHIS (PERFECTIONS) and WISDOM-KAULANTAK PEETH TEAM - HIMALAYA.
"ईशपुत्र" नें आज प्रात: अग्नि देवता की स्तुति की और अग्नि देवता के महत्त्व पर प्रकाश डाला। "कौलान्तक नाथ" कहते हैं "वेदों में अग्निदेव की उपासना प्रधान विषय है। अग्नि मूल और प्रत्यक्ष देवता हैं। स्थूल अग्नि, ब्रह्म अग्नि का एक अंश मात्र है। योगाग्नि, सूर्याग्नी, चंद्राग्नी, मूलाग्नी आदि अनेक स्वरूपों में अग्नि विद्यमान हैं। प्रत्येक यज्ञ का मूल अग्नि ही है। स्वर्ग अग्नि है, नर्क भी अग्नि ही है, जीवन अग्नि है और मृत्यु भी अग्नि ही है। महाहिरण्यगर्भ का प्रत्यक्ष स्वरुप होने के कारण और देवताओं तक हवि पहुँचाने के कारण दिव्य अग्नि "जातवेद अग्नि" कहलाते हैं। यही कारण है की ईश्वर द्वारा प्रदत्त शरीर को अंतत: अग्नि देवता को ही सौंप दिया जाता है। एक दिन ये ब्रहमांड भी अग्नि देवता की हवि हो जाएगा। इसलिए अग्नि की उपासना श्रेष्ठों द्वारा की जाती है। अग्नि के रहस्य केवल सिद्ध जानते हैं। देवताओं में परम वन्दित अग्नि तेज देने वाले, समस्त विद्याओं के नायक है। ऐसे अग्नि देवता का लघु मंत्र-ॐ अं अग्ने नम: है। इसी मंत्र से उनकी उपासना व जाप किया जाना चाहिए। अग्नि का उपासक समस्त सिद्धियों व ज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है।" कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

ब्रह्मांड रचयिता देवी कूष्मांडा
मार्कंडेय पुराण के अनुसार चतुर्थ नवरात्र की देवी का नाम कूष्मांडा देवी है, प्राचीन कथा के अनुसार जब ये ब्रह्माण्ड बना ही नहीं था, तब माँ योगमाया ने सृष्टि की उत्त्पति के लिए ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया, किन्तु ब्रह्मा जी तो मन में कामना करते की ऐसी सृष्टि पैदा हो लेकिन उसे पूरा कैसे किया जाए तो योगमाया से ब्रह्मा जी ने सहायता मांगी,देवी को स्तुति से प्रसन्न कर ब्रह्मा जी को देवी से सृष्टि निर्माण की कला प्राप्त हुई, तब देवी ने सबसे पहले अंड अर्थात ब्रह्माण्ड पैदा किया, तथा सृष्टि में गर्भ के अतिरिक्त अण्डों से जीवन पैदा करने की शक्ति भी ब्रह्मा जी को दी, स्वयं भी देवी करोड़ों सूर्य के सामान तेजस्वी स्वरुप में, ब्रहमां में सूर्य मंडल के भीतर स्थित रहती हैं, ऐसी सामर्थ्य देवी के अतिरिक्त किसी और में नहीं है, देवी आठ भुजाओं वाली हैं, जिनमें कमल पुष्प, धनुष, तीर, कमंडल, चक्र, गदा,माला तथा अमृत कलश है धारण किये हुये हैं व सिंह के आसन पर सवार हैं, देवी साधक को अमरत्व का वरदान देने में समर्थ हैं, इच्छा मृत्यु का वर देने वाली देवी, साधक के सब दुखों को हरने में क्षण मात्र भी देर नहीं करती, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी पारलौकिक विद्याओं की जननी है, जीवन को धर्म एवं कृपा से भर देने में सामर्थ है

                                                                                  ब्रह्माण्ड को पैदा करने के कारण देवी का नाम पड़ा कूष्मांडा, महाशक्ति कूष्मांडा योगमाया का दिव्य तेजोमय स्वरुप हैं जो सृष्टि को पैदा करने के लिए उत्पन्न हुआ, संसार में अण्डों से जीवन की उत्त्पत्ति कराने की शक्ति ब्रह्मा जी को देने के कारण भी देवी को कूष्मांडा कहा जाता है, देवी के उपासक अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं तथा इछामृतु का वर देने वाली यही देवी हैं, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी को प्रसन्न करने के लिए चौथे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पांचवें व छठे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी कूष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है

मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै नम:

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें

जैसे मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै स्वाहा:

माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ

 यन्त्र-
          775 732 786
          151 181 102
          762 723 785


यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को भगवे रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार भगवे रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को केसर, लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा कभी भी की जा सकती है, रात्री की पूजा का देवी कूष्मांडा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है
मंत्र जाप के लिए भी संध्या व रात्री मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक बड़ा घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व कलश को लाल कपडे से ढक कर रखें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को भगवे वस्त्र, रुद्राक्ष माला तथा गेंदे के फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए
मंदिर में भगवे रंग की ध्वजा चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, अनाहत चक्र में देवी का ध्यान करने से चौथा चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में कपूर व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, चौथे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और दो अन्य नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे संतान प्राप्ति की समस्या हो या विदेश यात्रा की, या पद्दोंन्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ क्षूं क्षुधास्वरूपिन्ये देव बन्दितायै नम:

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें

ॐ शरणागतदीनार्त परित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणी नमोस्तुते

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा चौथे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी गुफा वाले शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज चौथे नवरात्र को चार कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ आभूषण देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, चौथे नवरात्र को अपने गुरु से "ब्रहमांड दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप देवत्व प्राप्त कर लेते हैं व ब्रह्म विद्या की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, चौथे नवरात्र पर होने वाले हवन में काले तिलों की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले चौथे नवरात्र का ब्रत ठीक सात पंद्रह बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर का प्रसाद बांटना चाहिए
आज सुहागिन स्त्रियों को भगवे अथवा पीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और भगवे या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

चांद सी सुंदर चंद्रघंटा
मार्कंडेय पुराण के अनुसार तृतीय नवरात्र की देवी का नाम चंद्रघंटा देवी है, निगम ग्रंथों में निहित कथा के अनुसार जब भगवान् शिव ने देवी को समस्त विद्ययों का ज्ञान प्रदान करना शुरू किया तो देवी उस ज्ञान का तप के लिए प्रयोग करने लगी, लगातार आगम निगमों का ज्ञान प्राप्त कर देवी महातेजस्विनी हो गयी व सभी कलाओं सहित तेज पुंज बन योगमाया के रूप में स्थित हो गयी, तब प्रसन्न हो कर शिव ने देवी को अपने साथ एकाकार कर अर्धनारीश्वर रूप धरा, उस समय देवी पार्वती जी को अपने वास्तविक स्वरुप का बोद्ध हुआ, तब शिव से अलग हो आकाश में देवी ने सिंह पर स्वर हो दस भुजाओं वाला एक अद्भुत रूप धारण किया, हाथों में कमल पुष्प धनुष त्रिशूल,गदा, तलवार सहित वर अभी मुद्रा धारण की, क्योंकि देवी तपस्विनी रूप में थी तो एक हाथ में माला और एक हाथ में उनहोंने कमंडल धारण कर लिया, सभी ऋषि मुनि देवता देवी के तेज को सः नहीं पा रहे थे तो भगवान शिव ने चन्द्रमा को देवी के शीर्ष स्थान पर बिराजने को कहा, जिससे उनका तेजस्वी स्वरूप अब और भी सुन्दर तथा शीतल हो गया, तब सभी देवताओं नें देवी की जय जयकार की तथा उनको चंद्रघंटा देवी के नाम से पुकारा,जो भी भक्त देवी के ऐसे दिव्य रूप की पूजा करता है, वो एक साथ संसार में भी तथा मुक्ति के मार्ग पर भी एक ही समय चल सकता है, भौतिक संसार में तो आगे बढ़ता ही है साथ अध्यात्म में भी शिखर पर रहता है, सभी विद्यार्थियों, साधको, भक्तों को ऐसी देवी के दर्शनों से महासिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, ऐसे व्यक्ति को अहंकार रहित ज्ञान प्राप्त होता है, देवी को पूजने वाले को सवयम देवता भी पूजते हैं

                                         आकाश मंडल में चन्द्रमा को अपने शीश पर धारण करने के कारण देवी का नाम पड़ा चंद्रघंटा, महाशक्ति चंद्रघंटा माँ पार्वती जी का तेजोमय स्वरुप हैं जो सर्व कलाओं को धारण करने से उत्पन्न हुआ
अपनी सभी कलाओं को अध्यात्म धर्म सहित धारण करने के कारण ही देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है, देवी के उपासक एक साथ ही संसार में जीते हुये परम मुक्ति के मार्ग पर भी चल सकते है, जिस कारण देवी की बड़ी महिमा गई जाती है, देवी कृपा से ही भक्त को संसार के सभी सुख तथा मुक्ति प्राप्त होती है, देवी को प्रसन्न करने के लिए तीसरे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है
यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,

महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं चंद्रघंटा देव्यै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं चंद्रघंटा देव्यै स्वाहा:
माता के मंत्र का जाप करने के लिए रक्त चन्दन की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ

 यन्त्र-
          539 907 234
          227 876 191
          654 812 902

यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को लाल रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार लाल रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा केवल सायकाल को ही की जाती है, शाम की पूजा का चंद्रघंटा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी संध्या मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को कमल पुष्प, रक्त चन्दन की माला तथा सफेद फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए,मंदिर में लाल रंग की चुनरी चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, मणिपुर चक्र में देवी का ध्यान करने से तृतीय चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में केसर मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए,

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, तीसरे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और बर्फ (हिमजल) का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए
तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे घरेलु कलह से मुक्ति हो, विवाह नहीं हो पा रहा हो, प्रेम प्राप्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ रं रक्त स्वरूपिन्ये महिषासुर मर्दिन्ये नम:
(न आधा लगेगा व न की जगह ण होगा )

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें,

ॐ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके
शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणि नमोस्तुते

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा तीसरे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी नाड़ी के निकट स्थित शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज तीसरे नवरात्र को तीन कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ चूड़ियाँ व श्रृंगार प्रसाद देना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, तीसरे नवरात्र को अपने गुरु से "उज्जवल दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, तीसरे नवरात्र पर होने वाले हवन में खीर से हवन करना चाहिए
ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले तीसरे नवरात्र का ब्रत आठ बीस साय खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर हलवा पूरी का प्रसाद बांटना चाहिए,आज सुहागिन स्त्रियों को लाल वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और हल्के लाल रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

रविवार, 7 अप्रैल 2019

महातपस्विनी देवी ब्रह्मचारिणी
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार द्वितीय नवरात्र की देवी का नाम ब्रह्मचारिणी देवी है, ये ब्रह्मचारिणी देवी भी गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती ही हैं, एक समय की बात है कि देव ऋषि नारद पर्वतराज हिमालय के महल पहुंचे, जहाँ पर्वत राज हिमालय की प्रार्थना पर उनहोंने बालिका पार्वती की जन्म पत्रिका शोधी और उनका भाग्य बताते हुये कहा कि इस कन्या का विवाह तो त्रिलोकीनाथ भगवान शिव से होगा, ये सुन कर देवी पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने कि इच्छा से कठोर तप करना शुरू कर दिया, देवी ने भोजन पानी त्याग दिया श्वेत वस्त्र धारण कर लिए, हाथों में कमंडल और माला ले कर, कठोर तपस्वियों जैसा जीवन जीने लगी, जैसे जैसे तप बढ़ता गया, तीनो लोकों में हा हा कार मच गया, इन्द्र की पदवी भी स्वर्ग में डोलने लगी, तब सभी देवताओं को जिज्ञासा हुई कि पृथ्वी पर कौन ऐसा तपस्वी है और वे उसे ढूडने हिमालय जा पहुंचे, जहाँ उनहोंने देवी पार्वती जी के दर्शन ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में किये, जिनके दिव्य तेज से समस्त लोक प्रकाशित हो रहे थे, महाशक्ति के ऐसे रूप के दर्शन कर सभी पवित्र हो गए, देवी के उपासक सभी पापों से मुक्त हो कर सुखी एवं पवित्र सात्विक जीवन जीते हैं व मुक्ति प्राप्त करते है, सभी आध्यात्मिक शक्तियों कि जननी भी ब्रह्मचारिणी देवी ही हैं,

                                                                                        हिमालय पर कठोर तपस्या करने के कारण व तपस्या नियमों को पालने के कारने देवी का नाम पड़ा ब्रह्मचारिणी, महाशक्ति ब्रह्मचारिणी माँ पार्वती जी का तपस्वी स्वरुप का ही नाम है, कठोर सात्विक तपस्या से तीनों लोकों को प्रभावित करने के कारण भी देवी को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है, देवी के उपासक सभी पापों से मुक्त हो कर सुखी एवं पवित्र सात्विक जीवन जीते हैं, देवी कृपा से ही मुक्ति प्राप्त होती है, देवी को प्रसन्न करने के लिए दूसरे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय व तीसरे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का अर्गला स्तोत्र फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का भी पाठ करें, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,



महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)



देवी ब्रह्मचारिणी को प्रसन्न करने के लिए दूसरे दिन का प्रमुख मंत्र है

मंत्र-ॐ हुं ह्रीं ऐं ब्रह्मचारिणी देव्यै नम:

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें

जैसे मंत्र-ॐ हुं ह्रीं ऐं ब्रह्मचारिणी देव्यै स्वाहा:



माता के मात्र का जाप करने के लिए तुलसी की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ



 यन्त्र-

          777 298 307

          621 543 991

          931 053 777



यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को saphed रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, शैलपुत्री देवी का श्रृंगार लाल किनारे वाले सफेद रंग के वस्त्रों से किया जाता है, सफेद या लाल रंग के फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को सफेद चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं , माता की मंत्र सहित पूजा केवल सुबह ही की जाती है, शाम की पूजा की अपेक्षा देवी ब्रह्मचारिणी की साधना के लिए ब्रह्म मुहूर्त का ज्यादा महत्त्व माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी ब्रह्म मुहूर्त या सुबह के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक अखंड दीपक जला लेना चाहिए, देवी की पूजा में नारियल सहित कलश स्थापन किया होना चाहिए साथ ही मंत्र जाप को फलीभूत होने के लिए रेत में कलश के निकट गेहूं के जवारे उगायें, कलश में गंगाजल और पंचामृत भर कर अक्षत (चाबलों) की ढेर पर इसे स्थापित करना चाहिए यदि पहले दिन कलश स्थापित किया है तो केवल कलश पूजा करें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर मौली सूत्र बांधें, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए



मंत्र-ॐ हुं ह्रीं ऐं



मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को श्वेत वस्त्र तुलसी माला तथा कुशा का आसन आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में कमंडल दान देने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, स्वाधिष्ठान चक्र में देवी का ध्यान करने से द्वितीय चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में दूध मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए,



चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै



ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, पहले दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और कूएं का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए , आज सुहागिन स्त्रियों को भी अधिक श्रृंगारनहीं करना चाहिए, स्वयम भी साधारण और हल्के रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे विद्या रोजगार की समस्या हो या याददाश्त कमजोर होने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं

देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ श्रीं बुद्धि स्वरूपिन्ये महिषासुर सैन्यनाशिनयै नम:(न आधा लगेगा)

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें

व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें

ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भितिमशेषजन्तो:

स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि

दारिद्रयदुःखभयहारिणी का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदाआर्द्रचित्ता 



यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा दूसरे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी सात्विक शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज दूसरे नवरात्र को दो कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ मोतियों या रक्तचंदन की माला देनी चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, दूसरे नवरात्र को अपने गुरु से "सत्व दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप पूर्ण आत्मिक, दैहिक, मानसिक पवित्रता की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, दूसरे नवरात्र पर होने वाले हवन में पंचमेवा की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले दूसरे नवरात्र का ब्रत ठीक सात बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्या पराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

-कौलान्तक पीठाधीश्वर

महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

नवरात्रि साधना
"During Navratri you can fast one time or for the entire Navratri period or consume fruits only for 9 days to do Ma Bhagvati Paraamba sadhna. For the mantra sadhna using rudraksh beads or red sandalwood beads are the best. If you want to mentally recite the mantras then too, you can do so continuously. There is no necessity for different mantras for the 9 different Goddesses - here presented one mantra is sufficient -Kaulantak Peeth Team Himalaya
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'नवरात्री' में आप 'माँ भगवती पराम्बा' की साधना के लिए एक समय अथवा पूर्ण काल व्रत रख सकते हैं अथवा 9 दिन फलाहारी रह सकते हैं। मंत्र साधना के लिए 'रुद्राक्ष' अथवा 'रक्त चन्दन' की माला उत्तम है। आप यदि मानसिक जाप करना चाहते हैं तो भी निरन्तर मंत्र जाप कर सकते हैं। नौ देवियों के लिए अलग-अलग मंत्र की आवश्यकता नहीं प्रस्तुत एक ही मंत्र पर्याप्त है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।


सोमवार, 4 मार्च 2019

महा शिवरात्रि साधना
कौलान्तक पीठ हिमालय शुभकामनाएं देना चाहता है, और सभी भैरवों और भैरवियों के लिए आपकी सलामती, शांति और खुशी के लिए प्रार्थना करता है जो सोशल मीडिया के माध्यम से हमारे साथ जुड़े हुए हैं। जो लोग शिवरात्रि पर विशेष साधना करना चाहते हैं, वे रात में शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं और रुद्राक्ष माला के साथ या इसके बिना इस मंत्र का जाप कर सकते हैं।
मंत्र: || ॐ आं ह्रीं क्रौं सः त्रिलोकेश्वराय श्री त्र्यम्बकाय नमः ||
यह मंत्र विशेष रूप से आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति के लिए है और यह बीमारियों, आर्थिक समस्याओं, प्रेम के मुद्दों और बुरी ऊर्जाओं को दूर करने के लिए प्रभावी है।

शिव पूजा के लिए किसी को विस्तृत अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं होती है। शिव पूजा करने के लिए साधारण रूप से फूल, साधारण जल का उपयोग किया जा सकता है। चूंकि यह रात का त्योहार है, इसलिए आप चाहे तो पूरी रात भी साधना कर सकते है।

|| ॐ सं सिद्धाय नमः ||
|| ॐ श्री गुरु मंडलाय नमः ||
|| ॐ महा हिमालयाय नमः ||
|| ॐ प्रिया ईशपुत्राय नमः ||

ॐ नमो आदेश!

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कौलान्तक पीठ टीम, हिमालय

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

सिद्ध योग साधना शिविर - 40 प्राणायाम
ईशपुत्र कौलान्तक नाथ नेँ जिन 40 प्राणायामोँ को सर्वप्रथम जगतहिताय सार्वजनिक किया है वो निम्नानुसार है ।
=== 1 ब्रह्म प्राणायाम 2 उद्गीथ प्राणायाम 3 अनुलोम-विलोम प्राणायाम 4 कपालभाति प्राणायाम 5 खण्ड प्राणायाम 6 मूर्च्छा प्राणायाम 7 भ्रामरी प्राणायाम 8 कुम्भक-रेचक-पूरक प्राणायाम 9 संक्षोभण प्राणायाम 10 बाह्य प्राणायाम 11 शीतली प्राणायाम 12 सूर्यभेदी प्राणायाम 13 शीतकारी प्राणायाम 14 चन्द्रभेदी प्राणायाम 15 नाडीशोधन प्राणायाम 16 उज्जायी प्राणायाम 17 कर्णरोगान्तक (कर्णभेदी) प्राणायाम 18 सप्तखण्ड प्राणायाम 19 कण्ठादिशोधन प्राणायाम 20 विश्राम प्राणायाम 21 पीडक प्राणायाम 22 केवली प्राणायाम 23 प्लावनी प्राणायाम 24 स्तंभकारी प्राणायाम 25 भस्त्रिका प्राणायाम 26 स्पन्दनकारी प्राणायाम 27 सुषुम्न प्राणायाम 28 जलधि प्राणायाम 29 चक्राति प्राणायाम 30 पद्मभेदन प्राणायाम 31 बाह्यवृत्ति प्राणायाम 32 अभ्यान्तरवृत्ति प्राणायाम 33 बाह्याभ्यान्तर-विषयापेक्षी प्राणायाम 34 त्रिकुटीभेदी प्राणायाम 35 लघु प्राणायाम 36 मूल प्राणायाम 37 मध्य प्राणायाम 38 उर्ध्व प्राणायाम 39 ब्रह्माण्डभेदी प्राणायाम 40 कपि प्राणायाम

आप इनको youtube पर भी देख सकते हैं ।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

श्री सर्वेश्वर आदिनाथ मंत्र
प्रस्तुत है 'कौलान्तक पीठ हिमालय' का सबसे चर्चित मंत्र जो 'कौल मत' के 'वैष्णव पक्ष' का मंत्र है। 'कौलान्तक पीठ' के 'सर्वकुल' नाम के कुल का प्रसिद्द मंत्र है। ये मंत्र 'सर्वेश्वर नाथ' यानि 'वैष्णव आदिनाथ' का प्रतीक भी है। वैसे तो 'आदिनाथ' स्वयं 'सदाशिव' को कहा जाता है जो 'शैव कौलकुल' के प्रथम बिंदु हैं। लेकिन शिव के कुल को आगे बढ़ाने का कार्य 'विष्णु पुरुष' का है। 'कौलान्तक पीठ' की एक प्रचलित कथा के अनुसार 'सर्वेश्वर नाथ' 'विष्णु पुरुष' ही हैं जो 'शिव पंथ' को बढ़ाने के लिए 'शिव स्वरुप' धारण करते हैं। हिमालय का 'गरुड़ासन पर्वत' उनका स्थल है। ये एक लम्बी कहानी है जिसे 'संप्रदाय' के भैरव-भैरवियाँ जानते हैं। हम विस्तार में ना जा कर 'वैष्णव आदिनाथ' का कौल मंत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। ये बताना जरूरी है कि 'शिव भेष' के कारण व प्रथम शिष्य व ज्ञान प्रदाता होने के कारण ही 'विष्णु पुरुष' को 'आदिनाथ' कह कर सम्बोधित किया गया है। बाकी कोई रहस्य भला आप सबसे छुप कहाँ सकता है ? आप जानते ही है कि इस संप्रदाय के लोग अभी भी अपनी मान्यताओं को आगे बढ़ा रहे हैं। ख़ैर छोड़िये प्रस्तुत है मंत्र-कौलान्तक पीठ

   ।।श्री सर्वेश्वर आदि नाथ मंत्र।।
धुं गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ासन पर्वताय
गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु कौल सिद्धाय
नं नं नं नं नं नं नं नं नं आदि नाथाय हुं


मंगलवार, 8 जनवरी 2019

शाबर कुरुकुल्ला मंत्र
कौलान्तक सम्प्रदाय की प्रमुख देवी "रक्त तारा" जिसे "देवी कुरुकुल्ला" और "सुकुल्ला" या "तोतला" जैसे नामों से पुकारा जाता है। वे चमत्कारों और रहस्यों की देवी के रूप में विख्यात हैं व पूजी जाती हैं।  देवी अति शीघ्र प्रसन्न हो कर वरदान देती हैं।  कौलाचारियों की महाअराध्या देवी का मंत्र स्वयं "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" की वाणी में प्रस्तुत है। शाबर कुरुकुल्ला मंत्र-ॐ नमो कुरुकुल्ले अन्न-धन वर्षिणी सकलकामाकर्षिणी सिद्ध हो-सिद्ध हो-सिद्ध हो माँ।


रविवार, 16 दिसंबर 2018

बृहस्पति कल्प और उसका कोर्स
सिद्ध धर्म के अनुसार, ‘बृहस्पति कल्प’ यह बृहस्पति जी के द्वारा किया गया सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। बृहस्पति कल्प को गहराई से समझने के बाद बृहस्पति जी के सम्पूर्ण कुलों को समझना संभव है।
सिद्ध धर्म के अनुसार, ‘बृहस्पति जी के आस्तिक और नास्तिक दोनों दर्शनों के लिये ‘बृहस्पति कल्प’ सर्वोच्च ग्रंथ है। बृहस्पति कल्प को समझने के लिए एक व्यक्ति को पहले उसके आधार में स्थित लौकिक और अलौकिक कुल और विचारधारा को समझना होगा। प्रमुख कुल और प्राथमिक विचारधाराओं में पारंगत होने पर ही कोई व्यक्ति बृहस्पति कल्प में पारंगत हो सकता है।
बृहस्पति कल्प के पांच खंड है और उन्ही को और अधिक स्पष्ट करने के लिये उपखंड भी है। तथा ‘आंतरराष्ट्रीय कौलान्तक सिद्ध विद्यापीठ’ भी बृहस्पति कल्प पर आधारित सात दिनों का कोर्स आयोजित करता है।

बृहस्पति कल्प के खंड और उसके उपखंडों के बारे में नीचे लिखा गया है

बृहस्पति कल्प खण्ड-1

-बृहस्पति योग आगम
-योग की उत्पत्ति
-108 योगों में श्रेष्ठ योग कौन ?
-योग के उपयोगी और अनुपयोगी भाग
-समाधी और पूर्णता में अंतर
-बृहस्पतिकृत योग ‘क्रिया योग’ का सार
-क्रिया योग और कुण्डलिनी
-क्रिया योग के उपप्रकार
-क्रिया योग की विधियां
-क्रिया योग की उपलब्धि
-क्रिया समाधी

खण्ड-2

बृहस्पति दर्शन
देवगुरु के 12 स्वरुप और आवश्यकता
-सत्व गुण, सत्व सृष्टि और सात्विक मनुष्य
-रजस् गुण, रजस् सृष्टि और राजसिक मनुष्य
-तमस् गुण, तमस् सृष्टि और तामसिक मनुष्य
-मनुष्य : आत्मा या शरीर ?
-ब्रह्माण्ड में अकेला या परित्यक्त?
-मनुष्य का प्रकृति पर अधिकार
-आवश्यकताएं और नियम
-मनुष्य के लिए सर्वोपरि नियम

उपखण्ड-1

-आस्तिक दर्शन
-आस्तिकता क्या है?
-आस्तिक क्यों हों?
-आस्तिकता का अंत कहाँ है?
-आस्तिकता गुण या दोष?
-मनुष्य आस्तिक क्यों नहीं हैं?
-आस्तिकता के प्रयोग
-क्या आस्तिकता मृत्यु के पार ले जाती है?
-क्या आस्तिकता से सत्य मिलता है?
-आस्तिकता का सार

उपखण्ड-2

-नास्तिक दर्शन
-नास्तिकता क्या है?
-नास्तिक क्यों हों?
-नास्तिकता का अंत कहाँ है?
-नास्तिकता गुण या दोष?
-मनुष्य नास्तिक क्यों नहीं हैं?
-नास्तिकता के प्रयोग
-क्या नास्तिकता मृत्यु के पार ले जाती है?
-क्या नास्तिकता से सत्य मिलता है ?
-नास्तिकता का सार

खण्ड-3

-कर्मकाण्ड
-कर्मकाण्ड क्या है?
-कर्मकाण्ड की कितनी उपयोगिता?
-कर्मकाण्ड के गुण और दोष
-कर्मकाण्ड और देश, काल, परिस्थिति
-कर्मकाण्ड के नियम
-कर्मकाण्ड का परिचय

उपखण्ड-1

-वैदिक कर्मकाण्ड का परिचय
-वैदिक कर्मकाण्ड की शैली
-वैदिक कर्मकाण्ड के मंत्र
-वैदिक कर्मकाण्ड के यन्त्र
-वैदिक कर्मकाण्ड के गुण दोष
-वैदिक कर्मकाण्ड का सार

उपखण्ड-2

-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड का परिचय
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड की शैली
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड के मंत्र
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड के यन्त्र
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड के गुण दोष
-(तान्त्रिक) अवैदिक कर्मकाण्ड का सार

उपखण्ड-3

-अकुल कर्मकाण्ड का परिचय
-अकुल कर्मकाण्ड की शैली
-अकुल कर्मकाण्ड के मंत्र
-अकुल कर्मकाण्ड के यन्त्र
-अकुल कर्मकाण्ड के गुण दोष
-अकुल कर्मकाण्ड का सार

खण्ड-4

-पुराण और तंत्र विरोध मार्ग क्यों?
-सत्य कौन पुराण या तंत्र?

उपखण्ड-1

पुराणिक कोष
-पुरातन ज्ञान क्यों आवश्यक?
-इतिहास कितना सत्य और असत्य?
-षडयंत्र और क्षात्र वासना
-षडयंत्र और दुर्बुद्धि वासना
-तथ्य और जनप्रसार
-रणनीति, कुप्रचार और असत्य
-जीवन के दुःख और उनका उपयोग
-हृदय, 5 विकार और षडयंत्र

उपखण्ड-2

-तांत्रिक कोष
-तांत्रिक होना क्यों आवश्यक?
-इतिहास निर्माण क्या है?
-सिद्धि क्या है और इसका महत्त्व क्या है?
-सिद्धि और छल में क्या समानता और असमानता?
-जीवन क्या है प्राप्ति या त्याग?
-तांत्रिक षट्कर्म आवश्यक और दोषपूर्ण क्यों?
-मनुष्य अतृप्त क्यों?

खंड-5

काम्य प्रयोग और चिकित्सा
–तांत्रिक विधि
–वैदिक विधि
–देह और स्वास्थ्य
–देह और सौंदर्य
–देह और वासनाएं
–वासनापूर्ती और वासना त्याग
–काम क्या है?
–काम की सीमा क्या है?
–कामवासना पाप या पुण्य?
–वासना का मनोलोक
–गृहस्थ धर्म, आकर्षण और पाप
–नियोग, वैश्यावृत्ति और प्रेम सम्बन्ध
–जीवन दर्शन का सार
–मृत्यु की प्रतीक्षा

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

देवी लक्ष्मी की लघु साधना-दीपावली विशेष
दीपावली स्वतः सिद्ध मुहूर्त है. तंत्र पथ अथवा मंत्र साधकों को किसी मुहूर्त विशेष को शोधने की जरूरत नहीं होती. वो केवल साधना करता है. दीपावली धन, यश, मान, स्वास्थ्य, गृहस्थ सुख तो देती ही है लेकिन ये समय आपके जीवन को अनेक लाभ दे सकता है यदि आप जानते हों कि कौन सी साधना अप पर ठीक बैठती है. गुरु से दीक्षा लेने के लिए भी ये मुहूर्त बड़ा ही श्रेष्ठ माना जाता है. लक्ष्मी देवी या कहें माँ श्री विद्या का काल होने से गरीब से गरीब भी साधना कर जीवन में उत्थान को प्राप्त कर सकता है. इस काल में श्री सूक्त का पाठ अथवा श्रवण आम भक्त के लिए वरदान स्वरुप होता है. मंत्र का जाप भी अत्यंत लाभदायक होता है.
मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले जाग्रय-जाग्रय हुं

इस काल में बीसा यन्त्र या श्रीयंत्र घर में स्थापित करना बड़ा ही शुभ प्रभाव देता है. हत्था जोड़ी, श्वेतार्क गणपति, रुद्राक्ष, मानिंक आदि घर में स्थापित करना धनदायक होता है. यदि आप रोजगार प्राप्त नहीं कर पा रहे तो निम्न यन्त्र को बना कर अपने पास रखें व दीवाली की रात ही इसे लिखें और पूजन करें.
यन्त्र-
६६६ ९९९ ६६६
९९९ ३३३ ९९९
३३३ ९९९ ३३३
देवी के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला का ही प्रयोग करें. उत्तर दिशा की और या पूर्व की और मुख रखना चाहिए. लाल रंग का आसन बिछाना चाहिए. अपनी रक्षा या तंत्र प्रयोगों से बचाव के लिए गुरु मंत्र या हिमालय मंत्र का जाप करें. इससे किसी भी तरह का जादू टोना तंत्र मंत्र प्रभावहीन हो जायेगा.
मंत्र-
ॐ महाकालाय विकर्तनाय मायाधराय नमो नम:
उपरोक्त सभी मन्त्रों की कम से कम पांच माला तो जरूर करें यदि आप साधक है तो ५० माला करने से लाभ मिलता है. देवी को लाल फूल व खीर पंचमेवे का भोग लगायें. यदि आपके पास धन अथवा समय का आभाव है तो एक लाल कपडे का टुकड़ा या चुनरी ले कर पांच दीये देवी के मंदिर ले जा कर चढ़ा दें. देवी अवश्य कृपा करेंगी.
-कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

वज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान


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बज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान



जब बक्तों के प्यारे बजरंगबली पैदा हुए थे, शिव ने भक्तों की रक्षा के लिए व भगवान् राम जी की सेवा व राम काज को पूरा करने के लिए मृत्यु लोक अर्थात पृथ्वी पर पवनदेव के तेज से बानर राज केसरी और रानी अंजनी के घर जन्म लिया, अत्यंत बलशाली होने के कारण नाम पड़ा महाबीर बजरंगबळी, बाल्यकाल से अद्भुत सिद्धियाँ होने व पवन पुत्र होने के कारण हवा में उड़ने व किसी भी लोक तक चले जाने की क्षमता उनमें थी, बाल्यकाल से ही उनहोंने कई राक्षसों का बध करना शुरू कर दिया था, सूर्य को आकाश में देख कर उसे निगल लिया तब सभी देववी देवताओं नें प्रार्थना कर उनसे सूर्य को मुक्त करने को कहा तो बजरंगबळी ने सूर्य को बाहर उगला, सूर्य भगवान् नें प्रसन्न हो कर उनको अपना शिष्य बना लिया, भगवान् सूर्य जैसे गुरु से ज्ञान पा कर महाबीर का सामना करने का साहस तीनों लोकों में किसी के पास नहीं रहा, लेकिन महाबीर बालक होने के कारण अक्सर तपस्यारत र्तिशी मुनियों से भी छेड़ छाड़ करते कुपित हो कर ऋषियों ने उनको शक्तियां भूल जाने का शाप दिया, क्षमा याचना पर ऋषियों नें कहा की समय अनुसार आवशयकता पड़ने पर तुम्हारी शक्तियां वापिस आ जाएँगी, जब राम जी को माता सीता का वियोग हुआ तब हनुमान जी से उनका मिलन हुआ, राम लक्ष्मण को कन्धों पर उठा कर वायु मार्र्ग से सुग्रीव तक ले गए,समय आने पर महाबीर ने लंका कूद कर पार कर ली, मार्ग में आने वाली बाधाओं व परीक्षाओं को धैर्य व नीति पूर्वक पूरण किया, अशोक वाटिका उजाड़ कर राक्षस वीरों को स्वर्ग पहुंचाया, मरणासन लक्ष्मण को बचाने के लिए हिमालय पर्वत से एक पहाड़ ही उठा कर ले आये, जब मेघनाद नें भगवान् राम और लक्षमण को नागपाश में बाँध लिया तब वैकुण्ठ जा कर गरुड़ जी को ले कर आये, युद्ध में कई वीरों को यमलोक पहुंचाया, सीता माता की सबसे पहले सुधि लाने वाले हनुमान जी ही थे, अयोध्या वासियों तक सीता राम के आगमन का उनहोंने ही समाचार पहुँचाया, रावण की कैद से शनि को मुक्त करवाया, जब शनि नें पिता से अभद्रता की तो, सूर्य के कहने पर शनि को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और भगवान् सूर्य के सामने उपस्थित कर दिया, सीता माता द्वारा दी गयी मोतियों की माला को तोड़ कर दरवारियों के कहने पर हन्मुमान जी नें सीना चीर दिया और अपने प्रब्न्हू राम सीता की युगल मूर्ती के दर्शन संसार को करवाए, लवकुश से युद्ध के दौरान बुद्धि संयम का अद्भुत परिचय दिया, बालकों के पाश में बांध गए, भगवान् राम जी के सरयू नाड़ी में सनान्न के बाद वैकुण्ठ लौटने पर भी महाबीर भक्तों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए पृथवी पर ही रहे, रामायणकाल के अतिरिक्त महाभारतकाल में जब भीम को अपने बल का घमंड हो गया तो हनुमान जी नें उनको कहा कि भीम तुम मेरी पूंछ उठा कर एक और कर दो, लेकिन पूरा प्रयास करने पर भी भीम पूंछ को हिला तक नहीं पाए, भगवान् श्रीकृष्ण जी और अर्जुन के रथ पर ध्वजा में स्वयं महाबीर उपस्थित रहे, इसीलिए युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ धमाके के साथ नष्ट हो गया, क्योंकि हनुमान जी नें रथ को छोड़ दिया था, कलियुग में भी हनुमान जी जीवित ही माने जाते है क्योंकि उनको चिरंजीवी होने का आशीर्वाद मिला है, महाभारत के अनुसार महाबीर हनुमान आज भी गंधमादन नाम के पर्वत पर रहते हैं, कहा जाता है की जहाँ जहाँ रामायण का पाठ होता है हनुमान जी सूक्ष्म रूप या प्रत्यक्ष रूप में जरूर वहां आते हैं, कलियुग में गोस्वामी तुलसीदास जी को राम लक्ष्मण जी के दर्शन भी हनुमान जी ने ही करवाए थे, हनुमान जी का इतना बल है की पातळ में अहिरावन को मार कर महाबीर हनुमान जी नें उसकी भुजाएं ही उखाड़ ली थी, ज्ञानियों में प्रथम रहने वाले, भक्तों को ज्ञान देने वाले, भूत प्तेतों का नाश करने वाली महाबीर का सुमिरन ही सब दुखों का नाश करने वाला है, नीच ग्रह यक्ष, किन्नर,किरात आदि सब इनके भय से थर-थर कांपते हैं, तो मान्गियें शीघ्र प्रसन्न होने वाले हनुमान जी से सकल मनोरथ, मानिये हनुमान जी को और शत्रुओंका रोगों का दुखों का नाश कीजिये, पाइए धन वैभव, नीच ग्रहों से मुक्ति पा कर सुखद जीवन का आशीर्वाद पाइए 
                                                              शत्रु नाश के लिए, रोग मुक्ति के लिए, रोजगार व व्यापार में लाभ के लिए,विद्या व बुद्धि के लिए, बलशाली शरीर के लिए,शनि मंगल राहु केतु जैसे नीच ग्रहों से मुक्ति के लिए, अकाल मृत्यु व दुर्घटना आदि से बचाव, हनुमान जी की कृपा पाने व दर्शन करने के लिए महामंत्र 

ॐ हं हनुमते नम:

हनुमान गायत्री

शाबर स्तुति मंत्र

स्तुति मंत्र

-कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज