सोमवार, 23 दिसंबर 2019

हे महादेव तू इतनी दया कर
हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
पाऊं मैं तेरा ध्यान हृदय में, ध्याऊं मैं तेरा ज्ञान।

निस दिन मैं तुझको बुलाता ही जाऊं, मिट जाए मेरी पहचान।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
मेरा मुझमें कुछ रह न पाए, तुझसी छबि मैं बनाऊं।

पागल सा बनकर मैं बढ़ता ही जाऊं, तुझको पुकारू मैं तुझको बुलाऊं।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
आगम निगम अब आंखे हो मेरी, शिव ही हो मेरे प्राण।

सब दोष गुण अब शिव को ही अर्पित, अर्पित ये मानव मान।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
गोपनीय रहस्य उजागर हो, सत्य का हो प्रकाश।

झूठे सारे असत्य संभाषण, पापों का हो जाए नाश।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
- महासिद्ध ईशपुत्र

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 7


देश, काल, स्थान और स्वभाव के अनुरूप मंत्र, औषधि और तप भी भिन्न भिन्न परिणाम उत्पन्न करते हैं! इसी प्रकृति में रहकर संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जाता है! तथा उसे भोजपत्र और ताड़ पत्रों पर अंकित कर सभ्यता को दिया जाता है! और सभ्यता उन्हीं पन्नों के माध्यम से अलौकिक ज्ञान को समझने की चेष्टा करती है! हिमालय पर इनके अनेकों गुप्त स्थान होते हैं, जहां आम मानव न पहुंच सके! ऋतु परिवर्तन होने के साथ-साथ साधना का तरीका भी परिवर्तित होता चला जाता है! अक्सर योगी अपनी साधनाओं के लिए ऐसे ऐसे स्थान चुनते हैं जहां जाना बड़ा विकट हो! शीत ऋतु में योगी अपनी देह पर भस्म मल लेते हैं! हिमालयों की सीधी पगडंडियों पर चलकर यह अक्सर दरों के आर पार गुजर जाया करते हैं और कभी पतझड़ जैसी ऋतु आने पर यही जोगी शरीर पर मृदा का लेप कर अपने देह को विशेष प्रकार के वृक्षों के सूखे पत्तों में स्थिर कर समाधि लगाने का प्रयत्न करते हैं! जिसे देखते ही अपने आप में एक विचित्र अनुभूति होती है! संपूर्ण मानवीय धारणाओं को दरकिनार कर अपने मस्तिष्क के विभिन्न तंतुओं को जागृत कर ये अतीन्द्रिय हो जाते हैं! सदा अपनी क्रियाओं में एकाग्रता और एक निष्ठा रखना ही इनकी सफलता का परम रहस्य है! प्रकृति में जहां भी इन्हें सुंदर स्थान मिल जाए बस वही समाधि लगाने के लिए बैठ जाते हैं! फिर वह चाहे नदी हो, नाला हो, पर्वत हो, कंदरा हो या फिर घना वनप्रदेश! यहां तक कि वृक्षों के ऊपर, किसी विशाल चट्टान के नीचे, झाड़ियों के अंदर अथवा किसी भी शुद्ध स्थान में इन्हें समाधि लगाए देखा जा सकता है! क्यों क्या हम इस ऋषि परंपरा को भूल गए? शायद यही वह परंपरा है जिस पर चलकर सभी ऋषि-मुनियों ने ज्ञान प्राप्त किया था! किंतु अब शायद बहुत कम लोग शेष रह गए हैं जो इस विधा को जानने वाले हैं! आज सभ्यता प्रकृति से दूर होती जा रही है! कृत्रिम ता में लीन होती जा रही है! यही कारण है कि वे निरोगी नहीं है! वह स्वस्थ नहीं है! वह आत्म सत्ता से जुड़े नहीं है! अब वह जमाने शायद बीत गए जब एकांत में साधक आत्मचिंतन में तल्लीन नजर आता था! आज नदी, नाले, कंदराएं, गुफाएं, पठार और वृक्षों के कोटर रिक्त हो गए हैं क्योंकि आज वहां कोई आत्मा तितिक्षु नहीं है! ऐसा श्रेष्ठ ऋषि जीवन आखिर क्यों छूट गया? आखिर मानव के मन में मलिनता क्यों आ गई? मानव परमात्मा से, प्रकृति से और अपने आप से दूर क्यों हो गया?
क्योंकि वह योगी बनना ही भूल गया! वह साधना की विलक्षणताओं को ही भूल गया! आइए हम भी योगी बनने का प्रयास करें, हम भी ऐसा जीवन जीने का प्रयास करें ताकि हम विराट बन सके, हम उस शाश्वत सत्य को जान सके जिससे यह सृष्टि उत्पन्न होती है और अंततः जिसमें यह सृष्टि पूर्ववत समा जाती है! हम जान सके अध्यात्म के शीर्षतम सोपानों को! हम जीवन के उस पार देख सके! हम अथाह ज्ञान को प्राप्त कर अमृत मार्ग की ओर बढ़ सके! - महासिद्ध ईशपुत्र

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 6

आज हम वास्तविक मार्ग से च्यूत हो गए हैं। आज हमें वास्तविक मार्ग बताने वाला ही कोई ना रहा! आज स्वयं तपस्या करने वाला ही ना रहा! आज नैसर्गिक ज्ञान और अलौकिक ज्ञान को जानने वाला शायद कोई ना रहा! आज शीतलता और ग्रीष्मा को सहने वाले योगी ही न रहे! आज वैभव छोड़कर हिमालय विचरण करने वाले न रहे! शायद इसीलिए आज वास्तविक धर्म खो गया है और रह गया है मात्र नकली और बनावटी धर्म! योगियों की साधना पद्धति अपने आप में ही बड़ी विचित्र होती है! जितना भी हम जानने का प्रयास करें उतना ही कम पड़ता है! इस प्रक्रिया को शब्दों में बांध लेना एक मूढ़ प्रयास ही होगा ! हिमालय की गहरी तराइयों एवं घाटियों में रहने वाले यही योगी हमारी संस्कृति के प्रतीक है! हिमालय के आकाश के सूर्य है! तथा यही है वो विलक्षण मानव को मानवता का सन्देश देते है! और उस परमात्मा की ओर सोचने पर विवश कर देते हैं, जिसके अस्तित्व से हम आज शायद कट से गए हैं! अभी तक कोई समझ नहीं पाया इनके प्रकृति प्रेम को! अभी तक कोई जान नहीं पाया इनकी खोजों को! अभी तक कोई समझ नहीं पाया इन मायाधारियों की माया को! कभी यह महीनों एक स्थान पर रहकर समाधि लगाते हैं, तो कभी विचित्र क्रियाएं करते हैं! और प्रत्येक क्रिया का अपना एक गूढ़ विज्ञान होता है! सभ्यता से दूर रहकर सर्वदा अपने चित्र को परमात्मा की ओर लगाने वाले यह योगी अद्भुत अनुभवों से भरे होते हैं! यही कारण है कि इतिहास में योगियों को सर्वश्रेष्ठ माना गया है! प्रकृति के खूबसूरत प्रांगण में बसने वाले, शुद्ध वायु और जल का सेवन करने वाले, कठिन परिवेश में अपने जीवन को ढालने वाले योगी ही शाश्वत सत्य को जान पाते हैं! बाल्यावस्था से युवावस्था तक लगातार ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है! साथ ही योग, ध्यान, ज्योतिष, वास्तु, नक्षत्र विज्ञान, पारद विज्ञान, पशु शास्त्र, पक्षी तंत्र, तंत्र ग्रंथ, आगम-निगम, शावर इत्यादि वैदिक कर्मकांड जैसी अनेकों विधाओं का स्वयं अध्ययन करना पड़ता है!
- महासिद्ध ईशपुत्र

सोमवार, 9 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 5
जहां घने जंगल होते हैं अथवा वन्य प्राणियों का भय रहता है वहां योगी अपनी साधना हेतु ऐसे स्थानों का चुनाव करते हैं जहां किसी प्रकार का पशु पक्षी तंग न कर सके और वो घंटों समाधि में लीन रह सके। आज इस जगत में धर्म अध्यात्म का यह सनातन मार्ग लगभग लुप्त हो चुका है! बड़ी बेदना है कि सभी लोग किताबी ज्ञान अथवा बौद्धिक चातुर्य को ही धर्म और अध्यात्म समझ बैठे हैं । हमें याद रखना चाहिए कि यदि हमें शाश्वत सत्य को जानना है तो हमें भी कुछ कुछ इसी तरह की प्रणाली में से होकर गुजरना होगा । प्रकृति को समझकर आत्मसात करना होगा। अपने भीतर की दुभितियों से मुक्त होना होगा। प्रकृति में इस कदर खो जाना होगा कि हम अपनी सत्ता को ही भूल जाए! और साथ ही अनेकों प्रयासों से अपनी चेतना को विकसित करना होगा। प्रकृति के एक एक हिस्से से हमें शिक्षा ग्रहण करनी होगी। जिस प्रकार योगी हिमालय के शिखरों पर साधना करते हैं उसी प्रकार वह भीतर की चेतना के उच्चतम सोपान पर होते हैं। आखिर वह क्या करते हैं? यह सब तो गुप्त है! लेकिन निश्चित ही उद्देश्य चेतना का विकास ही है। मार्ग अनेक हो सकते हैं लेकिन उद्देश्य एक ही होता है। कभी सूरज की तपती गर्मी, कभी हिमालय का निम्न तापमान, कभी तेज बरसात, कभी प्रकृति का कोप... सब सहते हुए योगियों को अपने मार्ग पर बढ़ना होता है! मार्ग में अनेकों परीक्षाएं होती है उन्हे लांघते हुए ही साधना में सफलता पाई जा सकती है। आज ऋषि परंपरा का सूर्य डूब रहा है! आज वास्तविक खोज के मार्ग अवरुद्ध हो चुके हैं! आज हमें खोजना होगा भारतीय ऋषि परंपरा को! हमें स्वयं तप करना होगा।
- महासिद्ध ईशपुत्र

मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 3
योगी स्वयं पर्यावरण की बारिक परख रखते हैं इसलिए वह स्वयं ही अपनी साधनाओं में ऋतु अनुकूल परिवर्तन करते हैं। इसके साथ ही साधना काल में भोजन का बड़ा महत्व रहता है। अपनी दैनिक तपश्चार्य के पश्चात कुछ समय भोजन के निर्माण के लिए भी दिया जाता है; यह भोजन भी अत्यंत सादा होता है। साधना काल में नमक, मिर्च आदि से युक्त भोजन नहीं किया जाता! और ना जिव्हा की लोलुपता के लिए किसी प्रकार का स्वाद ही लिया जाता है! योगी अपने भोजन में कंदमूलों का अधिक सेवन करते हैं और भिन्न भिन्न प्रकार के सूखे पत्तों को अथवा फलों को एकत्रित कर अपने साधना काल में प्रयुक्त करते हैं। आलू लेकर उसे आग में भूना जाता है और उसका भोजन किया जाता है। साथ ही कभी-कभी आटे से विशेष प्रकार की मोटी मोटी रोटियां बनाई जाती है, जिन्हें तिककड़ कहा जाता है; ये तिक्कड मां अन्नपूर्णा का प्रसाद कहे जाते हैं। साधना काल में प्रत्येक योगी को स्वपाकी बनना पड़ता है तथा बड़े धीर स्वभाव से संयम पूर्ण प्रत्येक आचरण करना होता है क्योंकि प्रत्येक क्रिया उसके विकास को प्रभावित करती है।
- महसिद्ध ईशपुत्र

रविवार, 1 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 2
योगी अलग-अलग तौर तरीकों से साधनाएं करते है। कभी किसी गुफा में सूखे पत्ते बिछाकर घंटों समाधि में लीन रहते हैं, तो कभी किसी वृक्ष के नीचे । हमेशा इनके पास बहुत कम सामान पाया जाता है; एक त्रिशूल अथवा चिमटा, और दूसरा कमंडल । कमंडल में जल अथवा भोजन रखा जाता है; तथा चिमटा और त्रिशूल अपनी रक्षा के लिए हथियार है। योगी अपने आप को बहुत कष्ट देते हैं लेकिन उस कष्ट से मिलने वाला लाभ सम्पूर्ण जगत को मिलता है। योगियों को समाधि लगाना व भ्रमण करना अत्यंत प्रिय होता है। कभी कभी हिमालय पर योगी किसी गुफा या कंदरा का कृत्रिम रूप से निर्माण करता है! जहां पत्थरों की चुनाई कर मिट्टी से उसे लेप दिया जाता है, वही स्थान उनका प्रमुख आश्रम रहता है तथा उसी आश्रम से प्रतिदिन योगी आसपास के क्षेत्रों में साधना करने जाते हैं व संध्या काल में वापस लौट आते हैं। अत्यंत शीतलता से बचने के लिए उनके सम्मुख अग्नि का धुना चेतन रहता है। जिससे शीतलता तो दूर होती ही है साथ ही वन्य प्राणियों से भी रक्षा होती है। प्रतिदिन प्रातः योगाभ्यास किया जाता है; प्राणायाम व धारणा की जाती है; मंत्रजप, यौगिक क्रियाएं भी की जाती है; अनेकों गुप्त क्रियाएं भी होती है व दिन की शुरुआत भी इसी क्रम से होती है। साधना के तौर-तरीके भी परिवर्तनशील होते है।
- महासिद्ध ईशपुत्र

मंगलवार, 26 नवंबर 2019

योगी जीवन - 1
हिमालय सुदूर पर्वत श्रृंखलाओं के रूप में आदि काल से स्थित है। भारतीय धर्म, अध्यात्म और प्रकृति की अनन्यतम विरासत है हिमालय। इनकी जीवन यात्रा अनूठी होती है। इनको क्रियाओं का ज्ञान अद्भुत होता है। प्रकृति के सुरम्य परिवेश में ये योगी भिन्न भिन्न साधनाएं करते हैं और भिन्न भिन्न चेष्टाएं करते हैं; जिन्हें तप कहा जाता है। ये तप कि जीवनशैली बहुत ही अनूठी है। योगी विशेष वृक्षों के पत्तों को एकत्रित कर धुना रमाते है और इस धुने से उठनेवाके धुएं से अपनी बाह्य देहशुद्धी करते हैं। ऐसी धारणा है कि देह भी बाहर से अशुद्ध होती है जिसे औषधियों से उठानेवाला धुआं शुद्ध करता है; जिसके परिणास्वरूप साधक देह की पवित्रता को अनुभूत करता है। घंटों धुएं के भीतर समाधि लगाई जाती है और लगातार प्राणायाम किया जाता है; साथ ही मंत्र और धारणा का भी सहारा लिया जाता है, ताकि साधक अपने आप को परम तप के लिए तैयार कर सके। योगियों का सर्वप्रथम नियम है कि वे एक स्थान पर स्थित रहकर साधना नहीं करते; वे ऋतु और समय के अनुकूल भ्रमण करते रहते हैं; इन्हें शिक्षा दी जाती है कि, जितना हो सके उतना प्रकृतिमय जीवन जिया जाए, यही कारण है कि योगी योगी हमेशा अपनी साधना किसी झील, तालाब, पोखर, नदी नाले, पर्वत, कंदरा, गुफा अथवा पठार पर ही करता है। शरीर को कष्ट सहने के लिए तैयार किया जाता है ताकि योगी कठोर अनुशासनात्मक साधना प्रणाली में खरा उतर सके। कहते हैं व्यक्ति का विकास उसके वातावरण, जल, भोजन और रहन सहन पर निर्भर करता है; ठीक उसी प्रकार साधक का जीवन भी इन्हीं सब पर टिका है, क्योंकि जब तक साधक प्रकृति में रहकर अथवा तप करके अपनी चेतना को विकसित नहीं करता तब तक आत्मानुभूति सहज नहीं होती।
- महासिद्ध ईशपुत्र

सोमवार, 25 नवंबर 2019

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥
 भावार्थ :
देवी ! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं । जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं ; आपकी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं ।
माता तू कमला है तू ही नारायणी
माता तू कमला है तू ही नारायणी,
आदि सरस्वती काली संतोषी।
माता तू कमला है तू ही नारायणी।

तू ही नित लेती मां कई अवतार है,
दुष्टों का करती मां तू ही संहार है।
तू ही नित लेती मां कई अवतार है,
दुष्टों का करती मां तू ही संहार है।

पापों से मुक्ति तू पल में दिलाए,
मन के तू सारे मां भरम मिटाएं।

माता तू कमला है तू ही नारायणी,
आदि सरस्वती काली संतोषी।

तू ही है जग में मां तू ही संसार है,
 तू ही है महिमा वो जो अपरम्पार है।
तू ही है जग में मां तू ही संसार है,
 तू ही है महिमा वो जो अपरम्पार है।

जीवों को माया तू बनके भरमाए,
भक्तों को अपने तू दरशन करवाए।

माता तू कमला है तू ही नारायणी,
आदि सरस्वती काली संतोषी।

तू ही है ज्योति मां तू ही अंधकार है,
तू ही है लघुता मां तू ही विस्तार है।
तू ही है ज्योति मां तू ही अंधकार है,
तू ही है लघुता मां तू ही विस्तार है।

तू ही मां जीवन का सत्य बताए,
तू ही मां दुखों से पार लगाए।

माता तू कमला है तू ही नारायणी,
आदि सरस्वती काली संतोषी।

तू ही बल बुद्धि मां जीवन आधार है,
देवी ही शक्ति से चलता संसार है।
तू ही बल बुद्धि मां जीवन आधार है,
देवी ही शक्ति से चलता संसार है।

जीवों को भव से तू पार ले जाएं,
भक्तों को अपने तू चरण लगाए।

माता तू कमला है तू ही नारायणी,
आदि सरस्वती काली संतोषी।
माता तू कमला है तू ही नारायणी,
आदि सरस्वती काली संतोषी।
माता तू कमला है तू ही नारायणी...।
- महासिद्ध ईशपुत्र

सोमवार, 18 नवंबर 2019

हिमालय के प्रखरतम  महायोगी की महासमाधी
कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज योग क्षेत्र के चमकते सूर्य हैं...उनसा योगी युगों युगों में ही धरती पर जन्म लेता होगा...एक अद्भुत सा जीवन है महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज का....जिनको इसलिए समझना मुश्किल है क्योंकि उनका महामस्तिष्क मानवीय सीमाओं से परे हैं.....एक ओर  महायोगी कहते फिरते हैं कि वो बहुत ही साधारण से हिमालय के जोगी हैं......वहीँ दूसरी और उनका महाविराट स्वरुप देख कर साधक की आँखें फटी  की  फटी रह जाती है......पर यदि साधक हो तो!....क्योंकि भले ही कोई कुछ कहे लेकिन सच ये है कि कोई यदि इस दुनिया का सबसे बड़ा विचारक हो.......चिन्तक हो.......दुनिया उसे मानती हो....तो वो भी सत्य स्वरुप को नहीं समझ सकता.....मेरा ये दावा नहीं है कि महायोगी अवतार हैं....लेकिन साहित्यक भाषा में ऐसा मानव अवतारी ही माना और कहा जाता है.....योग के न जाने कितने रूपों को महायोगी जी जानते है...पर बात वही कि बताएँगे किसको..?...सामान तो है.....दुकानदार भी.....पर बिडम्बना ये है कि ग्राहक ही नहीं हैं.....शायद यही कारण है कि महायोगी हिमालय के सबसे बड़े योगी होने के बाद भी बिलकुल गौण हैं.....जिस हिमालय को महायोगी पर नाज है...जो हिमालय महायोगी को अपना पुत्र कहता है.....शायद उसी हिमालय ने महायोगी को इतना जटिल बना दिया कि उनको कोई समझ ही नहीं पा रहा....लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन प्रबुद्ध साधकों का एक बड़ा समूह महायोगी जी के रहस्यों से जुड़ कर...महासमाधि के महारहस्य को जान जायेगा....  



















भारत में ऐसे बहुत ही कम साधक होंगे जिनको बाल्यकाल से समाधि का अनुभव हुआ हो.....लेकिन सिद्ध परम्परा के चंद्रमा....कौलान्तक पीठ को वाममार्गी घृणित तंत्र मंत्र से मुक्ति दिलानेवाले महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी सहज समाधी को उपलब्ध मायाधारी योगी हैं....शायद उनको प्राकृतिक तौर पर ही समाधी लगती है....क्यूंकि वो समाधी के लिए कोई महाभ्यास नहीं करते.....मैंने उनके साथ जितना भी समय बिताया......तब यही जान पाया हूँ कि......एक दुबला पतला सुन्दर सा बालक महायोगी और पीठाधीश्वर  वो भी सबसे रहस्यमयी पीठ का..?....उस पीठ के हजारों नहीं लाखों दुश्मन है.....लेकिन जब वास्तविकता से पाला पड़ा तो मुझे सूर्य कहाँ से उदय होता है ये पता चला..!.....महायोगी जी की समाधी का तरीका देख कर तो मैं सोचता हूँ कि मुझ जैसे आदमी के लिए ये संभव ही नहीं हैं.....लेकिन महायोगी जी जब समझाते हैं तो लगता है कि मैं भी एक न एक दिन पहुँच ही जाऊँगा........कभी कभी समाज में महायोगी जी को देख कर बहुत हंसी आती है......कोई भी साधारण सा पुजारी.....पंडा....पुरोहित....बड़े बड़े तर्क महायोगी को दे कर ये जताने का प्रयास करते हैं कि वो ही सबकुछ जानते हैं महायोगी जी तो बच्चे हैं....और

 
सचमुच बच्चे ही हैं......उनको जबाब ही नहीं देते....बस हाथ जोड़े हाँ में हाँ मिला देते हैं.....ऐसे पुरुष में समाधी के ज्वलंत बीज देख कर भ्रमित हो जाना सहज ही है.....ये तो छोडिये ज्योतिष और समय साधना..!...काल पुरुष की महापूजा के महारहस्यों  को जानने वाले महायोगी जी का दुर्भाग्यबश कभी किसी ज्योतिषी से मिलना हो जाये तो समझ लीजिये महायोगी जी के राहु-केतु खराब हो गए....वो आते ही बताना शुरू कर देंगे मंगल से ये होता है...शनि ये कर देगा.... ये वाला रंग ऐसे हो तो ये प्रभाव होगा.....मेरा ये सब देख कर मस्तिष्क चकराने लगता है कि ये माजरा क्या है.....सनातन विद्याओं के रक्षक को ये क्या समझा रहे हैं.....उस पर अपनी की हुई मूर्खता पर इतने प्रसन्न होते हैं कि मानो कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो.....पहले अपने अहंकार से ही नहीं जीत सकते....तो धर्म को क्या जानेगे....यहाँ तक की कोई-कोई तो पंडा पुरोहित या कथित योगी तो ये समझाना शुरू कर देते हैं कि यदि आप इतने बड़े योगी है तो समाज में क्या कर रहे हैं....?.....जंगलों या हिमालय में ही रहना चाहिए...आपको इन चीजों से..........समाज से क्या लेना देना..?..

और अपनी महिमा में कहेंगे कि हमने पीएचडी की है.....विदेशों में जा कर लेक्चर देते है....वैदिक ज्योतिष योग आयुर्वेद के हम महापंडित हैं......अब आप ही बताइये  ऐसे में महायोगी जी क्या कर सकते हैं...?..दरअसल इस समाज में बैठे कुछ धर्म के ठेकेदारों से ये बर्दाश्त ही नहीं हो रहा कि एक सच्चा जानकार योगी हिमालय से उतर  कर लोगों तक सही सटीक जानकारियां पहुंचाए.....क्योंकि महायोगी जी सच कहेंगे और फिर ये झूठ बोल कर किसको लूटेंगे....वास्तु ग्रहों के नाम पर या योग को बेचने कहाँ जायेंगे.....इसमें केवल इनकी ही गलतियाँ नहीं हैं.....हमारी भी हैं कि जिसने योग किया ही नहीं उसको हम सबकुछ मान लेते हैं......और असली मिल जाए तो हम उसके साथ केवल फोटो खिचवाते हैं.....उससे ज्यादा कुछ नहीं.....लेकिन जो महायोगी जी की तरह सचमुच साधनारत हों.....वो समझ ही नहीं आते....जो बेचारा थोडा अध् कचरा अध्यात्म का ज्ञान रखता है....उससे कहियेगा कि हम कौलान्तक पीठ से हैं तो तुरंत कहेगा अच्छा वाममार्गी कौलाचारी....बेचारे ये ही नहीं जानते कि कौलान्तक पीठ का वास्तविक नाम कुलांत पीठ है......वो कुलांत पीठ जहाँ सिद्धों की भूमि है......इसी सिद्धभूमि में समाधि लगाते हैं कौलान्तक पीठाधीश्वर.....
जहाँ हिमाच्छादित पर्वत मधुर गीत गुनगुनाते हैं.....जहाँ झरनों की पवित्रता सम्मोहित करती है.....शीतल समीर में जहाँ अनहद नाद गूंजता हो....वो धरा महायोगी जी की ही तो है......शायद पत्थर पत्थर....पेड़ पेड़ भी महायोगी जी को पहचानता है......लेकिन संसार के लिए ये कहानी के सिवा कुछ भी नहीं.....जबकि हाथ कंगन को आरसी क्या...महायोगी जी अभी धरा पर ही हैं उनको देखना चाहिए.....पर नहीं! हम कष्ट नहीं उठा सकते....जब काम करना पड़ जाए तप करना पड़े तो महायोगी जी जैसे साधकों को करना चाहिए और जब केवल भगवान के बारे में मलाईदार बातें करनी हों तो वो लोग खुद उपस्थित.....जीभ हिलाना सरल जो हैं....ऊपर से भक्ति ने बिगाड़ कर रख दिया....वास्तव में भक्ति किसको उपलब्ध है? ये तो जानने में आने वाला है नहीं.....तो बैठे रहो! साधना करो नहीं! बस भक्ति हो गई.....लेकिन भला हो भाग्य का....क्योंकि मैं स्वयं ब्राह्मण  हूँ ये सारी बाते जो मैंने कहीं इसीलिए सटीक कहीं......क्योंकि मैंने भी महायोगी जी के साथ शुरू में कुछ ऐसा ही किया था....पर अब वास्तविकता समझ पाया हूँ.....आप कहेंगे की समाधि की बात क्यों नहीं कर रहा हूँ....?....मैं समाधी की ही बात कर रहा हूँ कि जबतक ऐसी कुत्सित वृत्तियाँ रहेंगी....साधक का कल्याण नहीं हो सकता....साधक को सूक्ष्म बुद्धि वाला होना चाहिए......

कालनेमियों की इस दुनिया में सब समझ में नहीं आता.....सच जानना बहुत जटिल है.....लेकिन समाधी की बात कहने से पहले मैं ये जरूर बताना चाहूँगा कि जबतक हम लोगों में अधकचरा ज्ञान होता हैं.....और उस ज्ञान के आधार पर जब हमारी आजीविका और नाम समाज में चल रहा होता है तो ऐसे में महायोगी जी जैसे योगी और वास्तविक पुरुष के आ जाने से भरण पोषण का प्रबंधन और समझ को अँधेरे में रख कर कमाया हुआ नाम डगमगाने लगता है....इसीलिए हम लोग महायोगी जी जैसे आदमी का विरोध करते हैं.....लोगों का तो पता है कि वो कुछ जानते ही नहीं...वहां हम जो कहेंगे वो ही मान्य है.....फिर लगातार झूठ बोलते बोलते आदत हो जाती है....फिर लगता है कि दुनिया ऐसे ही चलती है......फिर सच्चे लोगों के सामने भी कथित ज्ञान उबाले ले ही लेता है....इसमें हमारा भी कसूर नहीं है......पर मैं गुरुदेव महायोगी जी की अनुकम्पा से ही मुक्त हो सका हूँ.....शायद इसे ही जातिपाश.....और पशुपाश से मुक्ति कहते हैं.....महायोगी जी के दर्शन मुझे तब हुए थे जब वो कालेज मैं पढ़ भी रहे थे और शिष्यों को ज्ञान भी दे रहे थे.....तब तक तो महायोगी जी की ख्याति बहुत हो चुकी थी....उनकी चर्चाएँ ही सबके मुह पर होती थी.....कि वो चमत्कारी बालक है....उसके पास अनेकों सिद्धियाँ हैं......और भी न जाने क्या क्या...?




















लेकिन वो सदा ही इन बातों को नकारते रहे....वो मनोविज्ञान का अध्ययन कर रहे थे और साथ ही फिलासफी का भी...जब भी मैं कोई बात करता तो कह देते.....तुम्हें ये मानसिक बिमारी है.....बात बदलता तो कहते अब ये वाली मानसिक बिमारी है.....मैं जो भी करता वो कोई न कोई बिमारी ही होती....अब समझ गया हूँ कि मनोविज्ञान भी अपने आप मैं एक बिमारी ही है.....ठीक वैसी ही बात फिलासफी में भी थी......मैं कोई बात कहूँ तो कहेंगे कि ये नास्तिकतावाद का सिद्धांत है.....ये मार्क्सवाद का सिद्धात है....ये प्रलयवाद की सोच है.....लगता था कि जीवन एक फिलासफी ही है.....धर्म भी फिलासफी ही है.....फिर एक दौर आया जब महायोगी जी हमेशा लोगों से नास्तिकता कि बाते ही करते रहते........हर चीज उनको बस अन्धविश्वास ही लगती......हर बात में विज्ञान पदार्थ और प्रकाश अणु सूक्ष्म जीव रासायनिक परिवर्तन की ही बातें.....मुझे तो लगता था कि दुनिया के सबसे बड़े नास्तिक युवा के साथ मैं रह रहा हूँ.....लेकिन बाबजूद इसके साधना में वैसे ही....बहुत गहन तलों तक उतर कर प्रतिदिन ध्यानस्थ होना....मैं समझ नहीं पाता था.....लेकिन मैं तब ये जानता था कि मुझे देखते रहना है.....क्योंकि मायावी गुरुओं की थाह इतनी आसानी से नहीं मिलती.....यही मेरा संयम मेरे काम आया और मैं महायोगी जी को जान पाया.....जल्द्वाजी और मानवीय बुद्धि समाधि की महाशत्रु होती है.....इसीलिए ब्रह्म्प्रग्या होनी चाहिए.....यूँ तो बहुत बार मैंने महायोगी जी को समाधी की हालत में देखा है लेकिन हर बार उनका एक नया ही रूप देखने को मिलता हैं......हिमालय में बिचरण करते हुए मान लो कहीं कोई पेड़ या पत्थर या फिर कोई गुफा नजर आई तो वहां बैठ जाते हैं.....कुछ देर उस जगह की प्रशंसा करेंगे कुछ बातें करेंगे.......और कहेंगे की मैं कुछ देर ध्यान करना चाहता हूँ और बैठ गए....बस यदि चार पांच घंटे तक नहीं उठे तो बस समझ जाइये कि अब पता नहीं कब उठेंगे..?..हम सभी साथ रहने वाले समझ जाते हैं.....लेकिन समस्या तब हो जाती है जब महायोगी जी जंगल में कहीं भयानक जगह बैठ जाएँ......एक बार बर्फ से घिरे स्थान पर बड़े से पत्थर के नीचे बनी छोटी सी गुफा में महायोगी जी तेरह दिनों के लिए समाधिस्थ हो गए.....पहले ही दिन जब महायोगी जी वहां बैठे और लम्बे समय तक उठे ही नहीं तो साँसे गले में ही अटक गयी....रात हो रही थी जंगल में कडकडाती ठण्ड अब क्या करें.....तो भाई गुरुदेव जो महायोगी जी के शिष्य है नाम भी गुरुदेव ही है...है न हैरान करने वाली बात.?....और भाई हरीश जी ने जंगल से लकड़ियाँ बीन कर रात बिताई....मुश्किल से रात बीती क्योंकि साथ ही बहन मञ्जूषा जी भी थीं.......और पहली ही रात को जंगली कुत्ते काफी पास तक आ गए......मुश्किल से ही उनको भगा सके....दरअसल गलती हमारी थी हम ही जंगली कुत्तों के रास्ते में बैठ गए थे ये बाद के दिनों में पता चला.....लेकिन हम काफी नीचे थे और महायोगी जी अकेले समाधिस्थ.......तो बहन मञ्जूषा जी और भाई गुरुदेव लकड़ियाँ ले कर रात को महायोगी जी की गुफा में पहुंचे और सामने आग जला दी....ठण्ड से दांत कटकटा रहे थे.....महायोगी जी को छू कर देखा तो बिलकुल ठन्डे पड़ चुके थे नाख़ून हल्के नीले थे.....लेकिन शांत बैठे थे समाधिस्थ.....किसी तरह रात समाप्त होते ही बैग में पड़ी माता की चुनरियों और लाल कपडे से झंडियाँ बनायीं गयी और भाई गुरुदेव और हरीश ने टेंट और भोजन की व्यवस्था भी की....साथ ही महायोगी जी की गुफा के तीनो ओर झण्डों से मार्ग रोका गया ताकि भालू जैसे जानवर का अंदाजा दूर से ही लगाया जाए....




















महायोगी जहाँ बैठे थे वो गलेशियर वाली जगह थी ढलान था लेकिन भाई हरीश जी की मेहनत से बाद का काम बर्फ पर भी पूरा हो गया......हमने तीन टेंट लगा लिए एक टेंट हमने महायोगी जी की गुफा के पास लगा लिया.....जो बहत ही छोटा टेंट था.....जिसमें दो आदमी भी मुश्किल से ही आ सकते थे......उस टेंट को भी जबरदस्ती वहां लगाया गया....उसके लिए भी जगह नहीं थी.......लेकिन एक आदमी को तो महायोगी जी की रक्षा के लिए वहां रहना ही था.....इसलिए ये टेंट जरूरी था.......करीब 200मीटर नीचे बेस केम्प लगाया गया था......दो आदमी वहां रह कर लकड़ी पानी भोजन की व्यवस्था करते.......भले ही महायोगी जी समाधिस्थ थे लेकिन बाकी तो भूखे नहीं रह सकते थे न.......खाली समय में हम भजन गाते जंगल घूमते.....सफाई का ध्यान रखते और कोशिश रहती कि ज्यादा से ज्यादा समय महायोगी जी के निकट ही बैठ कर ध्यान किया जाए......लेकिन थोड़ी देर में ही सबकी छुट्टी हो जाती....हम थक जाते लेकिन महायोगी एक ही आसन में रहते,सूरज निकलता और डूब जाता.....आधी रात के बाद तो ठण्ड के कारण नींद ही नहीं आती थी सुबह होने का ही इन्तजार करते रहते कि कब सूरज निकलेगा.....और इस कडकडाती ठण्ड से राहत मिलेगी......
आपको लग रहा होगा कि जंगल तो है पेड़ काट कर आग क्यों नहीं सेक लेते.....तो इसका जबाब यह है कि महायोगी जी के अनुसार प्रकृति को हानि नहीं पहुंचानी है...केवल सूखी लकड़ियाँ ही जलाई जाएँ जबतक कि बहुत ही ज़रूरी न हो जाए....तो उनके नियम का पालन करना था.....सारी लकडियाँ तो बर्फ में दबी हुयी थी....ऐसे में सारा दिन कोई न कोई लकड़ियों का ही प्रबंध करता रहता....फिर दूर से बर्फ पर उठा कर लाना और भी बड़ी चुनौती.....एक तो आक्सीजन की कमी उरार से सीधी चढ़ाई....पीठ पर लकडियाँ......हमारी तो आँखें और जीभ ही बाहर निकल आती.....बस केवल एक सुख था दिन चढ़ते ही बर्फ कुछ पिघल जाती...पानी के छोटे छोटे झरने बहने लगते....तो पानी नसीब हो जाता....लकड़ियों की बार बार इसलिए भी याद आ जाती है....क्योंकि लकड़ियाँ एक नहीं दो-दो जगहों के लिए लानी पड़ती थी......महायोगी जी की गुफा तक पहुंचाना मतलब बहादुर पुरुष होना.....बीस बार तो बर्फ पर फिसल कर गिरते ऊपर से गिरती लकड़ियाँ.......तो रोना ही आ जाए.....पर जब देखते कि बिना खाए पिए महायोगी जी एक ही आसन में दिन रात वो भी बिना सोये बैठे हैं.....!....तो जोश आ जाता कि ये सेवा का अवसर हमें नहीं चूकना है.....तब लकड़ियाँ फिर कंधे पर होती और हांफते हांफते सब गुफा तक पहुँच ही जाते.....



















सोचता हूँ कि महायोगी जी न जाने किस मिटटी के बने हुए हैं....समाधी में बैठ जाएँ तो बैठ जाएँ...पांच दिन.....दस दिन....पंद्रह दिन....और शांत......ऐसा लगता है कि मानो मूर्ती बैठी हो....लेकिन समाधी के दौरान भी चेहरे के हाव भाव बदलते रहते हैं....जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अभी किस तरह की अनुभूति महायोगी जी को हो रही है....आप यदि इन फोटोस को गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि उनकी भाव भंगिमाएं बदल रही होती हैं......एक दिन तो हद हो गयी जंगली कुत्ते बेस केम्प के बीच में से गुजर गए....और चंडीगढ़ से एक टीवी चैंनल के रिपोर्टर और केमरा पर्सन भी वहां आ पहुंचे....ये तो किस्मत ही थी कि बेस में ही दो टेंट लगे हुए थे तो रहने की कोई समस्या नहीं थी....अब वो महायोगी जी को लगातार रिकार्ड करने लगे.....तो बिजली कहाँ से आती....फिर हरीश जी को जनरेटर की व्यवस्था के लिए जाना पड़ा......सड़क तक तो जनरेटर आ गया लेकिन वो बहुत ही भारी था.....उसे लाने में भाई गुरुदेव जी ने सहायता की......वो दमदार आदमी हैं.....भगवान की माया देखिये कि ये ठीक ही हुआ कि बेस केम्प इतनी दूर था की जनरेटर की आवाज गुफा तक नहीं पहुंचती थी.....अब बहन मञ्जूषा पर खाना बनाने और बीच-बीच में गुरु जी को देखते रहने का जिम्मा और बढ़ गया..........हैरानी की बात ही थी कि गुफा के आस पास कहीं भी मोबाईल फ़ोन का सिग्नल नहीं था पर बेस केम्प में था.....अब तो जनरेटर होने से और मोबाईल फ़ोन होने के कारण लोगों के फ़ोन भी आने लग गए तो मञ्जूषा जी उसमें भी व्यस्त हो गयी....जंगल में भी काम ही काम हो गया....






































हालाँकि अब हम बहुत लोग वहां हो गए थे पर समस्याएं कम नहीं हुई....बर्फबारी शुरू हो गयी....हालाँकि जिस दिन महायोगी जी समाधी में बैठे थे सूर्य उसी दिन तक था.....रात को मौसम खराब हुआ और बरसता ही रहा....जबतक महायोगी जी समाधी से नहीं उठे तबतक मौसम खराब ही रहा.....लेकिन अब सबको लकड़ियों की  चिंता हो गयी......तो ऐसे मौसम में भी भाई गुरुदेव जी लकड़ियाँ लाने जाते थे और गीली लकड़ियों को आग के नजदीक सूखने रखा जाता....बर्फ में खाना बनाना बर्तन धोना हमारा नहाना मुश्किल हो गया......बैसे तो कोई डरता नहीं है पर ऐसी जगह डर तो लगता ही है.....इस लिए पत्थर पर हनुमान जी कि मूर्ती बना कर स्थापित कर ली और उनसे प्रार्थना करते कि जंगली जीवों से हमारी रक्षा करें.....काफी दिनों से भोजन पानी के बिना बैठे महायोगी जी का रंग धीरे-धीरे काला पड़ने लगा......होंठ फट गए.......सबको फिर महायोगी जी की ही चिंता होने लगी.......तो महायोगी जी के नजदीक आग बढ़ा दी गयी.......अब माइनस तापमान में ठंडी हवा में मह्योगी जी की सुरक्षा ने सबकी नींद उड़ा दी.....अब गुफा वाला टेंट काम आया एक आदमी वहीँ सोता और बीच-बीच में आग जलाता जाता.....लेकिन ठण्ड में मानो आग को भी ठण्ड लग रही हो वो जलती ही नहीं थी.....बहुत ही मुश्किल से आग बनाये रखी जाती...महायोगी जी की हालत बहुत ख़राब दिख रही थी सब भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि काश ये समाधी जल्दी टूट जाए.....पर कोई लाभ नहीं....
























































सोचता हूँ कि इस बार तो अपेक्षाकृत महायोगी जी को काफी निचले स्थान पर स्वतः समाधि लग गयी थी लेकिन बहुत ऊँची चोटियों पर क्या होता होगा..?...सोचता हूँ महायोगी जी को किसी दुष्ट की नजर न लगे क्योंकि स्वयं महायोगी जी समाज से दूर दूर रहते हैं जिसका कारण बताते हुए वो कहते हैं कि सत्य का मार्ग असत्य को आकर्षित करता है.....सच्च झूठ को आकर्षित करता है......सज्जन दुर्जन जो सहज ही आकर्षित करते हैं.......योगी अक्सर भोगियों को आकर्षित करते हैं......तो बचना मुश्किल होता है......क्योंकि मकड़ी का सुन्दर दिखने वाला जाल परमात्मा का नहीं मौत का संकेत होता है.....महायोगी जी को समाज में बिलकुल नहीं जाना चाहिए बस इसी तरह अद्भुत जीवन जीना चाहिए.....हिमालय की कंदराओं में उनका वास्तविक रूप देख कर सुखद अनुभूति होती है......जब महायोगी जी समाधी में रहे तो टीवी रिपोर्टरों ने उनकी लगातार विडिओ बनायी जो उनके पास है....हमारे पास विड़ोज नहीं हैं केवल कुछ ही फोटोज हैं.....लेकिन बीच में भाई रमेश जी भी कुल्लू से समाधी वाली गुफा तक आये थे.....उनहोंने महायोगी जी की और समाधी गुफा के आस पास की कुछ तस्वीरें अपने मोबाईल से ली वो मेरे पास भी हैं आपके लिए मैं यहाँ दुर्लभ चित्र प्रस्तुत कर रहा हूँ......



              















मुझे  महायोगी जी की बात 100 % ठीक लगती है कि कोई कहता है ये सब कुछ झूठ है.....तो सचमुच उसके लिए झूठ ही हैं.....जिसने रेगिस्तान नहीं देखा होता....उसे रेगिस्तान की पूरी कहानी ही झूठी लगती हैं.........महायोगी जी कहते है कि कथित ज्यादा पढ़े लिखे लोग इतने अभद्र होते है कि शिक्षा को भी शर्म आ जाए...जिसका कारण होता है अज्ञान......वे साक्षर हो सकते हैं....पर ज्ञानी नहीं.....महायोगी जी बचपन से समाधी में बैठते थे.....एक दिन किसी डाक्टर से मुलाक़ात हुयी......डाक्टर महोदय ने कहा महायोगी जी इतने-इतने दिनों एक ही स्थान पर आपके बैठने का कारण ये है कि आप मनोरोग से गुजर रहे हैं आपको एक योग्य चिकित्सक की जरूरत है......डाक्टर के सझाने से महायोगी मनोचिकित्सक के पास जाने को तैयार हो गए......महायोगी जी हमसे कहने लगे कि डाक्टर बेफिजूल तो कोई बात कहेगा नहीं......चेक करवा लेते हैं......तीन महीने तक मनोचिकित्सक से रोज मिलते उनकी बातें सुनते.....उनकी दी अंग्रेजी दवाइयां भी खाते....लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ....बल्कि दवाओं के सेवन से पाचन तंत्र जरूर गडबडा गया.....फिर मनोचिकित्सक ने उनको और बड़े मनोचिकित्सक से मिलने कि सलाह दी......लेकिन हम दुखी हो चुके थे.....रोज रोज डॉक्टर के चक्कर नहीं लगा सकते थे......और हमें तो महायोगी जी पर गुस्सा आ रहा था कि किस मूर्ख कि बातों में आ गए....फिर महायोगी जी ने केवल इतना कहा कि इस चिकित्सक को चिकित्सा का रोग हो गया है......मैं ऐसे ही पढ़े लिखे रोगी को नजदीक से देखना सुनना चाहता था.......जिस तरह उदाहरण से महायोगी जी ने समझाया वो मैं नहीं बता सकता लेकिन सचमुच समझ आ गया कि जो कभी-कभी दूसरों को सलाह दे रहे होते हैं वो भी स्वयं एक रोग से ही जूझ रहे होते हैं.....और हैरानी की बात कि जिन्होंने समाधी कभी नहीं लगाई वो ही अक्सर समाधी पर टिप्पणियां करने बैठते हैं......जो धर्म को नहीं जांनते वो ही धर्म को समझाने बैठ जाते हैं......हम लोगो ने समाधी की स्थिति में किसी को बहुत निकट से देखा ये हमारा गौरव है.......समाधी में क्या होता है ये तो महायोगी जी ही जानते हैं पर मैं केवल ये बता सकता हूँ कि लगभग तेरह दिनों बाद सुबह 8 : 15 पर महायोगी जी महासमाधि से उठे......और उनहोंने सबको आशीवाद दिया लेकिन वो बहुत कमजोर हो चुके थे.....सबने वो एतिहासिक पल देखा कि कैसे महायोगी समाधी में रहे और उठे......सबकी आँखों में आंसू थे......बेस केम्प तक भाई गुरुदेव महायोगी जी को ले कर आये....साथ थी टीवी चैनल की टीम और मंजुषा जी ने उठते  ही महायोगी जी को गुनगुना पानी पिलाया और शहद के तीन चम्मच खाने को दिए.....करीब तीन घंटों के बाद महायोगी जी ने कुछ खाया तब तक सभी भजन गाते रहे...वो भी जोर-जोर से.......आज भी सारा दृश्य आँखों में घूम जाता है......ये क्षण भूले नहीं जा सकते.......बस मुझसे और नहीं बताया जाता.....समाधि के फोटो की गेलरी भी शायद जोड़ी जाएगी.....तो वहां फोटोज देखना न भूलें.....केवल एक या दो विड़ोस ही समाधी की हैं जो यू टयूब में है आप देख सकते हैं......मैं अभी नया साधक हूँ ज्यादा मर्यादाएं नहीं जानता....यदि इस ब्लाग को लिखते समय कोई अभद्रता हो गयी हो.......या फिर कोई गलती हो गयी हो तो कृप्या आप सभी मुझे मूढ़ समझ कर क्षमा कर दें......बहुत बहुत धन्यवाद 
       -रविन्द्र शर्मा