बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

'तारा महाविद्या के २१ प्रमुख भैरवों का वाहण मंत्र'


'तारा महाविद्या के २१ प्रमुख भैरवों का वाहण मंत्र' नीचे मंत्र क्रम दिया गया है 'कौलान्तक सिद्धों' का ये मंत्र एक महाकवच व सुरक्षा भी है जो सभी साधनाओं से पहले स्थापित होता है जिसकी विधि 'गुरुगम्य' ही है-

1) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं अक्षोभ्य भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं अक्षोभ्य भैरवाय फट्।
2) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं काल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं काल भैरवाय फट्।
3) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं नील भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं नील भैरवाय फट्।
4) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं विकराल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं विकराल भैरवाय फट्।
5) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं कंकाल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं कंकाल भैरवाय फट्।
6) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं पाताल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं पाताल भैरवाय फट् ।
7) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं काम भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं काम भैरवाय फट्।
8) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं जड़ भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं जड़ भैरवाय फट्।
9) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं स्थूल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं स्थूल भैरवाय फट्।
10) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं नाद भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं नाद भैरवाय फट्।
11) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं वीर भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं वीर भैरवाय फट्।
12) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रलय भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रलय भैरवाय फट्।
13) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं उच्चाट भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं उच्चाट भैरवाय फट्।
14) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं दुर्मुख भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं दुर्मुख भैरवाय फट्।
15) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं पावक भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं पावक भैरवाय फट्।
16) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रेत भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रेत भैरवाय फट्।
17) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं स्तंभ भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं स्तंभ भैरवाय फट्।
18) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं प्रमाद भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं प्रमाद भैरवाय फट्।
19) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं सूचि भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं सूचि भैरवाय फट्।
20) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं मैथून भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं मैथुन भैरवाय फट्।
21) ॐ हृौय, हृौय, हृौय हुं चाण्डाल भं भैरवाय हुं क्रौं हृौं हुं, जं तं थं नं यं हं फं रं वं ज्रें थ्रें न्रें हुं हुं चाण्डाल भैरवाय फट्।




बुधवार, 26 जून 2024

तारा महाविद्या-बौद्धाचार-कौलाचार-चीनाचार-गोम्पा
''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना'' एक अत्यंत जटिल और उच्च कोटि की साधना मानी गयी है। लेकिन इस ''दिव्य महाविद्या'' को समझ पाना सरल नहीं है। ''महर्षि विश्वामित्र और वशिष्ठ'' जैसे सर्वोच्च ऋषियों नें भी ''तारा महाविद्या'' को जानना चाहा। लेकिन उनका साहस भी आखिर टूट गया। तब महाचीन जा कर उनहोंने एक ''बुद्ध से चीनाचार'' द्वार तारा को सिद्ध किया। आज चीनाचार बदल गया है। आज काल और काल की गति बदल गयी है। तंत्र का दक्षिण मारग और वाम मारग मानों आखिरी साँसे गिन रहा हो। साहित्यकार और शोधार्थी तो ये तक नहीं ढूंढ पा रहे की भारत का तंत्र प्राचीन है या चीन का? बौद्ध धर्म के बज्रयान नें तारा को प्रमुख आराध्या माना और आज तक वो अपने 'गोम्पा में तारा को स्थान दिए हैं। ''कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज'' नें बाल्यावस्था में हिमाचल प्रदेश के ''लौहुल-स्पीती'' क्षेत्रों में भोटी भाषा और बौद्ध धर्म के तन्त्रयान को लामाओं से निकटता से समझा है। लगभग पांच वर्ष का अभ्यास और कौलमत नें ''कौलान्तक नाथ'' को बहुत कुछ प्रदान किया है। आज भी ''कौलान्तक नाथ'' का ''बौद्ध धर्म'' के प्रति 'मैत्री पूर्ण' प्रेम कम नहीं हुआ है।
जैसे ही गुजरात के अहमदाबाद में 19-20 जनबरी 2013 को ''तारा महाविद्या-नील सरस्वती साधना शिविर'' की घोषणा हुयी। ''कौलान्तक नाथ'' हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के निकट स्थित बोद्ध गोम्पा गए। वहां उनहोंने ''चीनाचार और बोद्धाचार'' को याद किया। माँ तारा से पूर्णता व ''हिन्दू और बोद्धों'' के मध्य मैत्री, प्रेम व शांति बनाये रखने की प्रार्थना की। आपकी सेवा में प्रस्तुत है। बोद्ध गोम्पा में ''कौलान्तक नाथ'' की एक छोटी सी दुर्लभ विडिओ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

बुधवार, 8 अगस्त 2018

कौलान्तक क्रमानुसार 'अक्षोभ्य भैरव' मंत्र
'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करता है 'तारा महाविद्या' के साधकों हेतु कौलान्तक क्रमानुसार 'अक्षोभ्य भैरव' मंत्र। ये मंत्र 'तारा महाविद्या' के सभी स्वरूपों की साधना हेतु अनिवार्य है व निरंतर साधना व दीक्षा काल में प्रयुक्त होना चाहिए। माँ तारा की अनियत्रित शक्ति को आगमानुसार केवल अक्षोभ्य पुरुष ही रोक सकते हैं। इस कारण हमारे संप्रदाय यानि 'उत्तर कौल' संप्रदाय (जिसे अब इस नाम जानते है.…किन्तु इसको पूर्व में योगिनी कौल मत कहा जाता था) के तांत्रिकों के अतिरक्त 'तंत्र योगियों' नें भी अक्षोभ्य पुरुष के ध्यान क्रम को सबसे प्रमुख व महत्वपूर्ण बताया है। हालाँकि 'पूर्व कौल' संप्रदाय की मान्यता इससे थोड़ी भिन्न है। दोनों मतों को 'कौलान्तक पीठ' नें सम्मान पूर्वक ग्रहण कर दोनों को स्थान दिया है जो गुरुमुख से आपको प्राप्त होता है ।

मंत्र-ॐ भ्रौं भ्रौं स: अक्षोभ्य भैरवाय ह्रौय ह्रौय भं हुं फट।