मैने तुम्हे अपना तेजस्वी तेज का अंश दिया है। मै आपको दिव्य कलाएं एवं सामर्थ्य प्रदान कर रहा हूं। नित्य आपके साथ हूं| आपकी हर सांस में आपके साथ हूं। आपकी हर एक धड़कन को सुनने की सामर्थ्य रखता हूं। अगर इसके वावजूद आप शिखरस्थ नही हुए, फिर तो समझिये इस युग क्या किसी युग में आप कायाकल्प नही कर सकते। अब वो समय है धरा में युग को बदलने का। और युग को बदलने के लिए हजारों, लाखों, करोड़ों की भीड़ नही चाहिए। बस कुछ 'राजहंस' चाहिए, कुछ शेर चाहिए जो इस परिवर्तन के लिए तैयार हों। इसलिए साधना कीजिए, बल अर्जित कीजिए। अब इस राष्ट्र की वागडोर अपने हाथ में लीजिए। ऐसा न हो कि देर हो जाये।
प्रतीकोपासना का मतलब है "प्रतीक के रुप मेँ उपासना करना"। क्योँकि हम उस ब्रह्म की, उस भगवान की कोई मूर्ति नहीँ बना सकते, हम उसका कोई मन्दिर नहीँ बना सकते, हम उसका कोई तीर्थ नहीँ बना सकते क्योँकि वो तो इतना विराट है कि वो तो जानने मेँ नहीँ आता, जब वो जानने मेँ नहीँ आता तो उसका मन्दिर, किताबेँ, पुस्तक, ग्रंथ ये सब कैसे लिखा जा सकता है ? ये पुरी तरह से ढोंग है...लेकिन ये ढोंग तब सत्य होने लग जाता है जब आपकी बुद्धि, आपका समर्पण, आपका प्रेम उस पर कार्य करता है । क्योँ ? क्योँकि ये प्रतीकोपासना है । क्या होती है प्रतीकोपासना ? एक उदाहरण : जैसे भारत का झंडा आपने देखा होगा, तीन रंगोँवाला, तिरंगा, उसके मध्य मेँ चक्र है । इस झंडे की आन के लिए आप और हम अपनी जान तक कुरबान कर देना चाहते है ! हम मरने को तैयार है ! मर-मिटने को तैयार है ! किसके लिए ? एक तिरंगे झंडे के लिए ! आप कहेंगे, "क्या बेवकूफी है ? ये तो एक कपडे का टूकडा है, इसके लिए हम जान क्योँ देँ ?" लेकिन क्या आप ऐसा कहते है ? नहीँ । क्योँ ? क्योँकि ये आपकी और मेरी मातृभूमि का "प्रतीक" है इसलिए वो कपडे का टूकडा होने के बावजूद मेरे और आपके लिए इतना सम्मान का तत्त्व हो जाता है कि हम अपने सर कटवाने के लिए तैयार हो जाते है लेकिन उस तिरंगे को हम झूकता हुआ देखना नहीँ चाहते ! समझ मेँ आया ? ये है प्रतीकोपासना । ठीक उसी तरह हमारी मूर्तियाँ, हमारे धर्मग्रंथ, हमारे तीर्थस्थान वो भगवान नहीँ है, भगवान के प्रतीक है इसलिए हम प्रतीकोपासना करते है । - ईशपुत्र
योनि तंत्र जैसे सामाजिक रूप से कलंकित और जटिल तंत्र के बारे में 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' कहते हैं की-भारत के ऋषियों नें जो भी मनुष्य को दिया वो अत्यंत श्रेष्ठ और उच्चकोटि का ज्ञान ही था. जिसमें तंत्र भी एक है. तंत्र में एक दिव्य शब्द है 'योनी पूजा' जिसका बड़ा ही गूढ़ और तात्विक अर्थ है. किन्तु कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों व वासना और भोग की इच्छा रखने वाले कथित धर्म पुरोधाओं ने स्त्री शोषण के लिए तंत्र के महान रहस्यों को निगुरों की भांति स्त्री शरीर तक सीमित कर दिया. हालांकि स्त्री शरीर भी पुरुष की भांति ही सामान रूप से पवित्र है. लेकिन तंत्र की योनी पूजा सृष्टि उत्पत्ति के बिंदु को 'योनी' यानि के सृजन करने वाली कह कर संबोधित करता है. माँ शक्ति को 'महायोनी स्वरूपिणी' कहा जाता है. जिसका अर्थ हुआ सभी को पैदा करने वाली. उस 'दिव्य योनी' का यांत्रिक चित्र ही 'श्री यन्त्र' है. वो 'महायोनी' ही 'श्री विद्या' हैं.
किन्तु तंत्र मार्गी साधक को सावधान रहना चाहिए.....विशेषतया स्त्री साधिकाओं को की कहीं योनी तंत्र के नाम पर उनको कुछ अनर्गल सिखा कर कोई उन्हें कूकर्म के मार्ग पर न ले जाए. ऐसा बहुत सी साधिकाओं के साथ पूर्व व वर्तमान में हुआ है......हो रहा है. इसीलिए कथित तांत्रिक समाज को गलत दिशा दे सकता है. बातों में या तर्क द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है. पर योनी तंत्र चर्चा का नहीं प्रत्यक्ष सिद्धि का क्षेत्र है. इसलिए तंत्र की खोज करने वाले रहस्य चित्रों को यथारूप न ले कर उसे 'स्वरुप रहस्यानुसार' समझें. योनी तंत्र सृष्टि उत्पत्ति का परा विज्ञान है. न की स्त्री शरीर का अवयव. 'माँ करुणाकारिणी स्वर्ण सिंहासनमयी कामरूपिणी कामाख्या योनी' ब्रह्माण्ड उत्तपत्ति का प्रतीक हैं व शक्ति उतपत्ति का प्रतीक....वो प्रत्यक्ष विग्रह है. जिसकी तुलना किसी अंग विशेष से करना.......'मातृस्वरूपिनी पराम्बा' का घोर अपमान ही होगा.
योनी तंत्र का इतिहास परम पवित्र और बेदाग़ है इसलिए सामाजिक लोगों को इसे कलंकित या विकृत नहीं समझना चाहिए, बस तांत्रिकों की शक्ल में छिपे भेड़ियों से सावधान रहना चाहिए'-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.