शनिवार, 6 जुलाई 2024

गुप्त नवरात्रि महिमा

The world wide famous "Kaulantak Peeth" known for hidden knowledge and secrets has its own prime festival and its "Gupt Navaratri" and by its name one can known that this navaratri is a secret one. The sadhana procedure of this navaratri is not like the procedure of the main ones. This particular time is taken as very important. The Goddess of miracles "Kurukulla" or "Rakta Tara/Red Tara" with her full power indulges in the recreating this universe. In this time there is a huge karma kanda rituals and through "Kaul tradition", the worship of Goddess is carried out. In this time the worship of 64 yoginis, Ten Mahavidyas , Kritya, Matrika along with various other forms of Goddess is done with sadhana carried out too. The "Gupt Navaratri" is also called as Tantra time too. The "Gupt Navaratri" comes twice in a year and in the midst of playing of drums, tantric musical instrument the chakra puja , mandal pujan and awaran puja is carried out. A chakra puja in this time equals the fruit of worship of all gods and goddess. A mandal puja equals the woship of all universe. An awaran puja in this time takes the sadhak in the world of sadhana to its peak but a thing to be noted is that with whatever intention you do the sadhana it should be kept discrete. In this phase any inauspicious act etc the offence of the planets, intelligible time offence etc does not effect a sadhak. "Ishaputra-Kaulantak Nath" has told so many wish fulfilling mantras in his previous videos. For the sadhanas you can check his videos-Kaulantak Peeth Team-Himalaya.

गुप्त विद्या और रहस्यों के लिए विश्व भर में प्रसिद्द "कौलान्तक पीठ" का पर्मुख पर्व होता है "गुप्त नवरात्र" जैसा की नाम से ही विदित है की ये नवरात्र गोपनीय होते हैं। इसकी साधना आम तरीकों से नहीं होती। जैसा की प्रमुख नवरात्रों में होता है। ये समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चमत्कारों की देवी "कुरुकुल्ला" यानि "रक्त तारा" इस काल में अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ ब्रह्माण्ड को नवनिर्मित करती है। इस काल में व्यापक कर्मकाण्ड करते हुए "कौल परम्परा" अनुसार देवी की साधनाएँ होती है। इस काल में चौंसठ योगिनी, दस महाविद्या, कृत्या, मातृका सहित देवी के कई स्वरूपों की स्तुति की जाती है व साधना संपन्न की जाती है। इन गुप्त नवरात्रों को तंत्र काल भी कहा जाता है। ये गुप्त नवरात्र भी वर्ष में दो बार आते हैं। ढोल नगाड़ों व तांत्रिक वाद्य यंत्रों के बीच चक्र पूजन, मंडल पूजन व आवरण पूजन सम्पन्न किया जाता है। एक चक्र पूजा इस काल में, सभी देवी-देवताओं की पूजा के बराबर फलदाई होती है। एक मंडल पूजा समस्त ब्रह्माण्ड की पूजा के बराबर होती है। एक आवरण पूजा, साधक को साधना जगत में बहुत ऊँचा उठा देती है . लेकिन एक समस्या है की इस दौर में आप किस उद्देश्य से साधना कर रहे हैं ये गोपनीय ही रहना चाहिए। इस काल में कोई सूतक-पातक आदि ग्रह दोष, मुहूर्त दोष आदि नहीं लगते। "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" नें बहुत से इच्छापूरक मंत्रो के बारे में पहले ही विडिओ में बताया है। आप साधना के लिए विडिओ देख सकते हैं-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

देवी कुरुकुल्ला आरती
'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करता है 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' और 'आनंदा भैरवी' की आवाज में देवी कुरुकुल्ला रक्त तारा' की आरती। इस आरती को पहाड़ी शैली' में ही यथावत रखा गया है। समस्त भूत-प्रेत, ऊपरी बाधाओं की रोक, नकारात्मक शक्ति की रोक, समस्यायों के निवारण, कृत्या परिहार, ग्रह बाधा निवारण सहित देवी की परम कृपा हेतु आरती श्रवण व गायन श्रेष्ठ उपाय है। आपके जीवन में मंगल हो, दिव्य प्रकाश हो और देवी की परम अनुपम कृपा हो इसी इच्छा के साथ, आपकी सेवा में अर्पित है ये आरती कौलान्तक पीठ टीम- हिमालय ।
देवी कुरुकुल्ला की आरती सुनने के लिए क्लिक करे



तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी।
जय जय रासरते, जय जय रासरते। 03
तू तारा तू तोतला कुल्ला कुरुकुल्ला, तू तारा तू तोतला कुल्ला कुरुकुल्ला।

तंत्र मंत्र है सारे तुझसे, 
तंत्र मंत्र है सारे तुझसे।
योग जप तप सिद्धि और भक्ति, योग जप तप सिद्धि और भक्ति।
भोग मोक्ष है सूत्र तेरे, 
भोग मोक्ष है सूत्र तेरे । 
तू ही आदिशक्ति !

तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी।
जय जय रासरते, जय जय रासरते। 02
तू तारा तू तोतला कुल्ला कुरुकुल्ला, तू तारा तू तोतला कुल्ला कुरुकुल्ला।

वेद पुराण है बालक तेरे, 
वेद पुराण है बालक तेरे।
सहस्त्रभुजा देवी कुरुकुल्ला, 
सहस्त्रभुजा देवी कुरुकुल्ला।
रक्त वर्ण तेरा पीत वर्ण है, 
रक्त वर्ण तेरा पीत वर्ण है।
माया रूप विकुल्ला!

तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी।
जय जय रासरते, जय जय रासरते। 02
तू तारा तू तोतला कुल्ला कुरुकुल्ला, तू तारा तू तोतला कुल्ला कुरुकुल्ला।

आगम निगम प्रदात्री तू ही, 
आगम निगम प्रदात्री तू ही।
शिव संग रास रचाती, 
शिव संग रास रचाती।
परम तंत्र स्वतंत्र तू ही, 
परम तंत्र स्वतंत्र तू ही।
वर अभिष्टदात्री !

तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
जय जय रासरते जय जय रासरते।
तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
तू कौलाचारिणी तू समयाचारिणी,
जय जय रासरते जय जय रासरते।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

जब ईशपुत्र को आदि जगदम्बा के साक्षात् दर्शन हुए
ये बात भी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि महायोगी जी को केवल बारह वर्ष कि आयु में ही गुरु पदवी पर महागुरु ने बिठा दिया था....और तभी से कुछ साधक महायोगी जी के शिष्य बन गए और उनके साथ रहने लगे....कुछ साधू और सन्यासियों ने तो ये दावा तक किया कि वो महायोगी जी के पूर्व जन्मों के शिष्य हैं....महायोगी जी के घर के सामने जमघट लगा रहता....परिवार को महायोगी जी कि स्कूली शिक्षा कि चिंता होती रहती थी....लेकिन कोई उपाय ही नहीं था...इन साधकों को परिवार वालों ने गाली-गलौच कर भगाया भी लेकिन......दो-तीन दिनों में ही फिर आ जाते...समस्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी.....एक ओर जहाँ कुल्लू में स्थित देवताओं के सामने होने वाली बलि प्रथा को रोकने के प्रयास के कारण जहाँ सामाजिक रूप से महायोगी के अनेक शत्रु तैयार हो गए थे.....वहीँ क्षेत्र का जातिवाद महायोगी के परिवार पर भारी पड़ने लगा......महायोगी जी के कई शिष्य जाति में बहुत छोटे होने और स्वयं महायोगी जी के उच्च कुल में होने के कारण साथ सहभोज एवं पूजन, यज्ञ, साधना का विरोध होने लगा....महायोगी जी के परिवार को विरादरी कि चुनौतियों का सामना करना पड़ा.....जिस कारण महायोगी जी ने घर छोड़ कर बाहर रहने का निर्णय कर लिया....ताकि परिवार को कोई परेशानी न हो.........यही सोचकर महायोगी शिष्यों सहित "बालीचौकी "नाम कि जगह पर ही माता काली कि प्राचीन गुफा में रह कर तप करने लगे....यहीं महायोगी जी को "माता रानी" ने साधारण स्त्री के रूप दर्शन दिए.....और महायोगी जी से प्रसाद मांग कर ले गयीं.....लेकिन काफी देर तक उनको पता ही नहीं चला....जब तक भान होता देर हो चुकी थी.....अब तो इस घटना ने महायोगी जी पर नया जनून सवार कर दिया कि मुझे मातारानी से मिलना है.....महायोगी जी ने भोजन त्याग कर वहीँ साधना करनी शुरू कर दी......मंत्र जप करते रहते......यज्ञ करते रहते......लेकिन बात न बन सकी.....महायोगी कमजोर होते चले गए....उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा....
कहा जाता है कि यक्षिणियों....की सिद्धि महायोगी को जन्मजात थी....जोगिनियों की कृपा से महायोगी हिमालय के सबसे बड़े योगी बने थे......कौलान्तक पीठ की अधिष्ठात्री देवी माता कुरुकुल्ला की सिद्धि ने महायोगी को मानवीय सीमाओं से परे कर दिया था........पर माया थी कि महायोगी को अस्थिर किये जा रही थी....महायोगी जी कि ऐसी हालत हो गयी कि अब वो बैठ ही नहीं प् रहे थे.....माता-पिता भी बेटे कि ऐसी हालत देख कर गुफा दौड़े चले आये.....महायोगी जी यहीं से पवित्र हंसकुंड तीर्थ की चौदह दिनों की यात्रा पर चले गए....ऐसी हालत में जाना सबको मंजूर नहीं था...पर हठयोगी के सामने किसकी चलती....महायोगी जी यात्रा पर नंगे पवन निकल पड़े....और अनेक कष्टों से भरे मार्ग को पार करते हुए दिव्य हंसकुंड तक पहुंचे....और वहां से भी ऊपर सकती नाम के पर्वत शिखर तक पहुंचे.....जहाँ दो दिन की साधना कर महायोगी जी पुन: घर की और लौटे....लेकिन घर आने के लिए नहीं बल्कि उन दो दिनों की साधना ने महायोगी जी को और भी तंग कर दिया था....महायोगी जी घोर तप का निर्णय मन ही मन कर चुके थे....अपने संकल्प को पूरा करने के लिए....पहले महायोगी जी घर लौटे....यक्शिनियों का आवन कर उनको पूछा की बताओ माता के दर्शन कैसे हो सकते हैं....उनहोंने कहा की इसके लिए तो घोर तप करना होगा....महायोगी जी ने कहा मैं तैयार हूँ....यक्शिनियों ने ही बताया की महायोगी जी आपको इसके लिए "गरुडासन" पर्वत पर जा कर ही साधना करनी होगी ये स्थान तो काफी दूर था....महायोगी ने कहा ये तो जोगनियों का दिव्य स्थान है....महायोगी जी पहले भी वहां जा चुके थे....अब महायोगी जोगिनियों का आवाहन करने लगे.......जोगिनियों ने महायोगी को कहा की तुम निश्चिन्त हो कर आओ हमारे रहते तुम्हारा बाल भी बांका नहीं हो सकता......महायोगी जी ने आपने कुल देवता श्री शेष नाग जी की अनुमति ली....साथ ही माता तोतला जी की भी......अपने सभी पूर्वजों को प्रणाम कर आशीर्वाद माँगा....लेकिन जाने से पहले दो बड़ी अड़चने सामने आ गयी......
पहली अड़चन तो ये थी की महायोगी के पैतृक घर के साथ वाले पर्वत "जोगिनीगंधा"की देवी भ्रामरी इसके लिए मान नहीं रही थी और साथ ही......"सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली"भी आज्ञा नहीं दे रही थी महायोगी जी जानते थे कि "सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली" को मनाना बहुत ही आसान है......लेकिन "जोगिनीगंधा" पर्वत की देवी भ्रामरी सरलता से नहीं मानने वाली....तो पहले महायोगी जी इसी परवत पर चले गए....इस पर्वत पर साधना के लिए बैठते ही बबाल शुरू हो गया......गांव कि मान्यता के अनुसार यहाँ कोई रात को नहीं रहता सदियों से कोई रहा भी नहीं था...लोग इस स्थान को बहुत ही पवित्र मानते हैं....लेकिन महायोगी जी के दिन-रात वहां रहने के कारण लोग भड़क गए....और समूह बना कर महायोगी जी को धमकाने पहुंचे लेकिन महायोगी जी ने उनको कड़ाई से कह दिया कि वो बिना साधना पूरण किये कदापि नहीं जायेंगे....कहा जाता है कि इस देवी के क्षेत्र कि रक्षा कोई "लंगड़ाबीर"नाम का देवता करता है....जो भालू या शेर जैसा रूप बना कर लोगों को मार देता है....लेकिन जो हिमालयों और बनो का सम्राट हो उसको भला क्या भय.....महायोगी जी करीब सात दिन वहां रहे और अन्तत:,करुणामयी माता प्रसन्न हुई....उनहोंने आकाश मार्ग से महायोगी जी को मौली बस्त्र का टुकड़ा....और कुछ दिव्य पुष्प दिए.......
आप सोच रहे होंगे कि ये तो बिलकुल ही अवैज्ञानिक बात है कि हवा में कोई चीज कैसे आ सकती है....ये वहां के लोगों के लिए चमत्कार नहीं सैंकड़ों लोगो के सामने होने वाली मामूली सी दैविक क्रिया है.....यहाँ का बच्चा-बच्चा इस तथ्य को भली भांति जानता है........सैंकड़ों लोग इसके प्रत्यक्षदर्शी भी है......महायोगी जी इस स्थान से लौटते हुए....ही"सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली"के बन में स्थित मंदिर में पहुंचे....इस माता का बन छोटा सा ही है लेकिन वहां के बृक्षों को कोई लोहा नहीं लगता.......जंगल कटा नहीं जाता इसी कारण बचा हुआ है....इसी बन के मध्य से बहुत ही ऊँचाई से पानी का झरना गिरता है....इस झरने कि जहाँ से शुरुआत होती है वहीँ माता जी का छोटा सा मंदिर है.....वहां पहुँच कर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी ने माता को केवल स्तुति करके ही प्रसन्न कर लिया....माता चवाली ममतामयी कोमल हृद्या हैं.....यही वो देवी हैं जिनके पास मृतसंजीवनी एवं पर्णी नामक बृक्ष भी है.....जिससे सोना बनाया जाता है जैसी दिव्य औषधियां हैं....लेकिन मान्यता के अनुसार इन औषधियों को अदृशय रखा गया है....माता कि कृपा से ही ये प्राप्त हो सकती हैं.....महायोगी जी माता का आशीर्वाद ले......अपनी "गरुडासन पर्वत" कि महासाधना के लिए अब तैयार थे........
 महायोगी जी कठिनतम यात्रा कर गरुडासन पर्वत तक पहुंचे....और और शुरू की अपनी सबसे बड़ी साधना......इस साधना के बारे में मैं नहीं बता सकता....जानता तो हूँ पर यही महायोगी जी के जीवन का सबसे अहम् पड़ाव है....इसी पर्वत पर महायोगी जी को माता रानी के न केवल दर्शन हुए बल्कि आज तक जो इतिहास में सुना भी नहीं गया.....मातारानी के साथ लगभग तीन घंटों से अधिक कि अवधि तक महायोगी जी रहे लेकिन महायोगी नहीं जानते थे कि वो किस से धर्म चर्चा कर रहे हैं....अंतिम कुछ क्षणों में माता ने स्वयं ही कह दिया....कि तुम मुझसे मिलने यहाँ आये थे....तो देख लो मैं ऐसी हूँ.....और करीब सात मिनट तक वहां रह कर देवी ने बिदा ली....आप ये कल्पना करने न लग जाएँ की कोई आठ भुजा वाली मुकुट धारण किये शेर पर सवार हो कर प्रकट हुई और अदृशय हो गयीं......ऐसा कुछ नहीं हुआ......महायोगी जी 26 दिनों तक बिलकुल भूखे रहे होंठ और चमड़ी जगह जगह से फट गयी थी बहुत ही तेज बुखार हो रहा था.....दो दिनों से महायोगी हिले तक नहीं थे.....अब महायोगी जीने की उम्मीद छोड़ चुके थे.....ऐसे में उन्हें मूत्र त्याग की इच्छा हुई....घसीटते हुए कुच्छ दूरी तक गए.....कुछ बूँद मूत्र त्याग किया.....वापिस कन्दरा की और लौटने लगे तो बेहोश हो कर गिर गए.....तभी एक गांव की महिला वहां जड़ी बूटियाँ ढूढती हुई पहुंची....उसने महायोगी को उठाया और पानी पिलाया....फिर लताडती हुई पर्वत के ऊपर ले गई क्योंकि ठण्ड के कारण महायोगी जी का शरीर अकड़ गया था....ऊपर धूप थी.....वहां धूप में लिटा कर महायोगी जी से घर का पता पूछने लगी और कहने लगी की तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे हो...जानते नहीं की यहाँ खतरा है...इतनी ऊंचाई पर तो जानवर भी जिन्दा नहीं रहते....जब महायोगी जी ने कहा की वो माता भगवती को मनाने के लिए आये हैं...तो वो औरत कहने लगी माता तो दिल में होती है..आत्महत्या करके नहीं मिलेगी अपने घर चले जाओ....लेकिन महायोगी बोले की मैं जानता हूँ कि दिल में प्रेम और भक्ति होनी चाहिए पर शायद इतना काफी नहीं....इसी तरह समय तीन घंटे बीत गए....जब महायोगी जी बातो मैं ही उलझे रहे तर्क पे तर्क देते रहे......तो उस औरत ने अपनी गोद से गर्म तजा प्रसाद निकाल कर महायोगी जी को दिया और बोली देखो लो मैं ऐसी ही हूँ.......महायोगी को उस स्त्री कि बातों मैं सच्चाई नजर आई.....महायोगी जी ने अपनी दादी को बताते हुए कहा था कि दादी जी पता नहीं क्यों मुझमे उस औरत कि बात काटने का सहस ही नहीं रहा...वो जो कहती गई मैंने मन....लगा मानों सचमुच
वो ही आदि जगदम्बा है......जैसे ही हल्का सा बोध हुआ.....आँखों से आंसू बहाने लगे मैं दहाड़ दहाड़ कर रोने लगा....उनके सीने से लग कर रोता रहा....पलट पलट कर उनको देखता.....उनको छू कर देखा....उनहोंने कहा मैं सदा तुम्हारे साथ ही हूँ.....कुरुकुल्ला कि प्रतिमा का निर्माण करो.....रथ बनायो......(पहाड़ी कुल्लवी शैली कि प्रतिमा को रथ कहा जाता है)....फिर माता उठी और कहने लगी ये प्रसाद तुम्हारे लिए...और मैं खड़ा हो गया.....वो उठी हाथ मैं दरात थी...और पहाड़ कि दूसरी और जाने लगी.....दिल तो कर रहा था कि मैं रोकू.....लेकिन हिल ही नहीं पा रहा था....थोड़ी देर मैं ठंडी हवा के झोंके ने अहसास दिलाया तो पहाड़ी कि तरफ भागा....दूर दूर तक कोई नहीं था....यहाँ तक कि जंगल तो बहुत ही दूर थे केवल नग्न रिक्त परवत ही था....महायोगी काफी देर रोते रहे.....अचानक हसने लगे...उनको याद आया कि शायद बुखार दिमाग मैं चढ़ रहा है या इतने दिनों से भूखे होने के कारण मौत से पहले हेल्युसुनेशन हो रहा है....भला ऐसा कैसे हो सकता है कि अभी माता आई थी.....अपने को महायोगी जी ने बहुत समझाया....लेकिन तभी हाथ पर रखे प्रसाद पर नजर गई.....जिसकी गर्मी हाथों को महसूस हो रही थी.....महायोगी जी ने प्रसाद ग्रहण किया.....लेकिन आज तक भी महायोगी इस बात को मान ही नहीं पाए कि सचमुच वो भगवती ही थी....लेकिन महागुर को इस बात का पता चलते ही वो भी गरुडासन पहुंचे......महायोगी इतना होने पर भी भ्रम ही मान रहे थे....तो साधना आगे जारी रखने कि जिद्द पर अड़े थे......महागुरु के समझाने बुझाने पर ही लौटे....हम सब तो यही मानते है कि वो भगवती ही थी......केवल महायोगी जी को छोड़ कर....दादी जी का भी यही माना था.....देवी कुरुकुल्ला कि पहले एक धातु प्रतिमा ही थी.....जो प्राचीन है....लेकिन बड़ी मूर्ति जिसे रथ कहा जाता है...तैयार नहीं किया गया था....घर आने के तकरीबन 6सालों के बाद ही महायोगी ने अपना वादा पूरा कर कुरुकुल्ला देवी का रथ बना कर तैयार करवाया....धन का अत्यंत अभाव होने के कारण महायोगी जी माता की प्रतिमा को मनोवांछित स्वरुप नहीं दे पाए लेकिन भविष्य में धन कि व्यवस्था होने पर ऐसा करेने का मन बना माता कि मूर्ती को तैयार किया गया......आप भी जगतकल्याणी माता कुरुकुल्ला जी के दर्शन कर लीजिये......
-लखन नाथ
कौलान्तक पीठ में स्थित माता कुरुकुल्ला कि अस्थाई प्रतिमा
इसी प्रतिमा को माँ भगवती का दिव्य देवी रथ भी कहा जाता है

सोमवार, 27 मई 2019

चमत्कार और ईशपुत्र
कौतुक विद्यापति
चमत्कार की दो श्रृंखलाएं हैं, एक तो कौतुक विद्या जिसका सीधा सा अर्थ है बाजीगरी या जादूगरी,जिसके पीछे यंत्र, व्यवस्था, औषधि, रसायन, विशेष उपकरण व प्रस्तुति का सहारा लिया जाता है और जनता को अथवा दर्शक को विस्मृत किया जा सकता है, किन्तु ये एक कला है जिसका उद्देश्य मनोरंजन करना ही है और दूसरी श्रृंखला में दैविक चमत्कार आते हैं, जो केवल ईश्वर की कृपा से ही घटित होते हैं, महायोगी जी को कौतुक विद्या का गुरु भी कहा जाता है किन्तु दैविक चमत्कारों के बारे में महायोगी जी साफ शब्दों में कहते हैं कि मैं कोई दैविक चमत्कार नहीं करता, जो चमत्कार मेरे जीवन में हुए हैं उन पर भी मेरा बस नहीं था, मैं केवल प्रार्थना करता हूँ और चमत्कार होने लगता है, ये मेरे लिए ही नहीं सबके लिए सामान है" शायद ही किसी महायोगी या परमहंस नें इतना स्पष्ट कहा हो, सब नकली जाल बुनते रहते हैं, ताकि लोगों को मूर्ख बनाया जा सके, किन्तु महायोगी जी को किसी से ज्यादा कुछ तो लेना देना है नहीं इसलिए प्रपंचों से दूर आत्मकल्याण के पथ पर गतिशील हैं, किन्तु उनके साथ रहने वालों को अच्छी तरह मालूम है कि स्वयं महायोगी जी कितने दैविक चमत्कारों से भरे हुए हैं, हो सकता है कि ये केवल हमारा माना ही हो, या हमारी आस्था या भक्ति हो, किन्तु ज्यादा यहाँ कहना ठीक नहीं, अन्यथा आप कहेंगे कि अन्धविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है, हमारी हो सकता है एक अलग दुनिया हो, थोड़े बहुत अन्धविश्वासी भी हो गए हों पर मैं ये जानता हूँ कि जब कोई मां रोते हुए कहती है कि, महायोगी जी संतान नहीं है, महायोगी जी प्रेम से आशीर्वाद दे कर कहते हैं कि मैं प्रार्थना करता हूँ और संतान प्राप्ति हो जाती है, तो मेरा मतलब पूरा हो जाता है, ये कैसे हुआ? क्यों हुआ? क्या कारण था? नहीं जानता, ये बातें तो स्वयं कोई योगी या परमहंस ही समझ सकता है,

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

शाबर कुरुकुल्ला मंत्र
कौलान्तक सम्प्रदाय की प्रमुख देवी "रक्त तारा" जिसे "देवी कुरुकुल्ला" और "सुकुल्ला" या "तोतला" जैसे नामों से पुकारा जाता है। वे चमत्कारों और रहस्यों की देवी के रूप में विख्यात हैं व पूजी जाती हैं।  देवी अति शीघ्र प्रसन्न हो कर वरदान देती हैं।  कौलाचारियों की महाअराध्या देवी का मंत्र स्वयं "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" की वाणी में प्रस्तुत है। शाबर कुरुकुल्ला मंत्र-ॐ नमो कुरुकुल्ले अन्न-धन वर्षिणी सकलकामाकर्षिणी सिद्ध हो-सिद्ध हो-सिद्ध हो माँ।


मंगलवार, 7 अगस्त 2018

विकराल कुरुकुल्ला कवच मंत्र
'विकराल कुरुकुल्ला कवच मंत्र' एक स्तुति मंत्र है जो 'देवी' की स्तुति के साथ-साथ ही उनकी अनुकम्पा प्रदान करने वाला है। इसे मनोकामनापूरक मन्त्र व सुरक्षा करने वाला मंत्र कहा गया है। हिमालय पर 'गण गन्धर्व' इसी प्रकार उनकी मंत्र स्तुति करते हैं। 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' द्वारा गया गया ये मंत्र प्रस्तुत है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
-------Goddess Kurukulla Mantra-----------
तू महाभैरवी देवी डाकिनी, तू गंधर्वपूजिता...
शांत रूप तेरा तू विकराला देवपूजिता...
तू वरदायिनी कैलाशवासिनी कुरुकुल्ला...
दुर्गा दुर्गतिनाशिनी तू अंबा हे जगदंबा...
ॐ ह्रीं वज्रपुष्पं हुं फट् आः सुरेखे वज्ररेखे स्त्रींकारी ह्रींकारी क्लींकारिणी कुरुकुल्ले कुल्लुकतारिणी कुल्लुकेशी हुं ऐं स्त्रीं ह्रीं फट् कीली-कीली युं हुं हुं ऐं त्रीं द्रीं क्षीं स्हूं सर्वार्थसाधिनी जग्रय-जग्रय ॥
(tu mahabhairavi devi dakini, tu gandharv poojitaa...
shant roop tera tu, vikaralaa Dev poojitaa.......
tu vardayini kailashwasini , kurukulla..........
durgaa durgati naashini tu, Ambaa he! jagdambaa.......)
( om hreem vjrapushpm hum phat aa: surekhe vajrrekhe streengkaaree hreengkaaree kleengkaarini kurukulle kulluktaarini kullukeshee hum aim streem hreem phat kili-kili yum hum hum aim treem dreem ksheem sahoom sarvarth sadhini jagraya-jagraya...........)



रविवार, 8 जुलाई 2018

श्री कुरुकुल्ला सुकुल्ला प्रभात स्तुति
ऐसा नहीं है कि 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' केवल तंत्र कुल के ज्ञाता हों। उनके लिए धर्म का हर विभाग सामान रूप से वन्दनीय है और उन पर सामान अधिकार रखते हैं। प्रतीक्षा कीजिये वेदमंत्र कतार में हैं। फिलहाल लीजिये उनके द्वारा की गई देवी कुरुकुल्ला यानि रक्त तारा की स्तुति। आपके लिए प्रस्तुत है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय
।। श्री कुरुकुल्ला सुकुल्ला प्रभात स्तुति।।
शुभप्रभातं सुप्रभातं कुरुकुल्ला देव्यै नम:
नमस्कारं नमस्कारं सुकुल्ला दैव्यै नम: ।
शान्तिं प्रयच्छ मे! ज्ञानं प्रयच्छ मे!
ऋद्धिं प्रयच्छ मे! सिद्धिं प्रयच्छ मे!
धनं-धान्यं, भोगं-मोक्षं, यशं देहि मे!
नमस्कारं नमस्कारं सुकुल्ला दैव्यै नम: ।
शुभप्रभातम सुप्रभातम कुरुकुल्लादेव्यै नम:
नमस्कारं नमस्कारं सुकुल्ला दैव्यै नम: ।
क्लीं क्लीं ह्रीं ह्रीं ऐं हुं रक्त तारायै नम:
तोतले तुरे तारे तरले कुलनायिके,
कल्याणं कुरु देवी सौंदर्य रूपवर्धिनी
नमस्तुभ्यं ईप्सितप्रदे सर्वकामप्रदायिनी,
त्रैलोक्यविजयिनी देवी सर्वमुग्धे नमो नम:,
वर अभयदात्री देवी सर्वदा सुमंगलकारिणी,
नमो नमो कुरुकुल्ले सर्वदुःख विनाशिनी
अनंता अक्षरा नित्या महाकौतुककारिणी,
अकालमृत्यु प्रशमनी सर्व शत्रु निवारिणी
त्राहि माम कुरुकुल्ले! सुकुल्ले नमोस्तुते!
सामर्थ्य शक्ति प्रदायिनी पुष्प धनुधारिणी
श्री कामकला देवी कालकालेश्वरी नमो नम: ।
नमस्कारं नमस्कारं सुकुल्ला दैव्यै नम:
शुभप्रभातम सुप्रभातम कुरुकुल्लादेव्यै नम: ।

बुधवार, 16 मई 2018

 कौल तन्त्र और वज्रयान तन्त्र
प्रश्न: तो हमारे तन्त्र और उनके (वज्रयान) तन्त्र मेँ क्या भिन्नता है ?
ईशपुत्र: अन्तर है । अन्तर कहाँ हो जाता है? हम मूलतया शिव और शक्ति को प्रमुख रखते है । क्यों ? क्योंकि हमारे पंथ की शुरुआत-प्रारम्भ स्वयं महादेव ने किया लेकिन वहां उनके सम्प्रदाय की शुरुआत महादेव ने स्वयं ने नहीं की है अपितु हमारे ही सम्प्रदाय से, मै उनका नाम नहीं लेना चाहता, फिर भी यदि आप जिज्ञासु लोग है और स्वयं खोजेंगे तो आपको ऐसे सिद्धों के नाम मिल जाएंगे जो हमारे ही हिमालय के योगी "सिद्ध-परम्परा" के बहुत पहले से सिद्ध थे लेकिन, निजी स्वार्थ होता है, राजनीति कहाँ नहीँ रहती ! धर्म और गद्दियों मेँ भी तो राजनीति है ! प्राचीन काल में हमारे सम्प्रदाय की प्रचलित बहुत महत्वपूर्ण कथा है कि, बहुत से सिद्धों ने हमारे ही पंथ से बगावत की । होता है...हर सम्प्रदाय में जो विशालकाय सम्प्रदाय हो वहां सब व्यक्तियों का तुष्टिकरण नहीं हो सकता और हमारे पंथ में पीठाधीश्वर बनने के नियम जितने कठिन है जितने जटिल है शायद ही किसी और पंथ और धर्म में ऐसे हो । ऐसा लगता है जब हम तैयारी करते है, कि मानो हम किसी युद्ध पर जानेवाले हो ! युद्धस्तर पर हम तैयारियां करते है तब जाकर के एक पीठाधीश्वर का युद्ध लड के उसकी गद्दी तक पहुंचना होता है । जबकि आज आप किसी भी सम्प्रदाय को देख लीजिए किसी भी गद्दी को, बस आपको सेवा ही करनी है और आपका नम्बर लग जायेगा और आप पीठाधीश्वर बन जाएंगे, लेकिन यहां ऐसा नहीं चलता... तो प्राचीन काल मेँ... जैसे मान लीजिए मेरा आश्रम है अब यहां पचास लोग होंगे, अब पचास के पचास तो पीठाधीश्वर नहीं बन सकते! तो एक व्यक्ति जब पीठाधीश्वर बनता है तो उसके साथ के दो-तीन उसके जो प्रतिस्पर्धी होते है उन्हें लगता है कि 'अरे ! हम मेँ इस से अधिक योग्यता थी !' और योग्यता तो सिद्ध कर के होती है ना ! जब वो अपनी योग्यता सिद्ध नहीं कर पाते तो वो पीठ का परित्याग कर देते है ! उसे हम असंतुष्ट लोग कहते है, मोहभंग जिन लोगों का हो जाता है... तो ऐसे ही सिद्ध प्राचीन काल मेँ भी रहे जिनका मोहभंग हो गया तब वो "कौलान्तक सम्प्रदाय" को और "महाहिन्दू पंथ" को निशाना बनाने के लिए तत्त्व ढूंढने लगे ! मै आज आपको दो "रहस्य" बता रहा हूं ! प्रथम रहस्य ये है कि यदि आप हमारे ही "हिन्दू धर्म" के वेद, पुराण, शास्त्रों और ग्रंथों को भी देखेंगे, उस मेँ से एक शब्द हटा ही दिया गया है वो है "हिन्दू" ! आप यदि हमारे पुराण, वेद, शास्त्र पढ़ेंगे वहां आपको "हिन्दू" नाम का शब्द बहुत ही कम इक्का-दुक्का स्थानों में ही देखने को मिलेगा ! वो शब्द कैसे हटाया गया ? इसमें कुछ ब्राह्मणों का षड्यंत्र था ! सभी ब्राह्मणों का नहीं क्योंकि ब्राह्मण तो इस पंथ को और इस विद्या को आगे पहुंचाने वाले है और वहां कुछ ब्राह्मणों के कारण और उन असंतुष्ट ब्राह्मणों और असंतुष्ट हमारी पीठ से गये सिद्धों ने मिलकर कई अन्य सम्प्रदाय खडे किए ! और उन्हीं अलग-अलग संप्रदायों का फिर अलग-अलग राग था ! क्योंकि देखिए जब आपको हम से अलग होना होगा...मान लीजिए आज आप हमारे भक्त है, कल को अगर आप को हमारा शत्रु बनना पड़े तो आप छोटी-छोटी बात कहेंगे जैसे कि इस व्यक्ति का चरित्र ठीक नहीं ! ये व्यक्ति शक्तिशाली नहीं ! ये व्यक्ति तपस्वी नहीं ! इस व्यक्ति मेँ कोई ज्ञान नहीं इत्यादि-इत्यादि...तो ठीक वैसे ही हुआ जब हमारे यहां से वो सिद्ध जो किसी स्थिति पर न पहुंच सके वो जाकर अन्य धर्मों मेँ मिल गये !

प्रश्न : तो क्या भविष्य में बौद्ध पंथ का अंत हो जाएगा ? जैसा कि वैष्णव ग्रंथों में कहा गया है ?
ईशपुत्र : मैने भी अपने गुरुओं से सुना है और जो वैष्णव ग्रंथ है हमारे भारतवर्ष के...उनमें विवरण दिया गया है कि "बौद्ध पंथ का अन्त हो जायेगा ।" लेकिन मैं इस वृत्ति का पीठाधीश्वर नहीं हूं । कारण ये है कि चाहे जो भी हो वो हमारे गर्भ से निकले हुए लोग है, हमारी संतानें है, हमारे पुत्र है । मैं बौद्ध धर्म की प्रत्येक शाखा को अपना पुत्र ही मानता हूं । बुद्ध से लेकर अभी तक जितने भी अलग अलग उनके प्रमुख लोग हुए है पैदा...उन सबको मैं अपना पुत्रवत् मानता हूं, छोटा मानता हूं और उनकी रक्षा करना अपना "धर्म" मानता हूं । लेकिन ये सब तभी तक सहा जा सकता है जब तक आप एक सीमा से बाहर ना जाओ । भगवान श्रीकृष्ण को जब तक एक साथ सौ गालियां नहीं दी गयी वो मुस्कुराते रहे...ठीक मेरा भी वही सिद्धांत है । सभी बौद्ध धर्म के मतावलंबी एक जैसे नहीं है... हमारी पीठ...क्योंकि ये भगवती माँ कुरुकुल्ला की पीठ है जिनको रक्त तारा अथवा रेड तारा कहा जाता है...तो दुनियाभर से लोग जो बौद्ध धर्म के माननेवाले है वो पीठ मेँ आते है और वो अपनी पद्धति से पूजा-पाठ करते है...अपने मंत्रों से,अपने तौर तरीकों से । हमने उन्हें कभी नहीं रोका...हम ये कहते ही नहीं की भगवती हमारी है । हम कौन होते है कहनेवाले ? ये तो जगत की है, ब्रह्मांड की है, जो आयेगा उसकी माँ है और जो चाहे आकर इनसे वरदान पाए क्योंकि ये तो चमत्कारों की देवी मानी जाती है । अनेकों चमत्कार इनके द्वार पर है और एक क्षण मेँ किसी का भी किस्मत बदलने का मादा रखती है अन्यथा इनकी अनुकंपा नहीं होती तो मेरे जैसा एक गांव का अतिशून्य परिवार मेँ पैदा हुआ व्यक्ति प्रखरतम मस्तिष्क प्राप्त करके सर्वोच्च पदवी तक जाने की सामर्थ्य नहीं रखता था । तो ये केवल भगवती की प्रेरणा से हुआ । तो बौद्ध मत के लोग भी यहां आते है । कुछ अच्छे लोग भी वहां है...तो हमने उन्हें कभी नहीं रोका...इसीलिए मै ये नहीं चाहता कि बौद्ध धर्म का कभी अन्त हो और बौद्ध धर्म को नष्ट किया जाए ! मै तो उनकी ओर "मैत्री" का हाथ बढाना चाहता हूं ! मै उनसे प्रेम करता हुँ ! मैँ तो ये कहता हुँ कि तुम लौट आओ अपने घर ! लेकिन इसका अर्थ ये नहीँ कि तुम बौद्ध पंथ को छोड दो, तुम बुद्ध को मानना छोड दो या तुम अपनी मिश्राचारी पद्धति को अपनाना छोड दो लेकिन अपनी मौलिक परम्परा से जुड जाओ । बडा लंबा समय हो गया है तुमने अपना घर छोड दिया है और तुम घर से बाहर भटक रहे हो । सुबह का भूला यदि सन्ध्या के समय घर लौट आये तो उसे भूला नहीँ कहा जाता ये हमारी भारतीय कहावत है...तो मेरा तो खुले ह्रदय से उनका स्वागत है, मेरा तो "मैत्रीपूर्ण हाथ" उनकी और मैने बढाया है...और ऐसा पहली बार होगा क्योँकि मुझसे पूर्व शंकराचार्य इस पृथ्वी पर आये, उनके जैसा धुरंधर व्यक्तित्व..जिससमय बौद्ध धर्म का तन्त्रयान पूरे देश मेँ फैल चूका था । हर ओर केवल एक ही नारा था "बुद्धं शरणं गच्छामि ।" जिस समय हर ओर, हर समय, हर दिशा मेँ ब्राह्मणोँ का अपयश फैल रहा था । लोग ब्राह्मणवाद को, वेदोँ को गलत कह रहे थे, पुराणोँ को गलत कह रहे थे और जहाँ भी ब्राह्मण दिखते उनको हटा देने, गिरा देने, नष्ट कर देने पर तुले हुए थे...तब भी एक सिँह की भाँति एक संन्यासी नेँ संपूर्ण पृथ्वी पर भारत पर से उस बौद्ध धर्म को इस प्रकार खदेडा कि भारत मेँ आपको देखने को ही बौद्ध धर्म नहीँ मिलता । बहुत चंद लोग मध्य मेँ रहते है और बाकी देश की सीमाओँ से बाहर रहते है जिन्हे खदेड दिया गया लेकिन मैँ खदेडने नहीँ आया हुँ ! और ना ही खदेडने की बात करता हुँ ! अभी तक जो भी आये उन्होँने बौद्ध धर्म को हटाने की ही बात की । मैँ प्रथम पुरुष हुँ जो उनकी ओर हाथ पुनः बढा रहा है । मैँ कहता हुँ मैने "मैत्री" का हाथ बढाया है तो तुम्हे मेरे हाथोँ मेँ हाथ देना चाहिए । तुम्हे अपनी मौलिक परम्परा मेँ लौटना चाहिए । तुम्हेँ शिव और शक्ति की निन्दा छोडकर मौलिकरुप से साधना समझनी चाहिए क्योँकि जीवन लडनेँ के लिए नहीँ है । जीवन बहुत छोटा है । उस जीवन को स्थायीत्व प्राप्ति के लिए, पूर्णता प्राप्ति के लिए हमेँ मौलिकरुप से साधना करनी चाहिए यही मेरा प्रस्ताव भी है और ऐसा उनको समझना भी चाहिए ।


विष्णु भैरव जी : याने कि आप "मैत्रीय प्रस्ताव" आगे बढाना चाहते हो ?
ईशपुत्र : बिलकुल, मेरा केवल उतना ही मन्तव्य है क्योँकि बौद्ध धर्म आज एक सुंदर रुप मेँ पनप रहा है...उसका कारण ये है कि अधिकांश परंपराएँ हम से ली गयी है...मैने तो ये भी नहीँ कहा कि, "चुराई गयी है !" मै तो कह रहा हुँ, "ली गयी है !"  क्योँकि उनके प्रमुख जो रहे आप उनको गौर से खोजिए तो आपको पता चलेगा की वो "सिद्ध" रहे है सारे के सारे । चौरासी सिद्ध होँ या अन्य सिद्ध होँ या उप सिद्ध होँ या महा सिद्ध होँ या हिमालय के योगी हो वो भारत के ही किसी प्रान्त से, कसबे से निकले है और जाकर उन्होँने बौद्ध पंथ मेँ जाकर के वो ज्ञान आगे बढाया है । तो वो सब मेरे लिए अनुज है, छोटे है तो मैँ उनको कभी हानि कैसे पहुँचा सकता हुँ और वैसे भी भारत की ऐसी मंशा कभी नहीँ रही । महामहिम दलाई लामा एक पंथ के प्रमुख है और हमारे ही हिमाचल प्रदेश मेँ उनको स्थान दिया गया है । आपने क्या कभी देखा कि हमने उन्हेँ किसी प्रकार से हानि पहुँचाई ? यहाँ तक कि जब तिब्बती समुदाय को कोई हानि पहुँचाई जाती है तब भी हमारा वरद हस्त उन पर रहेता है कि इनको कोई कष्ट ना पहुँचाओ क्योँकि हम उन्हेँ शिष्य की भाँति मानते है । ये बात अलग है कि उनमेँ से कुछ उद्दडं तत्व है जो हमेँ शत्रु की निगाह से देख रहे है...तो यदि तुम शत्रुता करोगे तो विपरित हो सकता है, मैँ अपना हाथ तुम्हारे उपर से खिंच लुंगा । मेरा कोई समर्थन तुम्हारी तरफ नहीँ रहेगा और मैँ तुम्हारे लिए कोई मंगल काम नहीँ करनेवाला हालाँकि मैँ कर रहा हुँ, विश्व के लिए कर रहा हुँ वो मैँ छोडुंगा नहीँ वो मेरी आदत है लेकिन यदि तुम "असत्य" कहोगे शिव के विरुद्ध कहोगे शक्ति के विरुद्ध कहोगे तो तुम्हारा विनाश होगा ! और शायद यही कारण है कि वैष्णव पंथ इस प्रकार की भविष्यवाणी करता है कि भविष्य मेँ बौद्ध संप्रदाय का अंत हो जायेगा लेकिन मैँ ये भविष्यवाणी करना चाहता हुँ कि इस तरह का अंत ना हो !! वहाँ से केवल उन लोगोँ का अंत हो जो नीच है, निकृष्ट है, शिवनिन्दक है, शक्ति के निन्दक है और जो वहाँ राजनीति कर रहे है..बौद्ध धर्म, तंत्र और कुलाचार, कौलाचार, समयाचार के नाम पे..उनको शान्त रहना चाहिए और मेरे "मैत्रीय प्रस्ताव" को स्वीकार करना चाहिए क्योँकि मेरा "मैत्रीय प्रस्ताव" पूर्वसुनियोजित है और मैँ चाहता हुँ कि वो "प्रकृति के इशारे" को समझे और अपने घर को वापिस लौट आये और अपनी साधनाओँ को आगे बढाते हुए जीवन को सुखमय करे ।