शनिवार, 6 जुलाई 2024

गुप्त नवरात्रि महिमा

The world wide famous "Kaulantak Peeth" known for hidden knowledge and secrets has its own prime festival and its "Gupt Navaratri" and by its name one can known that this navaratri is a secret one. The sadhana procedure of this navaratri is not like the procedure of the main ones. This particular time is taken as very important. The Goddess of miracles "Kurukulla" or "Rakta Tara/Red Tara" with her full power indulges in the recreating this universe. In this time there is a huge karma kanda rituals and through "Kaul tradition", the worship of Goddess is carried out. In this time the worship of 64 yoginis, Ten Mahavidyas , Kritya, Matrika along with various other forms of Goddess is done with sadhana carried out too. The "Gupt Navaratri" is also called as Tantra time too. The "Gupt Navaratri" comes twice in a year and in the midst of playing of drums, tantric musical instrument the chakra puja , mandal pujan and awaran puja is carried out. A chakra puja in this time equals the fruit of worship of all gods and goddess. A mandal puja equals the woship of all universe. An awaran puja in this time takes the sadhak in the world of sadhana to its peak but a thing to be noted is that with whatever intention you do the sadhana it should be kept discrete. In this phase any inauspicious act etc the offence of the planets, intelligible time offence etc does not effect a sadhak. "Ishaputra-Kaulantak Nath" has told so many wish fulfilling mantras in his previous videos. For the sadhanas you can check his videos-Kaulantak Peeth Team-Himalaya.

गुप्त विद्या और रहस्यों के लिए विश्व भर में प्रसिद्द "कौलान्तक पीठ" का पर्मुख पर्व होता है "गुप्त नवरात्र" जैसा की नाम से ही विदित है की ये नवरात्र गोपनीय होते हैं। इसकी साधना आम तरीकों से नहीं होती। जैसा की प्रमुख नवरात्रों में होता है। ये समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चमत्कारों की देवी "कुरुकुल्ला" यानि "रक्त तारा" इस काल में अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ ब्रह्माण्ड को नवनिर्मित करती है। इस काल में व्यापक कर्मकाण्ड करते हुए "कौल परम्परा" अनुसार देवी की साधनाएँ होती है। इस काल में चौंसठ योगिनी, दस महाविद्या, कृत्या, मातृका सहित देवी के कई स्वरूपों की स्तुति की जाती है व साधना संपन्न की जाती है। इन गुप्त नवरात्रों को तंत्र काल भी कहा जाता है। ये गुप्त नवरात्र भी वर्ष में दो बार आते हैं। ढोल नगाड़ों व तांत्रिक वाद्य यंत्रों के बीच चक्र पूजन, मंडल पूजन व आवरण पूजन सम्पन्न किया जाता है। एक चक्र पूजा इस काल में, सभी देवी-देवताओं की पूजा के बराबर फलदाई होती है। एक मंडल पूजा समस्त ब्रह्माण्ड की पूजा के बराबर होती है। एक आवरण पूजा, साधक को साधना जगत में बहुत ऊँचा उठा देती है . लेकिन एक समस्या है की इस दौर में आप किस उद्देश्य से साधना कर रहे हैं ये गोपनीय ही रहना चाहिए। इस काल में कोई सूतक-पातक आदि ग्रह दोष, मुहूर्त दोष आदि नहीं लगते। "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" नें बहुत से इच्छापूरक मंत्रो के बारे में पहले ही विडिओ में बताया है। आप साधना के लिए विडिओ देख सकते हैं-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

सोमवार, 18 नवंबर 2019

हिमालय के प्रखरतम  महायोगी की महासमाधी
कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज योग क्षेत्र के चमकते सूर्य हैं...उनसा योगी युगों युगों में ही धरती पर जन्म लेता होगा...एक अद्भुत सा जीवन है महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज का....जिनको इसलिए समझना मुश्किल है क्योंकि उनका महामस्तिष्क मानवीय सीमाओं से परे हैं.....एक ओर  महायोगी कहते फिरते हैं कि वो बहुत ही साधारण से हिमालय के जोगी हैं......वहीँ दूसरी और उनका महाविराट स्वरुप देख कर साधक की आँखें फटी  की  फटी रह जाती है......पर यदि साधक हो तो!....क्योंकि भले ही कोई कुछ कहे लेकिन सच ये है कि कोई यदि इस दुनिया का सबसे बड़ा विचारक हो.......चिन्तक हो.......दुनिया उसे मानती हो....तो वो भी सत्य स्वरुप को नहीं समझ सकता.....मेरा ये दावा नहीं है कि महायोगी अवतार हैं....लेकिन साहित्यक भाषा में ऐसा मानव अवतारी ही माना और कहा जाता है.....योग के न जाने कितने रूपों को महायोगी जी जानते है...पर बात वही कि बताएँगे किसको..?...सामान तो है.....दुकानदार भी.....पर बिडम्बना ये है कि ग्राहक ही नहीं हैं.....शायद यही कारण है कि महायोगी हिमालय के सबसे बड़े योगी होने के बाद भी बिलकुल गौण हैं.....जिस हिमालय को महायोगी पर नाज है...जो हिमालय महायोगी को अपना पुत्र कहता है.....शायद उसी हिमालय ने महायोगी को इतना जटिल बना दिया कि उनको कोई समझ ही नहीं पा रहा....लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन प्रबुद्ध साधकों का एक बड़ा समूह महायोगी जी के रहस्यों से जुड़ कर...महासमाधि के महारहस्य को जान जायेगा....  



















भारत में ऐसे बहुत ही कम साधक होंगे जिनको बाल्यकाल से समाधि का अनुभव हुआ हो.....लेकिन सिद्ध परम्परा के चंद्रमा....कौलान्तक पीठ को वाममार्गी घृणित तंत्र मंत्र से मुक्ति दिलानेवाले महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी सहज समाधी को उपलब्ध मायाधारी योगी हैं....शायद उनको प्राकृतिक तौर पर ही समाधी लगती है....क्यूंकि वो समाधी के लिए कोई महाभ्यास नहीं करते.....मैंने उनके साथ जितना भी समय बिताया......तब यही जान पाया हूँ कि......एक दुबला पतला सुन्दर सा बालक महायोगी और पीठाधीश्वर  वो भी सबसे रहस्यमयी पीठ का..?....उस पीठ के हजारों नहीं लाखों दुश्मन है.....लेकिन जब वास्तविकता से पाला पड़ा तो मुझे सूर्य कहाँ से उदय होता है ये पता चला..!.....महायोगी जी की समाधी का तरीका देख कर तो मैं सोचता हूँ कि मुझ जैसे आदमी के लिए ये संभव ही नहीं हैं.....लेकिन महायोगी जी जब समझाते हैं तो लगता है कि मैं भी एक न एक दिन पहुँच ही जाऊँगा........कभी कभी समाज में महायोगी जी को देख कर बहुत हंसी आती है......कोई भी साधारण सा पुजारी.....पंडा....पुरोहित....बड़े बड़े तर्क महायोगी को दे कर ये जताने का प्रयास करते हैं कि वो ही सबकुछ जानते हैं महायोगी जी तो बच्चे हैं....और

 
सचमुच बच्चे ही हैं......उनको जबाब ही नहीं देते....बस हाथ जोड़े हाँ में हाँ मिला देते हैं.....ऐसे पुरुष में समाधी के ज्वलंत बीज देख कर भ्रमित हो जाना सहज ही है.....ये तो छोडिये ज्योतिष और समय साधना..!...काल पुरुष की महापूजा के महारहस्यों  को जानने वाले महायोगी जी का दुर्भाग्यबश कभी किसी ज्योतिषी से मिलना हो जाये तो समझ लीजिये महायोगी जी के राहु-केतु खराब हो गए....वो आते ही बताना शुरू कर देंगे मंगल से ये होता है...शनि ये कर देगा.... ये वाला रंग ऐसे हो तो ये प्रभाव होगा.....मेरा ये सब देख कर मस्तिष्क चकराने लगता है कि ये माजरा क्या है.....सनातन विद्याओं के रक्षक को ये क्या समझा रहे हैं.....उस पर अपनी की हुई मूर्खता पर इतने प्रसन्न होते हैं कि मानो कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो.....पहले अपने अहंकार से ही नहीं जीत सकते....तो धर्म को क्या जानेगे....यहाँ तक की कोई-कोई तो पंडा पुरोहित या कथित योगी तो ये समझाना शुरू कर देते हैं कि यदि आप इतने बड़े योगी है तो समाज में क्या कर रहे हैं....?.....जंगलों या हिमालय में ही रहना चाहिए...आपको इन चीजों से..........समाज से क्या लेना देना..?..

और अपनी महिमा में कहेंगे कि हमने पीएचडी की है.....विदेशों में जा कर लेक्चर देते है....वैदिक ज्योतिष योग आयुर्वेद के हम महापंडित हैं......अब आप ही बताइये  ऐसे में महायोगी जी क्या कर सकते हैं...?..दरअसल इस समाज में बैठे कुछ धर्म के ठेकेदारों से ये बर्दाश्त ही नहीं हो रहा कि एक सच्चा जानकार योगी हिमालय से उतर  कर लोगों तक सही सटीक जानकारियां पहुंचाए.....क्योंकि महायोगी जी सच कहेंगे और फिर ये झूठ बोल कर किसको लूटेंगे....वास्तु ग्रहों के नाम पर या योग को बेचने कहाँ जायेंगे.....इसमें केवल इनकी ही गलतियाँ नहीं हैं.....हमारी भी हैं कि जिसने योग किया ही नहीं उसको हम सबकुछ मान लेते हैं......और असली मिल जाए तो हम उसके साथ केवल फोटो खिचवाते हैं.....उससे ज्यादा कुछ नहीं.....लेकिन जो महायोगी जी की तरह सचमुच साधनारत हों.....वो समझ ही नहीं आते....जो बेचारा थोडा अध् कचरा अध्यात्म का ज्ञान रखता है....उससे कहियेगा कि हम कौलान्तक पीठ से हैं तो तुरंत कहेगा अच्छा वाममार्गी कौलाचारी....बेचारे ये ही नहीं जानते कि कौलान्तक पीठ का वास्तविक नाम कुलांत पीठ है......वो कुलांत पीठ जहाँ सिद्धों की भूमि है......इसी सिद्धभूमि में समाधि लगाते हैं कौलान्तक पीठाधीश्वर.....
जहाँ हिमाच्छादित पर्वत मधुर गीत गुनगुनाते हैं.....जहाँ झरनों की पवित्रता सम्मोहित करती है.....शीतल समीर में जहाँ अनहद नाद गूंजता हो....वो धरा महायोगी जी की ही तो है......शायद पत्थर पत्थर....पेड़ पेड़ भी महायोगी जी को पहचानता है......लेकिन संसार के लिए ये कहानी के सिवा कुछ भी नहीं.....जबकि हाथ कंगन को आरसी क्या...महायोगी जी अभी धरा पर ही हैं उनको देखना चाहिए.....पर नहीं! हम कष्ट नहीं उठा सकते....जब काम करना पड़ जाए तप करना पड़े तो महायोगी जी जैसे साधकों को करना चाहिए और जब केवल भगवान के बारे में मलाईदार बातें करनी हों तो वो लोग खुद उपस्थित.....जीभ हिलाना सरल जो हैं....ऊपर से भक्ति ने बिगाड़ कर रख दिया....वास्तव में भक्ति किसको उपलब्ध है? ये तो जानने में आने वाला है नहीं.....तो बैठे रहो! साधना करो नहीं! बस भक्ति हो गई.....लेकिन भला हो भाग्य का....क्योंकि मैं स्वयं ब्राह्मण  हूँ ये सारी बाते जो मैंने कहीं इसीलिए सटीक कहीं......क्योंकि मैंने भी महायोगी जी के साथ शुरू में कुछ ऐसा ही किया था....पर अब वास्तविकता समझ पाया हूँ.....आप कहेंगे की समाधि की बात क्यों नहीं कर रहा हूँ....?....मैं समाधी की ही बात कर रहा हूँ कि जबतक ऐसी कुत्सित वृत्तियाँ रहेंगी....साधक का कल्याण नहीं हो सकता....साधक को सूक्ष्म बुद्धि वाला होना चाहिए......

कालनेमियों की इस दुनिया में सब समझ में नहीं आता.....सच जानना बहुत जटिल है.....लेकिन समाधी की बात कहने से पहले मैं ये जरूर बताना चाहूँगा कि जबतक हम लोगों में अधकचरा ज्ञान होता हैं.....और उस ज्ञान के आधार पर जब हमारी आजीविका और नाम समाज में चल रहा होता है तो ऐसे में महायोगी जी जैसे योगी और वास्तविक पुरुष के आ जाने से भरण पोषण का प्रबंधन और समझ को अँधेरे में रख कर कमाया हुआ नाम डगमगाने लगता है....इसीलिए हम लोग महायोगी जी जैसे आदमी का विरोध करते हैं.....लोगों का तो पता है कि वो कुछ जानते ही नहीं...वहां हम जो कहेंगे वो ही मान्य है.....फिर लगातार झूठ बोलते बोलते आदत हो जाती है....फिर लगता है कि दुनिया ऐसे ही चलती है......फिर सच्चे लोगों के सामने भी कथित ज्ञान उबाले ले ही लेता है....इसमें हमारा भी कसूर नहीं है......पर मैं गुरुदेव महायोगी जी की अनुकम्पा से ही मुक्त हो सका हूँ.....शायद इसे ही जातिपाश.....और पशुपाश से मुक्ति कहते हैं.....महायोगी जी के दर्शन मुझे तब हुए थे जब वो कालेज मैं पढ़ भी रहे थे और शिष्यों को ज्ञान भी दे रहे थे.....तब तक तो महायोगी जी की ख्याति बहुत हो चुकी थी....उनकी चर्चाएँ ही सबके मुह पर होती थी.....कि वो चमत्कारी बालक है....उसके पास अनेकों सिद्धियाँ हैं......और भी न जाने क्या क्या...?




















लेकिन वो सदा ही इन बातों को नकारते रहे....वो मनोविज्ञान का अध्ययन कर रहे थे और साथ ही फिलासफी का भी...जब भी मैं कोई बात करता तो कह देते.....तुम्हें ये मानसिक बिमारी है.....बात बदलता तो कहते अब ये वाली मानसिक बिमारी है.....मैं जो भी करता वो कोई न कोई बिमारी ही होती....अब समझ गया हूँ कि मनोविज्ञान भी अपने आप मैं एक बिमारी ही है.....ठीक वैसी ही बात फिलासफी में भी थी......मैं कोई बात कहूँ तो कहेंगे कि ये नास्तिकतावाद का सिद्धांत है.....ये मार्क्सवाद का सिद्धात है....ये प्रलयवाद की सोच है.....लगता था कि जीवन एक फिलासफी ही है.....धर्म भी फिलासफी ही है.....फिर एक दौर आया जब महायोगी जी हमेशा लोगों से नास्तिकता कि बाते ही करते रहते........हर चीज उनको बस अन्धविश्वास ही लगती......हर बात में विज्ञान पदार्थ और प्रकाश अणु सूक्ष्म जीव रासायनिक परिवर्तन की ही बातें.....मुझे तो लगता था कि दुनिया के सबसे बड़े नास्तिक युवा के साथ मैं रह रहा हूँ.....लेकिन बाबजूद इसके साधना में वैसे ही....बहुत गहन तलों तक उतर कर प्रतिदिन ध्यानस्थ होना....मैं समझ नहीं पाता था.....लेकिन मैं तब ये जानता था कि मुझे देखते रहना है.....क्योंकि मायावी गुरुओं की थाह इतनी आसानी से नहीं मिलती.....यही मेरा संयम मेरे काम आया और मैं महायोगी जी को जान पाया.....जल्द्वाजी और मानवीय बुद्धि समाधि की महाशत्रु होती है.....इसीलिए ब्रह्म्प्रग्या होनी चाहिए.....यूँ तो बहुत बार मैंने महायोगी जी को समाधी की हालत में देखा है लेकिन हर बार उनका एक नया ही रूप देखने को मिलता हैं......हिमालय में बिचरण करते हुए मान लो कहीं कोई पेड़ या पत्थर या फिर कोई गुफा नजर आई तो वहां बैठ जाते हैं.....कुछ देर उस जगह की प्रशंसा करेंगे कुछ बातें करेंगे.......और कहेंगे की मैं कुछ देर ध्यान करना चाहता हूँ और बैठ गए....बस यदि चार पांच घंटे तक नहीं उठे तो बस समझ जाइये कि अब पता नहीं कब उठेंगे..?..हम सभी साथ रहने वाले समझ जाते हैं.....लेकिन समस्या तब हो जाती है जब महायोगी जी जंगल में कहीं भयानक जगह बैठ जाएँ......एक बार बर्फ से घिरे स्थान पर बड़े से पत्थर के नीचे बनी छोटी सी गुफा में महायोगी जी तेरह दिनों के लिए समाधिस्थ हो गए.....पहले ही दिन जब महायोगी जी वहां बैठे और लम्बे समय तक उठे ही नहीं तो साँसे गले में ही अटक गयी....रात हो रही थी जंगल में कडकडाती ठण्ड अब क्या करें.....तो भाई गुरुदेव जो महायोगी जी के शिष्य है नाम भी गुरुदेव ही है...है न हैरान करने वाली बात.?....और भाई हरीश जी ने जंगल से लकड़ियाँ बीन कर रात बिताई....मुश्किल से रात बीती क्योंकि साथ ही बहन मञ्जूषा जी भी थीं.......और पहली ही रात को जंगली कुत्ते काफी पास तक आ गए......मुश्किल से ही उनको भगा सके....दरअसल गलती हमारी थी हम ही जंगली कुत्तों के रास्ते में बैठ गए थे ये बाद के दिनों में पता चला.....लेकिन हम काफी नीचे थे और महायोगी जी अकेले समाधिस्थ.......तो बहन मञ्जूषा जी और भाई गुरुदेव लकड़ियाँ ले कर रात को महायोगी जी की गुफा में पहुंचे और सामने आग जला दी....ठण्ड से दांत कटकटा रहे थे.....महायोगी जी को छू कर देखा तो बिलकुल ठन्डे पड़ चुके थे नाख़ून हल्के नीले थे.....लेकिन शांत बैठे थे समाधिस्थ.....किसी तरह रात समाप्त होते ही बैग में पड़ी माता की चुनरियों और लाल कपडे से झंडियाँ बनायीं गयी और भाई गुरुदेव और हरीश ने टेंट और भोजन की व्यवस्था भी की....साथ ही महायोगी जी की गुफा के तीनो ओर झण्डों से मार्ग रोका गया ताकि भालू जैसे जानवर का अंदाजा दूर से ही लगाया जाए....




















महायोगी जहाँ बैठे थे वो गलेशियर वाली जगह थी ढलान था लेकिन भाई हरीश जी की मेहनत से बाद का काम बर्फ पर भी पूरा हो गया......हमने तीन टेंट लगा लिए एक टेंट हमने महायोगी जी की गुफा के पास लगा लिया.....जो बहत ही छोटा टेंट था.....जिसमें दो आदमी भी मुश्किल से ही आ सकते थे......उस टेंट को भी जबरदस्ती वहां लगाया गया....उसके लिए भी जगह नहीं थी.......लेकिन एक आदमी को तो महायोगी जी की रक्षा के लिए वहां रहना ही था.....इसलिए ये टेंट जरूरी था.......करीब 200मीटर नीचे बेस केम्प लगाया गया था......दो आदमी वहां रह कर लकड़ी पानी भोजन की व्यवस्था करते.......भले ही महायोगी जी समाधिस्थ थे लेकिन बाकी तो भूखे नहीं रह सकते थे न.......खाली समय में हम भजन गाते जंगल घूमते.....सफाई का ध्यान रखते और कोशिश रहती कि ज्यादा से ज्यादा समय महायोगी जी के निकट ही बैठ कर ध्यान किया जाए......लेकिन थोड़ी देर में ही सबकी छुट्टी हो जाती....हम थक जाते लेकिन महायोगी एक ही आसन में रहते,सूरज निकलता और डूब जाता.....आधी रात के बाद तो ठण्ड के कारण नींद ही नहीं आती थी सुबह होने का ही इन्तजार करते रहते कि कब सूरज निकलेगा.....और इस कडकडाती ठण्ड से राहत मिलेगी......
आपको लग रहा होगा कि जंगल तो है पेड़ काट कर आग क्यों नहीं सेक लेते.....तो इसका जबाब यह है कि महायोगी जी के अनुसार प्रकृति को हानि नहीं पहुंचानी है...केवल सूखी लकड़ियाँ ही जलाई जाएँ जबतक कि बहुत ही ज़रूरी न हो जाए....तो उनके नियम का पालन करना था.....सारी लकडियाँ तो बर्फ में दबी हुयी थी....ऐसे में सारा दिन कोई न कोई लकड़ियों का ही प्रबंध करता रहता....फिर दूर से बर्फ पर उठा कर लाना और भी बड़ी चुनौती.....एक तो आक्सीजन की कमी उरार से सीधी चढ़ाई....पीठ पर लकडियाँ......हमारी तो आँखें और जीभ ही बाहर निकल आती.....बस केवल एक सुख था दिन चढ़ते ही बर्फ कुछ पिघल जाती...पानी के छोटे छोटे झरने बहने लगते....तो पानी नसीब हो जाता....लकड़ियों की बार बार इसलिए भी याद आ जाती है....क्योंकि लकड़ियाँ एक नहीं दो-दो जगहों के लिए लानी पड़ती थी......महायोगी जी की गुफा तक पहुंचाना मतलब बहादुर पुरुष होना.....बीस बार तो बर्फ पर फिसल कर गिरते ऊपर से गिरती लकड़ियाँ.......तो रोना ही आ जाए.....पर जब देखते कि बिना खाए पिए महायोगी जी एक ही आसन में दिन रात वो भी बिना सोये बैठे हैं.....!....तो जोश आ जाता कि ये सेवा का अवसर हमें नहीं चूकना है.....तब लकड़ियाँ फिर कंधे पर होती और हांफते हांफते सब गुफा तक पहुँच ही जाते.....



















सोचता हूँ कि महायोगी जी न जाने किस मिटटी के बने हुए हैं....समाधी में बैठ जाएँ तो बैठ जाएँ...पांच दिन.....दस दिन....पंद्रह दिन....और शांत......ऐसा लगता है कि मानो मूर्ती बैठी हो....लेकिन समाधी के दौरान भी चेहरे के हाव भाव बदलते रहते हैं....जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अभी किस तरह की अनुभूति महायोगी जी को हो रही है....आप यदि इन फोटोस को गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि उनकी भाव भंगिमाएं बदल रही होती हैं......एक दिन तो हद हो गयी जंगली कुत्ते बेस केम्प के बीच में से गुजर गए....और चंडीगढ़ से एक टीवी चैंनल के रिपोर्टर और केमरा पर्सन भी वहां आ पहुंचे....ये तो किस्मत ही थी कि बेस में ही दो टेंट लगे हुए थे तो रहने की कोई समस्या नहीं थी....अब वो महायोगी जी को लगातार रिकार्ड करने लगे.....तो बिजली कहाँ से आती....फिर हरीश जी को जनरेटर की व्यवस्था के लिए जाना पड़ा......सड़क तक तो जनरेटर आ गया लेकिन वो बहुत ही भारी था.....उसे लाने में भाई गुरुदेव जी ने सहायता की......वो दमदार आदमी हैं.....भगवान की माया देखिये कि ये ठीक ही हुआ कि बेस केम्प इतनी दूर था की जनरेटर की आवाज गुफा तक नहीं पहुंचती थी.....अब बहन मञ्जूषा पर खाना बनाने और बीच-बीच में गुरु जी को देखते रहने का जिम्मा और बढ़ गया..........हैरानी की बात ही थी कि गुफा के आस पास कहीं भी मोबाईल फ़ोन का सिग्नल नहीं था पर बेस केम्प में था.....अब तो जनरेटर होने से और मोबाईल फ़ोन होने के कारण लोगों के फ़ोन भी आने लग गए तो मञ्जूषा जी उसमें भी व्यस्त हो गयी....जंगल में भी काम ही काम हो गया....






































हालाँकि अब हम बहुत लोग वहां हो गए थे पर समस्याएं कम नहीं हुई....बर्फबारी शुरू हो गयी....हालाँकि जिस दिन महायोगी जी समाधी में बैठे थे सूर्य उसी दिन तक था.....रात को मौसम खराब हुआ और बरसता ही रहा....जबतक महायोगी जी समाधी से नहीं उठे तबतक मौसम खराब ही रहा.....लेकिन अब सबको लकड़ियों की  चिंता हो गयी......तो ऐसे मौसम में भी भाई गुरुदेव जी लकड़ियाँ लाने जाते थे और गीली लकड़ियों को आग के नजदीक सूखने रखा जाता....बर्फ में खाना बनाना बर्तन धोना हमारा नहाना मुश्किल हो गया......बैसे तो कोई डरता नहीं है पर ऐसी जगह डर तो लगता ही है.....इस लिए पत्थर पर हनुमान जी कि मूर्ती बना कर स्थापित कर ली और उनसे प्रार्थना करते कि जंगली जीवों से हमारी रक्षा करें.....काफी दिनों से भोजन पानी के बिना बैठे महायोगी जी का रंग धीरे-धीरे काला पड़ने लगा......होंठ फट गए.......सबको फिर महायोगी जी की ही चिंता होने लगी.......तो महायोगी जी के नजदीक आग बढ़ा दी गयी.......अब माइनस तापमान में ठंडी हवा में मह्योगी जी की सुरक्षा ने सबकी नींद उड़ा दी.....अब गुफा वाला टेंट काम आया एक आदमी वहीँ सोता और बीच-बीच में आग जलाता जाता.....लेकिन ठण्ड में मानो आग को भी ठण्ड लग रही हो वो जलती ही नहीं थी.....बहुत ही मुश्किल से आग बनाये रखी जाती...महायोगी जी की हालत बहुत ख़राब दिख रही थी सब भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि काश ये समाधी जल्दी टूट जाए.....पर कोई लाभ नहीं....
























































सोचता हूँ कि इस बार तो अपेक्षाकृत महायोगी जी को काफी निचले स्थान पर स्वतः समाधि लग गयी थी लेकिन बहुत ऊँची चोटियों पर क्या होता होगा..?...सोचता हूँ महायोगी जी को किसी दुष्ट की नजर न लगे क्योंकि स्वयं महायोगी जी समाज से दूर दूर रहते हैं जिसका कारण बताते हुए वो कहते हैं कि सत्य का मार्ग असत्य को आकर्षित करता है.....सच्च झूठ को आकर्षित करता है......सज्जन दुर्जन जो सहज ही आकर्षित करते हैं.......योगी अक्सर भोगियों को आकर्षित करते हैं......तो बचना मुश्किल होता है......क्योंकि मकड़ी का सुन्दर दिखने वाला जाल परमात्मा का नहीं मौत का संकेत होता है.....महायोगी जी को समाज में बिलकुल नहीं जाना चाहिए बस इसी तरह अद्भुत जीवन जीना चाहिए.....हिमालय की कंदराओं में उनका वास्तविक रूप देख कर सुखद अनुभूति होती है......जब महायोगी जी समाधी में रहे तो टीवी रिपोर्टरों ने उनकी लगातार विडिओ बनायी जो उनके पास है....हमारे पास विड़ोज नहीं हैं केवल कुछ ही फोटोज हैं.....लेकिन बीच में भाई रमेश जी भी कुल्लू से समाधी वाली गुफा तक आये थे.....उनहोंने महायोगी जी की और समाधी गुफा के आस पास की कुछ तस्वीरें अपने मोबाईल से ली वो मेरे पास भी हैं आपके लिए मैं यहाँ दुर्लभ चित्र प्रस्तुत कर रहा हूँ......



              















मुझे  महायोगी जी की बात 100 % ठीक लगती है कि कोई कहता है ये सब कुछ झूठ है.....तो सचमुच उसके लिए झूठ ही हैं.....जिसने रेगिस्तान नहीं देखा होता....उसे रेगिस्तान की पूरी कहानी ही झूठी लगती हैं.........महायोगी जी कहते है कि कथित ज्यादा पढ़े लिखे लोग इतने अभद्र होते है कि शिक्षा को भी शर्म आ जाए...जिसका कारण होता है अज्ञान......वे साक्षर हो सकते हैं....पर ज्ञानी नहीं.....महायोगी जी बचपन से समाधी में बैठते थे.....एक दिन किसी डाक्टर से मुलाक़ात हुयी......डाक्टर महोदय ने कहा महायोगी जी इतने-इतने दिनों एक ही स्थान पर आपके बैठने का कारण ये है कि आप मनोरोग से गुजर रहे हैं आपको एक योग्य चिकित्सक की जरूरत है......डाक्टर के सझाने से महायोगी मनोचिकित्सक के पास जाने को तैयार हो गए......महायोगी जी हमसे कहने लगे कि डाक्टर बेफिजूल तो कोई बात कहेगा नहीं......चेक करवा लेते हैं......तीन महीने तक मनोचिकित्सक से रोज मिलते उनकी बातें सुनते.....उनकी दी अंग्रेजी दवाइयां भी खाते....लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ....बल्कि दवाओं के सेवन से पाचन तंत्र जरूर गडबडा गया.....फिर मनोचिकित्सक ने उनको और बड़े मनोचिकित्सक से मिलने कि सलाह दी......लेकिन हम दुखी हो चुके थे.....रोज रोज डॉक्टर के चक्कर नहीं लगा सकते थे......और हमें तो महायोगी जी पर गुस्सा आ रहा था कि किस मूर्ख कि बातों में आ गए....फिर महायोगी जी ने केवल इतना कहा कि इस चिकित्सक को चिकित्सा का रोग हो गया है......मैं ऐसे ही पढ़े लिखे रोगी को नजदीक से देखना सुनना चाहता था.......जिस तरह उदाहरण से महायोगी जी ने समझाया वो मैं नहीं बता सकता लेकिन सचमुच समझ आ गया कि जो कभी-कभी दूसरों को सलाह दे रहे होते हैं वो भी स्वयं एक रोग से ही जूझ रहे होते हैं.....और हैरानी की बात कि जिन्होंने समाधी कभी नहीं लगाई वो ही अक्सर समाधी पर टिप्पणियां करने बैठते हैं......जो धर्म को नहीं जांनते वो ही धर्म को समझाने बैठ जाते हैं......हम लोगो ने समाधी की स्थिति में किसी को बहुत निकट से देखा ये हमारा गौरव है.......समाधी में क्या होता है ये तो महायोगी जी ही जानते हैं पर मैं केवल ये बता सकता हूँ कि लगभग तेरह दिनों बाद सुबह 8 : 15 पर महायोगी जी महासमाधि से उठे......और उनहोंने सबको आशीवाद दिया लेकिन वो बहुत कमजोर हो चुके थे.....सबने वो एतिहासिक पल देखा कि कैसे महायोगी समाधी में रहे और उठे......सबकी आँखों में आंसू थे......बेस केम्प तक भाई गुरुदेव महायोगी जी को ले कर आये....साथ थी टीवी चैनल की टीम और मंजुषा जी ने उठते  ही महायोगी जी को गुनगुना पानी पिलाया और शहद के तीन चम्मच खाने को दिए.....करीब तीन घंटों के बाद महायोगी जी ने कुछ खाया तब तक सभी भजन गाते रहे...वो भी जोर-जोर से.......आज भी सारा दृश्य आँखों में घूम जाता है......ये क्षण भूले नहीं जा सकते.......बस मुझसे और नहीं बताया जाता.....समाधि के फोटो की गेलरी भी शायद जोड़ी जाएगी.....तो वहां फोटोज देखना न भूलें.....केवल एक या दो विड़ोस ही समाधी की हैं जो यू टयूब में है आप देख सकते हैं......मैं अभी नया साधक हूँ ज्यादा मर्यादाएं नहीं जानता....यदि इस ब्लाग को लिखते समय कोई अभद्रता हो गयी हो.......या फिर कोई गलती हो गयी हो तो कृप्या आप सभी मुझे मूढ़ समझ कर क्षमा कर दें......बहुत बहुत धन्यवाद 
       -रविन्द्र शर्मा

सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

ईशपुत्र ने "मृत्यु विचार" ग्रंथ का रहस्य अनावरित किया
१)क्या मौत का कोई स्वाद होता है ?
२)क्या मौत का कोई रंग होता है ?
३)क्या कोई मौत का अनुभव जानता है ?
४)क्या मौत का दिन जाना जा सकता है ?
५)क्या मौत को टाला जा सकता है ?
कौलान्तक पीठ        
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला की सबसे बिबादास्पद पाण्डुलिपि को पढ़ने में आखिरकार सफलता मिल गई है....ये दावा हिमालय की सबसे बड़ी पीठ कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी ने किया है....गौरतलब है की कुल्लू की बंजार घाटी में एक "मौत की मनहूस पाण्डुलिपि"थी जो भोज पत्र पर लिखी गयी थी.....जिसके  रचयिता महर्षि पुण्डरीक को माना जाता है.....इस ग्रन्थ का नाम है...."मृत्यु विचार".....इस ग्रन्थ में मृत्यु को प्रधान विषय रख कर इसकी रचना की गयी थी....ये दुर्लभ पाण्डुलिपि कई तांत्रिको के पास से हो कर गुजरी.....लेकिन दुर्भाग्य ये रहा की ये पाण्डुलिपि जहाँ जहाँ गयी.....वहां वहां उन लोगो की बीमारी अथवा दुर्घटना के कारण मौत होती रही....तो किसी के परिवार ही उजाड़ गए....इस कारण पाण्डुलिपि बदनाम हो गयी...बंजार क्षेत्र के ही एक बुजुर्ग
 मानव की दो मुहीं मृत्यु को दर्शाता चित्र  
 चित्र में अकाल और सकाल मृत्यु सर्प बने हैं  
के पास इस पाण्डुलिपि की एक प्रति प्राप्त हुई है.......माना जाता है की ब्रिटिश काल में कुल्लू क्षेत्र में लोग बहुत कम पढ़े लिखे थे.....लेकिन कुछ एक ब्राह्मण और ठाकुर ही थोडा बहुत अक्षर ज्ञान रखते थे.....सन 1835में इस अनोखी पाण्डुलिपि की 5 प्रतियां बनायीं गई थी....लिकिन वो भी वैसी ही मनहूस निकली....लोगो ने उन पांडुलिपियों को भी तांत्रिको के मरते ही उनके साथ जला डाला......लेकिन किसी तरह बंजार घाटी में एक बृद्ध के पास एक पांडुलिपि बची रह गयी...कुछ समय पूर्व उनका देहाबसान हो गया.....वे निसंतान ही थे व पत्नी काफी पहले ही स्वर्गवासी हो चुकी थी...उनके शरीर छोड़ते ही.....उस पाण्डुलिपि को भी आग में जलाया जा रहा था.....क्योंकि महायोगी जी पहले से जानते थे की उनके पास वो पाण्डुलिपि है...और लोग उस पाण्डुलिपि के साथ क्या करने वाले हैं....इसलिए तुरंत महायोगी कुछ योग्य शिष्यों सहित बंजार पहुंचे लेकिन तब तक पाण्डुलिपि को आग के हवाले कर दिया गया था.....लेकिन सौभाग्य बश पाण्डुलिपि पूरी जलाई न जा सकी....उसका कागज खाफी मोटा होने के कारण
 ज्योतिषीय आधार पर मृत्यु की कुंडली  
 12 घरो में कौन सी मृत्यु होगी ये बताया गया है  
पाण्डुलिपि के कुछ पन्ने काफी हद तक सुरक्षित ही रहे......कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज ने वो आधी जली हुई पांडुलिपि अपने अधिकार में ले ली....क्योंकि पाण्डुलिपि को मनहूस माना जाता है इस लिए महायोगी जी ने पांडुलिपि को हिमालय के जंगल में एक गुफा में छुपा कर सुरक्षित रक्ख लिया....और पाण्डुलिपि के कुछ फोटो खींच कर उनपर अनुसंधान शुरू कर दिया.....यहाँ पाण्डुलिपि वाले बुजुर्ग का नाम इस लिए नहीं दिया जा रहा की लोग उनके सम्बन्धियों को बुरी नजर से देखना शुरू कर देंगे....साथ ही हैरान कर देने वाली बात तो ये है की जिस बुजुर्ग के पास ये पांडुलिपि थी वो तो इसे पढ़ना जनता ही नहीं था....उनके सम्बन्धियों के बच्चे पाण्डुलिपि को खेल का सामान समझते थे.....क्योंकि ये लकड़ी  के एक डब्बे में राखी गयी थी...बच्चों नें पाण्डुलिपि पर लगभग मिट चुके पीले रंग पर पेंसिल से पेंटिंग कर डाली.....जिससे पाण्डुलिपि को आंशिक नुक्सान पहुंचा है...मूल स्वरुप ख़राब सा लग रहा है......महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के अनुसार ये पांडुलिपि बंजार घाटी की स्थानीय बोली में व कुछ संस्कृत शब्दों का मिश्रण कर तान्करी भाषा में लिखी गयी है....महायोगी जी ने बताया की पाण्डुलिपि में मृत्यु को ईश्वर के बराबर का बताया गया है......पाण्डुलिपि कहती है की किसी भी व्यक्ति या पदार्थ की आयु निश्चित तो नहीं है....लेकिन मौत का दिन स्थान बार और मृत्यु का तरीका जाना जा सकता है.....जिसके लिए ज्योतिष और तंत्र  साधना का कुछ योगिक बिधान बताया गया है.....कुंडली के भावों के द्वारा मृत्यु को जानना.....तंत्र साधना द्वारा मौत को देखना.....मौत का पूर्वानुमान की बिधि आदि तत्व इसमें हैं...साथ ही अकाल मृत्यु और सकाळ मृत्यु यानि की पूरण मृत्यु के समय को तलने की बिधि भी इसमें बताई गयी है.....मौत के समय कैसा अनुभव होता है...मौत का स्वाद और सुगंध कैसी होती है ये भी बरणित किया गया है....मौत का अनुभव बच्चा पैदा करने के बाद का अनुभव जैसा और कई दिनों से रुके हुए मल को त्यागने के बाद के अनुभव जैसा...अमावस मैं चमकते दीप जैसा या बादलों से निकलते प्रकाश जैसा और हल्दी और कुमकुम के मिलेजुले रंग जैसा साथ ही बेहोशी जैसी गहरी नींद सा बताया गया है....
 मृत्यु के समय कैसा अनुभव होता है चित्र   
dमृत्यु को बहुत मीठा अनुभव बताया गया है  
अकाल मृत्यु से बचाने के यन्त्र.....मन्त्र पूजा....बताई गयी है....इस संसार की आयु कितनी होगी.....चाँद  तारो की उम्र कितनी है......दुनिया को मृत्यु  ने कितना समाप्त कर दिया है जैसी रोचक तत्वों की जानकारी  इसमें हैं.......कौलान्तक पीठाधीश्वर कहते है की......ये देख कर हैरानी होती है की मृत्यु और संसार के विषय को........मानव की मृत्यु जैसे विषयों को पूर्वजों ने कितनी गूढता से समझा है......इस पुस्तक में जीवन को आसमान में चमकने वाली बिजली जितना छोटा क्षणभंगुर बताया गया है......और इस मृत्यु को जीतने के लिए मनुष्य को उपाय करने की व ईश्वर की उपासना की सलाह दी गयी है......महायोगी इस पाण्डुलिपि को मनहूस नहीं मानते....उनहोंने लोगो से अपील भी की है की कृपया देश की अमूल्य धरोहरों को आग में न जलाया जाए....यदि आपके पास इस तरह के ग्रन्थ हों तो उन्हें कौलान्तक पीठ के हवाले कर दिया जाए......पाण्डुलिपि के अनुसार अभी सृष्टि बहुत ही नयी है....सृष्टि को रहस्यमय काले अदृशय सर्प के मुख से निकलता हुया दिखाया गया है......और वही सर्प अंत में सृष्टि को निगल जाता है.....पाण्डुलिपि के अनुसार सृष्टि में अनेको लोक हैं जिन्हें मृत्यु  की काली अदृश्य सर्पिनी ही उगलती व निगलती है...
 सृष्टि चक्र को दर्शाता चित्र दो आकृतियों सहित  
 ऋषि वशिष्ठ का जिक्र करता पाण्डुलिपि का पृष्ठ  
अभी पृथ्वी को सर्पिनी ने सूर्या चन्द्र सहित 827 सुर्सोत पहले ही उगला है......एक सुर्सोत की आयु लगभग 98हजार वर्ष होती है तो अभी सूर्या चंद्रमा की आयु लगभग 8,10,46,000 वर्ष ही है.......हालाँकि महायोगी इस समय अवधि को अभी सटीक नहीं मान रहे.....क्योंकि कितने वर्षों का एक सुर्सोत होता है ये अभी भी ठीक ठीक मालूम नहीं हो सका है....महायोगी जी की गन्ना के अनुसार एक सुर्सोत की आयु 1 लाख 19 हजार साल ह्जोती है....लेकिन प्राचीन मान्यताएं सुर्सोत की आयु 98 हजार साल ही बताती हैं.....हमारी पृथ्वी के ऊपर 32 पृथ्वी मंडल बताये गए हैं......और नीचे 52 पृथ्वी मंडल बताये गए हैं.....जिन सबको काल की अदृशय सर्पिनी ने एक साथ ही उगला था....और इस पृथ्वी सूर्य चन्द्र को काल की ये अदृशय अनंत सर्पिनी 27291सुर्सोत पूरे होने पर निगल लेगी......लेकिन मानव इस समय अवधि से पहले ही मृत्यु के मुख में चले जायेंगे...सृष्टि की ऐसी गणना अनूठी है.....वहीँ दूसरी और कलियुग में मानव को कृत्रिम भ्रमजाल वाला जीवन जीते हुए दिखया गया है....ऐसा जीवन जो भगवन ने नहीं बनाया.....वो मानव देत्यों द्वारा रचित होगा....जिसकी कैद में मानव स्वयं को भूल जाएगा की वास्तब में जीवन क्या है.....ये मानव के अंत की शुरुआत होगी......इस पाण्डुलिपि को ऋषि पुण्डरीक द्वारा रचा गया है....इसमें ऋषि वशिष्ठ,विशवामित्र,नागो का भी वर्णन है......हालाँकि ये प्रारंभिक जानकारियाँ ही हैं....पर शायद ज्यादा पता भी नहीं चल पायेगा....क्योंकि पाण्डुलिपि पूरी नहीं है....फिलहाल पाण्डुलिपि को खंगाला जा रहा है.......ताकि इसमें छिपे सारे  रहस्य सामने  निकल कर आ सकें.....फिलहाल पाण्डुलिपि सुरक्षित हाथो में पहुँच गयी है.....सनद रहे की महायोगी को पांडुलिपियों से जुड़े शोध कार्यों के कारण जाना जाता है.....देश के प्रमुख समाचार पत्रों में महायोगी जी के अनेक शोधों की जानकारियाँ  छप चुकी हैं...और देश के कई बड़े नामी टीवी चेनलो पर महायोगी जी के कार्यक्रम लगातार प्रसारित होते रहते हैं.....