सोमवार, 1 जुलाई 2019

Kaulantak Nath and the title of Baba
Based on Kaula Siddha Dharma, Kaulantak Nath is not a baba or is considered to be a baba . A baba is socially misinterpreted word to denote some certain spiritual sect which is not related to Kaula Siddha tradition in whatsoever way possible. Baba itself is a word used in derogation by the society based on the constant attack of the Medias. Baba originally means fatherly figure but the modern day interpretation has deviated from its original meaning and used in a very derogatory way. Kaulantak Nath even in primitive era was not known by the title of baba nor in the modern day. Kaulantak Nath means lord of Kaulas and Kaulas are not babas. Kaulas are rajasic Shaivas. Therefore, Kaulantak Nath is never to be interpreted as a baba.

मंगलवार, 4 जून 2019

चेतना में वृद्धि
कौलान्तक पीठाधीश्वर कहते हैं-एक छोटा सा बालक धीरे-धीरे सीखता है और युवा होता है, वही ज्ञान धीरे-धीरे वृद्धावस्था तक पहुंचता है और समाप्त हो जाता है, किन्तु ऋषि परम्परा कहती है कि बौधिक ज्ञान की अपेक्षा साधक को चेतना में वृद्धि करनी चाहिए, तब कोई भी अवस्था क्यों न हो ज्ञान बढ़ता ही जाएगा, मृत्यु उसे समाप्त नहीं कर पाएगी. वो मृत्यु के बाद भी बढ़ता ही जायेगा. रहस्यमय बात है कि वो मृत्यु से अमृत तत्व की ओर ले जाएगा. किन्तु सबके लिए ये संभव नहीं. इसे उच्च धरा पर विराजमान साधक ही समझ पाता है.लेकिन इस उच्च धरा पर साधक को निरंतर अभ्यास और वैराग्य ही ले जा सकता है"-कौलान्तक पीठ टीम.

रविवार, 26 मई 2019

शिव कौन है ?
शिव कौन है?
कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज को कुछ प्यारे भक्तों नें कहा की आप साक्षात शिव है....महायोगी जी नें मुस्कुराते हुए उत्तर दिया........मैं शिव नहीं आप शिव हो इसलिए जहाँ देखते हो जिसे देखते हो शिव ही देखते हो.......ये आपके प्रेम की वो ऊँचाई है.....और भक्ति की वो पराकाष्ठा की मुझ जैसे साधारण औघड़ में भी शिव नजर आते हैं.........ये सृष्टि जिस भाव से देखेंगे वैसी ही नजर आती है. जब साधक शिवमय हो कर अपने अस्तित्व को शिव में विलीन कर देता है तो उसे त्रिशूल में शिव, डमरू में शिव, गंगा में शिव, चंद्रमा में शिव, पर्वतों में शिव, गुरु में शिव यहाँ तक की मुझ जैसे अज्ञानी में भी साक्षात् शिव नजर आते हैं. मुझमें शिव देखना मेरा नहीं आपके अपने उच्चतम चेतन धरातल का सूचक है. इसलिए मैं नहीं आप स्वयं शिव हो. आपके घट-घट में शिव का वास है. आप शिव भक्ति के कारण नित्य हो गए हो.....साक्षात् शिव हो गए हो. इसी कारण मुझमें भी शिव ही देखते हो, धन्य है आपकी शिव दृष्टि-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

गुरुवार, 9 मई 2019

कौलान्तक पीठ और महासिद्ध ईशपुत्र
 गौरवमयी हिमालय स्थित कौलान्तक पीठ-महारहस्य पीठ और महायोगी सत्येन्द्र नाथ

वो हिमालय का एक अद्भुत योगी है शायद 600 साल पहले समाप्त हो चुकी भारतीय सिद्ध परम्परा का लगभग आखिरी वारिस....एक युवा जो संजोये है बहुत से अनसुलझे रहस्य......जिसे लोग सिद्ध संत कहते हैं....कहा जाता है कि हिमालय उसे अपना पुत्र मानता है....लेकिन युवा योगी ने अपने को केवल भारत का एक आम नागरिक ही बताया....हजारों सिद्ध साधू नाथ और औघड़ परमहंस जिसे अपना गौरव मानते हैं वो विचित्रताओं से भरा एक युवा है जिसे महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के नाम से पुकारा जाता है,आपने ठीक समझा ये वही महायोगी सत्येन्द्र नाथ हैं जिन्हें कौलान्तक पीठ ने अपना पीठाधीश्वर नियुक्त किया,अनेक रहस्यमयी साधनाओं को संपन्न करके ही कोई इस पीठ का अधिपति नायक बन सकता हैं....भौतिक विज्ञान से कोसों दूर अध्यात्म का नैसर्गिक विज्ञान अंगडाइयां लेता है,पुस्तकों में लिखित ज्ञान के अतिरिक्त जो भी आध्यात्मिक रहस्य हैं वो कौलान्तक पीठ के ही पास हैं...ये वही कौलान्तक पीठ है जिसे कुलांत पीठ के नाम से जाना जाता है....जिस पीठ ने हजारों साल पहले देवी देवताओं की पहली बार पृथ्वी पर प्रतिमाएं बनायीं थी,ये वही कौलान्तक पीठ है जिसे मंत्र विद्या तंत्र योग आयुर्वेद का संरक्षक और प्रचारक कहा गया....इस पीठ का कार्य था धर्म जगत के रहस्यों को खोजना,अनसुलझे सवालों को हल करना,शायद आपको याद हो रामायण में जिस सिद्धाश्रम का विवरण है वो यही पीठ है,ये सारा संसार जनता है कि कौलान्तक पीठ का नाम लेते ही कम्कम्पी छूट जाती है क्योंकि वो बर्फीला हिमालय और कडकडाती ठण्ड हौंसला पस्त करके रख देती है....इसी कौलान्तक पीठ में आज भी 33 करोड़ देवी देवता निवास करते हैं......आज भी तपस्या के लिए सिद्धक जन केवल कौलान्तक पीठ को ही प्रमुख और पवित्र मानते हैं.....बहुत से लोग इस कौलान्तक पीठ को नीलखंड महाहिमालय उत्तराखंड आदि नामों से भी जानते हैं....योगिनियों...किन्नरियों...अप्सराओं...गन्धर्वों...देवताओं...यक्ष-यक्षिणियों....जोगिनिओं...भूतों...सहित न जाने कितनी योनिया यहाँ गुप्त रूप और प्रकट रूप में निवास करती हैं....तान्करी भाषा के ग्रंथों में इस पीठ के विवरण भरे पड़े थे...लेकिन अफसोस की बात है कि उन ग्रंथों को केवल विदेशी आक्रमणकारियों ने नहीं बल्कि इसी देश के कुछ नासमझ लोगों नें भी जला जला कर समाप्त कर दिया....जादूगरी की दुनियां में कौलान्तक पीठ वो नाम था जहाँ से विश्व के अनेक जादूगर गुरु पैदा हुए थे....तंत्र का इंद्रजालिक संसार देख कर होश ग़ुम हो जाते थे.....हठयोगियों का ईश्वर विहीन साम्राज्य देखने का साहस हर किसी में नहीं था....यज्ञों की अनूठी परम्पराएँ...कर्मकांड का अनूठा संसार था कौलान्तक पीठ....शायद आप नहीं जानते कि जो पूजा पाठ आज आप कर रहे हैं उसे बनाने का श्री श्रेय भी कौलान्तक पीठ को ही जाता है....भले ही लोग आज इस बात को स्वीकार न करें लेकिन सत्य को प्रमाणों की आवश्यकता नहीं होती...कहावत थी की गुरु जाए तो एकायामी-कौलान्तक जाए तो बहुआयामी .......अर्थात संसार के किसी भी गुरु के पास जाएँ तो वो केवल एक ही विषय में आपको परांगत बना सकता है...लेकिन कौलान्तक पीठ जा कर विद्या ग्रहण करें तो आप बहु आयामी हो सकते हैं....कौलान्तक पीठ का एक भाग वाम मार्गियों का भी था.....जिस कारण सारे सात्विक मार्गी घबराते थे...आज भी कौलान्तक पीठ की वाम मार्गी शाखा के प्रमुख उत्त्रान्चालाधिपति शंभर नाथ जी अबधूत हैं सात्विक मार्ग के महातपस्वी योगी परमहंस चिदानंद नाथ है.....रजस मार्ग के सिद्ध प्रवर्तक आज हमारे बीच कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के रूप में हैं....सबसे प्रसन्नता की बात कि हिमालय के महासिद्ध योगी योगिराज सिद्धसिद्धांत नाथ जी महाराज के ही शिष्य कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी को तीनो में से सर्वश्रेष्ठ कहा गया है.....केवल बातों में नहीं....सिद्ध साधनाओं हाथ साधनाओं के और तीनों शाखाओं के सार ज्ञान होने के कारण ही महायोगी सर्वश्रेष्ठ कहलाये...लेकिन ये अति दुखद पहलू है कि आज कौलान्तक पीठ का नामों निशाँ तक नहीं रहा है...कौलान्तक पीठ के नाम पर बची हैं कुछ प्राचीन पांडुलिपियाँ....और महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज....पहले पहल महायोगी जी ने कौलान्तक पीठ को बचाने के लिए कई लोगों को जोड़ा.....उनसे हाथ पाऊँ जोड़ कर सहायता मांगी.....लेकिन यही लोग जल्द ही कुत्सित स्वार्थों के कारण महायोगी और पीठ के शत्रु बन गए...ये तो भला हो कि ऐसे लोग चुनिन्दा है...गिनाये जा सकते हैं केवल चार या पांच ही....सरकार की तरफ भी महायोगी जी ने निहारा पर बेकार.....सन 2010 तक महायोगी जी नें सबसे मिन्नतें कर कर के इस पीठ और परम्पराओं के संरक्षण की बात कही लेकिन 2011 से महायोगी जी सीधे धर्म जगत के साधकों से जुड़ कर शाश्वत विद्याओं का प्रचार कर रहे हैं........साथ ही समस्या ये भी है कि आज की भाग दौड़ वाली जिंदगी में किसी के पास समय नहीं हैं लोग जटिल साधनाओं को समझ नहीं पाते...लोग चाहते है धर्म के नाम पर बस थोड़ी देर भजन करें...नाचें...झूमें...और धार्मिक मनोरंजन हो ज्यादा से ज्यादा कथा या प्रवचन हो जाए....हो सके तो साथ ही सुरक्षा की गारंटी कोई धर्म या धर्मगुरु दे दे....और कुछ नहीं....क्योंकि वो समझते हैं कि शायद इससे ज्यादा की आवश्यकता ही नहीं है....उनको धर्म की याद बुढ़ापे में मौत को देख कर ही आती है या फिर गंभीर बिमारी की दुःख की हालत में....ऊपर से इतने धर्म गुरु और इतने सारे ग्रन्थ कि क्या करें ये हम नहीं समझ पाते तो वो क्या समझेंगे? इसलिए कौलान्तक पीठ को फिर अपने रूप में आने में समय तो लगेगा...लेकिन कौलान्तक पीठ अपने स्वरुप में फिर आएगा जरूर....और ये सिलसिला शुरू हो चुका है....महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के अद्भुत आश्रय में रहने वाले अनेक साधक एक जुट हो कर सनातन की सबसे पुरानी पीठ को तो जिन्दा कर ही रहे हैं साथ ही आत्मकल्याण और जीवन को सुखमय भी बना रहे हैं....मंत्र योग ज्योतिष तंत्र रसायन आयुर्वेद आदि विद्याओं का लाभ उठा कर जीवन के कष्टों को दूर कर सुखमय जीवन जी रहे हैं.....अब सबको समझ आने लगा है कि कौलान्तक पीठ क्यों इतना ज्यादा प्रचारित और पसंदीदा था....हर ओर बस कौलान्तक पीठ कि ही लहर दौड़ रही है.....ये सब आपके सहयोग से हुआ है....आज राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर कौलान्तक पीठ की चर्चा हो रही है.....कौलान्तक पीठ यानि के रहस्य पीठ......तो देर किस बात की आइये जाने कौलान्तक पीठ के हर रहस्य को.....जानें महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के अद्भुत ज्ञान को....सीखें कुछ ऐसा जो जीवन की परिभाषा बदल दे....जीवन जीने की नयी चाह जगा दे...जिंदगी को जीने का लक्ष्य दिखा दे....हमारा प्रयास है कि हम आपको दें अद्भुत जानकारियां....लाभदायक जानकारियां...साथ ही मनोरंजक जानकारियां...तो कौलान्तक पीठ के अलग अलग साधक द्वारा बनाई जा रही इस वेबसाईट में आपका हार्दिक स्वागत है....बस जुड़े रहिये और जानते रहिये कौलान्तक पीठ को......
हिमालय जो पृथ्वी पर सबसे बड़ा रहस्य है....वही महारहस्यपीठ स्वरुप पवित्र देवात्मा हिमालय ही कहलाता है दिव्य "कौलान्तकपीठ"........जहां ज्ञान अध्यात्म योग दर्शन तंत्र आयुर्वेद ज्योतिष सहित महातप का महाशक्तिस्थल है.......जिसकी रहस्यमय साधनाओं के बारे में सुनना भी रोमांचक लगता हैं.....विश्व के लगभग सभी महानतम दिव्य अवतारी कौलान्तक पीठ तक अवश्य किसी न किसी कारणवश पहुंचे ही हैं.....इसी से कौलान्तक पीठ की महानतम गरिमा का अनुमान लगाया जा सकता है.....इसी पवित्र पीठ के वर्तमान प्रखरतम पीठाधीश्वर हैं........हिमालय के सबसे दिव्य योगी कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज......हम ह्रदय से आपका कौलान्तक पीठ और महायोगी जी के रहस्यमय पवित्र संसार में हार्दिक स्वागत करते हैं.....जाने की कौन हैं महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज.....और कहाँ है कौलान्तक पीठ.....जिसकी कल्पना मात्र से साधकों एवं भक्तों के शरीर में स्पंदन होने लगता है.....परमहंस जहा विचरण को जीवन का गौरव मानते हैं.......कौलान्तक पीठ एक मात्र ऐसा पीठ स्थान है जो एक साथ सात्विक राजसिक तामसिक साधना पद्धतियों को सिखाता है....जिसका कारण है सिद्ध गुरुओं का इस पीठ को आशीर्वाद होना.....जैसे महाऋषि लोमेश जी......महाऋषि काकबुशुन्डी जी... महाऋषि दत्तात्रेय जी..कपिल मुनि जी....विभांडक ऋषि जी......मार्कंडेय ऋषि जी....भगवान् परशुराम जी....महाऋषि विश्वामित्र जी....महाऋषि वसिष्ठ जी....ममहाऋषि कश्यप जी......मुनि अगत्स्य जी.....लरकाई ऋषि जी.....दैत्यगुरु शुक्राचार्य जी.....लोपामुद्रा जी....गार्गी देवी जी...साथ ही साथ मत्स्येन्द्र नाथ जी....गुरु गोरक्षनाथ जी....नव नाथों सहित चौरास्सी सिद्धों जैसे अनेक दिव्य तेजस्वियों के कारण संयुक ज्ञान इस पीठ को प्राप्त हुआ.....लेकिन याद रहे पीठाधीश्वर बनते ही महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी ने बलि प्रथा...नशा सेवन....कुत्सित आचरण को तंत्र से बहार का रास्ता दिखा दिया है....महायोगी जी के अनुसार ये सब कालांतर में तंत्र के साथ हुई छेड-छाड़ का परिणाम हैं.....महायोगी जी नें तंत्र का शुद्ध और पवित्र रूप ही सामने लाया है...महायोगी जी ने तंत्र की वास्तविक परिभाषा दे कर डरावने शब् साधकों को.....बदबूदार औघड़ों के स्थान पर पवित्र एवं शुद्ध तंत्र साधक साधिकाओं को स्थापित किया है....तंत्र के नाम पर प्रचलित सड़ी-गली मनघडंत साधनाओं को दरकिनार कर दिव्य चक्र पूजा......आवरण पूजा......यन्त्र साधना आदि को सामने लाया......जिसका अनेक कथित तांत्रिको औघड़ों ने विरोद्ध किया....लेकिन महासंकल्पवान महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के आगे किसी की चल न सकी...कौलान्तक पीठ से कौलाचारी साधक अलग हो गए.....जो महायोगी के महाज्ञान को न समझ सके वे वाममार्ग शिरोमणि शंभर नाथ जी महाबधूत की शरण में जा कर नए पंथ में जुड़ गए.....महायोगी ने कहा मुझे कथित तांत्रिकों की आवशयकता ही नहीं है....कौलान्तक पीठ बदनाम हो चुके तंत्र को साफ सुथरा बना कर अनेक सात्विक भैरव-भैरवियों को जोड़ेगा.....आपको बता दें कि कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर की योग्यताएं आम पीठाधीश्वरों जैसी नहीं होती बल्कि बड़ी ही विचित्र हैं.....जैसे सबसे पहले अभिनय कला आनी चाहिए क्रमशः गीत.......संगीत....नृत्य.....युद्ध.....साहित्य-काव्य.....चित्रकला......वाणी विलास.....सम्मोहन.....कौतुक कला यानि जादूगरी....रहस्य कला....यानि की अज्ञात को अज्ञात के माध्यम से जानना......आयुर्वेद...शल्य...श्लाक्य...काय....नाडी...निदान...औषधि सहित.....मंत्र....सात्विक..राजसी...तामसिक तथा लिंगानुसार क्रमश: विविध मंत्र.......जैसे पुलिंग...स्त्रीलिंग....नपुंसक मन्त्रों का ज्ञान.....विभिन्न विद्या मंत्र....बीज मंत्र और स्तुति मन्त्रों सहित शाबर....देशज मन्त्रों का ज्ञान होना चाहिए.....तंत्र की पटल पूजा.....न्यास पूजा....चक्र पूजा.....यन्त्र निर्माण...यन्त्र रहस्य....वास्तु...स्थान..सहित विशवकर्मा विद्या....निर्माण विद्या.....काल ज्ञान सहित महाविद्या...योगिनी मंडल....तथा विविध ज्योतिष ज्ञान...सामुद्रिक...सहित...पक्षी जीव शास्त्र....कर्मकांड सहित वेदोच्चार...षड्दर्शन....सहित शास्त्रज्ञान....कथा ब्रत सहित तीर्थ ज्ञान....असी अनेक कलाएं...विद्याएँ......अनेक चीजें तो मैं बता ही नहीं सकता......और जानता भी नहीं हूँ......आप महायोगी जी को गाते...नाचते....लड़ते....जादूगरी करते....ये सब करते हुए स्वयं देखेंगे.......जैसे जैसे धन की कमी दूर होगी.....वैसे-वैसे आप देख पायेंगे एक ऐसा संसार....जिसे देख कर आप दांतों तले अंगुलियाँ दवा लेंगे....हमें दुःख है कि जहाँ ज्ञान होता है शायद वहां लक्ष्मी नहीं होती.....अन्यथा सीमित सा धन भी यदि पीठ के पास हो तो देश के युवा हैरान रह जायेंगे ये सब देख कर कि उनके देश में धर्म अध्यात्म आखिर इतना अद्भुत कैसे था....दुनिया ने भारत से सीखा है......आर्यावर्त से सीखा है....और भारत ने कौलान्तक पीठ में रहने वाले योगियों ऋषियों मुनियों से सीखा है.....आइये कौलान्तक पीठ को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग दें.....स्वयम भी पवित्र मार्ग पर चलें और सभ्यता को भी नयी और परखी हुई दिशा प्रदान करें....ॐ महाकालाय विकर्तनाय मायाधराय नमो नम:


सोमवार, 30 जुलाई 2018

कौलान्तक पीठ हिमालय
॥ ॐ महाकालाय विकर्तनाय मायाधराय नमो नमः॥


हिमालय की दिव्य भूमि में कुल्लूत नाम का एक प्राचीन देश.... जहाँ मां भगवती पाराम्बा का निवास माना गया तथा शिव की तंत्रमयी तपोभूमि मानी जाती है... में एक स्थान ऐसा भी था , जिसे कौलान्तक पीठ कहा जाता था। इस पीठ के पर्यायवाची नाम क्रमश: कुलांतर पीठ, कुलान्तक पीठ, कोलांतर पीठ, कौलांतर पीठ हैं। इस पीठ की स्थापना स्वयं शिव द्वारा की गयी मणि जाती है। क्योंकि माँ सती से सम्बन्धित होने के कारण भगवान शिव ने स्वयं हिमालय के एक भाग में इस पीठ की स्थापना की थी। इस पीठ के प्रथम पीठाधीश भगवान लोमेश ऋषि को माना जाता है। उसके बाद क्रमश: अनेक दिव्य ऋषियों ने इस पीठ को संभाला। कलयुग में वर्ष २००२ में हिमालय की दिव्य ऋषि परम्परा के द्योतक प्रातः स्मरणीय पूज्य पाद श्री सिद्धसिद्धांत नाथ जी महाराज ने इस पीठ पर श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज को पीठाधीश के रूप में प्रतिष्ठित किया गया व पहली बार महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज ने हिमालय की प्राचीन पीठ व भारत की सबसे प्राचीन पीठ कौलान्तक पीठ को पुन: विश्व भर में प्रसारित व प्रतिष्ठित करने का दायित्व स्वीकार किया। कौलान्तक पीठ तप , साधनाओं और अध्यात्म ज्ञान का भंडार है। यह एक मात्र ऐसा पीठ है जिसके साधकों को ६४ कला संपन्न होने का गौरव प्राप्त है। सांकेतिक रूप से शास्त्रों में इसी पीठ को ज्ञान गंज, सिद्धाश्रम व महा हिमालय कहा गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से हिमाचल के कुल्लू शहर के मध्य से बहती विपाशा नदी जिसे वर्तमान में व्यास नदी भी कहा जाता है के साथ लगता पूर्वी व उत्तरी क्षेत्र तिब्बत के अंतिम पठार तक कौलान्तक पीठ कहलाता है व नदी के दक्षिणीपश्चिमी भाग को जालंधर पीठ माना गया है जिसकी स्थापना काक भुशुण्डी जी महाराज ने की थी। रेशमी मार्ग पर आने वाले दुसरे देश के आक्रमणकारियों ने दोनों पीठों को नष्ट कर दिया था। किन्तु कौलान्तक पीठ को उस समय के पीठाधीश ज्ञानेंद्र नाथ जी महाराज ने पुनर्प्रतिष्ठित किया तथा यह भी कथा आती है की उस समय नव नाथ और चौरासी सिद्ध हिमालय भ्रमण करते हुए इस पीठ पर पहुंचे तथा उन्होंने इस पीठ के जीर्णोद्धार में सहायता की। इसी कारण इस पीठ पर नाथ सम्प्रदाय और सिद्ध संप्रदाय का भी अधिकार हो गया जो मत्स्येन्द्र नाथ जी महाराज व गुरु गोरख नाथ जी महाराज द्वारा स्थापित है। कौलान्तक पीठ में साधक अलग- अलग देशों, अलग - अलग द्वीपों से ज्ञान व विद्या प्राप्त करने आते थे। इस पीठ का पीठाधीश्वर बनने हेतु योग, ज्योतिष, तंत्र, वास्तु, कर्म कांड , आयुर्वेद सहित अनेक विषयों का ज्ञान होना अनिवार्य है व हिमालय के उच्चतम क्षेत्रों में हट साधनाओं को संपन्न करना होता है तथा गुरु शिष्य परम्परा के अनुकूल ही यह पीठ प्राप्त होती है। किन्तु खेद का विषय यह रहा की लगभग २००० सालों से कौलान्तक पीठ का परम्परा हिमालय के क्षेत्रों में आंशिक रूप से जीवित रही लेकिन उसी कल से जालंधर पीठ सहित अन्य चार दिव्य पीठें लुप्त हो गयी। संभवतः इसी आशय को जगद्गुरु भगवान शंकराचार्य जी ने समझा व हिमालय की इन लुप्त पीठों के बराबर की चार पीठों की स्थापना की। किन्तु सकल जगत के लिए यह प्रसन्नता का विषय है के महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज ने सबसे प्राचीन कौलान्तक पीठ की पुनर्स्थापना का बीड़ा उठाया है। महायोगी स्वयं इस परम्परा से जुड़े हैं व नाथ परम्परा से भी दीक्षित हैं।
हिमालय की कठोर हठ सधानाओं से हो कर गुजरे है व लुप्तप्राय: हो चुकी टन्करी लिपि व भूतलिपि आदि का ज्ञान रखते हैं । अध्यात्म की सभी विधाओं में निपुण हैं व बाल्यावस्था से साधनारत हैं ..... हिमालय के अनेक क्षेत्रों में साधनों एवं तप क्रियाओं को संपन्न कर चुके हैं। ऐसे में आपका इस पीठ से जुड़ना मानव जीवन का गौरव है। आपके द्वारा यह पीठ पुनर्प्रतिष्ठित हो पायेगी तथा आदिकाल की तरह ही अनेक राष्ट्रों व द्वीपों के साधकों को दिव्य ज्ञान प्रदान कर पाएगी तथा वास्तविक साधनात्मक जीवन का पुनर्स्थापन हो पायेगा। कौलान्तक पीठ से जुड़ कर आपने अपना अमूल्य सहयोग इस पीठ को प्रदान किया हैं। अतः पीट पूरण निष्ठां से आपको आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति के मध्यमो से अवगत करवाएगा। कौलान्तक पीठ का कार्य किसी प्रदेश अथवा देश का कार्य न हो कर एक वैश्विक कार्य है। अतः आप गणमान्य सदस्यों की राय अपेक्षित है। कौलान्तक पीठ का कार्य पूरी तरह पारदर्शी व धर्मनिष्ट है। कौलान्तक पीठ के इस वैश्विक महा यज्ञ में आपका सहयोग एह आहुति की तरह अमूल्य व गौरवमयी रहेगा। अतः सभी दिव्य पथ के साधकों से अनुरोध है की वे कौलान्तक पीठ की स्थापना में अपना सहयोग दें ..........और हिमालय के दिव्य ज्ञान से स्वयं जुड़ें तथा विश्व को जोड़ें।

शनिवार, 21 जुलाई 2018

रक्तेश्वर : : बच्चों के लिए एक जादुई काल्पनिक कहानी
              
यह कहानी एक काल्पनिक कहानी है। यह इशपुत्र द्वारा तेरह वर्ष की बहुत छोटी उम्र में लिखा गया था। उन्होंने इसे बच्चों के लिए एक बाल लेखक के रूप में लिखा था। इतनी छोटी उम्र में लिखा गया है, विभिन्न लेखन त्रुटियां हैं। इसे अनुवाद के दौरान भी अपनी मौलिकता को संरक्षित करने के लिए सही नहीं किया गया था। इस पुस्तक में, एक तरफ हिंदी में मूल हाथ से लिखे गए पृष्ठों के साथ, इसका अंग्रेजी अनुवाद भी दिया जाता है। इस पुस्तक को सुंदर ग्राफिक्स और तस्वीरों के साथ और सजाया गया है। पुस्तक की कहानी न केवल युवा बच्चों के लिए बल्कि वयस्कों के लिए भी प्रासंगिक है। इस कहानी का महत्व इस तथ्य में निहित है कि महा योगी ने इसे लिखा है जब वह एक युवा योगी थे। आज हजारों और लाख लोग हैं जो महायोगी सत्येंद्र नाथ (इशपुत्र) का सम्मान करते हैं, प्यार करते हैं और पूजा करते हैं। तो उनके लिए यह पुस्तक संरक्षित और प्रस्तुत की गई है। यद्यपि इशपुत्र ने कई कहानियां लिखी हैं, लेकिन इस पुस्तक में केवल एक कहानी शामिल है ताकि समय और उम्र की प्रामाणिकता को संरक्षित किया जा सके।
विशेषताएं और विवरण
प्रकाशन दिनांक: 3 फ़रवरी 2015
प्रकाशक: कौलंतक पीठ हिमालय
अंग्रेजी भाषा

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कौलान्तक पीठाधीश्वर की योग्यताएं
कौलान्तक पीठ के
पीठाधीश्वर होने के मायने सबसे अलग
हैं, आमतौर पर पीठ का अर्थ होता है एक
स्थान विशेष जैसे कोई मंदिर आश्रम स्थान विशेष, किन्तु कौलान्तक
पीठ कोई एक घर या मंदिर नहीं है
वरन हिमालय का बहुत बड़ा भू भाग है, जिस पर आज
भारत की सरकार का ही अधिकार है,
इसलिए आध्यात्मिक रूप से हिमालय की धर्म
संस्कृति का प्रमुख होना ही कौलान्तक
पीठाधीश्वर होना है, और ये तो
सबसे जटिल है क्योंकि यदि आपके पास कोई मंदिर हो तो आप
उसे संभालें या कोई स्थान या आश्रम हो तो उसेर संभालें वहां
बैठ कर धर्म कार्य सम्पादित करें, किन्तु जब खुला आकाश
हजारों योजन तक फैला हिमालय हो तो क्या किया जा सकता
है, ये ठीक वैसा ही है,
की आपको कहा जाए की आप अरवों
की संपत्ति के मालिक हैं किन्तु आप
किसी भी कीमत पर एक रूपया
तक नहीं खर्च कर सकते, तो कौलान्तक
पीठाधीश्वर होने का अर्थ है कुछ
भी न होना, क्योंकि संसार तो पूछेगा ही
की आखिर आपका आश्रम कहाँ है, क्योंकि
उनको तो उसकी आदत है और आपके पास कोई
जबाब नहीं, संभवत: आपको समझ पाना उनके लिए
अब बिलकुल असम्भव है, ये तो एक पहलू हुआ, माना कि
भौतिक रूप से आप कोई सम्पदा या स्थान दिखने में असमर्थ हैं
किन्तु दूसरी और उतना ही विराट ज्ञान
प्रवाह है, सभी को ज्ञान ब्राहमण देते हैं
क्योंकि उनहोंने परम्परागत रूप से ज्ञान लिया है हालाँकि ये
कोई अनिवार्य नियम नहीं पर एक सामाजिक व्यवस्था
है और उनको ज्ञान देने वाले सन्यासी हैं जो
सिद्ध गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर समाज के हर वर्ग सहित
विशेषतय: ब्राहमणों तक ज्ञान पहुंचाते हैं, किन्तु
सन्यासियों के ये सिद्ध गुरु ही वो गुरु हैं जो
कौलान्तक पीठ यानि की हिमालय के
परम तेजस्वी ऋषि मुनि योगी परमहंस
होते हैं, जो इतनी कठोर तपस्या करते हैं कि
आम आदमी को बताते हुए भी डर
लगता है क्योंकि अधूरे ज्ञान के कारण उसको ये सब
किसी बड़े अत्याचार से कम नहीं लगता,
तब तक भूखे प्यासे साधना ताप का अभ्यास किया जाता है जब
शरीर की सबसे अंतिम सीमा
समाप्त हो जाये वो लगातार, गर्मी सर्दी,
वर्षा, जंगली जानवर, भोजन पानी का
आभाव, अकेलापन और भी न जाने कितनी
ही दारुण दुःख देने वाली परिस्थितियां का
सामना करते हैं जो सामने सदा ही मुह बाए
खडी रहती है, इस
पीड़ा का अंदाजा केवल पढ़ कर या कल्पना से
नहीं किया जा सकता, हिमालय के
किसी बर्फीले एकांत स्थान पर एक रात
काट कर देख लीजिये, चमड़ी तक फट
जाती है शरीर का रंग इतना कला हो
जाता है कि महीनो ठीक होने को
लग जाएँ, ये सब तो साधारण बाते हुयी, कौलान्तक
पीठाधीश्वर होने के अर्थ है, आप
को 64 कलाओं का ज्ञान होना चाहिए, 33 करोड देवी देवताओं का आवाहन व विसर्जन एवं पूजन
आना चाहिए, योग की सभी विधाओं का
ज्ञान होना चाहिए, तंत्र के मार्ग त्रय का भी
ज्ञान होना चाहिए, अघोर, सत्व, भक्ति, ज्ञान सहित
उपलक्षण विद्याओं का भी समावेश होना चाहिए,
पीठाधीश्वर का कठोर तपस्वी
एवं अभ्यासी होना अति अनिवार्य है,
गीत संगीत, नृत्य, हास्य, रुदन,
चित्रकला, लेखन क्षमता, कवित्व, श्रृंगार, युद्ध विद्या, दर्शन,
भाष्य क्षमता, वाक् शक्ति, कल्पनाशीलता,
परिश्रमी, मंत्र अभ्यासी, आयुर्वेद
ज्ञाता, रसायन विज्ञानी, कर्मकांडी व
योगी होना अति अनिवार्य है, 64 योगिनियों को
प्रसन्न कर व हिमालय के यक्ष एवं यक्षिणियों
की विद्याओं का ज्ञान होना ही
चाहिए, साथ ही लक्षण शास्त्र, सामुद्रिक
शास्त्र, काक भाषा, देश काल सहित विविध
ज्योतिषीय विद्याओं का ज्ञान भी, इन
सबसे ऊपर की चीज तो ये है कि
प्राचीन लिपियों जैसे ब्रम्ह लिपि, देव लिपि, भूत लिपि
व टाँकरी लिपि आदि लिपियों का ज्ञान होना चाहिए,
प्राचीन पांडुलिपियों में निहित ज्ञान का भी
पता होना चाहिए, धर्म की विविध परम्पराओं,
शाखाओं, मतों का भी ज्ञान हो, क्योंकि हिमालय
भूत प्रेत राक्षसों व दैत्यों की भी भूमि
है साथ ही नाग जाती वहां
बसती है तो पीठाधीश्वर को
नाग विद्या, गारुडी विद्या, भूत विद्या, दैत्य संवाद आदि
का परम्परागत ज्ञान होना चाहिए, कौलान्तक पीठ
को महारह्स्य पीठ कहा जाता है क्योंकि
इसकी बहुत सी बाते गुप्त व
रहस्यमयी हैं, जिनको सिद्धौग गुरु व दिव्यौघ गुरु
से प्राप्त करना होता है, बाल्यकाल से ज्ञान और विद्या को
गुप्त रख कर ही ज्ञान ग्रहण करने
की परमपरा है, एक
पीठाधीश्वर जो कि स्वयं
महायोगी होता है के लिए ये बात सबसे जटिल
हो जाती है कि उसे तंत्रमय कर्मकांड व पूजन
वर्षभर करते रहना होता है, जो कि दक्षिण
मार्गी पूजा के अंतर्गत आता है अर्थात बलि व
तामसिक पदार्थों रहित पूजन, जिसे राजसी पूजा
कहा जा सकता है, वेदों, पुराणों, शास्त्रों, तंत्र ग्रंथों यानि
आगम निगम का ज्ञान होना चाहिए, दस महाविद्याओं
सहित शिव शक्ति की प्रधान पूजा व
आवाहनी विद्या का सिद्धहस्त हो साथ
ही हिमालय पर लम्बे समय तक एकांत में
रहने व समाधी लगाने का सिद्धहस्त हो,
हिमालयों की पारिस्थितिकी का
अनुभवी हो, प्रमुखतय: शाक्त पंथी
हो किन्तु मूलतय: शैव पंथी होना चाहिए, सिद्ध
अथवा नाथ परम्परा अनुसार दीक्षित हो, काम्य
प्रयोगों सहित जनहित की विद्याओं का ज्ञाता
हो व अप्सरा साधना, भैरवी साधना,
यक्षिणी व योगिनी साधना संपन्न हो,
हादी कादी, बला अतिबला, सहित
अग्नि विद्या, मधु विद्या का जानकार हो, देशज देवलि
रीति को जनता हो और निडर निर्भय हो, यहाँ
सभी गुणों की व्याख्य करना संभव
नहीं है,
किन्तु बड़े ही गौरव का
विषय है कि चार शिष्यों नें इन विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया
और सफल हुए महायोगी सत्येन्द्र नाथ, जिनको
इस महारहस्य पीठ का
पीठाधीश्वर बना दिया गया|

शनिवार, 26 मई 2018

योनि पूजा
योनि तंत्र जैसे सामाजिक रूप से कलंकित और जटिल तंत्र के बारे में 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' कहते हैं की-भारत के ऋषियों नें जो भी मनुष्य को दिया वो अत्यंत श्रेष्ठ और उच्चकोटि का ज्ञान ही था. जिसमें तंत्र भी एक है. तंत्र में एक दिव्य शब्द है 'योनी पूजा' जिसका बड़ा ही गूढ़ और तात्विक अर्थ है. किन्तु कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों व वासना और भोग की इच्छा रखने वाले कथित धर्म पुरोधाओं ने स्त्री शोषण के लिए तंत्र के महान रहस्यों को निगुरों की भांति स्त्री शरीर तक सीमित कर दिया. हालांकि स्त्री शरीर भी पुरुष की भांति ही सामान रूप से पवित्र है. लेकिन तंत्र की योनी पूजा सृष्टि उत्पत्ति के बिंदु को 'योनी' यानि के सृजन करने वाली कह कर संबोधित करता है. माँ शक्ति को 'महायोनी स्वरूपिणी' कहा जाता है. जिसका अर्थ हुआ सभी को पैदा करने वाली. उस 'दिव्य योनी' का यांत्रिक चित्र ही 'श्री यन्त्र' है. वो 'महायोनी' ही 'श्री विद्या' हैं.
किन्तु तंत्र मार्गी साधक को सावधान रहना चाहिए.....विशेषतया स्त्री साधिकाओं को की कहीं योनी तंत्र के नाम पर उनको कुछ अनर्गल सिखा कर कोई उन्हें कूकर्म के मार्ग पर न ले जाए. ऐसा बहुत सी साधिकाओं के साथ पूर्व व वर्तमान में हुआ है......हो रहा है. इसीलिए कथित तांत्रिक समाज को गलत दिशा दे सकता है. बातों में या तर्क द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है. पर योनी तंत्र चर्चा का नहीं प्रत्यक्ष सिद्धि का क्षेत्र है. इसलिए तंत्र की खोज करने वाले रहस्य चित्रों को यथारूप न ले कर उसे 'स्वरुप रहस्यानुसार' समझें. योनी तंत्र सृष्टि उत्पत्ति का परा विज्ञान है. न की स्त्री शरीर का अवयव. 'माँ करुणाकारिणी स्वर्ण सिंहासनमयी कामरूपिणी कामाख्या योनी' ब्रह्माण्ड उत्तपत्ति का प्रतीक हैं व शक्ति उतपत्ति का प्रतीक....वो प्रत्यक्ष विग्रह है. जिसकी तुलना किसी अंग विशेष से करना.......'मातृस्वरूपिनी पराम्बा' का घोर अपमान ही होगा.
योनी तंत्र का इतिहास परम पवित्र और बेदाग़ है इसलिए सामाजिक लोगों को इसे कलंकित या विकृत नहीं समझना चाहिए, बस तांत्रिकों की शक्ल में छिपे भेड़ियों से सावधान रहना चाहिए'-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.