बुधवार, 26 जून 2024

तारा महाविद्या-बौद्धाचार-कौलाचार-चीनाचार-गोम्पा
''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना'' एक अत्यंत जटिल और उच्च कोटि की साधना मानी गयी है। लेकिन इस ''दिव्य महाविद्या'' को समझ पाना सरल नहीं है। ''महर्षि विश्वामित्र और वशिष्ठ'' जैसे सर्वोच्च ऋषियों नें भी ''तारा महाविद्या'' को जानना चाहा। लेकिन उनका साहस भी आखिर टूट गया। तब महाचीन जा कर उनहोंने एक ''बुद्ध से चीनाचार'' द्वार तारा को सिद्ध किया। आज चीनाचार बदल गया है। आज काल और काल की गति बदल गयी है। तंत्र का दक्षिण मारग और वाम मारग मानों आखिरी साँसे गिन रहा हो। साहित्यकार और शोधार्थी तो ये तक नहीं ढूंढ पा रहे की भारत का तंत्र प्राचीन है या चीन का? बौद्ध धर्म के बज्रयान नें तारा को प्रमुख आराध्या माना और आज तक वो अपने 'गोम्पा में तारा को स्थान दिए हैं। ''कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज'' नें बाल्यावस्था में हिमाचल प्रदेश के ''लौहुल-स्पीती'' क्षेत्रों में भोटी भाषा और बौद्ध धर्म के तन्त्रयान को लामाओं से निकटता से समझा है। लगभग पांच वर्ष का अभ्यास और कौलमत नें ''कौलान्तक नाथ'' को बहुत कुछ प्रदान किया है। आज भी ''कौलान्तक नाथ'' का ''बौद्ध धर्म'' के प्रति 'मैत्री पूर्ण' प्रेम कम नहीं हुआ है।
जैसे ही गुजरात के अहमदाबाद में 19-20 जनबरी 2013 को ''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना शिविर'' की घोषणा हुयी। ''कौलान्तक नाथ'' हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के निकट स्थित बोद्ध गोम्पा गए। वहां उनहोंने ''चीनाचार और बोद्धाचार'' को याद किया। माँ तारा से पूर्णता व ''हिन्दू और बोद्धों'' के मध्य मैत्री, प्रेम व शांति बनाये रखने की प्रार्थना की। आपकी सेवा में प्रस्तुत है। बोद्ध गोम्पा में ''कौलान्तक नाथ'' की एक छोटी सी दुर्लभ विडिओ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

मंगलवार, 21 मई 2019

अब वो समय है धरा में युग को बदलने का
मैने तुम्हे अपना तेजस्वी तेज का अंश दिया है। मै आपको दिव्य कलाएं एवं सामर्थ्य प्रदान कर रहा हूं। नित्य आपके साथ हूं| आपकी हर सांस में आपके साथ हूं। आपकी हर एक धड़कन को सुनने की सामर्थ्य रखता हूं। अगर इसके वावजूद आप शिखरस्थ नही हुए, फिर तो समझिये इस युग क्या किसी युग में आप कायाकल्प नही कर सकते। अब वो समय है धरा में युग को बदलने का। और युग को बदलने के लिए हजारों, लाखों, करोड़ों की भीड़ नही चाहिए। बस कुछ 'राजहंस' चाहिए, कुछ शेर चाहिए जो इस परिवर्तन के लिए तैयार हों। इसलिए साधना कीजिए, बल अर्जित कीजिए। अब इस राष्ट्र की वागडोर अपने हाथ में लीजिए। ऐसा न हो कि देर हो जाये।
-'ईशपुत्र'- 'कौलान्तक नाथ'
(-श्रीविद्या साधना शिविर)

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

श्री मातंगी महाविद्या साधना
मातंगी के बिना पूरा जीवन अधूरा है । जिस व्यक्ति को अपने जीवन में प्रेम अनुभव नहीं हुआ हो, जिस व्यक्ति को अपने जीवन में "गुरुत्व" का एहसास नहीं हुआ हो, किस व्यक्ति को अपने होने का अभी तक बोध नहीं हुआ हो उसके लिए मातंगी साधना बड़ी ही अनिवार्य है, क्योंकि हम पैदा तो हो जाते हैं हम ज्ञान विज्ञान सीख लेते हैं, बुद्धि-बल और विवेक भी हमें आ जाता है और हम पूरी जिंदगी जीते चले जाते हैं लेकिन धीरे धीरे धीरे सब नष्ट होता जाता है और जीवन का जो आखिरी भाग हमारे पास आता है वह बहुत ही खराब भाग होता है; तब हमारे पास कुछ नहीं होता जब तक हम सुंदर है, सौंदर्यशाली हैं, सामर्थ्यवान है तब तक ही हमारी जय जयकार होती है, तो मातंगी आपको नित्य बनाती है इसलिए शब्द है नित्य कन्या और नित्य पुरुष; जो पहले भी थे आज भी है और भविष्य में भी रहेंगे ! जिनको "चिरंजीवी" भी कहा जाता है, तो आपकी चेतना भी चिरंजीवी हो जाए, आपके भीतर भी स्थायित्व हो जाए वह सब आपको मातंगी देती है और याद रहे हम पृथ्वी पर कोई भी काम तब तक नहीं कर सकते जब तक उसमें आनंद ना हो, जब तक उसमें रस ना हो, जब तक उसमें दिव्यता ना हो और वह रस जो है वह आपको मातंगी देगी । अब आपको अगर मैं आप लोग कहीं से आ रहे हो और इतना बड़ा फूलों का गुलदस्ता बनाकर आपको समर्पित करुं । अगर आपने फूलों के प्रति उसका सौंदर्य है, मेरे प्रेम को समझने की बुद्धि है तब तो आप उस को संभाल कर रखेंगे लेकिन अगर नहीं है तो सामने भैंस आ रही होंगी उसको खिला देंगे कि, "ले जी तेरे लिए बढ़िया वाला चारा है ।" तो फर्क तो एक ही चीज का है केवल उस स्थिति का है, इसलिए धर्म को भी सभी लोग नहीं समझ सकते । आप कोशिश करके देखिए । किसी नास्तिक को जाकर धर्म समझाइए जरा, मैं मान जाऊंगा यदि आप समझाने में कामयाब हो गए । क्यों ? क्योंकि उसके पास वो तन्तु ही नहीं हैं, उसके पास वह सामर्थ्य ही नहीं है ।जब आप धर्म को समझ सकते हैं तो वह भी तो समझ सकता होगा, दिमाग तो उसके पास भी वही है, मेरे पास भी वही है....अगर मैंने भी विज्ञान की पढ़ाई की है, अगर मेरे भी मस्तिष्क में नास्तिकतावाद है, आस्तिकतावाद है, धर्म है, दर्शन है, तब भी मेरे मन में दृढ़ विश्वास है कि, 'धर्म का यह पक्ष सत्य है', तो मुझे कहीं से तो वह विचार आ रहा है, कोई तो मुझे वह दे रहा है और उसको भी यदि वह नहीं समझ आ रहा है वह नहीं समझ पा रहा है तो उसे भी वह तत्व कोई दे रहा है । तो वो सब संचालित करने वाली शक्ति मातंगी होती है ।मातंगी के कारण ही मुनि  मातंग हुए थे उनकी कथा कहीं ढूंढिएगा पढ़िएगा की कितनी अद्भुत कथा उनकी थी । तो मातंगी शक्ति के बिना मैंने कहा  कि जीवन अधूरा है ।आपके पास सामर्थ्य होनी चाहिए समझने की, आपके पास सामर्थ्य होनी चाहिए किसी भी चीज को ग्रहण करने की । ये ठीक वैसे ही कि आप संध्या के समय कहीं बैठे हो और कोई व्यक्ति सामने से आए, आने के बाद वह आपकी स्तुति करें, आपकी प्रशंसा करें और बहुत ज्यादा आपकी तारीफ करें इतनी ज्यादा कि इससे पहले पृथ्वी पर किसी की तारीफ ना हुई हो और बाद में उसे पता चले कि आप तो बहरे थे । तो उस प्रशंसा का कोई सार नहीं रह जाएगा । वैसे ही सृष्टि है, ये प्रतिपल आपको आनंद देना चाहती है क्योंकि माया है । योगमाया है वह तो आपकी मां है और अगर वह हमारी मां है तो सागर भी मुझे आनंद देगा, यह लाइट्स भी मुझे आनंद देगी, यह पर्दे भी आनंद देंगे, आप लोग भी मुझे आनंद देंगे क्योंकि सब मेरी मां का ही तो है ! वह मेरे विरुद्ध कैसे जाएगा लेकिन मुझे वह आनंद सुनाई नहीं देगा क्योंकि मैं अभी बहरा हूं । तो वो कान खोलने के लिए, उस आनंद को जानने के लिए मातंगी अपने आप में एक प्रमुख विद्या है ।
- महासिद्ध ईशपुत्र

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कौलान्तक पीठाधीश्वर की योग्यताएं
कौलान्तक पीठ के
पीठाधीश्वर होने के मायने सबसे अलग
हैं, आमतौर पर पीठ का अर्थ होता है एक
स्थान विशेष जैसे कोई मंदिर आश्रम स्थान विशेष, किन्तु कौलान्तक
पीठ कोई एक घर या मंदिर नहीं है
वरन हिमालय का बहुत बड़ा भू भाग है, जिस पर आज
भारत की सरकार का ही अधिकार है,
इसलिए आध्यात्मिक रूप से हिमालय की धर्म
संस्कृति का प्रमुख होना ही कौलान्तक
पीठाधीश्वर होना है, और ये तो
सबसे जटिल है क्योंकि यदि आपके पास कोई मंदिर हो तो आप
उसे संभालें या कोई स्थान या आश्रम हो तो उसेर संभालें वहां
बैठ कर धर्म कार्य सम्पादित करें, किन्तु जब खुला आकाश
हजारों योजन तक फैला हिमालय हो तो क्या किया जा सकता
है, ये ठीक वैसा ही है,
की आपको कहा जाए की आप अरवों
की संपत्ति के मालिक हैं किन्तु आप
किसी भी कीमत पर एक रूपया
तक नहीं खर्च कर सकते, तो कौलान्तक
पीठाधीश्वर होने का अर्थ है कुछ
भी न होना, क्योंकि संसार तो पूछेगा ही
की आखिर आपका आश्रम कहाँ है, क्योंकि
उनको तो उसकी आदत है और आपके पास कोई
जबाब नहीं, संभवत: आपको समझ पाना उनके लिए
अब बिलकुल असम्भव है, ये तो एक पहलू हुआ, माना कि
भौतिक रूप से आप कोई सम्पदा या स्थान दिखने में असमर्थ हैं
किन्तु दूसरी और उतना ही विराट ज्ञान
प्रवाह है, सभी को ज्ञान ब्राहमण देते हैं
क्योंकि उनहोंने परम्परागत रूप से ज्ञान लिया है हालाँकि ये
कोई अनिवार्य नियम नहीं पर एक सामाजिक व्यवस्था
है और उनको ज्ञान देने वाले सन्यासी हैं जो
सिद्ध गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर समाज के हर वर्ग सहित
विशेषतय: ब्राहमणों तक ज्ञान पहुंचाते हैं, किन्तु
सन्यासियों के ये सिद्ध गुरु ही वो गुरु हैं जो
कौलान्तक पीठ यानि की हिमालय के
परम तेजस्वी ऋषि मुनि योगी परमहंस
होते हैं, जो इतनी कठोर तपस्या करते हैं कि
आम आदमी को बताते हुए भी डर
लगता है क्योंकि अधूरे ज्ञान के कारण उसको ये सब
किसी बड़े अत्याचार से कम नहीं लगता,
तब तक भूखे प्यासे साधना ताप का अभ्यास किया जाता है जब
शरीर की सबसे अंतिम सीमा
समाप्त हो जाये वो लगातार, गर्मी सर्दी,
वर्षा, जंगली जानवर, भोजन पानी का
आभाव, अकेलापन और भी न जाने कितनी
ही दारुण दुःख देने वाली परिस्थितियां का
सामना करते हैं जो सामने सदा ही मुह बाए
खडी रहती है, इस
पीड़ा का अंदाजा केवल पढ़ कर या कल्पना से
नहीं किया जा सकता, हिमालय के
किसी बर्फीले एकांत स्थान पर एक रात
काट कर देख लीजिये, चमड़ी तक फट
जाती है शरीर का रंग इतना कला हो
जाता है कि महीनो ठीक होने को
लग जाएँ, ये सब तो साधारण बाते हुयी, कौलान्तक
पीठाधीश्वर होने के अर्थ है, आप
को 64 कलाओं का ज्ञान होना चाहिए, 33 करोड देवी देवताओं का आवाहन व विसर्जन एवं पूजन
आना चाहिए, योग की सभी विधाओं का
ज्ञान होना चाहिए, तंत्र के मार्ग त्रय का भी
ज्ञान होना चाहिए, अघोर, सत्व, भक्ति, ज्ञान सहित
उपलक्षण विद्याओं का भी समावेश होना चाहिए,
पीठाधीश्वर का कठोर तपस्वी
एवं अभ्यासी होना अति अनिवार्य है,
गीत संगीत, नृत्य, हास्य, रुदन,
चित्रकला, लेखन क्षमता, कवित्व, श्रृंगार, युद्ध विद्या, दर्शन,
भाष्य क्षमता, वाक् शक्ति, कल्पनाशीलता,
परिश्रमी, मंत्र अभ्यासी, आयुर्वेद
ज्ञाता, रसायन विज्ञानी, कर्मकांडी व
योगी होना अति अनिवार्य है, 64 योगिनियों को
प्रसन्न कर व हिमालय के यक्ष एवं यक्षिणियों
की विद्याओं का ज्ञान होना ही
चाहिए, साथ ही लक्षण शास्त्र, सामुद्रिक
शास्त्र, काक भाषा, देश काल सहित विविध
ज्योतिषीय विद्याओं का ज्ञान भी, इन
सबसे ऊपर की चीज तो ये है कि
प्राचीन लिपियों जैसे ब्रम्ह लिपि, देव लिपि, भूत लिपि
व टाँकरी लिपि आदि लिपियों का ज्ञान होना चाहिए,
प्राचीन पांडुलिपियों में निहित ज्ञान का भी
पता होना चाहिए, धर्म की विविध परम्पराओं,
शाखाओं, मतों का भी ज्ञान हो, क्योंकि हिमालय
भूत प्रेत राक्षसों व दैत्यों की भी भूमि
है साथ ही नाग जाती वहां
बसती है तो पीठाधीश्वर को
नाग विद्या, गारुडी विद्या, भूत विद्या, दैत्य संवाद आदि
का परम्परागत ज्ञान होना चाहिए, कौलान्तक पीठ
को महारह्स्य पीठ कहा जाता है क्योंकि
इसकी बहुत सी बाते गुप्त व
रहस्यमयी हैं, जिनको सिद्धौग गुरु व दिव्यौघ गुरु
से प्राप्त करना होता है, बाल्यकाल से ज्ञान और विद्या को
गुप्त रख कर ही ज्ञान ग्रहण करने
की परमपरा है, एक
पीठाधीश्वर जो कि स्वयं
महायोगी होता है के लिए ये बात सबसे जटिल
हो जाती है कि उसे तंत्रमय कर्मकांड व पूजन
वर्षभर करते रहना होता है, जो कि दक्षिण
मार्गी पूजा के अंतर्गत आता है अर्थात बलि व
तामसिक पदार्थों रहित पूजन, जिसे राजसी पूजा
कहा जा सकता है, वेदों, पुराणों, शास्त्रों, तंत्र ग्रंथों यानि
आगम निगम का ज्ञान होना चाहिए, दस महाविद्याओं
सहित शिव शक्ति की प्रधान पूजा व
आवाहनी विद्या का सिद्धहस्त हो साथ
ही हिमालय पर लम्बे समय तक एकांत में
रहने व समाधी लगाने का सिद्धहस्त हो,
हिमालयों की पारिस्थितिकी का
अनुभवी हो, प्रमुखतय: शाक्त पंथी
हो किन्तु मूलतय: शैव पंथी होना चाहिए, सिद्ध
अथवा नाथ परम्परा अनुसार दीक्षित हो, काम्य
प्रयोगों सहित जनहित की विद्याओं का ज्ञाता
हो व अप्सरा साधना, भैरवी साधना,
यक्षिणी व योगिनी साधना संपन्न हो,
हादी कादी, बला अतिबला, सहित
अग्नि विद्या, मधु विद्या का जानकार हो, देशज देवलि
रीति को जनता हो और निडर निर्भय हो, यहाँ
सभी गुणों की व्याख्य करना संभव
नहीं है,
किन्तु बड़े ही गौरव का
विषय है कि चार शिष्यों नें इन विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया
और सफल हुए महायोगी सत्येन्द्र नाथ, जिनको
इस महारहस्य पीठ का
पीठाधीश्वर बना दिया गया|

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

गुप्त नवरात्रि में दश महाविद्याओं की साधना
कथा एवं सार
एक समय ऋषि श्रृंग प्रजाजनों को दर्शन दे रहे थे अचानक भीड़ से एक स्त्री निकाल कर आई, और करबद्ध ऋषि श्रृंग से बोली कि, मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं,जिस कारण में कोई पूजा पाठ नहीं कर पाती, न ही ऋषि दर्शन एवं सेवा कर पाती हूँ, यहाँ तक कि ऋषियों को भेजे जाने वाला अन्न का भाग भी में नहीं दे पाती, मेरा पति मांसाहारी हैं, जुआरी है, लेकिन में माँ शक्ति दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूँ, उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूँ, तो ऋषि श्रृंग बोले कि, माता जिस प्रकार दो नवरात्र ग्रीष्म और शारदीय प्रतिवर्ष मनाये जाते हैं, ठीक वैसे ही दो नवरात्र और भी एक वर्ष में होते हैं जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है, जिस प्रकार नवरात्र नौ देवियों के होते हैं उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं,यदि कोई दस महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना कर ले तो जीवन धन धान्य राज्यसत्त ऐश्वर्य से भर जाता है, इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है, यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो माँ उसके जीवन को सफल कर देती हैं,लोभी,कामी,व्यसनी,सहित यदि मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि इन दिनों माता की पूजा कर ले तो जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती....इस प्रकार उस स्त्री ने ऋषि श्रृंग के वचनों पर श्रद्धा कर गुप्त नवरात्र की पूजा की और जीवन में परिवर्तन आने लगा,घर में सुख शान्ति आ गयी,पति सद्मार्ग पर आ गया,और जीवन माता की कृपा से खिल उठा.यदि आप भी कभी कभी शराब पी लेते हैं,मांसाहार कर लेते हैं और चाहते हैं की माता की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि आये, तो इस अवसर को नहीं चूकिएगा,ये भी बता दें की तंत्र और शाक्त मत का तो ये सबसे अहम् पर्व माना जाता है,वैशनो,पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का ये अहम् पर्व माना जाता है,पाकिस्तान स्थित हिन्गुलाज देवी की सिद्धि का भी यही अहम् समय होता है,शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किया लेकिन सिद्धि नहीं मिली तो उनहोंने काल ज्ञान द्वारा ये पता किया कि गुप्त नवरात्र ही वो समय है जब शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है, ऋषि विश्वामित्र ने तो शक्तिया प्राप्त कर नयी सार्ष्टि तक रच डाली......लंकापति रावन का पुत्र मेघनाद अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करना चाहता था ताकि कोई उसे जीत ना सके....तो मेघनाद ने अपने गुरु शुक्राचार्य से परामश किया तो शुक्राचार्य ने गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करने को कहा,मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की,राम राबण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही राम भगवान् सहित लक्षण जी को नागपाश मेमन बाँध कर मृत्यु के द्वार तक प[अहुंचा दिया था,ये भी कहा जाता है की यदि नास्तिक की परिहास्वश इन समय मंत्र साधना कर ले तो भी उसे फल मिल ही जाता है,यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है,यदि आप चाहते हैं मंत्र साधना करना,लेकिन काम-काज की उलझनों के कारण नहीं कर पाते नियमों का पालन तो ये समय आपके लिए ही माता की कृपा ले कर आया है,बिना किसी नियम को पाले बस कीजिये माँ शक्ति की मंत्र साधना और पाइए मनचाही मुराद,इस साधना के बारे में कहा जाता है की साधना से मनोकामना पूरी होने की 100 % गारंटी है,बस केवल बात ही ध्यान रखना होगा की आपके मंत्र,देवी का स्वरुप और पूजा रखनी होगी गुप्त,बिना किसी को बताये,घर पर ही करें माँ को प्रसन्न,और इसका आसान सा तरीका हम आपको आज बताने जा रहे हैं,तो कीजिये गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की महासिद्ध पूर्णमनोरथी साधना...................................




--------माँ शक्ति को प्रसन्न करने का प्रमुख मंत्र-------
धूप दीप प्रसाद माता को अर्पित करें
रुद्राक्ष की माला से ग्यारह माला का मंत्र जप करें
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
मंत्र-ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम: ।।
पेठे का भोग लगाएं

दस महाविद्याओं से पाइए मनचाही कामना
---------------------
काली----------------------
लम्बी आयु,बुरे ग्रहों के प्रभाव,कालसर्प,मंगलीक बाधा,अकाल मृत्यु नाश आदि के लिए देवी काली की साधना करें
हकीक की माला से मंत्र जप करें
नौ माला का जप कम से कम करें
मंत्र-क्रीं ह्रीं ह्रुं दक्षिणे कालिके स्वाहा ॥
---------------------तारा-----------------------
तीब्र बुद्धि रचनात्मकता उच्च शिक्षा के लिए करें माँ तारा की साधना
नीले कांच की माला से मंत्र जप करें
बारह माला का जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् ॥
-------------------त्रिपुर सुंदरी--------------------
व्यक्तित्व विकास पूर्ण स्वास्थ्य और सुन्दर काया के लिए त्रिपुर सुंदरी देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें
दस माला मंत्र जप अवश्य करें
मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदर्यै नमः ॥
------------------भुवनेश्वरी------------------------
भूमि भवन बाहन सुख के लिए भुबनेश्वरी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला का प्रयोग करें
ग्यारह माला मंत्र जप करें
मन्त्र-ॐ ह्रीं भुबनेश्वर्यै ह्रीं नमः ॥
------------------छिन्नमस्ता----------------------
रोजगार में सफलता,नौकरी पद्दोंन्ति के लिए छिन्नमस्ता देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिन्यै ह्रीं फट स्वाहा ॥
-----------------त्रिपुर भैरवी-----------------------
सुन्दर पति या पत्नी प्राप्ति,प्रेम विवाह,शीघ्र विवाह,प्रेम में सफलता के लिए त्रिपुर भैरवी देवी की साधना करें
मूंगे की माला से मंत्र जप करें
पंद्रह माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा ॥
------------------धूमावती------------------------
तंत्र मंत्र जादू टोना बुरी नजर और भूत प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए धूमावती देवी की साधना करें
मोती की माला का प्रयोग मंत्र जप में करें
नौ माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा ॥
-----------------बगलामुखी-----------------------
शत्रुनाश,कोर्ट कचहरी में विजय,प्रतियोगिता में सफलता के लिए माँ बगलामुखी की साधना करें
हल्दी की माला या पीले कांच की माला का प्रयोग करें
आठ माला मंत्र जप को उत्तम माना गया है
मन्त्र-ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम: ॥
-------------------मातंगी-------------------------
संतान प्राप्ति,पुत्र प्राप्ति आदि के लिए मातंगी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला से मंत्र जप करें
बारह माला मंत्र जप करें
ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा ।।
-------------------कमला-------------------------
अखंड धन धान्य प्राप्ति,ऋण नाश और लक्ष्मी जी की कृपा के लिए देवी कमला की साधना करें
कमलगट्टे की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा ॥

-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज



बुधवार, 16 मई 2018

ज्ञान का अभिमान - मूढता
ज्ञान मनुष्य की शोभा है और ज्ञान ही चेतना का विकास भी, लेकिन यही ज्ञान कब और कैसे साधक के लिए घातक हो जाता है ? क्योँ साधक का ज्ञान मस्तिष्क मेँ मचाता है घमासान ? इस मुसीबत से बचने का क्या है उपाय ?

ज्ञान का अभिमान - मूढता >>>

प्रणाम ! मैँ हुँ महायोगी सत्येन्द्र नाथ, साधक के जीवन में अनेकोँ उतार चढ़ाव आते है । और मनुष्य उन उतार चढावोँ के बीच में से गुजरता हुआ अपनी चेतना का विकास करता है । चेतना के विकास में जहाँ उसका कर्म उसका सहयोगी होता है, वहीं ज्ञान भी उसका सहयोगी होता है, लेकिन कर्म और ज्ञान की इस प्रक्रिया में बहुत सी जटिलताएँ है, उनमें से एक सबसे प्रमुख जटिलता है -
ज्ञान का एक अनूठा गुप्त अहंकार । जब बालक छोटा होता है तभी से लेकर वो सीखना शुरु करता है और अपने जीवन के हर क्षण, हर पल वो कुछ न कुछ ग्रहण करता रहता है, उसका लगातार सीखना ही उसे विस्तृत चेतना से जोड़ता चला जाता है, लेकिन धीरे-धीरे जब ज्ञान का जब ये प्रवाह आगे बढ़ता है, तो ये अपने मुख्य बिन्दू मेँ से च्युत होने लगता है, अपने मुख्य मार्ग में से ये धारा अलग होकर बहने लगती है, और ये अलग धारा ही चेतना की विकसित होने वाली नदी को सुखा डालती है ।
ये ठीक वैसा ही है, मानो हिमालय से कोई नदी शुरू हुई बहुत बड़ी और विस्तृत होती चली जा रही है और अंत में वो शाखाओं में विभक्त हो जाये और समुद्र तक पहुंच ही न सके । छोटी धाराएँ अक्सर टूट जाती हैं और सूख जाती है, ठीक वैसा ही ये ज्ञान है । जब मनुष्य भौतिक संसार में ये ज्ञान ग्रहण करता है और बाह्य उपादानों के माध्यम से, अनेक स्त्रोतों के माध्यम से ज्ञान अर्जित करने की चेष्ठा करता है, तो उसके भीतर उसके साथ-साथ उसमें से गुजरते हुए अनेकोँ तरह के अवयव और तत्व उसके साथ जुड़ते जाते हैं, जो उसकी इस अविरलता को-निश्चलता को-निरंतरता को बाधित कर देते हैं, ये ठीक वैसे ही है, जैसे पानी का गन्दा होते चले जाना अथवा रेगिस्तान के रेत में पानी का समा जाना और समाप्त हो जाना ।
जब हम आध्यात्म के बारे मेँ जिज्ञासा करते हैं, तो किसी योगी के बारे में पढ़ते हैं । किसी ऋषि- मुनि के बारे में पढ़ते है । किसी व्यक्तिविशेष के बारे में या ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के बारे मेँ पढ़ते हैं जो परमात्मा से जुडा हुआ हो और फिर हम अपने धर्मग्रन्थों का अध्ययन करते है, लेकिन धीरे- धीरे हम उन बातों से बन्धते चले जाते हैं और कई बार तो हम इतनी हद कर देते हैं कि हम वास्तविक खोज नहीँ करते हैं हमेँ लगने लगता है कि मैने अमूक ग्रंथ में ये पढ़ रखा है, तो बस केबल यही सत्य होगा । और कई बार ये विषय इतने अधिक गंभीर हो जाते हैं कि सोचना पड़ जाता है कि ग्रन्थ या वाक्य प्रधान है अथवा अनुभूति प्रधान है । एक अधकचरा ज्ञानी, अगर किसी पुराण में ये लिखा होँ कि अमूक मंत्र है, इस मंत्र में चार बार "ह्रीं" शब्द का उच्चारण होना चाहिए, जैसे- ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं..... लेकिन यदि वो कहीं दूसरे स्थान पर, दूसरी जगह जाकर ये देख ले कि उस मंत्र का उच्चारण चार बार "ह्रीं" की जगह केबल दो बार ही ह्रीं हो रहा है, तो उसके भीतर का वो नकली तथाकथित ज्ञान, वो कुलबुलाहट करने लगेगा, उसके पेट में मानो मरोड़ उठने लगेंगे, उसका वो कथित ज्ञान उसके अहंकार को इस तरह से बढ़ा देता है कि वो तत्क्षण अपना संयम खो देता है और उसे लगने लगता है - 'अरे वाह ! यह आदमी तो सरासर गलत बात कह रहा है क्योंकि मैँ जो जानता हूँ वही सत्य है', और कई बार बात इससे आगे बढ़ जाती है और साधक उस व्यक्ति के पास पहुंच जाता है कि- "भाई साहब! आपने चार बार "ह्रीं" की जगह केबल दो बार लगाया", वो ये बात भूल जाता है कि सामने वाले व्यक्ति का "स्तर" क्या है ! उसकी साधना कैसी है ! उसकी रीत क्या है ! उसके गुरू कौन है ! वो ये सब नही देखना चाहता, वो तो केबल "लकीर का फकीर" है| उसने सुन लिया है, या उसने पढ़ लिया है कि वहाँ केबल चार बार "ह्रीं" लगा है |
जैसे कुछ लोग इस बात पर लगातार विवाद करते रहते हैं कि कुछ मंत्रों में जो "तंत्रोक्त मंत्र" है, वहाँ "प्रणव" - "ॐकार" नहीं लगता और अधिकांश "आगम-निगम ग्रंथों" में इसका विवरण भी है कि बहोत से मंत्रों के आगे उद्गीथ-प्रणव और इस प्रकार की जो व्याहृतियाँ हैं भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ..... इस प्रकार की व्याहृतियोँ को नहीँ जोड़ा जाता, लेकिन कालान्तर में कुछ सम्प्रदाय ऐसे हुए, जब "सिद्ध गुरूओं" नेँ उन कीलित मंत्रों के उत्कीलन के लिए प्रणव और अन्य बीज मंत्रों के सम्पुट लगाये, और उसके बाद जो मंत्र बना, उसमें प्रणव था-उद्गीथ था, तो "ॐकार" का होना नहीँ होना कोई लड़ाई का विषय नहीँ हो सकता, ये तथाकथित ज्ञान हो सकता है, लेकिन हम उस "ॐकार" के पीछे या उस "ह्रींकार" के पीछे किसी व्यक्ति विशेष को ये कह दें कि तुम गलत साधना कर रहे हो ये केबल अन्धा ज्ञान ही है । ये वो ज्ञान है , जो ज्ञान जैसा भासता है, लेकिन ज्ञान नहीँ है । ये ठीक मनघढंत तथ्य है । जैसे- मान लीजिए कि आप किसी रात किसी सूनसान जंगल में से गुजरने वाले हो, लेकिन उससे पहले आप अपने मित्र के घर बैठे होँ और मित्र ये कह दे कि मैने सुना है "पाँच हजार साल पुरानी एक कहानी मेँ कहा गया है कि जिस जंगल मेँ से तुम गुजरने वाले होँ वहाँ एक विशालकाय डायनासोर रहता है और जब तुम उस जंगल के बीच में से जाओगे, तो वो तुम्हें खा सकता है ।" अब तुम ये भली प्रकार जानते हो कि डायनासोर आज के युग में है ही नहीं, तो अब यदि तुम उस बन में से गुजरते हुए ये सोचने लग जाओ कि 'ये तो वही डायनासोर का जंगल है, अब डायनासोर आकर मुझे खा जायेगा', तो ये मूढ़ता है | ठीक उसी तरह यदि 5000 साल पहले किसी गुरू ने कहा कि इस मंत्र में "ॐकार" नहीं लगता और आज तुम 5000 साल के बाद इस बात का दावा कर रहे हो कि मैने वो पुस्तक पढ़ी है, अथवा अमूक गुरू को सुना है, उसने कहा कि इस मंत्र में "ॐकार" नहीँ लगेगा और तुम उसके लिए दावा ठोको, तो याद रखना तुमसे बड़ा "मूर्ख" इस पृथ्वी पर नहीँ हो सकता क्योंकि तुम ठीक वैसी ही बात पर यकिन कर रहे हो कि किसी नेँ कह दिया कि अगर तुम गंदी नाली का पानी भी पी लेते हो तो तुम्हें रोग नहीँ लगने वाले । ये हो सकता है कि गंदी नाली का पानी लेने के बाद तुम्हारे शरीर के भीतर की प्रतिरोधक क्षमता उस गंदगी से लड़ती रहे-लडती रहे लेकिन अगर तुम निरन्तर उस जल का सेबन करते रहोगे तो लम्बे समय तक रोगों से बचे रहना फिर कदापि संभव नहीँ,
इसलिए मूढ़ताओं का परित्याग करना बड़ा अनिवार्य है, इसलिए "गुरूगम्य साधनाओं" में जाना बड़ा अनिवार्य है, अन्यथा ये कथित "ज्ञान" बुरी तरह भ्रमित कर सकता है । और यदि इस "ज्ञान" में उतनी सार्थकता होती, तो वो जिस क्षण तुमने उस "मंत्र" को पढ़ लिया और जिस क्षण वो "ज्ञान" तुम्हे प्राप्त हो गया, तो तुम्हारा रूपांतरण तो तत्क्षण हो जाना चाहिए । तुम उस "मंत्र" को जानते हो तुम उस "ज्ञान" को भी जानते हो लेकिन क्या तुम्हारा रूपांतपण हुआ ? नहीँ । तुम्हारा स्वयं का रूपांतरण नहीँ हुआ, लेकिन तुम दूसरे को सिखाने चलते हो कि ये "ज्ञान" गलत है, तो ये "आध्यात्म - मार्ग" कि एक ऐसी बड़ी बाधा है जिसके बारे में तुम्हे स्वयं को , स्वयमेव ही सूचित करना होगा , स्वयं को स्वयं ही सतर्क करना होगा, क्योंकि यदि तुम इस मूढ़ता में पड़ गये , तो "वास्तविक ज्ञान के मार्ग की तलाश" बन्द कर दोगे । जिसके मन में साधना की ललक होती है, जिसके मन में अध्यात्म की ललक होती है, वो प्रश्न नहीँ करता, जो गुरुओँ के पास जाता है, वो केवल विसर्जन कर देता है । गुरु के पास जाना, फिर अपने तथाकथित ज्ञान के तराजू पे उनको तौलने लग जाना, ये पृथ्वीलोक पर सबसे घृणित और कुत्सित कर्म 'आध्यात्म' में माना जाता है । पृथ्वी पर जो बड़े से बड़ा पापाचार है तुम उसकी तुलना करो और दूसरे तराजू पर इस बात की कल्पना करो कि तुम किसी गुरु के पास जाते हो और उनका आँकलन अपनी बुद्धि और विवेक से करते हो, तो वो दोनो पाप समान्तर होते है ।
गुरु की तलाश में तुम्हे बुद्धि का प्रयोग अवश्य करना चाहिए लेकिन जब तुम दैवयोग से उनके श्रीचरणों में पहुँच जाओ तो इस तथाकथित ज्ञान को एक ओर रखना बड़ा अनिवार्य है; वरना तुम गुरु के शरीर को देखोगे, उनके क्रिया-कलाप को देखोगे, उनके आसपास के वातावरण और लोगों को देखोगे, गुरू के विषय में लोग क्या कहते हैं-समाज क्या कहते हैं ये सब सुनने लग जाओगे...याद रखना इन सब बातों से आध्यात्म का कोई लेना देना नहीँ है । जो व्यक्ति जानकार है, जो व्यक्ति किसी तथ्य को जानता है, वह सरलता से तुम्हेँ उपलब्ध नहीँ होने वाला और ना ही वो सरलता से तुम्हें कुछ देने वाला है, इसे जरा गंभीरता से समझना, ये साधना मार्ग की एक बड़ी अद्भुद सी अड़चन है ।
एक शिष्य जब पहली बार किसी गुरु से मिलता है, तो वो पूरी तैयारी करके गया होता है कि मै गुरु से ये प्रश्न करुँगा । मै गुरु को देखुँगा, उनके बारे में जानकारीयाँ प्राप्त करुँगा, वो कौन हैं ? कहाँ से पैदा हुए हैं ? उनका वातावरण क्या है ? उनका ज्ञान कैसा है ? वो कितने तपस्वी हैं ? किस तरह की सिद्धियाँ उनके पास हैं ? क्या वो मेरे लायक है या नहीँ है ? ये सब बातें एक तरफ व्यक्ति के मन में रहती हैं और दूसरी ओर यदि गुरु सिद्ध है, गुरु अपने आप मेँ पूर्ण चौंसठ कला सम्पन्न हैं, तो वो भली प्रकार बड़ी बारीकी से तुम्हारी एक-एक हरकत को देख रहे हैं । तुम क्या सोचते हो, तुम क्या कहना चाहते हो, तुम्हारे स्वार्थ क्या हैं , तुम्हारी बुद्धि क्या है, ये सब गुरु पहले से पढ़ रहे हैं । अब जब तुम उनके सम्मुख जाते हो, तो तुम अपना बुद्धिबल का प्रयोग करना चाहते हो, अपना कौशल दिखाना चाहते हो, अपना चातुर्य दिखाते हो, और गुरु ! वो न तो कोई चातुर्य दिखाते, वो केवल मौन रहते हैं और तुम्हें वो सब करने देते है, जो भी तुम कर सकते हो और इस उलझन के बीच वास्तविक ज्ञान तो खो जाता है ।...
एक तो पहले ही जीवन में समय कम था, मुश्किल से पुण्यवश यदि तुम गुरु के पास पहुंचे, फिर तुम्हारे कथित ज्ञान ने तुम्हें लपेट लिया, इससे बड़ा दुर्भाग्य अब पृथ्वी पर और क्या हो सकता है ! इललिए मेरे हित में ये है कि जब मैं श्रीगुरु के पास किसी कारणवश पहुंच जाउँ, तो उनके दिये साधना-मार्ग पर पूर्ण आस्था और विश्वास करके आगे बढुँ, क्योंकि दूसरा कोई चारा नहीँ है । मेरे पास दो ही मार्ग हैं, या तो फिर गुरु की निन्दा करुँ, कहुँ कि वो कपटी हैं, वो ठीक नही है, उनका चरित्र ठीक नहीँ है, उनका व्यक्तित्व ठीक नहीँ है, उनका पंथ ठीक नहीँ है, उनकी परंपरा ठीक नहीँ है । वो "शैव" हैं, वो "शाक्त" हैं, वो "वैष्णव" हैं, वो "गाणपत्य" हैं, उनको संप्रदायों में तोड़ दो, क्योंकि वो तो तुम्हारा अपना कथित ज्ञान है । तुमने गुरू को हरि के रूप में देखा, तो वो हरि के रूप में दिखेंगे । तुम गुरु को शिव के रूप में देखते हो तो शिवमय देखोगे । स्वयं को भी तुम गुरूवत् जानोगे, जब तुम गुरू से जुड़ जाते हो । ये तुम्हारी अपनी दृष्टि है, तुम किस दृष्टि से गुरू को देखते हो, तुम वैसे ही शब्दों का उच्चारण करते हो । अधिकांशतया अगर तुम प्राचीन गुरु परंपरा का अध्ययन करो तो समस्त बड़े बड़े गुरुओं की अवमानना, उनका अपयश, उनके खिलाफ कहने वाले वही लोग हैं, जो कभी उन गुरुओं के चरणों में बैठे थे; क्योंकि वो अति लोलुप, अति लोभी, अति कामुक, व्यसनी, पूरी तरह से भोग में लिप्त, कभी किसी भी उच्च कोटि के संत के भीतर के उच्च सोपान को नहीँ देख सकते और फिर गुरु मायावी हैं तो माया के अपने आवरण को सरलता से बींधने कहाँ देँगे ! और फिर तुम्हारा अपना वो ज्ञान, जिसको तुमने सदियों से पकड़ रखा है, वो एक परंपरा बन गया है, उसमें कोई अनुभूति नहीँ है, कोई तथ्य नहीँ है । जब तथ्यहीन तुम्हारा ज्ञान हो, जब अनुभवहीन तुम्हारा ज्ञान हो, तो वो केवल व्यर्थ की बस्तु हो जाती है, वो कुड़ा करकट है और उसका स्थान केवल कुड़ादान ही है । एक समय मैं कुछ साधकों के बीच बैठा था तो प्रश्न हुआ कि इस सृष्टि को संचालित करने वाली और नष्ट करने वाली शक्ति कौन है ? सबने कहा, 'सृष्टि को बनाने वाले ब्रह्मा जी हैं, पालक विष्णु जी हैं और संहार करने वाले भगवान शिव हैं', लेकिन मैने कहा, "अवश्य भगवान शिव संहारक हैं, लेकिन सृष्टि बनाने वाले भी वही हैं, पालने वाले भी वही हैं ।" अब इस तत्व के पीछे विवाद हो सकता है लेकिन विवाद कौन करेगा ? जो मूढ़ होगा । इसका कारण स्पष्ट है । कारण इसलिए स्पष्ट है - यदि कोई व्यक्ति 'शैव' होकर ये तथ्य कह रहा है, तो वो सत्य है । जिस समय मै 'शैव' बनकर तुमसे ये बाद करता हूँ, तो शिव को ही प्रधान रखता हुँ, शिव की निंदा नही करता, शिव के उपर किसी तत्व को नहीँ जानता और जब मै 'शाक्त' होकर बात करता हुँ तो शक्ति को ही श्रेष्ठ मानता हूँ और उनसे उपर किसी तत्व की बात नहीँ करता, इसे "दैवत्व का चिंतन" कहा जाता है, "तत्व निरूपण" कहा जाता है ।
'अग्नि पुराण' में अग्नि देवता कहते हैं कि "मुझसे ही सृष्टि उत्पन्न हुई है, मै ही इसका पालन करने वाला, आदि और अंत का कारण हुँ ।" शेषनाग 'गुह्य विद्या तंत्र' में कहते हैं कि "मैँ ही सहस्त्रमुखी होकर नारायण को उत्पन्न करता हूँ और सृष्टि के आगे के क्रिया कलापों को गति देने के लिए उनको प्रेरित करता हूँ और अंत में सहस्त्रों मुखों से 'क्रोधाग्नि' के द्वारा इस संपूर्ण सृष्टि का अंत करने वाला हुँ ।" इसी प्रकार भगवान नारायण कहते हैं कि "मै ही योगमाया को धारण करने वाला हुँ। मेरी ही इच्छा से ये सृष्टि बनी है, चलती है और लय हो जाती है ।" अब यहाँ कथित ज्ञान झगड़ा कर सकता है, लेकिन मूल ज्ञान नहीँ ।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि एक विशेष कार्यक्रम के दौरान मुझसे ये पूछा गया कि "दुःख देने वाले देवता कौन है?" तो चार प्रमुख देवता होते हैं । जिसमें मैने 'रूद्र' का उच्चारण नही किया । 'रूद्र' के स्थान पर 'कुबेर' शब्द का उच्चारण किया, जिसके लिए कार्यक्रम का संचालन करने वालों ने बड़ी कठोर आपत्ति की । उन्होंने कहा, "महाराज आपने इससे पहले भी कई प्रवचनों में चार देवताओं का पहले भी उल्लेख किया है, तो इस बार ऐसा क्यों ?" तो मैने कहा, "आपकी दृष्टि का भेद है । इस समय जो 'प्रवचन' मै कर रहा हूँ, या जिस विषय को मै समझा रहा हूँ वो 'महाविद्याओं' से जुड़ा हुआ है और 'महाविद्याएं' समस्त शिवाधीन हैं । शिव के बिना कोई 'महाविद्या' नही है, शिवरहित नही होती और बिना शिव के उन्हेँ सिद्ध नहीँ किया जा सकता और यदि इस समय मैं दुःख देने वाले देवताओं में 'रूद्र' शब्द का उच्चारण कर देता हूँ, तो उससे महाविद्या कुपित हो जाती है; इसलिए 'रूद्र' के स्थान पर 'कुबेर' शब्द कहा जाता है क्योंकि जो रूद्र है, उनका कार्यभार देव-परंपरा के अनुसार उपविभाग में कोषाध्यक्ष कुबेर सम्भालते हैं । तो जहाँ मुझे लगता है कि यहाँ सीमा टूट न जाए, यहाँ 'शिवत्व' का उल्लंघन न हो जाए, यहाँ शिव की मर्यादा खंडित न होने लगे, वहाँ हमे ऐसा ही कहना होता है...ऐसे शब्दों के कारण भ्रम हो सकता है । लेकिन किसे ? केवल उसी को जो उस कथित ज्ञान की परंपरा से बंधा हुआ है । परंपराओं से तो मै भी बंधा हुआ हूँ । हजारों अरबों वर्षों पूर्व जिनकी मेरे पास गणना भी नहीं है ! जिसके लिए आदि, अनादि, अनंत ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है ! ऐसी सनातन परंपरा से जुड़े होने के बाद भी मै उन समस्त परंपराओं का पालन करता हूँ, लेकिन वहाँ कथित ज्ञान को आड़े नही आने देता ।
अक्सर यही कारण है कि बहुत से लोग अमृत कलश के पास पहुँच कर भी प्यासे लौट आते हैं , तो ऐसे ज्ञान का क्या लाभ जो तुम्हारा ही शत्रु हो जाए, जो तुम्हारे ही मार्ग में रोड़ा बन जाए और तुम्हे कुछ पाने न दे, उस ज्ञान को त्याग देना जो इतने प्रश्न खड़े कर दे; अपितु उस ज्ञान को उत्पन्न करने की कोशिश करना जो गुरू और उनके बाद गुरु प्रदत्त साधना और उनके श्री चरणों में बैठ कर मूल साधना को करने का यथावत् अवसर प्रदान करे । यदि एक साधना भी तुमने गुरु के चरणों में पूरी तरह से संपन्न कर ली, तो अपने जीवन में समझ लेना कि कोई सार्थक प्राप्ति तुमने अब अवश्य कर ली । साधना मार्ग में सबसे बड़ा अडंगा, सबसे बड़ी अड़चन ये "ज्ञान" है । तो ज्ञान कभी-कभी मित्र न होकर हमारा शत्रु हो जाता है, और ऐसे में बड़े बड़े "ज्ञानी" मोह और ममता के गर्त में जाकर भ्रमित होकर गुरू के चरणों से भी रिक्त लौट आते हैं । यही योगमाया की अद्भुद सृष्टि है, इसीलिए स्वयं कहा गया है- "ज्ञानिनामपि चेतांषि देवी भगवती हि सा।" वो योगमाया तो बड़े-बड़े ज्ञानियोँ को भी मोहित करने वाली हैं । तो आप और हम बड़ी सहजता से भ्रमित हो सकते हैं । ऐसी परिस्थिति से बचते हुए, योगमाया की स्तुति करते हुए हमे जीवन में आगे कदम बढ़ाना चाहिए । अभी के लिए इतना ही । ॐ नमः शिवाय !
- ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

उच्छिष्ट चाण्डालिनी मन्त्र
ॐ न्रीं त्रीं ह्रीं क्रीं हुं उच्छिष्ट चाण्डालिन्यै नमः ॥ Uchchhishta Chanadalini Mantra For Wealth & Super Natural Power By Mahayogi Satyendra Nath Ji.