संसार इधर से उधर हो जाए लेकिन मेरी आंखों में वो चिंगारी है, साधना के लिए मैं तत्पर हूं। ऐसा शैवमतीय गुण हमारे भीतर होना चाहिए! शिव की तरह! बैठ गए हैं आसान पे तो बैठ गए हैं आसान पे, पार्वती प्रतीक्षा कर रही है , जगत की जननी उनके चरणों पे विराजमान हैं , देख रही है कि वो जागेंगे और युगों है कि वो जागते नहीं! ऐसे महादेव ही हमारे लक्ष्य हो सकते है ! हमारे लिए अनुकरणीय हो सकते है , क्योंकि उनका अनुसरण करना, उनका अनुकरण करना ही हमारे लिए श्रेष्ठ मार्ग है !
वो जड़वत् है, पत्थर की भांति, उनका जब भी शास्त्रकारों ने जब भी ऋषियों ने विवरण दिया तो कहा कि, "वो तो कैलाश धाम पे , कैलाश शिखर पर विद्यमान हैं!" कहा, "क्या कर रहे हैं?" कहा, "समाधिस्थ है!" तो कहा, "किसकी उपासना कर रहे हैं?" कहा, "नहीं मालूम।" तो कहा, " तो कभी जाके पूछ लो!" तो कहा, "हम तो नहीं पूछ सकते!" कहा, "किसकी योग्यता है?" कहते है, "एक ही है जो पूछ सकती हैं और वो पराडाकिनी हैं , मां पराम्बा हैं !वही पूछ सकती हैं! " उन्होंने पूछा, कि, "हे प्रभु! आप नेत्र मूंद के किसका ध्यान करते हैं? तो उन्होंने कहा, "मैं नेत्र बंद रखकर के केवल ' ॐ' जो नाद है, उसी का ध्यान करता हूं !" पार्वती ने फिर पूछा, " ये नाद कौन हैं ? इस सृष्टि में मैने दो ही तत्त्वों को पाया है , या तो मैं , या तो आप! ये तीसरा कौन पैदा हो गया?" तो शिव ने कहा, "जहां तुम और हम मिलते हैं वही नाद है ! इसलिए मैं तुम्हारे और अपने अतिरिक्त किसी का चिंतन नहीं करता! मेरी समाधि वैसी समाधि नहीं है जैसे जोगी समाधि लगाते हैं, मेरी समाधि कुछ और समाधि है!" इसलिए महादेव हमारे लिए अनुकरणीय है !
ये बात भी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि महायोगी जी को केवल बारह वर्ष कि आयु में ही गुरु पदवी पर महागुरु ने बिठा दिया था....और तभी से कुछ साधक महायोगी जी के शिष्य बन गए और उनके साथ रहने लगे....कुछ साधू और सन्यासियों ने तो ये दावा तक किया कि वो महायोगी जी के पूर्व जन्मों के शिष्य हैं....महायोगी जी के घर के सामने जमघट लगा रहता....परिवार को महायोगी जी कि स्कूली शिक्षा कि चिंता होती रहती थी....लेकिन कोई उपाय ही नहीं था...इन साधकों को परिवार वालों ने गाली-गलौच कर भगाया भी लेकिन......दो-तीन दिनों में ही फिर आ जाते...समस्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी.....एक ओर जहाँ कुल्लू में स्थित देवताओं के सामने होने वाली बलि प्रथा को रोकने के प्रयास के कारण जहाँ सामाजिक रूप से महायोगी के अनेक शत्रु तैयार हो गए थे.....वहीँ क्षेत्र का जातिवाद महायोगी के परिवार पर भारी पड़ने लगा......महायोगी जी के कई शिष्य जाति में बहुत छोटे होने और स्वयं महायोगी जी के उच्च कुल में होने के कारण साथ सहभोज एवं पूजन, यज्ञ, साधना का विरोध होने लगा....महायोगी जी के परिवार को विरादरी कि चुनौतियों का सामना करना पड़ा.....जिस कारण महायोगी जी ने घर छोड़ कर बाहर रहने का निर्णय कर लिया....ताकि परिवार को कोई परेशानी न हो.........यही सोचकर महायोगी शिष्यों सहित "बालीचौकी "नाम कि जगह पर ही माता काली कि प्राचीन गुफा में रह कर तप करने लगे....यहीं महायोगी जी को "माता रानी" ने साधारण स्त्री के रूप दर्शन दिए.....और महायोगी जी से प्रसाद मांग कर ले गयीं.....लेकिन काफी देर तक उनको पता ही नहीं चला....जब तक भान होता देर हो चुकी थी.....अब तो इस घटना ने महायोगी जी पर नया जनून सवार कर दिया कि मुझे मातारानी से मिलना है.....महायोगी जी ने भोजन त्याग कर वहीँ साधना करनी शुरू कर दी......मंत्र जप करते रहते......यज्ञ करते रहते......लेकिन बात न बन सकी.....महायोगी कमजोर होते चले गए....उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा....
कहा जाता है कि यक्षिणियों....की सिद्धि महायोगी को जन्मजात थी....जोगिनियों की कृपा से महायोगी हिमालय के सबसे बड़े योगी बने थे......कौलान्तक पीठ की अधिष्ठात्री देवी माता कुरुकुल्ला की सिद्धि ने महायोगी को मानवीय सीमाओं से परे कर दिया था........पर माया थी कि महायोगी को अस्थिर किये जा रही थी....महायोगी जी कि ऐसी हालत हो गयी कि अब वो बैठ ही नहीं प् रहे थे.....माता-पिता भी बेटे कि ऐसी हालत देख कर गुफा दौड़े चले आये.....महायोगी जी यहीं से पवित्र हंसकुंड तीर्थ की चौदह दिनों की यात्रा पर चले गए....ऐसी हालत में जाना सबको मंजूर नहीं था...पर हठयोगी के सामने किसकी चलती....महायोगी जी यात्रा पर नंगे पवन निकल पड़े....और अनेक कष्टों से भरे मार्ग को पार करते हुए दिव्य हंसकुंड तक पहुंचे....और वहां से भी ऊपर सकती नाम के पर्वत शिखर तक पहुंचे.....जहाँ दो दिन की साधना कर महायोगी जी पुन: घर की और लौटे....लेकिन घर आने के लिए नहीं बल्कि उन दो दिनों की साधना ने महायोगी जी को और भी तंग कर दिया था....महायोगी जी घोर तप का निर्णय मन ही मन कर चुके थे....अपने संकल्प को पूरा करने के लिए....पहले महायोगी जी घर लौटे....यक्शिनियों का आवन कर उनको पूछा की बताओ माता के दर्शन कैसे हो सकते हैं....उनहोंने कहा की इसके लिए तो घोर तप करना होगा....महायोगी जी ने कहा मैं तैयार हूँ....यक्शिनियों ने ही बताया की महायोगी जी आपको इसके लिए "गरुडासन" पर्वत पर जा कर ही साधना करनी होगी ये स्थान तो काफी दूर था....महायोगी ने कहा ये तो जोगनियों का दिव्य स्थान है....महायोगी जी पहले भी वहां जा चुके थे....अब महायोगी जोगिनियों का आवाहन करने लगे.......जोगिनियों ने महायोगी को कहा की तुम निश्चिन्त हो कर आओ हमारे रहते तुम्हारा बाल भी बांका नहीं हो सकता......महायोगी जी ने आपने कुल देवता श्री शेष नाग जी की अनुमति ली....साथ ही माता तोतला जी की भी......अपने सभी पूर्वजों को प्रणाम कर आशीर्वाद माँगा....लेकिन जाने से पहले दो बड़ी अड़चने सामने आ गयी......
पहली अड़चन तो ये थी की महायोगी के पैतृक घर के साथ वाले पर्वत "जोगिनीगंधा"की देवी भ्रामरी इसके लिए मान नहीं रही थी और साथ ही......"सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली"भी आज्ञा नहीं दे रही थी महायोगी जी जानते थे कि "सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली" को मनाना बहुत ही आसान है......लेकिन "जोगिनीगंधा" पर्वत की देवी भ्रामरी सरलता से नहीं मानने वाली....तो पहले महायोगी जी इसी परवत पर चले गए....इस पर्वत पर साधना के लिए बैठते ही बबाल शुरू हो गया......गांव कि मान्यता के अनुसार यहाँ कोई रात को नहीं रहता सदियों से कोई रहा भी नहीं था...लोग इस स्थान को बहुत ही पवित्र मानते हैं....लेकिन महायोगी जी के दिन-रात वहां रहने के कारण लोग भड़क गए....और समूह बना कर महायोगी जी को धमकाने पहुंचे लेकिन महायोगी जी ने उनको कड़ाई से कह दिया कि वो बिना साधना पूरण किये कदापि नहीं जायेंगे....कहा जाता है कि इस देवी के क्षेत्र कि रक्षा कोई "लंगड़ाबीर"नाम का देवता करता है....जो भालू या शेर जैसा रूप बना कर लोगों को मार देता है....लेकिन जो हिमालयों और बनो का सम्राट हो उसको भला क्या भय.....महायोगी जी करीब सात दिन वहां रहे और अन्तत:,करुणामयी माता प्रसन्न हुई....उनहोंने आकाश मार्ग से महायोगी जी को मौली बस्त्र का टुकड़ा....और कुछ दिव्य पुष्प दिए.......
आप सोच रहे होंगे कि ये तो बिलकुल ही अवैज्ञानिक बात है कि हवा में कोई चीज कैसे आ सकती है....ये वहां के लोगों के लिए चमत्कार नहीं सैंकड़ों लोगो के सामने होने वाली मामूली सी दैविक क्रिया है.....यहाँ का बच्चा-बच्चा इस तथ्य को भली भांति जानता है........सैंकड़ों लोग इसके प्रत्यक्षदर्शी भी है......महायोगी जी इस स्थान से लौटते हुए....ही"सुवर्णकारिणी माता देवी चवाली"के बन में स्थित मंदिर में पहुंचे....इस माता का बन छोटा सा ही है लेकिन वहां के बृक्षों को कोई लोहा नहीं लगता.......जंगल कटा नहीं जाता इसी कारण बचा हुआ है....इसी बन के मध्य से बहुत ही ऊँचाई से पानी का झरना गिरता है....इस झरने कि जहाँ से शुरुआत होती है वहीँ माता जी का छोटा सा मंदिर है.....वहां पहुँच कर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी ने माता को केवल स्तुति करके ही प्रसन्न कर लिया....माता चवाली ममतामयी कोमल हृद्या हैं.....यही वो देवी हैं जिनके पास मृतसंजीवनी एवं पर्णी नामक बृक्ष भी है.....जिससे सोना बनाया जाता है जैसी दिव्य औषधियां हैं....लेकिन मान्यता के अनुसार इन औषधियों को अदृशय रखा गया है....माता कि कृपा से ही ये प्राप्त हो सकती हैं.....महायोगी जी माता का आशीर्वाद ले......अपनी "गरुडासन पर्वत" कि महासाधना के लिए अब तैयार थे........
महायोगी जी कठिनतम यात्रा कर गरुडासन पर्वत तक पहुंचे....और और शुरू की अपनी सबसे बड़ी साधना......इस साधना के बारे में मैं नहीं बता सकता....जानता तो हूँ पर यही महायोगी जी के जीवन का सबसे अहम् पड़ाव है....इसी पर्वत पर महायोगी जी को माता रानी के न केवल दर्शन हुए बल्कि आज तक जो इतिहास में सुना भी नहीं गया.....मातारानी के साथ लगभग तीन घंटों से अधिक कि अवधि तक महायोगी जी रहे लेकिन महायोगी नहीं जानते थे कि वो किस से धर्म चर्चा कर रहे हैं....अंतिम कुछ क्षणों में माता ने स्वयं ही कह दिया....कि तुम मुझसे मिलने यहाँ आये थे....तो देख लो मैं ऐसी हूँ.....और करीब सात मिनट तक वहां रह कर देवी ने बिदा ली....आप ये कल्पना करने न लग जाएँ की कोई आठ भुजा वाली मुकुट धारण किये शेर पर सवार हो कर प्रकट हुई और अदृशय हो गयीं......ऐसा कुछ नहीं हुआ......महायोगी जी 26 दिनों तक बिलकुल भूखे रहे होंठ और चमड़ी जगह जगह से फट गयी थी बहुत ही तेज बुखार हो रहा था.....दो दिनों से महायोगी हिले तक नहीं थे.....अब महायोगी जीने की उम्मीद छोड़ चुके थे.....ऐसे में उन्हें मूत्र त्याग की इच्छा हुई....घसीटते हुए कुच्छ दूरी तक गए.....कुछ बूँद मूत्र त्याग किया.....वापिस कन्दरा की और लौटने लगे तो बेहोश हो कर गिर गए.....तभी एक गांव की महिला वहां जड़ी बूटियाँ ढूढती हुई पहुंची....उसने महायोगी को उठाया और पानी पिलाया....फिर लताडती हुई पर्वत के ऊपर ले गई क्योंकि ठण्ड के कारण महायोगी जी का शरीर अकड़ गया था....ऊपर धूप थी.....वहां धूप में लिटा कर महायोगी जी से घर का पता पूछने लगी और कहने लगी की तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे हो...जानते नहीं की यहाँ खतरा है...इतनी ऊंचाई पर तो जानवर भी जिन्दा नहीं रहते....जब महायोगी जी ने कहा की वो माता भगवती को मनाने के लिए आये हैं...तो वो औरत कहने लगी माता तो दिल में होती है..आत्महत्या करके नहीं मिलेगी अपने घर चले जाओ....लेकिन महायोगी बोले की मैं जानता हूँ कि दिल में प्रेम और भक्ति होनी चाहिए पर शायद इतना काफी नहीं....इसी तरह समय तीन घंटे बीत गए....जब महायोगी जी बातो मैं ही उलझे रहे तर्क पे तर्क देते रहे......तो उस औरत ने अपनी गोद से गर्म तजा प्रसाद निकाल कर महायोगी जी को दिया और बोली देखो लो मैं ऐसी ही हूँ.......महायोगी को उस स्त्री कि बातों मैं सच्चाई नजर आई.....महायोगी जी ने अपनी दादी को बताते हुए कहा था कि दादी जी पता नहीं क्यों मुझमे उस औरत कि बात काटने का सहस ही नहीं रहा...वो जो कहती गई मैंने मन....लगा मानों सचमुच
वो ही आदि जगदम्बा है......जैसे ही हल्का सा बोध हुआ.....आँखों से आंसू बहाने लगे मैं दहाड़ दहाड़ कर रोने लगा....उनके सीने से लग कर रोता रहा....पलट पलट कर उनको देखता.....उनको छू कर देखा....उनहोंने कहा मैं सदा तुम्हारे साथ ही हूँ.....कुरुकुल्ला कि प्रतिमा का निर्माण करो.....रथ बनायो......(पहाड़ी कुल्लवी शैली कि प्रतिमा को रथ कहा जाता है)....फिर माता उठी और कहने लगी ये प्रसाद तुम्हारे लिए...और मैं खड़ा हो गया.....वो उठी हाथ मैं दरात थी...और पहाड़ कि दूसरी और जाने लगी.....दिल तो कर रहा था कि मैं रोकू.....लेकिन हिल ही नहीं पा रहा था....थोड़ी देर मैं ठंडी हवा के झोंके ने अहसास दिलाया तो पहाड़ी कि तरफ भागा....दूर दूर तक कोई नहीं था....यहाँ तक कि जंगल तो बहुत ही दूर थे केवल नग्न रिक्त परवत ही था....महायोगी काफी देर रोते रहे.....अचानक हसने लगे...उनको याद आया कि शायद बुखार दिमाग मैं चढ़ रहा है या इतने दिनों से भूखे होने के कारण मौत से पहले हेल्युसुनेशन हो रहा है....भला ऐसा कैसे हो सकता है कि अभी माता आई थी.....अपने को महायोगी जी ने बहुत समझाया....लेकिन तभी हाथ पर रखे प्रसाद पर नजर गई.....जिसकी गर्मी हाथों को महसूस हो रही थी.....महायोगी जी ने प्रसाद ग्रहण किया.....लेकिन आज तक भी महायोगी इस बात को मान ही नहीं पाए कि सचमुच वो भगवती ही थी....लेकिन महागुर को इस बात का पता चलते ही वो भी गरुडासन पहुंचे......महायोगी इतना होने पर भी भ्रम ही मान रहे थे....तो साधना आगे जारी रखने कि जिद्द पर अड़े थे......महागुरु के समझाने बुझाने पर ही लौटे....हम सब तो यही मानते है कि वो भगवती ही थी......केवल महायोगी जी को छोड़ कर....दादी जी का भी यही माना था.....देवी कुरुकुल्ला कि पहले एक धातु प्रतिमा ही थी.....जो प्राचीन है....लेकिन बड़ी मूर्ति जिसे रथ कहा जाता है...तैयार नहीं किया गया था....घर आने के तकरीबन 6सालों के बाद ही महायोगी ने अपना वादा पूरा कर कुरुकुल्ला देवी का रथ बना कर तैयार करवाया....धन का अत्यंत अभाव होने के कारण महायोगी जी माता की प्रतिमा को मनोवांछित स्वरुप नहीं दे पाए लेकिन भविष्य में धन कि व्यवस्था होने पर ऐसा करेने का मन बना माता कि मूर्ती को तैयार किया गया......आप भी जगतकल्याणी माता कुरुकुल्ला जी के दर्शन कर लीजिये......
-लखन नाथ
कौलान्तक पीठ में स्थित माता कुरुकुल्ला कि अस्थाई प्रतिमा
इसी प्रतिमा को माँ भगवती का दिव्य देवी रथ भी कहा जाता है
"कौलाचार" कोई भद्दा कामुक परिहास नहीं है। "कौलाचार" है श्रेष्ठता। जो कुल शिव का हो, जो शक्ति का हो वही कुल "कौलों" का कुल है। जो कुल रहस्यों के आवरण को निर्मित करता हो, जो कुल रहस्यों की आवरण पूजा करता हो, वही "कौल" है। "कौल धर्म है" "कौल शिव हैं" और हम उन्हीं को अपना मानते हैं जो शिव के हैं। संसार में बहुत से हैं जो "शिव द्रोही" है। तब भी हम मौन है, क्योंकि उनकी गति भी प्रलय काल में शिव ही है। "कौल" होने के लिए "घंटाकर्ण वीर" होना जरूरी है। "कौल" होने के लिए शिव का गण "महाकाल" और "वीरभद्र" होना जरूरी है। शिव का होने के लिए बस उनका हो जाना जरूरी है। लोग पूछते हैं की देश के लिए वर्तमान परिस्थितियों के लिए, हम क्या कर रहे हैं? हमारा उत्तर है की सदियों से तुम्हारे संसार और इस देश के लिए, इसकी संस्कृति के लिए, कौन कार्य कर रहा है? देश की राजनीति हो या धर्म, नई पीढ़ी की दिशा हो या परिवर्तन का अभियान। हम सर्वत्र उपलब्ध हैं। अभी बताने का समय नहीं आया। लेकिन तुम्हारे साथ झंडे थामने वाला एक हाथ "महाहिन्दू" का है, शिव के "कौल गण" का है। जब तुम पिटते हो, तुम्हारे साथ हम भी पिट रहे हैं। जब तुम भूखे सोते हो, हम भी भूखे सो रहे हैं। देश के लिए, संसार को बदलने के लिए, तुम भी सामने हो और हम भी सामने हैं। बस अंतर ये है की तुम संसार के कार्य दिखा-दिखा कर, बता-बता कर करते हो और धर्म को अध्यात्म को अपने ह्रदय में रखते हो, हम उलट हैं, धर्म को अध्यात्म को बता-बता कर करते हैं, दिखा-दिखा कर करते हैं। लेकिन देश हित और विश्व कल्याण के कार्य गुप्त रीति से करते हैं। हमने तुमसे नहीं पूछा की क्या तुम शिव की पूजा करते हो? तो तुम मत पूछो की हम क्या करते हैं। "महाहिन्दू" को कभी भी मूक बैठा हुआ नहीं मानना चाहिए, वो तो मृत्यु आने के बाद भी बोलता है। क्योंकि वो शिव पर विश्वास रखता है और शत्रुओं से अनुरोद्ध करता है की शांति में सहयोग दें। अन्यथा आखिर में सिंह गरज उठाता है। धर्म सत्संग का विषय नहीं है, कथाओं का विषय नहीं है। वो तो निरंतर जीवन है, योग क्षेम है। एक ऐसी उच्चता है जो विनम्रता देती है। कडवे वचनके साथ ही मीठा ह्रदय देती हैं। लेकिन इन सबके बाबजूद "कौलान्तक संप्रदाय" का गोपनीय ज्ञान एक रहस्य था और रहेगा। बस उजागर होगी तो "महाहिन्दुओं" की सनातन गौरव दास्तान।
अर्थ :- माँ दुर्गे! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दु:ख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो।
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
द्वार तेरे मैय्या आया है जोगी
द्वार तेरे मैय्या आया है जोगी
इच्छा क्या मैय्या पूरण नहीं होगी
इच्छा क्या मैय्या पूरण नहीं होगी
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
हिमालय में भटका मैय्या दर तेरा पाने
हिमालय में भटका मैय्या दर तेरा पाने
लिए कमंडल भटका मैया नीर तेरा लाने
लिए कमंडल भटका मैया नीर तेरा लाने
बिन दरस अब जाऊं नहीं मैं चाहे मुझको रुला दे
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
दर्शन को निकला मैय्या निकला भस्म मल कर
दर्शन को निकला मैय्या निकला भस्म मल कर
हिमालय भी पहुंचा मैय्या टूटा चल चल कर
हिमालय भी पहुंचा मैय्या टूटा चल चल कर
नीर बहे है नैनों से अब मुझको तू बुला ले
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
दुनिया नें मुझको मैय्या कहीं का न छोड़ा
दुनिया नें मुझको मैय्या कहीं का न छोड़ा
थक चूका हूँ जी के अब दिल को ऐसा तोडा
थक चूका हूँ जी के अब दिल को ऐसा तोडा
हर तरफ अँधियारा है अब आगे कैसे जाऊं
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
रिश्तों को देखा है नातों को जाना
रिश्तों को देखा है नातों को जाना
किस किस को अपना मैय्या मैंने माना
किस किस को अपना मैय्या मैंने माना
छूट गए हैं साथी सारे कैसे उनको मनाऊं
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
मैय्या रानी ओ काली मैय्या
- महासिद्ध ईशपुत्र
मार्कंडेय पुराण के अनुसार पंचम नवरात्र की देवी का नाम स्कंदमाता है, प्राचीन कथा के अनुसार एक बाद देवराज इन्द्र ने बालक कार्तिकेय को कहा की देवी गौरी तो अपने प्रिय पुत्र गणेश को ही अधिक चाहती है, तुम्हारी और कभी दयां नहीं देती, क्योंकि तुम केवल शिव के पुत्र हो व तुमको तो देवी कृत्तिकाओं ने ही पाला है, इस पर कार्तिकेय मुस्कुराए और बोले जो माता संसार का लालन पालन करती है, जिसकी कृपा से भाई गणेश को देवताओं में अग्रणी बनाया, वो क्या मेरी माता होते हुये भेद-भाव करेगी, तुम्हारे मन में जो संदेह पैदा हुआ है उसकी आधार भी मेरी माता ही हैं, मैं उनका पुत्र तो हूँ ही लेकिन उनका भक्त भी हूँ, हे इन्द्र जग का कल्याण करने वाली मेरी माता निसंदेह भक्तबत्सल भवानी है, ऐसे बचन सुन कर ममतामयी देवी सकन्दमाता प्रकट हुई और उनहोंने अपनी गोद में कार्तिकेय को बिठा कर दिव्य तेजोमय रूप धार लिया, जिसे देखते ही देवराज इन्द्र क्षमा याचना करने लगे, सभी देवगणों सहित इंद्र ने माता की स्तुति की, माता चतुर्भुजा रूप में अत्यंत ममता से भरी हुई थी, दोनों हाथों में पुष्प एक हाथ से वर देती व कार्तिकेय को संभाले हुये देवी तब सिंह पर आरूढ़ थी, देवी का कमल का आसन था, तब देवताओं के द्वारा स्तुति किये जाने पर देवी बोली मैं ही संसार की जननी हूँ मेरे होते भला कोई कैसे अनाथ हो सकता है? मेरा प्रेम सदा अपने पुत्रों व भक्तों के बरसता रहता है, सृष्टि में मैं ही ममता हूँ, ऐसी ममतामयी माँ की पूजा से भला भक्त को किस चीज की चिंता हो सकती है? बस माँ को पुकारने भर की देर है, वो तो सदा प्रेम लुटती आई है,
भगवान् कार्तिकेय जी के कारण उतपन्न हुई देवी ही स्कंदमाता है , महाशक्ति स्कंदमाता पार्वती जी का तेजोमय स्वरुप हैं जो सृष्टि को माँ के रूप में ममत्व और प्रेम प्रदान करती हैं, भगवान् कार्तिकेय का लालन पालन करने के कारण ही द्वि को स्कंदमाता कहा जाता है, देवी के उपासक जीवन में कभी अकेले नहीं होते ममतामयी स्कंदमाता सदा उनके साथ रह कर उनकी रक्षा करती है, संकट की स्थित में पुकारे पर देवी सहायता व कृपा करने में बिलम्ब नहीं करती, थोड़ी सी प्रार्थना व स्तुति से ही प्रसन्न हो कृपा बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए पांचवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का पाठ करना चाहिए , पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें , फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है , यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)
देवी स्कंदमाता को प्रसन्न करने के लिए पांचवें दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ सः ह्रीं ऐं स्कंदमातायै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ सः ह्रीं ऐं स्कंदमातायै स्वाहा:
माता के मंत्र का जाप करने के लिए कमलगट्टे की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ
यन्त्र-
929 345 224
677 632 891
654 756 879
यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को लाल रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, स्कंदमाता देवी का श्रृंगार लाल रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को कुमकुम,केसर, लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं , माता की मंत्र सहित पूजा सुबह व शाम की जा सकती है, संध्या की पूजा का समय देवी कूष्मांडा की साधना के लिए विशेष माना गया है , मंत्र जाप के लिए भी संध्या व प्रात: मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व कलश को जनेऊ जरूर अर्पित करना चाहिए, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, ध्वजा को गिरने से बचाना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें
यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए
मंत्र-ॐ सः ह्रीं ऐं
मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को हलवे का प्रसाद तथा फलाहार या मीठा भोग आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में मिठाई व फल चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है , विशुद्ध चक्र में देवी का ध्यान करने से पांचवा चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं ,प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में लौंग व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए
चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै
ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, पांचवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल लाना या अर्पित करना बहुत बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए
तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे अकेलेपन की समस्या हो या न्याय न मिल पाने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र
ॐ छां छायास्वरूपिन्ये दूतसंवादिनयै नम:(न आधा लगेगा)
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें
व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें
ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते
भयेभ्यस्त्राही नो देवी दुर्गे देवी नमोस्तुते
यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा पांचवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो इच्छानुसार किसी भी शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज पांचवें नवरात्र को पांच कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ बटुआ धन कोष गुल्लक आदि भेंट करना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें
पांचवें नवरात्र को अपने गुरु से "कालज्ञान दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप विविध काल और सृष्टि चक्र को जान सकें,समत्व की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, पांचवें नवरात्र पर होने वाले हवन में जौ की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व देसी घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले पांचवें नवरात्र का ब्रत ठीक सात पचपन पर सायं खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को लाल अथवा मेरून रंग के वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और रक्त वस्त्र धारण कर सकते हैं , भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ
मार्कंडेय पुराण के अनुसार चतुर्थ नवरात्र की देवी का नाम कूष्मांडा देवी है, प्राचीन कथा के अनुसार जब ये ब्रह्माण्ड बना ही नहीं था, तब माँ योगमाया ने सृष्टि की उत्त्पति के लिए ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया, किन्तु ब्रह्मा जी तो मन में कामना करते की ऐसी सृष्टि पैदा हो लेकिन उसे पूरा कैसे किया जाए तो योगमाया से ब्रह्मा जी ने सहायता मांगी,देवी को स्तुति से प्रसन्न कर ब्रह्मा जी को देवी से सृष्टि निर्माण की कला प्राप्त हुई, तब देवी ने सबसे पहले अंड अर्थात ब्रह्माण्ड पैदा किया, तथा सृष्टि में गर्भ के अतिरिक्त अण्डों से जीवन पैदा करने की शक्ति भी ब्रह्मा जी को दी, स्वयं भी देवी करोड़ों सूर्य के सामान तेजस्वी स्वरुप में, ब्रहमां में सूर्य मंडल के भीतर स्थित रहती हैं, ऐसी सामर्थ्य देवी के अतिरिक्त किसी और में नहीं है, देवी आठ भुजाओं वाली हैं, जिनमें कमल पुष्प, धनुष, तीर, कमंडल, चक्र, गदा,माला तथा अमृत कलश है धारण किये हुये हैं व सिंह के आसन पर सवार हैं, देवी साधक को अमरत्व का वरदान देने में समर्थ हैं, इच्छा मृत्यु का वर देने वाली देवी, साधक के सब दुखों को हरने में क्षण मात्र भी देर नहीं करती, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी पारलौकिक विद्याओं की जननी है, जीवन को धर्म एवं कृपा से भर देने में सामर्थ है
ब्रह्माण्ड को पैदा करने के कारण देवी का नाम पड़ा कूष्मांडा, महाशक्ति कूष्मांडा योगमाया का दिव्य तेजोमय स्वरुप हैं जो सृष्टि को पैदा करने के लिए उत्पन्न हुआ, संसार में अण्डों से जीवन की उत्त्पत्ति कराने की शक्ति ब्रह्मा जी को देने के कारण भी देवी को कूष्मांडा कहा जाता है, देवी के उपासक अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं तथा इछामृतु का वर देने वाली यही देवी हैं, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी को प्रसन्न करने के लिए चौथे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पांचवें व छठे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)
देवी कूष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै स्वाहा:
माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ
यन्त्र-
775 732 786
151 181 102
762 723 785
यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को भगवे रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार भगवे रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को केसर, लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा कभी भी की जा सकती है, रात्री की पूजा का देवी कूष्मांडा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है
मंत्र जाप के लिए भी संध्या व रात्री मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक बड़ा घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व कलश को लाल कपडे से ढक कर रखें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए
मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं
मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को भगवे वस्त्र, रुद्राक्ष माला तथा गेंदे के फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए
मंदिर में भगवे रंग की ध्वजा चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, अनाहत चक्र में देवी का ध्यान करने से चौथा चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में कपूर व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए
चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै
ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, चौथे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और दो अन्य नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे संतान प्राप्ति की समस्या हो या विदेश यात्रा की, या पद्दोंन्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र
ॐ क्षूं क्षुधास्वरूपिन्ये देव बन्दितायै नम:
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें
ॐ शरणागतदीनार्त परित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणी नमोस्तुते
यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा चौथे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी गुफा वाले शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज चौथे नवरात्र को चार कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ आभूषण देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, चौथे नवरात्र को अपने गुरु से "ब्रहमांड दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप देवत्व प्राप्त कर लेते हैं व ब्रह्म विद्या की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, चौथे नवरात्र पर होने वाले हवन में काले तिलों की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले चौथे नवरात्र का ब्रत ठीक सात पंद्रह बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर का प्रसाद बांटना चाहिए
आज सुहागिन स्त्रियों को भगवे अथवा पीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और भगवे या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
मार्कंडेय पुराण के अनुसार तृतीय नवरात्र की देवी का नाम चंद्रघंटा देवी है, निगम ग्रंथों में निहित कथा के अनुसार जब भगवान् शिव ने देवी को समस्त विद्ययों का ज्ञान प्रदान करना शुरू किया तो देवी उस ज्ञान का तप के लिए प्रयोग करने लगी, लगातार आगम निगमों का ज्ञान प्राप्त कर देवी महातेजस्विनी हो गयी व सभी कलाओं सहित तेज पुंज बन योगमाया के रूप में स्थित हो गयी, तब प्रसन्न हो कर शिव ने देवी को अपने साथ एकाकार कर अर्धनारीश्वर रूप धरा, उस समय देवी पार्वती जी को अपने वास्तविक स्वरुप का बोद्ध हुआ, तब शिव से अलग हो आकाश में देवी ने सिंह पर स्वर हो दस भुजाओं वाला एक अद्भुत रूप धारण किया, हाथों में कमल पुष्प धनुष त्रिशूल,गदा, तलवार सहित वर अभी मुद्रा धारण की, क्योंकि देवी तपस्विनी रूप में थी तो एक हाथ में माला और एक हाथ में उनहोंने कमंडल धारण कर लिया, सभी ऋषि मुनि देवता देवी के तेज को सः नहीं पा रहे थे तो भगवान शिव ने चन्द्रमा को देवी के शीर्ष स्थान पर बिराजने को कहा, जिससे उनका तेजस्वी स्वरूप अब और भी सुन्दर तथा शीतल हो गया, तब सभी देवताओं नें देवी की जय जयकार की तथा उनको चंद्रघंटा देवी के नाम से पुकारा,जो भी भक्त देवी के ऐसे दिव्य रूप की पूजा करता है, वो एक साथ संसार में भी तथा मुक्ति के मार्ग पर भी एक ही समय चल सकता है, भौतिक संसार में तो आगे बढ़ता ही है साथ अध्यात्म में भी शिखर पर रहता है, सभी विद्यार्थियों, साधको, भक्तों को ऐसी देवी के दर्शनों से महासिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, ऐसे व्यक्ति को अहंकार रहित ज्ञान प्राप्त होता है, देवी को पूजने वाले को सवयम देवता भी पूजते हैं
आकाश मंडल में चन्द्रमा को अपने शीश पर धारण करने के कारण देवी का नाम पड़ा चंद्रघंटा, महाशक्ति चंद्रघंटा माँ पार्वती जी का तेजोमय स्वरुप हैं जो सर्व कलाओं को धारण करने से उत्पन्न हुआ
अपनी सभी कलाओं को अध्यात्म धर्म सहित धारण करने के कारण ही देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है, देवी के उपासक एक साथ ही संसार में जीते हुये परम मुक्ति के मार्ग पर भी चल सकते है, जिस कारण देवी की बड़ी महिमा गई जाती है, देवी कृपा से ही भक्त को संसार के सभी सुख तथा मुक्ति प्राप्त होती है, देवी को प्रसन्न करने के लिए तीसरे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है
यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)
देवी चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं चंद्रघंटा देव्यै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं चंद्रघंटा देव्यै स्वाहा:
माता के मंत्र का जाप करने के लिए रक्त चन्दन की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ
यन्त्र-
539 907 234
227 876 191
654 812 902
यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को लाल रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार लाल रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा केवल सायकाल को ही की जाती है, शाम की पूजा का चंद्रघंटा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी संध्या मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए
मंत्र-ॐ क्लीं ह्रीं ऐं
मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को कमल पुष्प, रक्त चन्दन की माला तथा सफेद फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए,मंदिर में लाल रंग की चुनरी चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, मणिपुर चक्र में देवी का ध्यान करने से तृतीय चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में केसर मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए,
चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै
ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, तीसरे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और बर्फ (हिमजल) का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए
तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे घरेलु कलह से मुक्ति हो, विवाह नहीं हो पा रहा हो, प्रेम प्राप्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र
ॐ रं रक्त स्वरूपिन्ये महिषासुर मर्दिन्ये नम:
(न आधा लगेगा व न की जगह ण होगा )
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें,
यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा तीसरे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी नाड़ी के निकट स्थित शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज तीसरे नवरात्र को तीन कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ चूड़ियाँ व श्रृंगार प्रसाद देना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, तीसरे नवरात्र को अपने गुरु से "उज्जवल दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, तीसरे नवरात्र पर होने वाले हवन में खीर से हवन करना चाहिए
ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले तीसरे नवरात्र का ब्रत आठ बीस साय खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर हलवा पूरी का प्रसाद बांटना चाहिए,आज सुहागिन स्त्रियों को लाल वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और हल्के लाल रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार द्वितीय नवरात्र की देवी का नाम ब्रह्मचारिणी देवी है, ये ब्रह्मचारिणी देवी भी गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती ही हैं, एक समय की बात है कि देव ऋषि नारद पर्वतराज हिमालय के महल पहुंचे, जहाँ पर्वत राज हिमालय की प्रार्थना पर उनहोंने बालिका पार्वती की जन्म पत्रिका शोधी और उनका भाग्य बताते हुये कहा कि इस कन्या का विवाह तो त्रिलोकीनाथ भगवान शिव से होगा, ये सुन कर देवी पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने कि इच्छा से कठोर तप करना शुरू कर दिया, देवी ने भोजन पानी त्याग दिया श्वेत वस्त्र धारण कर लिए, हाथों में कमंडल और माला ले कर, कठोर तपस्वियों जैसा जीवन जीने लगी, जैसे जैसे तप बढ़ता गया, तीनो लोकों में हा हा कार मच गया, इन्द्र की पदवी भी स्वर्ग में डोलने लगी, तब सभी देवताओं को जिज्ञासा हुई कि पृथ्वी पर कौन ऐसा तपस्वी है और वे उसे ढूडने हिमालय जा पहुंचे, जहाँ उनहोंने देवी पार्वती जी के दर्शन ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में किये, जिनके दिव्य तेज से समस्त लोक प्रकाशित हो रहे थे, महाशक्ति के ऐसे रूप के दर्शन कर सभी पवित्र हो गए, देवी के उपासक सभी पापों से मुक्त हो कर सुखी एवं पवित्र सात्विक जीवन जीते हैं व मुक्ति प्राप्त करते है, सभी आध्यात्मिक शक्तियों कि जननी भी ब्रह्मचारिणी देवी ही हैं,
हिमालय पर कठोर तपस्या करने के कारण व तपस्या नियमों को पालने के कारने देवी का नाम पड़ा ब्रह्मचारिणी, महाशक्ति ब्रह्मचारिणी माँ पार्वती जी का तपस्वी स्वरुप का ही नाम है, कठोर सात्विक तपस्या से तीनों लोकों को प्रभावित करने के कारण भी देवी को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है, देवी के उपासक सभी पापों से मुक्त हो कर सुखी एवं पवित्र सात्विक जीवन जीते हैं, देवी कृपा से ही मुक्ति प्राप्त होती है, देवी को प्रसन्न करने के लिए दूसरे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय व तीसरे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का अर्गला स्तोत्र फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का भी पाठ करें, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)
देवी ब्रह्मचारिणी को प्रसन्न करने के लिए दूसरे दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ हुं ह्रीं ऐं ब्रह्मचारिणी देव्यै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ हुं ह्रीं ऐं ब्रह्मचारिणी देव्यै स्वाहा:
माता के मात्र का जाप करने के लिए तुलसी की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ
यन्त्र-
777 298 307
621 543 991
931 053 777
यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को saphed रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, शैलपुत्री देवी का श्रृंगार लाल किनारे वाले सफेद रंग के वस्त्रों से किया जाता है, सफेद या लाल रंग के फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को सफेद चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं , माता की मंत्र सहित पूजा केवल सुबह ही की जाती है, शाम की पूजा की अपेक्षा देवी ब्रह्मचारिणी की साधना के लिए ब्रह्म मुहूर्त का ज्यादा महत्त्व माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी ब्रह्म मुहूर्त या सुबह के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक अखंड दीपक जला लेना चाहिए, देवी की पूजा में नारियल सहित कलश स्थापन किया होना चाहिए साथ ही मंत्र जाप को फलीभूत होने के लिए रेत में कलश के निकट गेहूं के जवारे उगायें, कलश में गंगाजल और पंचामृत भर कर अक्षत (चाबलों) की ढेर पर इसे स्थापित करना चाहिए यदि पहले दिन कलश स्थापित किया है तो केवल कलश पूजा करें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर मौली सूत्र बांधें, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए
मंत्र-ॐ हुं ह्रीं ऐं
मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को श्वेत वस्त्र तुलसी माला तथा कुशा का आसन आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में कमंडल दान देने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, स्वाधिष्ठान चक्र में देवी का ध्यान करने से द्वितीय चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में दूध मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए,
चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै
ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, पहले दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और कूएं का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए , आज सुहागिन स्त्रियों को भी अधिक श्रृंगारनहीं करना चाहिए, स्वयम भी साधारण और हल्के रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे विद्या रोजगार की समस्या हो या याददाश्त कमजोर होने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं
देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र
ॐ श्रीं बुद्धि स्वरूपिन्ये महिषासुर सैन्यनाशिनयै नम:(न आधा लगेगा)
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें
व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भितिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि
दारिद्रयदुःखभयहारिणी का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाआर्द्रचित्ता
यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा दूसरे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी सात्विक शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज दूसरे नवरात्र को दो कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ मोतियों या रक्तचंदन की माला देनी चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, दूसरे नवरात्र को अपने गुरु से "सत्व दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप पूर्ण आत्मिक, दैहिक, मानसिक पवित्रता की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, दूसरे नवरात्र पर होने वाले हवन में पंचमेवा की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले दूसरे नवरात्र का ब्रत ठीक सात बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्या पराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
जय जय जग नायिका जग सुख दयिका नमन करे तुझे संता,
ऐं ह्रीं बीज दायक सुरगण नायक नमन करे भगवन्ता ।
हे अन्न धन वर्षिणी सब जग कर्षिणी दुख न पावे कोई,
जो रूप उजाला अति विकराला करो अनुग्रह सोई,
जय जय महाशक्ति अतुलित भक्ति व्यापक परमानंदा,
हे दुख विनाशिनी हृदय निवासिनी हरो मम वेगी प्रचण्डा ।
जेहि जोगी विरागी यति अनुरागी सुमिरत त्यागे काया,
निशि वासर ध्यावहिं गुण गण गावहिं जयति योगमाया ।
जय जय तेजस्विनी महातपस्विनी पतित पावनी गंगा,
जो काली कपालिनी महाविकरालिनी नित रहे शिव के संगा,
तू ही महालक्ष्मी दुर्गा काली अंत न पावे कोई,
जो मन से ध्यावे सुने सुनावे अनुग्रह पावे सोई,
जय जय हे भवानी शिव पटरानी तू ही ज्ञान निकंदा,
हे महाविलासिनी हृदय निवासिनी हरो मम वेगी प्रचण्डा ।
जेहि जोगी विरागी यति अनुरागी सुमिरत त्यागे काया,
निशि वासर ध्यावहिं गुण गण गावहिं जयति योगमाया ।
जय जय शिवनायिका हे महाकालिका गण है तेरे हनुमंता,
नित उठ गावे तुझे सुनावे यश तेरा तुझको संता,
मां तू ही भवानी महादयानी तुझको ध्यावे जोई,
अतुलित भक्ति अतुलित शक्ति नित नित पावे सोई,
हे मां अविनाशी हे सुखराशि तू ही परमानंदा,
कैलाश निवासिनी दैत्य विनाशिनी हरो मम वेगी प्रचण्डा ।
जेहि जोगी विरागी यति अनुरागी सुमिरत त्यागे काया,
निशि वासर ध्यावहिं गुण गण गावहिं जयति योगमाया ।
जयति योगमाया ।
जयति योगमाया ।
जयति योगमाया ।
- महासिद्ध ईशपुत्र
"During Navratri you can fast one time or for the entire Navratri period or consume fruits only for 9 days to do Ma Bhagvati Paraamba sadhna. For the mantra sadhna using rudraksh beads or red sandalwood beads are the best. If you want to mentally recite the mantras then too, you can do so continuously. There is no necessity for different mantras for the 9 different Goddesses - here presented one mantra is sufficient -Kaulantak Peeth Team Himalaya
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'नवरात्री' में आप 'माँ भगवती पराम्बा' की साधना के लिए एक समय अथवा पूर्ण काल व्रत रख सकते हैं अथवा 9 दिन फलाहारी रह सकते हैं। मंत्र साधना के लिए 'रुद्राक्ष' अथवा 'रक्त चन्दन' की माला उत्तम है। आप यदि मानसिक जाप करना चाहते हैं तो भी निरन्तर मंत्र जाप कर सकते हैं। नौ देवियों के लिए अलग-अलग मंत्र की आवश्यकता नहीं प्रस्तुत एक ही मंत्र पर्याप्त है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
कौलान्तक सम्प्रदाय की प्रमुख देवी "रक्त तारा" जिसे "देवी कुरुकुल्ला" और "सुकुल्ला" या "तोतला" जैसे नामों से पुकारा जाता है। वे चमत्कारों और रहस्यों की देवी के रूप में विख्यात हैं व पूजी जाती हैं। देवी अति शीघ्र प्रसन्न हो कर वरदान देती हैं। कौलाचारियों की महाअराध्या देवी का मंत्र स्वयं "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" की वाणी में प्रस्तुत है। शाबर कुरुकुल्ला मंत्र-ॐ नमो कुरुकुल्ले अन्न-धन वर्षिणी सकलकामाकर्षिणी सिद्ध हो-सिद्ध हो-सिद्ध हो माँ।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार प्रथम नवरात्र की देवी का नाम शैलपुत्री देवी है, इन शैलपुत्री देवी को गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में हम जानते हैं, शैलपुत्री के नाम से माँ पार्वती जी को त्रिलोकी भर में पूजा जाता है, और यही देवी सबकी अधीश्वरी है, एक समय की बात है कि पर्वत राज हिमालय ने कठोर तप कर माँ योगमाया को प्रसन्न किया, जब योगमाया के उनको दिव्य दर्शन हुये तो माता ने हिमालय को वर माँगने को कहा, तब पर्वत राज हिमालय ने योगमाया से कहा कि वे उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेँ, माता ने प्रसन्न हो कर पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लिया, हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में हिमाचल के घर पैदा हुई, पर्वत राज की पुत्री होने के कारण व कठोर तपस्वी सवभाव के कारण उनका नाम शैल पुत्री पड़ गया, माता शैल पुत्री का भक्त जीवन में कभी हारता नहीं, दुःख कोसों दूर से भक्त को देख कर भाग जाते हैं, शैल पुत्री के भक्त दृद निश्चयी, विश्वविजेता होते हैं, यदि आप सदा भयभीत रहते हों, जीवन कि सही दिशा नहीं ढून्ढ पा रहे हों, उदास जीवन में कोई सहारा न बचा हो, सब और शत्रु ही शत्रु हो गए हों, तो माता को मनाने का सबसे सही वक्त आ गया है, अब माता की पूजा आपकी सदा रक्षा करेगी,शुम्भ-निशुम्भ जैसे राक्षसों का नाश करने वाली देवी आपके जीवन के सब संकट हर लेगी, नवरात्रों में देवी स्वयं भक्तों के पास चल कर आती हैं, केवल उनको सच्चे मन से पुकारने की जरूरत होती है, आज हम आपको बताएँगे कि कैसे होंगी देवी शैलपुत्री प्रसन्न, वो कौन से मंत्र हैं जो माँ को खींच कर आपकी और ले आयेंगे, वो कौन सा यन्त्र हैं जिसकी सथापना से शैलपुत्री की सथापना हो जायेगी, किस रंग के वस्त्र माता को पहनाएं अथवा माता का श्रृंगार कैसे करें ? यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो आज हम आपको बताएँगे सही बिधि-बिधान जो माता कि कृपा ले कर आएगा
हिमालय के घर पैदा होने के करण देवी का नाम पड़ा शैलपुत्री,शैलपुत्री माँ पार्वती जी का ही नाम है , कठोर तपस्वी स्वभाव के कारण भी देवी को शैल पुत्री कहा जाता है , देवी शैलपुत्री का भक्त जीवन में कभी नहीं हारता, देवी का नाम भर लेने से दुःख कोसों दूर से भाग जाते हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए पहले नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय का पाठ करना चाहिए, जब भी पाठ करें तो पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर कवच का अर्गला स्तोत्र फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करना चाहिए, सकाम इच्छा के लिए तो विशुद्ध संस्कृत में ही पाठ होना चाहिए लेकिन निष्काम भक्त हिंदी में व संस्कृत दोनों में पाठ कर सकते हैं, यदि आप किसी मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का भी पाठ करें, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो देवी के नवारण महामंत्र का जाप पूरे नवरात्र भर करते रहें
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)
देवी शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए पहले दिन का प्रमुख मंत्र है
मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं शैलपुत्री देव्यै नम:
दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें
जैसे मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं शैलपुत्री देव्यै स्वाहा:
माता के मात्र का जाप करने के लिए स्फटिक या रत्नों से बनी माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ पर बना लेँ
यन्त्र-
578 098 395
842 576 998
224 862 627
यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को गुलाबी रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, शैलपुत्री देवी का श्रृंगार गुलाबी रंग के वस्त्रों से किया जाता है, इसी रंग के फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की पूजा सुबह और शाम दोनों समय की जाती है, शाम की पूजा मध्य रात्री तक होती है और रात्री की पूजा का ही सबसे ज्यादा महत्त्व माना गया है
मंत्र जाप के लिए भी रात्री के समय का ही प्रयोग करें, यदि आप पूरे नवरात्रों की पूजा कर रहे हों तो एक अखंड दीपक जला लेना चाहिए, देवी की पूजा में नारियल सहित कलश स्थापन का बड़ा ही महत्त्व है, आप भी एक कलश में गंगाजल भर कर अक्षत (चाबलों) की ढेर पर इसे स्थापित करें, पूजा स्थान पर एक भगवे रंग की ध्वजा जरूर स्थापित करें जो सब बाधाओं का नाश करती है, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें
यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए,
मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं
मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी के वाहन बृषभ यानि कि बैल कि पूजा करनी चाहिए तथा बैलों को भोजन घास आदि देना चाहिए, मंदिर में त्रिशूल दान देने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, मूलाधार चक्र में देवी का ध्यान करने से प्रथम चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए
चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै
ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, पहले दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और तीन नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए
नवरात्रों में तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, सुहागिन स्त्रियों को श्रृंगार करके व मेहंदी आदि लगा कर ही सौभाग्यशालिनी बन ब्रत व पूजा करनी चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे घर, वाहन, की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं,
देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र
ॐ ह्रीं रेत: स्वरूपिन्ये मधु कैटभमर्दिन्ये नम:
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें
व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसी देवी भगवती ही सा
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति
यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा पहले नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी परवत पर स्थित शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज प्रथम नवरात्र को एक कन्या का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ पत्थर का एक शिवलिंग देना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, प्रथम नवरात्र को अपने गुरु से "बज्र दीक्षा"लेनी चाहिए, जिससे आप पूर्व जन्म की स्मृति व भविष्य बोध की स्मृति शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, प्रथम नवरात्र पर होने वाले हवन में गुगुल की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व गूगुल जलना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले प्रथम नवरात्र का ब्रत सवा आठ बजे खोलेंगे,ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर बूंदी का प्रसाद बांटना चाहिए, श्रृंगार अवश्य करें,किन्तु अति और अभद्र श्रृंगार से बचाना चाहिए न ही ऐसे वस्त्र धारण करने चाहिए, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज
'विकराल कुरुकुल्ला कवच मंत्र' एक स्तुति मंत्र है जो 'देवी' की स्तुति के साथ-साथ ही उनकी अनुकम्पा प्रदान करने वाला है। इसे मनोकामनापूरक मन्त्र व सुरक्षा करने वाला मंत्र कहा गया है। हिमालय पर 'गण गन्धर्व' इसी प्रकार उनकी मंत्र स्तुति करते हैं। 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' द्वारा गया गया ये मंत्र प्रस्तुत है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
-------Goddess Kurukulla Mantra-----------
तू महाभैरवी देवी डाकिनी, तू गंधर्वपूजिता...
शांत रूप तेरा तू विकराला देवपूजिता...
तू वरदायिनी कैलाशवासिनी कुरुकुल्ला...
दुर्गा दुर्गतिनाशिनी तू अंबा हे जगदंबा...
ॐ ह्रीं वज्रपुष्पं हुं फट् आः सुरेखे वज्ररेखे स्त्रींकारी ह्रींकारी क्लींकारिणी कुरुकुल्ले कुल्लुकतारिणी कुल्लुकेशी हुं ऐं स्त्रीं ह्रीं फट् कीली-कीली युं हुं हुं ऐं त्रीं द्रीं क्षीं स्हूं सर्वार्थसाधिनी जग्रय-जग्रय ॥
(tu mahabhairavi devi dakini, tu gandharv poojitaa...
shant roop tera tu, vikaralaa Dev poojitaa.......
tu vardayini kailashwasini , kurukulla..........
durgaa durgati naashini tu, Ambaa he! jagdambaa.......)
( om hreem vjrapushpm hum phat aa: surekhe vajrrekhe streengkaaree hreengkaaree kleengkaarini kurukulle kulluktaarini kullukeshee hum aim streem hreem phat kili-kili yum hum hum aim treem dreem ksheem sahoom sarvarth sadhini jagraya-jagraya...........)
'Kaulantak Peeth Himalay' presents 'Maha Kal Rudra Sadhana' according to 'Kaulachar Tradition'. Presented matra being Kaulachari may seem fearful but is not to be considered any less powerful. It is impossible to imagine vast power of Mahakal Rudra - Kaulantak Peeth Himalay
'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करते हैं 'कौलाचार परम्परा' से 'महाकाल रूद्र मंत्र'। प्रस्तुत मंत्र 'कौलाचारी' होने के कारण थोड़ा डरावना प्रतीत हो सकता है किन्तु फिर भी इस मंत्र की शक्ति को कम नहीं आंकना चाहिए। महाकाल रूद्र की शक्ति का पार पाना असंभव है-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
योनि तंत्र जैसे सामाजिक रूप से कलंकित और जटिल तंत्र के बारे में 'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज' कहते हैं की-भारत के ऋषियों नें जो भी मनुष्य को दिया वो अत्यंत श्रेष्ठ और उच्चकोटि का ज्ञान ही था. जिसमें तंत्र भी एक है. तंत्र में एक दिव्य शब्द है 'योनी पूजा' जिसका बड़ा ही गूढ़ और तात्विक अर्थ है. किन्तु कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों व वासना और भोग की इच्छा रखने वाले कथित धर्म पुरोधाओं ने स्त्री शोषण के लिए तंत्र के महान रहस्यों को निगुरों की भांति स्त्री शरीर तक सीमित कर दिया. हालांकि स्त्री शरीर भी पुरुष की भांति ही सामान रूप से पवित्र है. लेकिन तंत्र की योनी पूजा सृष्टि उत्पत्ति के बिंदु को 'योनी' यानि के सृजन करने वाली कह कर संबोधित करता है. माँ शक्ति को 'महायोनी स्वरूपिणी' कहा जाता है. जिसका अर्थ हुआ सभी को पैदा करने वाली. उस 'दिव्य योनी' का यांत्रिक चित्र ही 'श्री यन्त्र' है. वो 'महायोनी' ही 'श्री विद्या' हैं.
किन्तु तंत्र मार्गी साधक को सावधान रहना चाहिए.....विशेषतया स्त्री साधिकाओं को की कहीं योनी तंत्र के नाम पर उनको कुछ अनर्गल सिखा कर कोई उन्हें कूकर्म के मार्ग पर न ले जाए. ऐसा बहुत सी साधिकाओं के साथ पूर्व व वर्तमान में हुआ है......हो रहा है. इसीलिए कथित तांत्रिक समाज को गलत दिशा दे सकता है. बातों में या तर्क द्वारा कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है. पर योनी तंत्र चर्चा का नहीं प्रत्यक्ष सिद्धि का क्षेत्र है. इसलिए तंत्र की खोज करने वाले रहस्य चित्रों को यथारूप न ले कर उसे 'स्वरुप रहस्यानुसार' समझें. योनी तंत्र सृष्टि उत्पत्ति का परा विज्ञान है. न की स्त्री शरीर का अवयव. 'माँ करुणाकारिणी स्वर्ण सिंहासनमयी कामरूपिणी कामाख्या योनी' ब्रह्माण्ड उत्तपत्ति का प्रतीक हैं व शक्ति उतपत्ति का प्रतीक....वो प्रत्यक्ष विग्रह है. जिसकी तुलना किसी अंग विशेष से करना.......'मातृस्वरूपिनी पराम्बा' का घोर अपमान ही होगा.
योनी तंत्र का इतिहास परम पवित्र और बेदाग़ है इसलिए सामाजिक लोगों को इसे कलंकित या विकृत नहीं समझना चाहिए, बस तांत्रिकों की शक्ल में छिपे भेड़ियों से सावधान रहना चाहिए'-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.
प्रश्न: तो हमारे तन्त्र और उनके (वज्रयान) तन्त्र मेँ क्या भिन्नता है ?
ईशपुत्र: अन्तर है । अन्तर कहाँ हो जाता है? हम मूलतया शिव और शक्ति को प्रमुख रखते है । क्यों ? क्योंकि हमारे पंथ की शुरुआत-प्रारम्भ स्वयं महादेव ने किया लेकिन वहां उनके सम्प्रदाय की शुरुआत महादेव ने स्वयं ने नहीं की है अपितु हमारे ही सम्प्रदाय से, मै उनका नाम नहीं लेना चाहता, फिर भी यदि आप जिज्ञासु लोग है और स्वयं खोजेंगे तो आपको ऐसे सिद्धों के नाम मिल जाएंगे जो हमारे ही हिमालय के योगी "सिद्ध-परम्परा" के बहुत पहले से सिद्ध थे लेकिन, निजी स्वार्थ होता है, राजनीति कहाँ नहीँ रहती ! धर्म और गद्दियों मेँ भी तो राजनीति है ! प्राचीन काल में हमारे सम्प्रदाय की प्रचलित बहुत महत्वपूर्ण कथा है कि, बहुत से सिद्धों ने हमारे ही पंथ से बगावत की । होता है...हर सम्प्रदाय में जो विशालकाय सम्प्रदाय हो वहां सब व्यक्तियों का तुष्टिकरण नहीं हो सकता और हमारे पंथ में पीठाधीश्वर बनने के नियम जितने कठिन है जितने जटिल है शायद ही किसी और पंथ और धर्म में ऐसे हो । ऐसा लगता है जब हम तैयारी करते है, कि मानो हम किसी युद्ध पर जानेवाले हो ! युद्धस्तर पर हम तैयारियां करते है तब जाकर के एक पीठाधीश्वर का युद्ध लड के उसकी गद्दी तक पहुंचना होता है । जबकि आज आप किसी भी सम्प्रदाय को देख लीजिए किसी भी गद्दी को, बस आपको सेवा ही करनी है और आपका नम्बर लग जायेगा और आप पीठाधीश्वर बन जाएंगे, लेकिन यहां ऐसा नहीं चलता... तो प्राचीन काल मेँ... जैसे मान लीजिए मेरा आश्रम है अब यहां पचास लोग होंगे, अब पचास के पचास तो पीठाधीश्वर नहीं बन सकते! तो एक व्यक्ति जब पीठाधीश्वर बनता है तो उसके साथ के दो-तीन उसके जो प्रतिस्पर्धी होते है उन्हें लगता है कि 'अरे ! हम मेँ इस से अधिक योग्यता थी !' और योग्यता तो सिद्ध कर के होती है ना ! जब वो अपनी योग्यता सिद्ध नहीं कर पाते तो वो पीठ का परित्याग कर देते है ! उसे हम असंतुष्ट लोग कहते है, मोहभंग जिन लोगों का हो जाता है... तो ऐसे ही सिद्ध प्राचीन काल मेँ भी रहे जिनका मोहभंग हो गया तब वो "कौलान्तक सम्प्रदाय" को और "महाहिन्दू पंथ" को निशाना बनाने के लिए तत्त्व ढूंढने लगे ! मै आज आपको दो "रहस्य" बता रहा हूं ! प्रथम रहस्य ये है कि यदि आप हमारे ही "हिन्दू धर्म" के वेद, पुराण, शास्त्रों और ग्रंथों को भी देखेंगे, उस मेँ से एक शब्द हटा ही दिया गया है वो है "हिन्दू" ! आप यदि हमारे पुराण, वेद, शास्त्र पढ़ेंगे वहां आपको "हिन्दू" नाम का शब्द बहुत ही कम इक्का-दुक्का स्थानों में ही देखने को मिलेगा ! वो शब्द कैसे हटाया गया ? इसमें कुछ ब्राह्मणों का षड्यंत्र था ! सभी ब्राह्मणों का नहीं क्योंकि ब्राह्मण तो इस पंथ को और इस विद्या को आगे पहुंचाने वाले है और वहां कुछ ब्राह्मणों के कारण और उन असंतुष्ट ब्राह्मणों और असंतुष्ट हमारी पीठ से गये सिद्धों ने मिलकर कई अन्य सम्प्रदाय खडे किए ! और उन्हीं अलग-अलग संप्रदायों का फिर अलग-अलग राग था ! क्योंकि देखिए जब आपको हम से अलग होना होगा...मान लीजिए आज आप हमारे भक्त है, कल को अगर आप को हमारा शत्रु बनना पड़े तो आप छोटी-छोटी बात कहेंगे जैसे कि इस व्यक्ति का चरित्र ठीक नहीं ! ये व्यक्ति शक्तिशाली नहीं ! ये व्यक्ति तपस्वी नहीं ! इस व्यक्ति मेँ कोई ज्ञान नहीं इत्यादि-इत्यादि...तो ठीक वैसे ही हुआ जब हमारे यहां से वो सिद्ध जो किसी स्थिति पर न पहुंच सके वो जाकर अन्य धर्मों मेँ मिल गये !
प्रश्न : तो क्या भविष्य में बौद्ध पंथ का अंत हो जाएगा ? जैसा कि वैष्णव ग्रंथों में कहा गया है ?
ईशपुत्र : मैने भी अपने गुरुओं से सुना है और जो वैष्णव ग्रंथ है हमारे भारतवर्ष के...उनमें विवरण दिया गया है कि "बौद्ध पंथ का अन्त हो जायेगा ।" लेकिन मैं इस वृत्ति का पीठाधीश्वर नहीं हूं । कारण ये है कि चाहे जो भी हो वो हमारे गर्भ से निकले हुए लोग है, हमारी संतानें है, हमारे पुत्र है । मैं बौद्ध धर्म की प्रत्येक शाखा को अपना पुत्र ही मानता हूं । बुद्ध से लेकर अभी तक जितने भी अलग अलग उनके प्रमुख लोग हुए है पैदा...उन सबको मैं अपना पुत्रवत् मानता हूं, छोटा मानता हूं और उनकी रक्षा करना अपना "धर्म" मानता हूं । लेकिन ये सब तभी तक सहा जा सकता है जब तक आप एक सीमा से बाहर ना जाओ । भगवान श्रीकृष्ण को जब तक एक साथ सौ गालियां नहीं दी गयी वो मुस्कुराते रहे...ठीक मेरा भी वही सिद्धांत है । सभी बौद्ध धर्म के मतावलंबी एक जैसे नहीं है... हमारी पीठ...क्योंकि ये भगवती माँ कुरुकुल्ला की पीठ है जिनको रक्त तारा अथवा रेड तारा कहा जाता है...तो दुनियाभर से लोग जो बौद्ध धर्म के माननेवाले है वो पीठ मेँ आते है और वो अपनी पद्धति से पूजा-पाठ करते है...अपने मंत्रों से,अपने तौर तरीकों से । हमने उन्हें कभी नहीं रोका...हम ये कहते ही नहीं की भगवती हमारी है । हम कौन होते है कहनेवाले ? ये तो जगत की है, ब्रह्मांड की है, जो आयेगा उसकी माँ है और जो चाहे आकर इनसे वरदान पाए क्योंकि ये तो चमत्कारों की देवी मानी जाती है । अनेकों चमत्कार इनके द्वार पर है और एक क्षण मेँ किसी का भी किस्मत बदलने का मादा रखती है अन्यथा इनकी अनुकंपा नहीं होती तो मेरे जैसा एक गांव का अतिशून्य परिवार मेँ पैदा हुआ व्यक्ति प्रखरतम मस्तिष्क प्राप्त करके सर्वोच्च पदवी तक जाने की सामर्थ्य नहीं रखता था । तो ये केवल भगवती की प्रेरणा से हुआ । तो बौद्ध मत के लोग भी यहां आते है । कुछ अच्छे लोग भी वहां है...तो हमने उन्हें कभी नहीं रोका...इसीलिए मै ये नहीं चाहता कि बौद्ध धर्म का कभी अन्त हो और बौद्ध धर्म को नष्ट किया जाए ! मै तो उनकी ओर "मैत्री" का हाथ बढाना चाहता हूं ! मै उनसे प्रेम करता हुँ ! मैँ तो ये कहता हुँ कि तुम लौट आओ अपने घर ! लेकिन इसका अर्थ ये नहीँ कि तुम बौद्ध पंथ को छोड दो, तुम बुद्ध को मानना छोड दो या तुम अपनी मिश्राचारी पद्धति को अपनाना छोड दो लेकिन अपनी मौलिक परम्परा से जुड जाओ । बडा लंबा समय हो गया है तुमने अपना घर छोड दिया है और तुम घर से बाहर भटक रहे हो । सुबह का भूला यदि सन्ध्या के समय घर लौट आये तो उसे भूला नहीँ कहा जाता ये हमारी भारतीय कहावत है...तो मेरा तो खुले ह्रदय से उनका स्वागत है, मेरा तो "मैत्रीपूर्ण हाथ" उनकी और मैने बढाया है...और ऐसा पहली बार होगा क्योँकि मुझसे पूर्व शंकराचार्य इस पृथ्वी पर आये, उनके जैसा धुरंधर व्यक्तित्व..जिससमय बौद्ध धर्म का तन्त्रयान पूरे देश मेँ फैल चूका था । हर ओर केवल एक ही नारा था "बुद्धं शरणं गच्छामि ।" जिस समय हर ओर, हर समय, हर दिशा मेँ ब्राह्मणोँ का अपयश फैल रहा था । लोग ब्राह्मणवाद को, वेदोँ को गलत कह रहे थे, पुराणोँ को गलत कह रहे थे और जहाँ भी ब्राह्मण दिखते उनको हटा देने, गिरा देने, नष्ट कर देने पर तुले हुए थे...तब भी एक सिँह की भाँति एक संन्यासी नेँ संपूर्ण पृथ्वी पर भारत पर से उस बौद्ध धर्म को इस प्रकार खदेडा कि भारत मेँ आपको देखने को ही बौद्ध धर्म नहीँ मिलता । बहुत चंद लोग मध्य मेँ रहते है और बाकी देश की सीमाओँ से बाहर रहते है जिन्हे खदेड दिया गया लेकिन मैँ खदेडने नहीँ आया हुँ ! और ना ही खदेडने की बात करता हुँ ! अभी तक जो भी आये उन्होँने बौद्ध धर्म को हटाने की ही बात की । मैँ प्रथम पुरुष हुँ जो उनकी ओर हाथ पुनः बढा रहा है । मैँ कहता हुँ मैने "मैत्री" का हाथ बढाया है तो तुम्हे मेरे हाथोँ मेँ हाथ देना चाहिए । तुम्हे अपनी मौलिक परम्परा मेँ लौटना चाहिए । तुम्हेँ शिव और शक्ति की निन्दा छोडकर मौलिकरुप से साधना समझनी चाहिए क्योँकि जीवन लडनेँ के लिए नहीँ है । जीवन बहुत छोटा है । उस जीवन को स्थायीत्व प्राप्ति के लिए, पूर्णता प्राप्ति के लिए हमेँ मौलिकरुप से साधना करनी चाहिए यही मेरा प्रस्ताव भी है और ऐसा उनको समझना भी चाहिए ।
विष्णु भैरव जी : याने कि आप "मैत्रीय प्रस्ताव" आगे बढाना चाहते हो ?
ईशपुत्र : बिलकुल, मेरा केवल उतना ही मन्तव्य है क्योँकि बौद्ध धर्म आज एक सुंदर रुप मेँ पनप रहा है...उसका कारण ये है कि अधिकांश परंपराएँ हम से ली गयी है...मैने तो ये भी नहीँ कहा कि, "चुराई गयी है !" मै तो कह रहा हुँ, "ली गयी है !" क्योँकि उनके प्रमुख जो रहे आप उनको गौर से खोजिए तो आपको पता चलेगा की वो "सिद्ध" रहे है सारे के सारे । चौरासी सिद्ध होँ या अन्य सिद्ध होँ या उप सिद्ध होँ या महा सिद्ध होँ या हिमालय के योगी हो वो भारत के ही किसी प्रान्त से, कसबे से निकले है और जाकर उन्होँने बौद्ध पंथ मेँ जाकर के वो ज्ञान आगे बढाया है । तो वो सब मेरे लिए अनुज है, छोटे है तो मैँ उनको कभी हानि कैसे पहुँचा सकता हुँ और वैसे भी भारत की ऐसी मंशा कभी नहीँ रही । महामहिम दलाई लामा एक पंथ के प्रमुख है और हमारे ही हिमाचल प्रदेश मेँ उनको स्थान दिया गया है । आपने क्या कभी देखा कि हमने उन्हेँ किसी प्रकार से हानि पहुँचाई ? यहाँ तक कि जब तिब्बती समुदाय को कोई हानि पहुँचाई जाती है तब भी हमारा वरद हस्त उन पर रहेता है कि इनको कोई कष्ट ना पहुँचाओ क्योँकि हम उन्हेँ शिष्य की भाँति मानते है । ये बात अलग है कि उनमेँ से कुछ उद्दडं तत्व है जो हमेँ शत्रु की निगाह से देख रहे है...तो यदि तुम शत्रुता करोगे तो विपरित हो सकता है, मैँ अपना हाथ तुम्हारे उपर से खिंच लुंगा । मेरा कोई समर्थन तुम्हारी तरफ नहीँ रहेगा और मैँ तुम्हारे लिए कोई मंगल काम नहीँ करनेवाला हालाँकि मैँ कर रहा हुँ, विश्व के लिए कर रहा हुँ वो मैँ छोडुंगा नहीँ वो मेरी आदत है लेकिन यदि तुम "असत्य" कहोगे शिव के विरुद्ध कहोगे शक्ति के विरुद्ध कहोगे तो तुम्हारा विनाश होगा ! और शायद यही कारण है कि वैष्णव पंथ इस प्रकार की भविष्यवाणी करता है कि भविष्य मेँ बौद्ध संप्रदाय का अंत हो जायेगा लेकिन मैँ ये भविष्यवाणी करना चाहता हुँ कि इस तरह का अंत ना हो !! वहाँ से केवल उन लोगोँ का अंत हो जो नीच है, निकृष्ट है, शिवनिन्दक है, शक्ति के निन्दक है और जो वहाँ राजनीति कर रहे है..बौद्ध धर्म, तंत्र और कुलाचार, कौलाचार, समयाचार के नाम पे..उनको शान्त रहना चाहिए और मेरे "मैत्रीय प्रस्ताव" को स्वीकार करना चाहिए क्योँकि मेरा "मैत्रीय प्रस्ताव" पूर्वसुनियोजित है और मैँ चाहता हुँ कि वो "प्रकृति के इशारे" को समझे और अपने घर को वापिस लौट आये और अपनी साधनाओँ को आगे बढाते हुए जीवन को सुखमय करे ।