शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

महादेव हमारे लिए अनुकरणीय है !

 संसार इधर से उधर हो जाए लेकिन मेरी आंखों में वो चिंगारी है, साधना के लिए मैं तत्पर हूं। ऐसा शैवमतीय गुण हमारे भीतर होना चाहिए! शिव की तरह! बैठ गए हैं आसान पे तो बैठ गए हैं आसान पे, पार्वती प्रतीक्षा कर रही है , जगत की जननी उनके चरणों पे विराजमान हैं , देख रही है कि वो जागेंगे और युगों है कि वो जागते नहीं! ऐसे महादेव ही हमारे लक्ष्य हो सकते है ! हमारे लिए अनुकरणीय हो सकते है , क्योंकि उनका अनुसरण करना, उनका अनुकरण करना ही हमारे लिए श्रेष्ठ मार्ग है !


वो जड़वत् है, पत्थर की भांति, उनका जब भी शास्त्रकारों ने जब भी ऋषियों ने विवरण दिया तो कहा कि, "वो तो कैलाश धाम पे , कैलाश शिखर पर विद्यमान हैं!" कहा, "क्या कर रहे हैं?" कहा, "समाधिस्थ है!" तो कहा, "किसकी उपासना कर रहे हैं?" कहा, "नहीं मालूम।" तो कहा, " तो कभी जाके पूछ लो!" तो कहा, "हम तो नहीं पूछ सकते!" कहा, "किसकी योग्यता है?" कहते है, "एक ही है जो पूछ सकती हैं और वो पराडाकिनी हैं , मां पराम्बा हैं !वही पूछ सकती हैं! " उन्होंने पूछा, कि, "हे प्रभु! आप नेत्र मूंद के किसका ध्यान करते हैं? तो उन्होंने कहा, "मैं नेत्र बंद रखकर के केवल ' ॐ' जो नाद है, उसी का ध्यान करता हूं !" पार्वती ने फिर पूछा, " ये नाद कौन हैं ? इस सृष्टि में मैने दो ही तत्त्वों को पाया है , या तो मैं , या तो आप! ये तीसरा कौन पैदा हो गया?" तो शिव ने कहा, "जहां तुम और हम मिलते हैं वही नाद है ! इसलिए मैं तुम्हारे और अपने अतिरिक्त किसी का चिंतन नहीं करता! मेरी समाधि वैसी समाधि नहीं है जैसे जोगी समाधि लगाते हैं, मेरी समाधि कुछ और समाधि है!" इसलिए महादेव हमारे लिए अनुकरणीय है !

ईशपुत्र - कौलान्तक नाथ (लोक लोकांतरगमन साधना शिविर)




शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

कौलाचार
"कौलाचार" कोई भद्दा कामुक परिहास नहीं है। "कौलाचार" है श्रेष्ठता। जो कुल शिव का हो, जो शक्ति का हो वही कुल "कौलों" का कुल है। जो कुल रहस्यों के आवरण को निर्मित करता हो, जो कुल रहस्यों की आवरण पूजा करता हो, वही "कौल" है। "कौल धर्म है" "कौल शिव हैं" और हम उन्हीं को अपना मानते हैं जो शिव के हैं। संसार में बहुत से हैं जो "शिव द्रोही" है। तब भी हम मौन है, क्योंकि उनकी गति भी प्रलय काल में शिव ही है। "कौल" होने के लिए "घंटाकर्ण वीर" होना जरूरी है। "कौल" होने के लिए शिव का गण "महाकाल" और "वीरभद्र" होना जरूरी है। शिव का होने के लिए बस उनका हो जाना जरूरी है। लोग पूछते हैं की देश के लिए वर्तमान परिस्थितियों के लिए, हम क्या कर रहे हैं? हमारा उत्तर है की सदियों से तुम्हारे संसार और इस देश के लिए, इसकी संस्कृति के लिए, कौन कार्य कर रहा है? देश की राजनीति हो या धर्म, नई पीढ़ी की दिशा हो या परिवर्तन का अभियान। हम सर्वत्र उपलब्ध हैं। अभी बताने का समय नहीं आया। लेकिन तुम्हारे साथ झंडे थामने वाला एक हाथ "महाहिन्दू" का है, शिव के "कौल गण" का है। जब तुम पिटते हो, तुम्हारे साथ हम भी पिट रहे हैं। जब तुम भूखे सोते हो, हम भी भूखे सो रहे हैं। देश के लिए, संसार को बदलने के लिए, तुम भी सामने हो और हम भी सामने हैं। बस अंतर ये है की तुम संसार के कार्य दिखा-दिखा कर, बता-बता कर करते हो और धर्म को अध्यात्म को अपने ह्रदय में रखते हो, हम उलट हैं, धर्म को अध्यात्म को बता-बता कर करते हैं, दिखा-दिखा कर करते हैं। लेकिन देश हित और विश्व कल्याण के कार्य गुप्त रीति से करते हैं। हमने तुमसे नहीं पूछा की क्या तुम शिव की पूजा करते हो? तो तुम मत पूछो की हम क्या करते हैं। "महाहिन्दू" को कभी भी मूक बैठा हुआ नहीं मानना चाहिए, वो तो मृत्यु आने के बाद भी बोलता है। क्योंकि वो शिव पर विश्वास रखता है और शत्रुओं से अनुरोद्ध करता है की शांति में सहयोग दें। अन्यथा आखिर में सिंह गरज उठाता है। धर्म सत्संग का विषय नहीं है, कथाओं का विषय नहीं है। वो तो निरंतर जीवन है, योग क्षेम है। एक ऐसी उच्चता है जो विनम्रता देती है। कडवे वचनके साथ ही मीठा ह्रदय देती हैं। लेकिन इन सबके बाबजूद "कौलान्तक संप्रदाय" का गोपनीय ज्ञान एक रहस्य था और रहेगा। बस उजागर होगी तो "महाहिन्दुओं" की सनातन गौरव दास्तान। 

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शिवोऽहम्
To be in the Shiva state for always is called Mahayoga. To recite the name of Shiva,to keep him in one's heart, to surrender ones existence to Shiva and to understand Shiva is the Shiva state. Shiva is beyond the dualities of virtue and sins, high and lows, compliments and condemn. You too accept the form of his and then who is going to be here beside Shiva?-Kaulantak Peeth Team-Himalayad.
नित्य शिव भाव रहना ही महायोग है। मुख से शिव कहना, मन में शिव रखना,स्वयं के अस्तित्व को शिव से और शिव का समझना ही शिव भाव है। शिव पाप-पूण्य, उच्चता-नीचता, प्रशंसा-निंदा से पार हैं। तुम भी उनके स्वरूप को आत्मसात कर लो। फिर शिव के अतिरिक्त यहाँ कोई और है कहाँ?-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

रविवार, 16 जून 2019

कौलान्तक पीठ का प्रमुख शैव ध्वज
"कौलान्तक पीठ का प्रमुख शैव ध्वज" जो कौलान्तक सम्प्रदाय के सिद्धों की पहचान है. इस ध्वज के नीचे हम कैलाश मानसरोवर से भी आगे तक की सिद्ध योगियों की तपोभूमि की पुन: प्राप्ति की कामना करते हैं. जो भूखंड आज दूसरे देशों नें हमसे छीन लिया है. वो भारत वर्ष का अभिन्न अंग है, सिद्धों के प्राण उस भूमि पर बसते हैं. महाहिमालय का वो सारा क्षेत्र हमें पुन: प्राप्त हो. यही मंगल कामना-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

रविवार, 26 मई 2019

शिव कौन है ?
शिव कौन है?
कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज को कुछ प्यारे भक्तों नें कहा की आप साक्षात शिव है....महायोगी जी नें मुस्कुराते हुए उत्तर दिया........मैं शिव नहीं आप शिव हो इसलिए जहाँ देखते हो जिसे देखते हो शिव ही देखते हो.......ये आपके प्रेम की वो ऊँचाई है.....और भक्ति की वो पराकाष्ठा की मुझ जैसे साधारण औघड़ में भी शिव नजर आते हैं.........ये सृष्टि जिस भाव से देखेंगे वैसी ही नजर आती है. जब साधक शिवमय हो कर अपने अस्तित्व को शिव में विलीन कर देता है तो उसे त्रिशूल में शिव, डमरू में शिव, गंगा में शिव, चंद्रमा में शिव, पर्वतों में शिव, गुरु में शिव यहाँ तक की मुझ जैसे अज्ञानी में भी साक्षात् शिव नजर आते हैं. मुझमें शिव देखना मेरा नहीं आपके अपने उच्चतम चेतन धरातल का सूचक है. इसलिए मैं नहीं आप स्वयं शिव हो. आपके घट-घट में शिव का वास है. आप शिव भक्ति के कारण नित्य हो गए हो.....साक्षात् शिव हो गए हो. इसी कारण मुझमें भी शिव ही देखते हो, धन्य है आपकी शिव दृष्टि-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

मंगलवार, 7 मई 2019

क्या है रुद्राक्ष और रुद्राक्ष का महत्व?
क्या है रुद्राक्ष और रुद्राक्ष का महत्व?
कौलान्तक पीठ हिमालय: रुद्राक्ष यानी जिसे रुद्र का अक्ष यानी आंसू कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र यानी भगवान शिव के आंसुओं से हुई है। रुद्राक्षों को आध्यात्मिक योगिक आभूषण की तरह धारण किया जाता रहा है। ये मान्यता है कि रुद्राक्ष इस धरती पर अकेली ऐसी वस्तु है, जिसमें स्वयं शिव का तेज शक्ति के रूप में विद्यमान रहता है। रुद्राक्ष की महिमा से बहुत से ग्रन्थ भरे पड़े हैं। रुद्राक्ष एक मुखी से ले कर तीस मुखी तक पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त भी रुद्राक्ष कई प्रकार के होते हैं जैसे गौरी-शंकर रुद्राक्ष, गणपति रुद्राक्ष, भद्राक्ष। साथ ही रुद्राक्ष के तीन प्रमुख रंग भी होते हैं काला,लाल और पीला। रुद्राक्ष कैसे धारण करें? इसके कुछ नियम है-

- रुद्राक्ष को कलाई, गला और हृदय पर धारण किया जा सकता है।
- इसे गले में धारण करना सर्वोत्तम होगा। वहीं कलाई में 12, गले में 36 और ह्रदय पर 108 दानों को धारण करना चाहिए।
- हृदय तक लाल धागे में एक दाना रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं।
- सावन में, सोमवार को और शिवरात्री के दिन रुद्राक्ष धारण करना सबसे अच्छा होता है। रुद्राक्ष धारण करने के पहले उसे शिव जी को समर्पित करना चाहिए।
- उसी माला या रुद्राक्ष पर मंत्र जाप करना चाहिए।

रुद्राक्ष धारण करने के बहुत से लाभ हैं किन्तु कुछ साधारण लाभ निम्न हैं।

- रुद्राक्ष को लेकर मान्यता है कि इसको धारण करने से कई तरह की शारीरिक समस्याएं दूर हो जाती हैं।
- वैज्ञानिक परिक्षण में भी यह बात साबित हो चुकी है कि दिल के रोगियों में रुद्राक्ष धारण करने से बहुत फायदा होता है।
- रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति पर महालक्ष्मी की कृपा होती है। जीवन में सभी सुख सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं।
- इसे धारण करने से हर तरह की मनोकामना पूरी होती है।
- रुद्राक्ष धारण करने से कठिन साधना करने के बाद मिलने वाले फल के बराबर लाभ होता है।
- रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही वो भाग्यशाली भी बनते हैं।

रुद्राक्ष के मुख से उनकी उपयोगिता और अधिक बनती है। एक मुखी रुद्राक्ष सर्वश्रेष्ठ माना गया है जबकि पंचमुखी सभी के लिए समान रूप से उपयोगी बताया गया है। यदि रुद्राक्ष को मंत्र सहित धारण किया जाए तो आध्यात्मिक बल में भी वृद्धि होती है। शिवलिंग पर रुद्राक्ष अर्पित करना महापुण्यदायक कहा गया है। रुद्राक्ष को छूना और देखना भी इच्छित क्षेत्र में उन्नति देने वाला होता है।
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मंगलवार, 8 जनवरी 2019

रुद्राक्ष के चमत्कारी महारह्स्य
भगवान शिव के प्रिय रुद्राक्ष में स्वयं शिव का अंश होता है, रुद्राक्ष को शिवाक्ष,शर्वाक्ष,भावाक्ष,फलाक्ष,भूतनाशन,पावन,हराक्ष, नीलकंठ,तृणमेरु,शिवप्रिय, अमर और पुष्पचामर भी कहते हैं, आयुर्वेद के ग्रंथों में भी रुद्राक्ष की महामहिमा का वर्णन है, आयुर्वेदिक ग्रंथों में रुद्राक्ष को महौषधि,दिव्य औषधि आदि कह कर इसके दिव्य गुणों को विस्तार से बताया गया है, रुद्राक्ष की जड़,छाल,फल,बीज और फूल सबमें औषधीय व दैवीय गुण छिपे हुये है. यदि आप तंत्र मंत्र जादू टोना अथवा किसी बुरे साए से परेशान हों! किसी की नजर ने जीना दूभर कर रखा हो! तरह तरह से ग्रहों की दशाओं ने जीवन की नैया को डावा-ड़ोल कर दिया हो! बुद्धि विवेक मस्तिष्क तनाव या किसी समस्या के कारण ठीक से काम न कर पा रहे हो! साथ ही आप यदि हृदय रोगों से परेशान हों, नक्षत्र दोष के कारण बनते काम बिगड़ रहे हों! तो अब समय आ गया है, "दुर्भाग्य के नाश का" और शिव की तरह प्रसन्न और मुक्त होने का. शिव पुराण में कहा गया है कि जिसने रुद्राक्ष धारण कर रखा हो, वो तो स्वयं शिव ही हो जाता है, जी हाँ ठीक सुना आपने जो भी व्यक्ति रुद्राक्ष धारण कर ले वो शिव के सामान ही दिव्य हो जाता है, लेकिन इसके लिए आपको जाननी होगी कुछ अतिगोपनीय विधियाँ,जो हम आज गहन अध्ययन केबाद आपके लिए ले कर आये हैं, अगर आपको लगता है कि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा, आप बहुत ही ज्यादा चंचल है और इस बजह से लगातार अपना नुक्सान कर रहे हैं, तो शिव के मन्त्रों से प्राण प्रतिष्ठा कर रुद्राक्ष धारण कीजिये, आपके जीवन में स्थिरता आने लगेगी. राहु, शनि, केतु, मंगल जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव से होने वाले रोगों व संकटों का नाश होगा, जीवन के संघर्षों से आपको राहत मिलेगी, साथ ही अकाल मृत्यु, दुर्घटनाओं को रोकेगा शिव का एक चमत्कारी रुद्राक्ष, सकन्ध पुराण और लिंग पुराण में कहा गया है कि रुद्राक्ष से आत्मविश्वास और मनोबल बढ़ता है, कार्य, व्यवसाय, व्यापार में अपार सफलता दिलवाता है, रुद्राक्ष सुख समृद्धि प्रदान करता है, साथ ही साथ पाप, शाप, ताप से भी भक्त की रक्षा करता है, हम आपको बता दें कि रुद्राक्ष भारत, नेपाल, जावा, मलाया जैसे देशों में पैदा होता है, भारत के असाम, बंगाल, देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में रुद्राक्ष पैदा होतें है, रुद्राक्ष का फल कुछ नीला और बैंगनी रंग का होता है जिसके अन्दर गुठली के रूप में स्थित होता है शिव का परम चमत्कारी दैविक रुद्राक्ष, लेकिन रुद्राक्ष का एक हमशक्ल भी होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, पर उसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते, शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष की क्षमता उसके मुखों के अनुसार ही होती है, रुद्राक्ष एक मुखी से ले कर इक्कीस मुखी तक प्राय: मिल जाते है, सबकी अलौकिकता एवं क्षमता अलग अलग होती है, हिमालय की तराइयों से प्राप्त रुद्राक्ष की महिमा सबसे बड़ी कही गई है, दस मुखी और चौदह मुखी रुद्राक्ष अतिदुर्लभ कहे गए है, पंद्रह से ले कर इक्कीस मुखी तक के रुद्राक्ष साधारणतय: नहीं मिल पाते, और एक मुखी की तो महिमा ही अपरम्पार है, जिसे मिल जाए उसे जीवन में फिर कुछ और पाना शेष नहीं रहता, वो केवल अत्यंत भाग्य वाले को ही मिल पाता है, रुद्राक्षों में नन्दी रुद्राक्ष, गौरी शंकर रुद्राक्ष, त्रिजूटी रुद्राक्ष, गणेश रुद्राक्ष, लक्ष्मी रुद्राक्ष, त्रिशूल रुद्राक्ष और डमरू रुद्राक्ष भी होते है, जो अंत्यंत दैविक माने गए हैं. रुद्राक्ष का प्रयोग औषधि के रूप में तो होता ही है साथ ही इसे धारण भी किया जाता है या पूजा के लिए,माला के रूप में प्रयुक्त होता है,स्फटिक शिवलिंग, बाण लिंग अथवा पारद शिवलिंग को स्थापित कर यदि रुद्राक्ष धारण कर लिया जाए तो वो व्यक्ति सम्राटों जैसा बैभव प्राप्त कर लेता है, रुद्राक्ष ऐसा तेजस्वी मनका है जिसका उपयोग बड़े बड़े योगी संत ऋषि मुनि महात्मा परमहंस तो करते ही है साथ ही साथ तांत्रिक अघोरी जैसी वाममार्गी विद्याओं के जानकार भी इसके चमत्कारी प्रभावों के कारण इसकी महिमा गाते फिरते है, भारत के सिद्ध रुद्राक्षों का प्रयोग तो आज विश्व के हर कोने में बैठा व्यक्ति कर ही रहा है, तो आप और हम इसके दिव्य गुणों से दूर क्यों रहें? स्कंध पुराण में कार्तिकेय जी भगवान शिव से रुद्राक्ष की महिमा और उत्पत्ति के बारे में प्रश्न पूछते है तो स्वयं शिव कहते है कि "हे षडानन कार्तिकेय ! सुनो, मैं संक्षेप में बताता हूँ, पूर्व काल में युद्ध में मुश्किल से जीता जाने वाला दैत्यों का राजा त्रिपुर था. उस दैत्यराज त्रिपुर नें जब सभी देवताओं को युद्ध में परास्त कर कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया. तो ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रमुख देवगण तथा पन्नग गण मेरे पास आ कर त्रिपुर का बध करने के लिए मेरी प्रार्थना करने लगे. देवताओं की प्रार्थना सुन कर संसार की रक्षा के लिए मैं बेग से अपने धनुष के साथ सर्व देवमय भयहारी कालाग्नि नाम के दिव्य अघोर अस्त्र को ले कर दैत्य राज त्रिपुर का बध करने के लिए चल पड़ा. लेकिन उसे हम त्रिदेवों से अनेक वर प्राप्त थे, इसलिए युद्ध में लम्बा समय लगा, एक हजार दिव्य वर्षों तक लगातार क्रोद्धमय युद्ध करने से व योगाग्नि के तेज के कारण अत्यंत विह्वल हुये मेरे नेत्रों से व्याकुल हो आंसू गिरने लगे, योगमाया की अद्भुत इच्छा से निकले वो आंसू जब धरा पर गिरे और बृक्ष के रूप में उत्त्पन्न हुये, तो रुद्राक्ष के नाम से विख्यात हो गए, ये षडानन रुद्राक्ष को धारण करने से महापुण्य होता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, रुद्राक्षों के दिव्य तेज से आप कैसे दुखों से मुक्ति पा कर सुखमय जीवन जीते हुये शिव कृपा पा सकते हैं
 विद्या बुद्धि एवं सफलता प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष
विद्या,ज्ञान व बुद्धि की प्राप्ति के लिए तीन मुखी व छ: मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इसे धारण करने से तीब्र बुद्धि होती है व अद्भुत स्मरण शक्ति प्राप्त होती है, जो पढाई में कमजोर हों वे इसे अवश्य धारण करें,बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा, तीन मुखी या छ: मुखी रुद्राक्ष धारण, करने से रचनात्मक कार्यों में भी बहुत लाभ मिलता है, जैसे यदि आप फैशन डिजाइनर हो, सौन्दर्य जगत से जुड़े हो, लेखक या सम्पादक हों, चित्रकार या अनुसंधानकर्ता हों तो ये रुद्राक्ष आपको बहुत लाभ प्रदान करेंगे,
  रोजगार,व्यक्तित्व विकास एवं इन्टरवियू में सफलता हेतु रुद्राक्ष
यदि आप अपना चौमुखी विकास करना चाहते हों तो या रोजगार पाना चाहते हों तो नौ मुखी, चार मुखी या फिर तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें, इसे धारण करने से सहनशीलता,बीरता,साहस,कर्मठता में बृद्धि होती है, इसका सबसे बड़ा गुण ये भी है की ये रुद्राक्ष संकल्प शक्ति में बृद्धि करते हैं जिससे आप अपने लक्ष्य तक जरूर पहुंचते ही है, बेरोजगार या नौकरी की तलाश कर रहे व्यक्ति को इससे उत्तम रोजगार प्राप्त होता है, यदि आप बार बार इन्टरवियू में असफल हो रहे हों तो इनमेंसे कोई एक रुद्राक्ष तुरंत धारण करेने से लाभ मिलेगा, यदि आप जीवन में आगे की बजाय पीछे की और जा रहे हों तो इन रुद्राक्षों को धारण करने से उन्नति अवश्य मिलेगी
सामाजिक,पारिवारिक समस्याओं एवं विवाह सम्बन्धी समस्याओं के लिए रुद्राक्ष
यदि आपका विवाह नहीं हो पा रहा है या विवाह के बाद गृहस्थी सुखी नहीं है, आपके सम्बन्ध अपने रिश्ते नाते वालों के साथ ठीक नहीं हैं या समाज में शत्रु ही शरु हो गए हों, तो आपको दो मुखी रुद्राक्ष या गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए,इसे धारण करने से घर में होने वाले परस्पर झगड़ों से मुक्ति पाई जा सकती है, ये रुद्राक्ष पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन,गुरु शिष्य अथवा मित्रों आदि के साथ के मतभेदों को दूर करता है, लड़के लड़कियों के विवाह में अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो तो इसे जरूर धारण करवाएं लाभ मिलेगा, आप मंगलबार के दिन इनमे से कोई भी रुद्राक्ष धारण करें
 दुर्घटना से बचाव, बुरी नजर, जादू-टोनों, बुरे ग्रहों से बचाव व अपनी सुरक्षा हेतु रुद्राक्ष
यदि आप अपनी सुरक्षा को ले कर बहुत चिंतित हों, वाहन चलने से घबराते हों, बार-बार दुर्घटनाएं होती हों, कुंडली हमेशा ही कोई नीच ग्रह या बाधा बनी रहती हो, भाग्य आपका साथ न दे रहा हो, जादू-टोनों से या फिर बुरी नजर से परेशान हों, भूत प्रेत अथवा सांप चूहे छिपकली से डर लगता हो, तो आपको ग्यारह मुखी या फिर दस मुखी रुद्राक्ष धारण काना चाहिए, यदि घर में बुरे साए का वास हो जो आपको परेशान करता हो तो सभी पारिवारिक सदस्य इसे धारण करें, यदि आप पवित्रता से रख सकते हैं तो वाहन अथवा तिजोरी की चाबी में छल्ले के रूप में भी आप इसका प्रयोग कर सकते हैं
 प्रेम प्राप्ति अथवा आकर्षण हेतु रुद्राक्ष
यदि आप किसी से प्रेम करते है और चाहते है की आपका प्रेम परिणित हो अथवा आप आकर्षण प्राप्त करना चाहते हों, तो छ: मुखी या तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करें, आप थियेटर या मंच से जुड़े हुये हों, धर्माचार्य हों या शिक्षक हों, मार्केटिंग या प्रचार माधयमों जैसे टीवी रेडिओ फिल्म आदि से जुड़े हैं तो आप ये रुद्राक्ष धारण कर लाभ पा सकते हैं, आपका प्रेम सम्बन्ध यदि टूट गया है, या आपके जीवन में कोई है जिसे आप खोना नहीं चाहते तो ये रुद्राक्ष फायदेमंद रहेगा
अखंड धन लाभ एवं कार्य व्यवसाय, व्यापार से लाभ प्राप्त करने हेतु रुद्राक्ष
यदि आप व्यापारी हैं कोई व्यवसाय करते हैं, कोई कंपनी चलाते है, या कोई निजी व्यवसाय करते है जिससे आपको धन लाभ की आकांक्षा है, तो आप सातमुखी, ग्यारह मुखी,गणेश रुद्राक्ष अथवा लक्ष्मी रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं, इन रुद्राक्षों को धारण करने से गरीवी का नाश होता है, जिस व्यवसाय में आप हैं उसी से आपको लाभ मिलने लगता है, आपका यश, मान, प्रतिष्ठा ऐसी बढती है की हर ओर से धन ही धन आने लगता है,आपके जीवन के सुखों में ओर अधिक बृद्धि होती है
रोगमुक्ति, स्वास्थ्य व लम्बी आयु हेतु रुद्राक्ष
यदि आप सदा तरह-तरह के रोगों से ही घिरे रहते हों, बीमारियाँ आपका पीछा ही नहीं छोड़ रही हों, यदि आप मानसिक रूप से भी परेशान ही रहते हों, चिंताएं खाए जा रही हों, कुंडली या क्रूर ग्रह अकाल मृत्यु का संकेत दे रहे हों तो आपको चौदह मुखी या आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, अकाल मृत्यु को टालने की इनमें अभूतपूर्व क्षमता है, रोग नाश के साथ-साथ जीवन की विकट परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करता है
समाजसेवा, शासन-प्रशासन, सत्ता या राजनीती में सफलता हेतु रुद्राक्ष
 यदि आप समाज सेवी हैं और अपने कार्यों को तीब्रता से करना चाहते हैं, शासन प्रशासन में अपनी पकड मजबूत करना चाहते हैं, आप युवा नेता या गहरे राजनीतिज्ञ हैं और अपने क्षेत्र के मुकाम को हासिल करना चाहते हैं, तो आपको बारह मुखी या सात मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इससे व्यक्ति की कीर्ति, यश, सूर्य के सामान चमकने लगती है, इसे धारण करने से बाणी में चातुर्य आता है संबोधन में आकर्षण पैदा होता है, आप अपनी गहरी छाप सब पर छोड़ सकते हैं
मुसीबत से या कोर्ट कचहरी मुकद्दमों से शीघ्र मुक्ति हेतु रुद्राक्ष
यदि आप पर कोई मुसीबत आन पड़ी हो कोई रास्ता न सूझ रहा हो या आप कोर्ट कचहरी के मामलों में फँस गए हों, आपका धैर्य जबाब देने लगा हो, जीवन केवल संघर्ष ही रह गया हो, अक्सर हर जगह अपमानित ही महसूस करते हों, तो आपको सात मुखी, पंचमुखी अथवा ग्यारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने चाहियें, समस्याओं के मध्य से भी तुरंत हल निकाल आएगा



कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

बुधवार, 18 जुलाई 2018

महाकाल रुद्र मन्त्र
'Kaulantak Peeth Himalay' presents 'Maha Kal Rudra Sadhana' according to 'Kaulachar Tradition'. Presented matra being Kaulachari may seem fearful but is not to be considered any less powerful. It is impossible to imagine vast power of Mahakal Rudra - Kaulantak Peeth Himalay
'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करते हैं 'कौलाचार परम्परा' से 'महाकाल रूद्र मंत्र'। प्रस्तुत मंत्र 'कौलाचारी' होने के कारण थोड़ा डरावना प्रतीत हो सकता है किन्तु फिर भी इस मंत्र की शक्ति को कम नहीं आंकना चाहिए। महाकाल रूद्र की शक्ति का पार पाना असंभव है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

Om Hroum Vam Kshoum Joom Mahaakaala Rudaaya Hroum Hroum Hum
ॐ ह्रौं वं क्षौं जूं महाकाल रुद्राय ह्रौं ह्रौं हुं

शनिवार, 26 मई 2018

महाकाल रुद्र साधना
जब जीवन को समझने का आप प्रयास करेंगे, तो पाएंगे कि जीवन समझ से पर है। यहाँ हर कोई रोता है.……हर कोई। कोई राजा हो कर रो रहा है, तो कोई भिखारी हो कर। कोई प्रेमी हो कर रो रहा है, तो कोई योगी हो कर। ये रुदन दुःख का रुदन है, जीवन में अभावों का रुदन है। ये अज्ञान का रुदन है, ये अभाव और अपूर्णता का रुदन है। कौन है इस रुदन के पीछे? कौन है जो रो रहा है? कंदन कर रहा है? हम यदि जीवात्माएं हैं, तो क्या इतनी भीड़ होने पर भी अकेली ही रह जाएँगी? क्या ये कष्ट ये पीड़ाएँ, मृत्यु के साथ ही खो जाएँगी। दर्द से तो ये ब्रह्माण्ड भी कराह रहा है। रुदन तो ग्रह, आकाश गंगायें भी कर रही हैं। पीड़ा तो हर तत्व की अपनी-अपनी है। इन सबके मूल में है शिव की एक ऐसी शक्ति, जो स्वयं रुदन का प्राकट्य है जिसे कहते है 'रूद्र'। शिव का वो स्वरुप जो काल को संचालित कर रहा है वही अभिन्न रूप से 'रूद्र' है। इसलिए महान ज्ञाताओं नें इसे 'महाकाल रूद्र' के नाम की संज्ञा दी है। ये रूद्र तो ब्रह्माण्ड के नित्य रुदन को हर कर उसे शांति और आनंद प्रदान करता है। जिस कारण ये सृष्टि आगे बढ़ रही है। ऐसे में जीवात्मा की स्थिति भी बेहद बुरी है। जो अज्ञानी है वो ज्ञानी होना चाहता है। जो ज्ञानी हो गया, वो ज्ञान से मुक्त हो अज्ञानी होने का अवसर देखता है। जो योगी नहीं वो, योगी को समझाते हैं कि तुमको कैसा होना चाहिए? जो योगी हैं वो योगी जैसे रहना नहीं चाहते। यहाँ नित्य युद्ध है.…नित्य युद्ध। कुछ उसे मीठी बातों, काल्पनिक धर्मों, कृत्रिम प्रेम और भ्रम युक्त आनंद से ढक लेना चाहते हैं। क्योंकि इस रुदन का सामना करने का उनमें साहस नहीं। वो वो तर्क से, आँखें और बुद्धि बंद कर इसका हल खोजते हैं। लेकिन क्या जीवन के संकट, जीवन की अपूर्णता इससे समाप्त हो जाएगी? नहीं ! अभी तो दुःख, शोक, पीड़ा के कुछ ही रूपों से तुम परिचित हो! ये तो अनंत है। ऐसे में ना तो भयभीत हो कर हल मिलेगा और न ही निर्भय हो कर इसका हल होगा। एक रास्ता है जिसकी आलोचना नास्तिक योगी और बुद्धिवादी अक्सर करते हैं, लेकिन समस्त तर्कों और आलोचनाओं के बाद भी वो मार्ग अब तक सबसे सही और सटीक निकला। वो मार्ग है साधना का मार्ग।
इस खोज के पथ पर बढ़ने का साहस हर किसी के बस का नहीं है। यहाँ तो बड़े-बड़े धुरंधर भी भाग खड़े होते हैं। लेकिन शिव भक्तों की बात ही निराली है। वो शिव के मार्ग पर चलते हैं और अपने शिव की ऐसी साधनाएं करते हैं कि सत्य प्रकट हुए बिना रह नहीं पाता। जीवन के अभाव, जीवन की कमजोरियां, दुःख और पीड़ाएँ उस साधक के सम्मुख ठहर कहाँ सकती हैं जिसनें 'महाकाल रूद्र' की शरण ले रखी हो। आस्तिक योगी 'काल ग्रंथी' के भीतर इसी 'महाकाल रूद्र' की शक्ति को भेदन कर प्राप्त करता है और साधक साधना के मंत्र मार्ग द्वारा। 'कौलान्तक परंपरा' में योगियों नें योग और मंत्र की विपरीत साधनाओं को आपस में ऐसे गूंथ लिया की देखने वाला भी हतप्रभ रह जाए। 'महाकाल रूद्र' की साधना कोई सरल कार्य नहीं है। किन्तु यदि आपको स्वयं 'महाकाल रूद्र' इसके निमित्त चुनते हैं तो आप इस मार्ग पर कदम बढ़ा पाते हैं। ये याद रखना चाहिए की ये कोई आम प्रवचन या योगशाला नहीं है साधना का रणक्षेत्र है। आप इन साधनाओं को तभी प्राप्त कर पाते हैं जब वो समय आ जाता है। अन्यथा लौटने वाले तो मीठी पानी की झील के किनारे पहुँच कर भी प्यासे लौट जाते हैं। इष्ट पर विश्वास नहीं, गुरु पर विश्वास नहीं तो इस पथ के बारे में सोचना भी नहीं। जब जीवन में कृत्रिम धर्म, अध्यात्म से मन भर जाए और भीतरी रुदन शुरू हो तभी 'महाकाल रूद्र' कृपा करते हैं। यदि आपकी स्थिति ऐसी है। आपको अब ना विज्ञान, ना ज्ञान, ना धर्म, ना संसार ठीक लगता हो, तो समय है इस साधना के पथ पर चल कर 'महाकाल रूद्र' की सत्ता से जुड़ने का। इस संसार से अलग 'कौलान्तक पीठ' का अपना एक संसार है। जिसमें रहने के लिए आपको हमारे सभी नियमों को मानना ही होगा। क्योंकि हमारा ज्ञान परम्पराओं पर आधारित है, हम उनका पालन हर हाल में करेंगे। बाहरी कलियुगी संसार से लोग अपनी विकृत मानसिकता ले कर यहाँ आते हैं तो भी हमारा प्रयास उनकी सहायता का रहता है। लेकिन सब 'महाकाल रूद्र' पर ही निर्भर करता है। 'महाकाल रूद्रसाधना' में व कौलान्तक पीठ की परंपरा में, बहुत सी बाते अवैज्ञानिक, अतार्किक व रूढ़िवादी है। जिनको हमारे आलोचक अन्धविश्वास व फर्जीवाड़ा भी कहते है। - कौलान्तक पीठ हिमालय

शुक्रवार, 25 मई 2018

योग कौशल
अगर आप घेरण्ड द्वारा प्रणीत योग को देखेंगे जिसे लोगोँ ने नकार दिया ! आखिर क्योँ नकारा ? क्या आपको ये मालूम है ? हठयोग को आखिर बल क्योँ मिलता गया ? और दर्शन अर्थात् philosophy मेँ केवल पतञ्जल की philosophy को इतना अधिक महत्व क्योँ दिया गया ? योग तो आपने बहुत लोगोँ से सीखा होगा, बहुत लोगोँ को आप योग करते देखते होंगे तब भी बहुत से लोग कौलान्तक पीठ आकर योग सीखना चाहते है ! क्योँकि हम योग को आपके सम्मुख अपने अंदाज मेँ लेकर आते है...वो अंदाज मेरा नहीँ है ! वो अंदाज है "देवाधिदेव महादेव" का ! वो है महादेव की सनातन परंपरा से आया हुआ योग; जो उन्होनेँ आगम के द्वारा निगम को अर्थात् माँ पार्वती को दिया ! और तभी से अनेकोँ ऋषि-मुनियोँ के द्वारा ये योग की धारा युँ ही बहती हुई इस पीठ मेँ आगे बढती आ रही है ।

आप कहेंगे, 'योग तो मैने अपने गुरु से भी सीखा है ! योग करते हुए तो हमने अन्य योगियोँ को भी देखा है । योग की बातेँ तो हमने भी हजार सुनी है और योग की कई पुस्तकेँ चाहे घेरण्ड योग हो, चाहे हठयोग प्रदीपिका हो, चाहे पतञ्जल योग हो, चाहे शिवसूत्र हो कोई भी योग से सम्बन्धित पुस्तक हो हमने जरुर पढी है... तो फिर कौलान्तक पीठ मेँ आकर वही पुस्तक और वही योग फिर से सीखने की क्या जरुरत ? आप कोई भी बडे से बडे योगी हो लेकिन तब तक अधूरे है जब तक आपने कौलान्तक पीठ मेँ योग की उस महादेव के द्वारा प्रदत्त उस परंपरा को देखा न हो जो उनके द्वारा बडी कठोरता से स्थापित की गयी है ! जहाँ संपूर्ण योग और उसके अस्तित्त्व को निचोडकर अर्क बनाकर के रखा गया है ताकि आप उस योग के बने हुए अर्क का सेवन कर योग के परम ज्ञान को उपलब्ध होकर, "महायोगी" बनकर समाधि की ओर जा सके, पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर सके ! - ईशपुत्र
वीरभद्र मन्त्र
'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करता है 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' की तंत्रमय आवाज में, शिव के प्रखरतम गण, दक्ष प्रजापति शिरोसंधानक 'श्री वीरभद्र' का तांत्रिक मंत्र'। इस मंत्र से ऊपर क्या हो सकता है? ये मंत्र बेहद तीब्र और शक्तिशाली माना गया है। सकल बाधा हरने वाले इस मंत्र को 'वीर भाव' से ही किया जाता है। आप सभी 'कौलान्तक पीठ' के भैरव-भैरवियाँ इस मंत्र की प्रखरता, विधि व महत्त्व को तो जानते ही है। तो ऊँची ध्वनि में सुनने योग्य इस वीर मंत्र का श्रवण कीजिये-कौलान्तकपीठ टीम-हिमालय।
'ॐ ड्रं ह्रौं बं जूं बं हूं बं स: बीर वीरभद्राय प्रस्फुर प्रज्वल आवेशय जाग्रय विध्वंसय क्रुद्धगणाय हुं'
"Om dram hroum bam joom bam hoom bam sah bir veerbhadraaya prasfura prajwala aaveshaya jaagraya vidhvamsaya kruddhagannaaya hoom"
वीरभद्र मन्त्र

बुधवार, 16 मई 2018

 कौल तन्त्र और वज्रयान तन्त्र
प्रश्न: तो हमारे तन्त्र और उनके (वज्रयान) तन्त्र मेँ क्या भिन्नता है ?
ईशपुत्र: अन्तर है । अन्तर कहाँ हो जाता है? हम मूलतया शिव और शक्ति को प्रमुख रखते है । क्यों ? क्योंकि हमारे पंथ की शुरुआत-प्रारम्भ स्वयं महादेव ने किया लेकिन वहां उनके सम्प्रदाय की शुरुआत महादेव ने स्वयं ने नहीं की है अपितु हमारे ही सम्प्रदाय से, मै उनका नाम नहीं लेना चाहता, फिर भी यदि आप जिज्ञासु लोग है और स्वयं खोजेंगे तो आपको ऐसे सिद्धों के नाम मिल जाएंगे जो हमारे ही हिमालय के योगी "सिद्ध-परम्परा" के बहुत पहले से सिद्ध थे लेकिन, निजी स्वार्थ होता है, राजनीति कहाँ नहीँ रहती ! धर्म और गद्दियों मेँ भी तो राजनीति है ! प्राचीन काल में हमारे सम्प्रदाय की प्रचलित बहुत महत्वपूर्ण कथा है कि, बहुत से सिद्धों ने हमारे ही पंथ से बगावत की । होता है...हर सम्प्रदाय में जो विशालकाय सम्प्रदाय हो वहां सब व्यक्तियों का तुष्टिकरण नहीं हो सकता और हमारे पंथ में पीठाधीश्वर बनने के नियम जितने कठिन है जितने जटिल है शायद ही किसी और पंथ और धर्म में ऐसे हो । ऐसा लगता है जब हम तैयारी करते है, कि मानो हम किसी युद्ध पर जानेवाले हो ! युद्धस्तर पर हम तैयारियां करते है तब जाकर के एक पीठाधीश्वर का युद्ध लड के उसकी गद्दी तक पहुंचना होता है । जबकि आज आप किसी भी सम्प्रदाय को देख लीजिए किसी भी गद्दी को, बस आपको सेवा ही करनी है और आपका नम्बर लग जायेगा और आप पीठाधीश्वर बन जाएंगे, लेकिन यहां ऐसा नहीं चलता... तो प्राचीन काल मेँ... जैसे मान लीजिए मेरा आश्रम है अब यहां पचास लोग होंगे, अब पचास के पचास तो पीठाधीश्वर नहीं बन सकते! तो एक व्यक्ति जब पीठाधीश्वर बनता है तो उसके साथ के दो-तीन उसके जो प्रतिस्पर्धी होते है उन्हें लगता है कि 'अरे ! हम मेँ इस से अधिक योग्यता थी !' और योग्यता तो सिद्ध कर के होती है ना ! जब वो अपनी योग्यता सिद्ध नहीं कर पाते तो वो पीठ का परित्याग कर देते है ! उसे हम असंतुष्ट लोग कहते है, मोहभंग जिन लोगों का हो जाता है... तो ऐसे ही सिद्ध प्राचीन काल मेँ भी रहे जिनका मोहभंग हो गया तब वो "कौलान्तक सम्प्रदाय" को और "महाहिन्दू पंथ" को निशाना बनाने के लिए तत्त्व ढूंढने लगे ! मै आज आपको दो "रहस्य" बता रहा हूं ! प्रथम रहस्य ये है कि यदि आप हमारे ही "हिन्दू धर्म" के वेद, पुराण, शास्त्रों और ग्रंथों को भी देखेंगे, उस मेँ से एक शब्द हटा ही दिया गया है वो है "हिन्दू" ! आप यदि हमारे पुराण, वेद, शास्त्र पढ़ेंगे वहां आपको "हिन्दू" नाम का शब्द बहुत ही कम इक्का-दुक्का स्थानों में ही देखने को मिलेगा ! वो शब्द कैसे हटाया गया ? इसमें कुछ ब्राह्मणों का षड्यंत्र था ! सभी ब्राह्मणों का नहीं क्योंकि ब्राह्मण तो इस पंथ को और इस विद्या को आगे पहुंचाने वाले है और वहां कुछ ब्राह्मणों के कारण और उन असंतुष्ट ब्राह्मणों और असंतुष्ट हमारी पीठ से गये सिद्धों ने मिलकर कई अन्य सम्प्रदाय खडे किए ! और उन्हीं अलग-अलग संप्रदायों का फिर अलग-अलग राग था ! क्योंकि देखिए जब आपको हम से अलग होना होगा...मान लीजिए आज आप हमारे भक्त है, कल को अगर आप को हमारा शत्रु बनना पड़े तो आप छोटी-छोटी बात कहेंगे जैसे कि इस व्यक्ति का चरित्र ठीक नहीं ! ये व्यक्ति शक्तिशाली नहीं ! ये व्यक्ति तपस्वी नहीं ! इस व्यक्ति मेँ कोई ज्ञान नहीं इत्यादि-इत्यादि...तो ठीक वैसे ही हुआ जब हमारे यहां से वो सिद्ध जो किसी स्थिति पर न पहुंच सके वो जाकर अन्य धर्मों मेँ मिल गये !

प्रश्न : तो क्या भविष्य में बौद्ध पंथ का अंत हो जाएगा ? जैसा कि वैष्णव ग्रंथों में कहा गया है ?
ईशपुत्र : मैने भी अपने गुरुओं से सुना है और जो वैष्णव ग्रंथ है हमारे भारतवर्ष के...उनमें विवरण दिया गया है कि "बौद्ध पंथ का अन्त हो जायेगा ।" लेकिन मैं इस वृत्ति का पीठाधीश्वर नहीं हूं । कारण ये है कि चाहे जो भी हो वो हमारे गर्भ से निकले हुए लोग है, हमारी संतानें है, हमारे पुत्र है । मैं बौद्ध धर्म की प्रत्येक शाखा को अपना पुत्र ही मानता हूं । बुद्ध से लेकर अभी तक जितने भी अलग अलग उनके प्रमुख लोग हुए है पैदा...उन सबको मैं अपना पुत्रवत् मानता हूं, छोटा मानता हूं और उनकी रक्षा करना अपना "धर्म" मानता हूं । लेकिन ये सब तभी तक सहा जा सकता है जब तक आप एक सीमा से बाहर ना जाओ । भगवान श्रीकृष्ण को जब तक एक साथ सौ गालियां नहीं दी गयी वो मुस्कुराते रहे...ठीक मेरा भी वही सिद्धांत है । सभी बौद्ध धर्म के मतावलंबी एक जैसे नहीं है... हमारी पीठ...क्योंकि ये भगवती माँ कुरुकुल्ला की पीठ है जिनको रक्त तारा अथवा रेड तारा कहा जाता है...तो दुनियाभर से लोग जो बौद्ध धर्म के माननेवाले है वो पीठ मेँ आते है और वो अपनी पद्धति से पूजा-पाठ करते है...अपने मंत्रों से,अपने तौर तरीकों से । हमने उन्हें कभी नहीं रोका...हम ये कहते ही नहीं की भगवती हमारी है । हम कौन होते है कहनेवाले ? ये तो जगत की है, ब्रह्मांड की है, जो आयेगा उसकी माँ है और जो चाहे आकर इनसे वरदान पाए क्योंकि ये तो चमत्कारों की देवी मानी जाती है । अनेकों चमत्कार इनके द्वार पर है और एक क्षण मेँ किसी का भी किस्मत बदलने का मादा रखती है अन्यथा इनकी अनुकंपा नहीं होती तो मेरे जैसा एक गांव का अतिशून्य परिवार मेँ पैदा हुआ व्यक्ति प्रखरतम मस्तिष्क प्राप्त करके सर्वोच्च पदवी तक जाने की सामर्थ्य नहीं रखता था । तो ये केवल भगवती की प्रेरणा से हुआ । तो बौद्ध मत के लोग भी यहां आते है । कुछ अच्छे लोग भी वहां है...तो हमने उन्हें कभी नहीं रोका...इसीलिए मै ये नहीं चाहता कि बौद्ध धर्म का कभी अन्त हो और बौद्ध धर्म को नष्ट किया जाए ! मै तो उनकी ओर "मैत्री" का हाथ बढाना चाहता हूं ! मै उनसे प्रेम करता हुँ ! मैँ तो ये कहता हुँ कि तुम लौट आओ अपने घर ! लेकिन इसका अर्थ ये नहीँ कि तुम बौद्ध पंथ को छोड दो, तुम बुद्ध को मानना छोड दो या तुम अपनी मिश्राचारी पद्धति को अपनाना छोड दो लेकिन अपनी मौलिक परम्परा से जुड जाओ । बडा लंबा समय हो गया है तुमने अपना घर छोड दिया है और तुम घर से बाहर भटक रहे हो । सुबह का भूला यदि सन्ध्या के समय घर लौट आये तो उसे भूला नहीँ कहा जाता ये हमारी भारतीय कहावत है...तो मेरा तो खुले ह्रदय से उनका स्वागत है, मेरा तो "मैत्रीपूर्ण हाथ" उनकी और मैने बढाया है...और ऐसा पहली बार होगा क्योँकि मुझसे पूर्व शंकराचार्य इस पृथ्वी पर आये, उनके जैसा धुरंधर व्यक्तित्व..जिससमय बौद्ध धर्म का तन्त्रयान पूरे देश मेँ फैल चूका था । हर ओर केवल एक ही नारा था "बुद्धं शरणं गच्छामि ।" जिस समय हर ओर, हर समय, हर दिशा मेँ ब्राह्मणोँ का अपयश फैल रहा था । लोग ब्राह्मणवाद को, वेदोँ को गलत कह रहे थे, पुराणोँ को गलत कह रहे थे और जहाँ भी ब्राह्मण दिखते उनको हटा देने, गिरा देने, नष्ट कर देने पर तुले हुए थे...तब भी एक सिँह की भाँति एक संन्यासी नेँ संपूर्ण पृथ्वी पर भारत पर से उस बौद्ध धर्म को इस प्रकार खदेडा कि भारत मेँ आपको देखने को ही बौद्ध धर्म नहीँ मिलता । बहुत चंद लोग मध्य मेँ रहते है और बाकी देश की सीमाओँ से बाहर रहते है जिन्हे खदेड दिया गया लेकिन मैँ खदेडने नहीँ आया हुँ ! और ना ही खदेडने की बात करता हुँ ! अभी तक जो भी आये उन्होँने बौद्ध धर्म को हटाने की ही बात की । मैँ प्रथम पुरुष हुँ जो उनकी ओर हाथ पुनः बढा रहा है । मैँ कहता हुँ मैने "मैत्री" का हाथ बढाया है तो तुम्हे मेरे हाथोँ मेँ हाथ देना चाहिए । तुम्हे अपनी मौलिक परम्परा मेँ लौटना चाहिए । तुम्हेँ शिव और शक्ति की निन्दा छोडकर मौलिकरुप से साधना समझनी चाहिए क्योँकि जीवन लडनेँ के लिए नहीँ है । जीवन बहुत छोटा है । उस जीवन को स्थायीत्व प्राप्ति के लिए, पूर्णता प्राप्ति के लिए हमेँ मौलिकरुप से साधना करनी चाहिए यही मेरा प्रस्ताव भी है और ऐसा उनको समझना भी चाहिए ।


विष्णु भैरव जी : याने कि आप "मैत्रीय प्रस्ताव" आगे बढाना चाहते हो ?
ईशपुत्र : बिलकुल, मेरा केवल उतना ही मन्तव्य है क्योँकि बौद्ध धर्म आज एक सुंदर रुप मेँ पनप रहा है...उसका कारण ये है कि अधिकांश परंपराएँ हम से ली गयी है...मैने तो ये भी नहीँ कहा कि, "चुराई गयी है !" मै तो कह रहा हुँ, "ली गयी है !"  क्योँकि उनके प्रमुख जो रहे आप उनको गौर से खोजिए तो आपको पता चलेगा की वो "सिद्ध" रहे है सारे के सारे । चौरासी सिद्ध होँ या अन्य सिद्ध होँ या उप सिद्ध होँ या महा सिद्ध होँ या हिमालय के योगी हो वो भारत के ही किसी प्रान्त से, कसबे से निकले है और जाकर उन्होँने बौद्ध पंथ मेँ जाकर के वो ज्ञान आगे बढाया है । तो वो सब मेरे लिए अनुज है, छोटे है तो मैँ उनको कभी हानि कैसे पहुँचा सकता हुँ और वैसे भी भारत की ऐसी मंशा कभी नहीँ रही । महामहिम दलाई लामा एक पंथ के प्रमुख है और हमारे ही हिमाचल प्रदेश मेँ उनको स्थान दिया गया है । आपने क्या कभी देखा कि हमने उन्हेँ किसी प्रकार से हानि पहुँचाई ? यहाँ तक कि जब तिब्बती समुदाय को कोई हानि पहुँचाई जाती है तब भी हमारा वरद हस्त उन पर रहेता है कि इनको कोई कष्ट ना पहुँचाओ क्योँकि हम उन्हेँ शिष्य की भाँति मानते है । ये बात अलग है कि उनमेँ से कुछ उद्दडं तत्व है जो हमेँ शत्रु की निगाह से देख रहे है...तो यदि तुम शत्रुता करोगे तो विपरित हो सकता है, मैँ अपना हाथ तुम्हारे उपर से खिंच लुंगा । मेरा कोई समर्थन तुम्हारी तरफ नहीँ रहेगा और मैँ तुम्हारे लिए कोई मंगल काम नहीँ करनेवाला हालाँकि मैँ कर रहा हुँ, विश्व के लिए कर रहा हुँ वो मैँ छोडुंगा नहीँ वो मेरी आदत है लेकिन यदि तुम "असत्य" कहोगे शिव के विरुद्ध कहोगे शक्ति के विरुद्ध कहोगे तो तुम्हारा विनाश होगा ! और शायद यही कारण है कि वैष्णव पंथ इस प्रकार की भविष्यवाणी करता है कि भविष्य मेँ बौद्ध संप्रदाय का अंत हो जायेगा लेकिन मैँ ये भविष्यवाणी करना चाहता हुँ कि इस तरह का अंत ना हो !! वहाँ से केवल उन लोगोँ का अंत हो जो नीच है, निकृष्ट है, शिवनिन्दक है, शक्ति के निन्दक है और जो वहाँ राजनीति कर रहे है..बौद्ध धर्म, तंत्र और कुलाचार, कौलाचार, समयाचार के नाम पे..उनको शान्त रहना चाहिए और मेरे "मैत्रीय प्रस्ताव" को स्वीकार करना चाहिए क्योँकि मेरा "मैत्रीय प्रस्ताव" पूर्वसुनियोजित है और मैँ चाहता हुँ कि वो "प्रकृति के इशारे" को समझे और अपने घर को वापिस लौट आये और अपनी साधनाओँ को आगे बढाते हुए जीवन को सुखमय करे । 
ज्ञान का अभिमान - मूढता
ज्ञान मनुष्य की शोभा है और ज्ञान ही चेतना का विकास भी, लेकिन यही ज्ञान कब और कैसे साधक के लिए घातक हो जाता है ? क्योँ साधक का ज्ञान मस्तिष्क मेँ मचाता है घमासान ? इस मुसीबत से बचने का क्या है उपाय ?

ज्ञान का अभिमान - मूढता >>>

प्रणाम ! मैँ हुँ महायोगी सत्येन्द्र नाथ, साधक के जीवन में अनेकोँ उतार चढ़ाव आते है । और मनुष्य उन उतार चढावोँ के बीच में से गुजरता हुआ अपनी चेतना का विकास करता है । चेतना के विकास में जहाँ उसका कर्म उसका सहयोगी होता है, वहीं ज्ञान भी उसका सहयोगी होता है, लेकिन कर्म और ज्ञान की इस प्रक्रिया में बहुत सी जटिलताएँ है, उनमें से एक सबसे प्रमुख जटिलता है -
ज्ञान का एक अनूठा गुप्त अहंकार । जब बालक छोटा होता है तभी से लेकर वो सीखना शुरु करता है और अपने जीवन के हर क्षण, हर पल वो कुछ न कुछ ग्रहण करता रहता है, उसका लगातार सीखना ही उसे विस्तृत चेतना से जोड़ता चला जाता है, लेकिन धीरे-धीरे जब ज्ञान का जब ये प्रवाह आगे बढ़ता है, तो ये अपने मुख्य बिन्दू मेँ से च्युत होने लगता है, अपने मुख्य मार्ग में से ये धारा अलग होकर बहने लगती है, और ये अलग धारा ही चेतना की विकसित होने वाली नदी को सुखा डालती है ।
ये ठीक वैसा ही है, मानो हिमालय से कोई नदी शुरू हुई बहुत बड़ी और विस्तृत होती चली जा रही है और अंत में वो शाखाओं में विभक्त हो जाये और समुद्र तक पहुंच ही न सके । छोटी धाराएँ अक्सर टूट जाती हैं और सूख जाती है, ठीक वैसा ही ये ज्ञान है । जब मनुष्य भौतिक संसार में ये ज्ञान ग्रहण करता है और बाह्य उपादानों के माध्यम से, अनेक स्त्रोतों के माध्यम से ज्ञान अर्जित करने की चेष्ठा करता है, तो उसके भीतर उसके साथ-साथ उसमें से गुजरते हुए अनेकोँ तरह के अवयव और तत्व उसके साथ जुड़ते जाते हैं, जो उसकी इस अविरलता को-निश्चलता को-निरंतरता को बाधित कर देते हैं, ये ठीक वैसे ही है, जैसे पानी का गन्दा होते चले जाना अथवा रेगिस्तान के रेत में पानी का समा जाना और समाप्त हो जाना ।
जब हम आध्यात्म के बारे मेँ जिज्ञासा करते हैं, तो किसी योगी के बारे में पढ़ते हैं । किसी ऋषि- मुनि के बारे में पढ़ते है । किसी व्यक्तिविशेष के बारे में या ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के बारे मेँ पढ़ते हैं जो परमात्मा से जुडा हुआ हो और फिर हम अपने धर्मग्रन्थों का अध्ययन करते है, लेकिन धीरे- धीरे हम उन बातों से बन्धते चले जाते हैं और कई बार तो हम इतनी हद कर देते हैं कि हम वास्तविक खोज नहीँ करते हैं हमेँ लगने लगता है कि मैने अमूक ग्रंथ में ये पढ़ रखा है, तो बस केबल यही सत्य होगा । और कई बार ये विषय इतने अधिक गंभीर हो जाते हैं कि सोचना पड़ जाता है कि ग्रन्थ या वाक्य प्रधान है अथवा अनुभूति प्रधान है । एक अधकचरा ज्ञानी, अगर किसी पुराण में ये लिखा होँ कि अमूक मंत्र है, इस मंत्र में चार बार "ह्रीं" शब्द का उच्चारण होना चाहिए, जैसे- ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं..... लेकिन यदि वो कहीं दूसरे स्थान पर, दूसरी जगह जाकर ये देख ले कि उस मंत्र का उच्चारण चार बार "ह्रीं" की जगह केबल दो बार ही ह्रीं हो रहा है, तो उसके भीतर का वो नकली तथाकथित ज्ञान, वो कुलबुलाहट करने लगेगा, उसके पेट में मानो मरोड़ उठने लगेंगे, उसका वो कथित ज्ञान उसके अहंकार को इस तरह से बढ़ा देता है कि वो तत्क्षण अपना संयम खो देता है और उसे लगने लगता है - 'अरे वाह ! यह आदमी तो सरासर गलत बात कह रहा है क्योंकि मैँ जो जानता हूँ वही सत्य है', और कई बार बात इससे आगे बढ़ जाती है और साधक उस व्यक्ति के पास पहुंच जाता है कि- "भाई साहब! आपने चार बार "ह्रीं" की जगह केबल दो बार लगाया", वो ये बात भूल जाता है कि सामने वाले व्यक्ति का "स्तर" क्या है ! उसकी साधना कैसी है ! उसकी रीत क्या है ! उसके गुरू कौन है ! वो ये सब नही देखना चाहता, वो तो केबल "लकीर का फकीर" है| उसने सुन लिया है, या उसने पढ़ लिया है कि वहाँ केबल चार बार "ह्रीं" लगा है |
जैसे कुछ लोग इस बात पर लगातार विवाद करते रहते हैं कि कुछ मंत्रों में जो "तंत्रोक्त मंत्र" है, वहाँ "प्रणव" - "ॐकार" नहीं लगता और अधिकांश "आगम-निगम ग्रंथों" में इसका विवरण भी है कि बहोत से मंत्रों के आगे उद्गीथ-प्रणव और इस प्रकार की जो व्याहृतियाँ हैं भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ..... इस प्रकार की व्याहृतियोँ को नहीँ जोड़ा जाता, लेकिन कालान्तर में कुछ सम्प्रदाय ऐसे हुए, जब "सिद्ध गुरूओं" नेँ उन कीलित मंत्रों के उत्कीलन के लिए प्रणव और अन्य बीज मंत्रों के सम्पुट लगाये, और उसके बाद जो मंत्र बना, उसमें प्रणव था-उद्गीथ था, तो "ॐकार" का होना नहीँ होना कोई लड़ाई का विषय नहीँ हो सकता, ये तथाकथित ज्ञान हो सकता है, लेकिन हम उस "ॐकार" के पीछे या उस "ह्रींकार" के पीछे किसी व्यक्ति विशेष को ये कह दें कि तुम गलत साधना कर रहे हो ये केबल अन्धा ज्ञान ही है । ये वो ज्ञान है , जो ज्ञान जैसा भासता है, लेकिन ज्ञान नहीँ है । ये ठीक मनघढंत तथ्य है । जैसे- मान लीजिए कि आप किसी रात किसी सूनसान जंगल में से गुजरने वाले हो, लेकिन उससे पहले आप अपने मित्र के घर बैठे होँ और मित्र ये कह दे कि मैने सुना है "पाँच हजार साल पुरानी एक कहानी मेँ कहा गया है कि जिस जंगल मेँ से तुम गुजरने वाले होँ वहाँ एक विशालकाय डायनासोर रहता है और जब तुम उस जंगल के बीच में से जाओगे, तो वो तुम्हें खा सकता है ।" अब तुम ये भली प्रकार जानते हो कि डायनासोर आज के युग में है ही नहीं, तो अब यदि तुम उस बन में से गुजरते हुए ये सोचने लग जाओ कि 'ये तो वही डायनासोर का जंगल है, अब डायनासोर आकर मुझे खा जायेगा', तो ये मूढ़ता है | ठीक उसी तरह यदि 5000 साल पहले किसी गुरू ने कहा कि इस मंत्र में "ॐकार" नहीं लगता और आज तुम 5000 साल के बाद इस बात का दावा कर रहे हो कि मैने वो पुस्तक पढ़ी है, अथवा अमूक गुरू को सुना है, उसने कहा कि इस मंत्र में "ॐकार" नहीँ लगेगा और तुम उसके लिए दावा ठोको, तो याद रखना तुमसे बड़ा "मूर्ख" इस पृथ्वी पर नहीँ हो सकता क्योंकि तुम ठीक वैसी ही बात पर यकिन कर रहे हो कि किसी नेँ कह दिया कि अगर तुम गंदी नाली का पानी भी पी लेते हो तो तुम्हें रोग नहीँ लगने वाले । ये हो सकता है कि गंदी नाली का पानी लेने के बाद तुम्हारे शरीर के भीतर की प्रतिरोधक क्षमता उस गंदगी से लड़ती रहे-लडती रहे लेकिन अगर तुम निरन्तर उस जल का सेबन करते रहोगे तो लम्बे समय तक रोगों से बचे रहना फिर कदापि संभव नहीँ,
इसलिए मूढ़ताओं का परित्याग करना बड़ा अनिवार्य है, इसलिए "गुरूगम्य साधनाओं" में जाना बड़ा अनिवार्य है, अन्यथा ये कथित "ज्ञान" बुरी तरह भ्रमित कर सकता है । और यदि इस "ज्ञान" में उतनी सार्थकता होती, तो वो जिस क्षण तुमने उस "मंत्र" को पढ़ लिया और जिस क्षण वो "ज्ञान" तुम्हे प्राप्त हो गया, तो तुम्हारा रूपांतरण तो तत्क्षण हो जाना चाहिए । तुम उस "मंत्र" को जानते हो तुम उस "ज्ञान" को भी जानते हो लेकिन क्या तुम्हारा रूपांतपण हुआ ? नहीँ । तुम्हारा स्वयं का रूपांतरण नहीँ हुआ, लेकिन तुम दूसरे को सिखाने चलते हो कि ये "ज्ञान" गलत है, तो ये "आध्यात्म - मार्ग" कि एक ऐसी बड़ी बाधा है जिसके बारे में तुम्हे स्वयं को , स्वयमेव ही सूचित करना होगा , स्वयं को स्वयं ही सतर्क करना होगा, क्योंकि यदि तुम इस मूढ़ता में पड़ गये , तो "वास्तविक ज्ञान के मार्ग की तलाश" बन्द कर दोगे । जिसके मन में साधना की ललक होती है, जिसके मन में अध्यात्म की ललक होती है, वो प्रश्न नहीँ करता, जो गुरुओँ के पास जाता है, वो केवल विसर्जन कर देता है । गुरु के पास जाना, फिर अपने तथाकथित ज्ञान के तराजू पे उनको तौलने लग जाना, ये पृथ्वीलोक पर सबसे घृणित और कुत्सित कर्म 'आध्यात्म' में माना जाता है । पृथ्वी पर जो बड़े से बड़ा पापाचार है तुम उसकी तुलना करो और दूसरे तराजू पर इस बात की कल्पना करो कि तुम किसी गुरु के पास जाते हो और उनका आँकलन अपनी बुद्धि और विवेक से करते हो, तो वो दोनो पाप समान्तर होते है ।
गुरु की तलाश में तुम्हे बुद्धि का प्रयोग अवश्य करना चाहिए लेकिन जब तुम दैवयोग से उनके श्रीचरणों में पहुँच जाओ तो इस तथाकथित ज्ञान को एक ओर रखना बड़ा अनिवार्य है; वरना तुम गुरु के शरीर को देखोगे, उनके क्रिया-कलाप को देखोगे, उनके आसपास के वातावरण और लोगों को देखोगे, गुरू के विषय में लोग क्या कहते हैं-समाज क्या कहते हैं ये सब सुनने लग जाओगे...याद रखना इन सब बातों से आध्यात्म का कोई लेना देना नहीँ है । जो व्यक्ति जानकार है, जो व्यक्ति किसी तथ्य को जानता है, वह सरलता से तुम्हेँ उपलब्ध नहीँ होने वाला और ना ही वो सरलता से तुम्हें कुछ देने वाला है, इसे जरा गंभीरता से समझना, ये साधना मार्ग की एक बड़ी अद्भुद सी अड़चन है ।
एक शिष्य जब पहली बार किसी गुरु से मिलता है, तो वो पूरी तैयारी करके गया होता है कि मै गुरु से ये प्रश्न करुँगा । मै गुरु को देखुँगा, उनके बारे में जानकारीयाँ प्राप्त करुँगा, वो कौन हैं ? कहाँ से पैदा हुए हैं ? उनका वातावरण क्या है ? उनका ज्ञान कैसा है ? वो कितने तपस्वी हैं ? किस तरह की सिद्धियाँ उनके पास हैं ? क्या वो मेरे लायक है या नहीँ है ? ये सब बातें एक तरफ व्यक्ति के मन में रहती हैं और दूसरी ओर यदि गुरु सिद्ध है, गुरु अपने आप मेँ पूर्ण चौंसठ कला सम्पन्न हैं, तो वो भली प्रकार बड़ी बारीकी से तुम्हारी एक-एक हरकत को देख रहे हैं । तुम क्या सोचते हो, तुम क्या कहना चाहते हो, तुम्हारे स्वार्थ क्या हैं , तुम्हारी बुद्धि क्या है, ये सब गुरु पहले से पढ़ रहे हैं । अब जब तुम उनके सम्मुख जाते हो, तो तुम अपना बुद्धिबल का प्रयोग करना चाहते हो, अपना कौशल दिखाना चाहते हो, अपना चातुर्य दिखाते हो, और गुरु ! वो न तो कोई चातुर्य दिखाते, वो केवल मौन रहते हैं और तुम्हें वो सब करने देते है, जो भी तुम कर सकते हो और इस उलझन के बीच वास्तविक ज्ञान तो खो जाता है ।...
एक तो पहले ही जीवन में समय कम था, मुश्किल से पुण्यवश यदि तुम गुरु के पास पहुंचे, फिर तुम्हारे कथित ज्ञान ने तुम्हें लपेट लिया, इससे बड़ा दुर्भाग्य अब पृथ्वी पर और क्या हो सकता है ! इललिए मेरे हित में ये है कि जब मैं श्रीगुरु के पास किसी कारणवश पहुंच जाउँ, तो उनके दिये साधना-मार्ग पर पूर्ण आस्था और विश्वास करके आगे बढुँ, क्योंकि दूसरा कोई चारा नहीँ है । मेरे पास दो ही मार्ग हैं, या तो फिर गुरु की निन्दा करुँ, कहुँ कि वो कपटी हैं, वो ठीक नही है, उनका चरित्र ठीक नहीँ है, उनका व्यक्तित्व ठीक नहीँ है, उनका पंथ ठीक नहीँ है, उनकी परंपरा ठीक नहीँ है । वो "शैव" हैं, वो "शाक्त" हैं, वो "वैष्णव" हैं, वो "गाणपत्य" हैं, उनको संप्रदायों में तोड़ दो, क्योंकि वो तो तुम्हारा अपना कथित ज्ञान है । तुमने गुरू को हरि के रूप में देखा, तो वो हरि के रूप में दिखेंगे । तुम गुरु को शिव के रूप में देखते हो तो शिवमय देखोगे । स्वयं को भी तुम गुरूवत् जानोगे, जब तुम गुरू से जुड़ जाते हो । ये तुम्हारी अपनी दृष्टि है, तुम किस दृष्टि से गुरू को देखते हो, तुम वैसे ही शब्दों का उच्चारण करते हो । अधिकांशतया अगर तुम प्राचीन गुरु परंपरा का अध्ययन करो तो समस्त बड़े बड़े गुरुओं की अवमानना, उनका अपयश, उनके खिलाफ कहने वाले वही लोग हैं, जो कभी उन गुरुओं के चरणों में बैठे थे; क्योंकि वो अति लोलुप, अति लोभी, अति कामुक, व्यसनी, पूरी तरह से भोग में लिप्त, कभी किसी भी उच्च कोटि के संत के भीतर के उच्च सोपान को नहीँ देख सकते और फिर गुरु मायावी हैं तो माया के अपने आवरण को सरलता से बींधने कहाँ देँगे ! और फिर तुम्हारा अपना वो ज्ञान, जिसको तुमने सदियों से पकड़ रखा है, वो एक परंपरा बन गया है, उसमें कोई अनुभूति नहीँ है, कोई तथ्य नहीँ है । जब तथ्यहीन तुम्हारा ज्ञान हो, जब अनुभवहीन तुम्हारा ज्ञान हो, तो वो केवल व्यर्थ की बस्तु हो जाती है, वो कुड़ा करकट है और उसका स्थान केवल कुड़ादान ही है । एक समय मैं कुछ साधकों के बीच बैठा था तो प्रश्न हुआ कि इस सृष्टि को संचालित करने वाली और नष्ट करने वाली शक्ति कौन है ? सबने कहा, 'सृष्टि को बनाने वाले ब्रह्मा जी हैं, पालक विष्णु जी हैं और संहार करने वाले भगवान शिव हैं', लेकिन मैने कहा, "अवश्य भगवान शिव संहारक हैं, लेकिन सृष्टि बनाने वाले भी वही हैं, पालने वाले भी वही हैं ।" अब इस तत्व के पीछे विवाद हो सकता है लेकिन विवाद कौन करेगा ? जो मूढ़ होगा । इसका कारण स्पष्ट है । कारण इसलिए स्पष्ट है - यदि कोई व्यक्ति 'शैव' होकर ये तथ्य कह रहा है, तो वो सत्य है । जिस समय मै 'शैव' बनकर तुमसे ये बाद करता हूँ, तो शिव को ही प्रधान रखता हुँ, शिव की निंदा नही करता, शिव के उपर किसी तत्व को नहीँ जानता और जब मै 'शाक्त' होकर बात करता हुँ तो शक्ति को ही श्रेष्ठ मानता हूँ और उनसे उपर किसी तत्व की बात नहीँ करता, इसे "दैवत्व का चिंतन" कहा जाता है, "तत्व निरूपण" कहा जाता है ।
'अग्नि पुराण' में अग्नि देवता कहते हैं कि "मुझसे ही सृष्टि उत्पन्न हुई है, मै ही इसका पालन करने वाला, आदि और अंत का कारण हुँ ।" शेषनाग 'गुह्य विद्या तंत्र' में कहते हैं कि "मैँ ही सहस्त्रमुखी होकर नारायण को उत्पन्न करता हूँ और सृष्टि के आगे के क्रिया कलापों को गति देने के लिए उनको प्रेरित करता हूँ और अंत में सहस्त्रों मुखों से 'क्रोधाग्नि' के द्वारा इस संपूर्ण सृष्टि का अंत करने वाला हुँ ।" इसी प्रकार भगवान नारायण कहते हैं कि "मै ही योगमाया को धारण करने वाला हुँ। मेरी ही इच्छा से ये सृष्टि बनी है, चलती है और लय हो जाती है ।" अब यहाँ कथित ज्ञान झगड़ा कर सकता है, लेकिन मूल ज्ञान नहीँ ।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि एक विशेष कार्यक्रम के दौरान मुझसे ये पूछा गया कि "दुःख देने वाले देवता कौन है?" तो चार प्रमुख देवता होते हैं । जिसमें मैने 'रूद्र' का उच्चारण नही किया । 'रूद्र' के स्थान पर 'कुबेर' शब्द का उच्चारण किया, जिसके लिए कार्यक्रम का संचालन करने वालों ने बड़ी कठोर आपत्ति की । उन्होंने कहा, "महाराज आपने इससे पहले भी कई प्रवचनों में चार देवताओं का पहले भी उल्लेख किया है, तो इस बार ऐसा क्यों ?" तो मैने कहा, "आपकी दृष्टि का भेद है । इस समय जो 'प्रवचन' मै कर रहा हूँ, या जिस विषय को मै समझा रहा हूँ वो 'महाविद्याओं' से जुड़ा हुआ है और 'महाविद्याएं' समस्त शिवाधीन हैं । शिव के बिना कोई 'महाविद्या' नही है, शिवरहित नही होती और बिना शिव के उन्हेँ सिद्ध नहीँ किया जा सकता और यदि इस समय मैं दुःख देने वाले देवताओं में 'रूद्र' शब्द का उच्चारण कर देता हूँ, तो उससे महाविद्या कुपित हो जाती है; इसलिए 'रूद्र' के स्थान पर 'कुबेर' शब्द कहा जाता है क्योंकि जो रूद्र है, उनका कार्यभार देव-परंपरा के अनुसार उपविभाग में कोषाध्यक्ष कुबेर सम्भालते हैं । तो जहाँ मुझे लगता है कि यहाँ सीमा टूट न जाए, यहाँ 'शिवत्व' का उल्लंघन न हो जाए, यहाँ शिव की मर्यादा खंडित न होने लगे, वहाँ हमे ऐसा ही कहना होता है...ऐसे शब्दों के कारण भ्रम हो सकता है । लेकिन किसे ? केवल उसी को जो उस कथित ज्ञान की परंपरा से बंधा हुआ है । परंपराओं से तो मै भी बंधा हुआ हूँ । हजारों अरबों वर्षों पूर्व जिनकी मेरे पास गणना भी नहीं है ! जिसके लिए आदि, अनादि, अनंत ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है ! ऐसी सनातन परंपरा से जुड़े होने के बाद भी मै उन समस्त परंपराओं का पालन करता हूँ, लेकिन वहाँ कथित ज्ञान को आड़े नही आने देता ।
अक्सर यही कारण है कि बहुत से लोग अमृत कलश के पास पहुँच कर भी प्यासे लौट आते हैं , तो ऐसे ज्ञान का क्या लाभ जो तुम्हारा ही शत्रु हो जाए, जो तुम्हारे ही मार्ग में रोड़ा बन जाए और तुम्हे कुछ पाने न दे, उस ज्ञान को त्याग देना जो इतने प्रश्न खड़े कर दे; अपितु उस ज्ञान को उत्पन्न करने की कोशिश करना जो गुरू और उनके बाद गुरु प्रदत्त साधना और उनके श्री चरणों में बैठ कर मूल साधना को करने का यथावत् अवसर प्रदान करे । यदि एक साधना भी तुमने गुरु के चरणों में पूरी तरह से संपन्न कर ली, तो अपने जीवन में समझ लेना कि कोई सार्थक प्राप्ति तुमने अब अवश्य कर ली । साधना मार्ग में सबसे बड़ा अडंगा, सबसे बड़ी अड़चन ये "ज्ञान" है । तो ज्ञान कभी-कभी मित्र न होकर हमारा शत्रु हो जाता है, और ऐसे में बड़े बड़े "ज्ञानी" मोह और ममता के गर्त में जाकर भ्रमित होकर गुरू के चरणों से भी रिक्त लौट आते हैं । यही योगमाया की अद्भुद सृष्टि है, इसीलिए स्वयं कहा गया है- "ज्ञानिनामपि चेतांषि देवी भगवती हि सा।" वो योगमाया तो बड़े-बड़े ज्ञानियोँ को भी मोहित करने वाली हैं । तो आप और हम बड़ी सहजता से भ्रमित हो सकते हैं । ऐसी परिस्थिति से बचते हुए, योगमाया की स्तुति करते हुए हमे जीवन में आगे कदम बढ़ाना चाहिए । अभी के लिए इतना ही । ॐ नमः शिवाय !
- ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ