बुधवार, 23 मार्च 2022

साधना मार्ग - हिमालय में तप भाग - 4


 साधना काल में उत्तम आहार, किस प्रकार के हमारे वस्त्र हो, क्या हमारे विचार हो, किस परिवेश में हम रहे यह छोटे-छोटे बिंदु साधक के अस्तित्व का निर्माण करते हैं! बहुत जरूरी है कि हम गुरु दीक्षा के समय दिए जाने वाले प्रवचन को भली प्रकार सुने! गुरु से जो ज्ञान ग्रहण किया है साधना के समय एकमात्र वही सहारा होता है। साधक के मन में यदि किसी प्रकार का भय है तो वो ऐसे स्थान पर जाकर ही उसे अनुभव कर सकता है! और यदि साधना मार्ग में साधक को किसी प्रकार का भय अनुभव हो तो वह उसे यथाशीघ्र श्रीगुरु के चरणों में निवेदित करें क्योंकि गुरु इसी परंपरा से गुजरे हुए हैं। वो इस मार्ग पर चले हुए हैं, वह जानते हैं कि उस भय से मुक्ति का उपाय क्या है। हमारे मस्तिष्क में अनेकों अनेक तंतु है, अधिकतम तंतु शायद निष्क्रिय से प़डे हैं, वह पूर्णतया सक्रिय नहीं इसलिए हम अपने आसपास होने वाले कार्यों, घटनाओं इन सब के प्रति बेहोश से रहते हैं, हमारी जागृति ही नहीं होती। जब धीरे धीरे हमारे भीतर परिवर्तन आता है तो मस्तिष्क के उन तंतुओं में अद्भुत परिवर्तन देखने को मिलता है! आसपास होने वाली छोटे से छोटी घटना भी हमें प्रभावित करती है, तब हम वास्तव में एक पुरुष से विराट होकर महापुरुष बन जाते हैं, अणु से विराट हो उठते हैं। बात छोटी है लेकिन हम इसकी मात्र कल्पना ना करें, किसी भी साधक की अनुभूति उसकी निजी होती है क्योंकि प्रत्येक साधक का स्तर भिन्न है अतः उसके अनुभव भी भिन्न और निजी होते हैं। साधना उतनी ही कठिन है जितना विराट हिमालय पर चढ़ना और साधना इसलिए जटिल लगती है क्योंकि हमारी वृत्तियां बह्यमुखी है, उन्हें अभ्यंतरी बनाना है, हमारा सारा का सारा ध्यान बाह्य जगत में स्थित है, उसे हम किस प्रकार भीतर ले जाए यही तो साधना पथ है! तप इसीलिए श्रेष्ठ है क्योंकि इस प्रणाली के माध्यम से हम अपने पूरे के पूरे अस्तित्व को झोंक देते हैं सिर्फ इसलिए कि हम उस विराट चेतना को जागृत कर सके! धीरे-धीरे साधना का तेज शरीर पर भी दिखने लगता है; शरीर के रोग, दुःख, शोक नष्ट होने लगते हैं और हम अपने आप को स्वस्थ अनुभव करते हैं; शरीर की समस्त व्याधियां उसी प्रकार दूर हो जाती है जिस प्रकार अंधकार में दीपक जलाने पर रोशनी हो जाती है, अंधकार नष्ट हो जाता है। लगातार प्राणायाम का अभ्यास, मंत्रों का अभ्यास समस्त मानसिक कुंठाओ से साधक को मुक्ति प्रदान करता है। लेकिन इतना होने के बाद भी साधक ये नहीं जानता कि भली प्रकार साधना क्या है, अभी जिन प्रक्रियाओं से हम स्वयं को गुजार रहे हैं अथवा स्वयं जिस मार्ग से हम गुजर रहे हैं वो तो एक प्रक्रिया मात्र है। हम कभी सूर्य का प्रकाश ले रहे हैं, हम कभी वातावरण से जुड़ रहे हैं, हम कभी मन को शांत बनाने का प्रयास कर रहे हैं, तो ये सब परंपराएं मिलकर बस हमें तराश ही रही है। धीरे-धीरे हम विचारों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं, हमारे सहस्त्रों सहस्त्र विचार साधना पथ पर चलते चलते रुकने लगाते हैं और वो अनुभूति गहरी होती चली जाती है, हम एक ऐसे स्थिति को प्राप्त करते हैं जो न तो पूरी तरह जागृत होती है, न ही पूरी तरह से सुषुप्त, अब धीरे-धीरे साधक उस पथ को जानने लगता है, जिस पथ पर वह आगे बढ़ा, अब गुरु का एक-एक शब्द सत्य प्रतीत होता है, हम गुरु के प्रति कृतज्ञता से भर उठते हैं, हम धन्यवाद करते हैं भीतर ही भीतर उस मार्गदर्शक का जिसने हमें इस पथ पर बढ़ने के लिए प्रेरित किया! भीतर का अनंत विकास साधना के प्रथम चरण पर ही हम अनुभव करते हैं। ऐसी अनेकों छोटी-छोटी घटनाएं घटित होती है जिनके बारे में बताना संभव नहीं और साधना में कभी कबार साधक थोड़ी मनमानी भी कर लेता है; वह स्वयं अपने साथ कुछ प्रयोग करता है; वह स्वयं अपनी साधनाओं के साथ भी प्रयोग करता है, इसमें कोई बुराई नहीं, किन्तु ये जानना अनिवार्य है कि हम किस हद तक स्वतः मनमाने प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि सावधानी हमेशा रखनी होगी! कोई भी ऐसी प्रणाली हमारे तप मार्ग में विघ्न पैदा कर सकती है जो तमस प्रधान हो; अतः गुरु से अपने साधना क्षेत्र को भली प्रकार सीख लेना चाहिए। धीरे-धीरे साधक स्थिरधी होता चला जाता है उसके भीतर दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है, वह प्रकृति से सब कुछ प्राप्त कर लेता है, साधक पूर्णतया भीतर से परिवर्तित हो जाता है! एक साधना का ही सूत्र है जो उसे परिवर्तित करने में अपनी अहम भूमिका निभाता है! देह तो साधक की परिवर्तित नहीं हो सकती क्योंकि वो आणविक है, भौतिक है किंतु भीतर के अणु परिवर्तित होते चले जाते हैं, साधक का बाह्य आवरण भी सूक्ष्म तलों पर परिवर्तित होता चला जाता है, ये सूक्ष्म बदलाव गुरु तुरंत भांप सकता है; अथवा कोई सिद्ध योगी, कोई दूसरा साधक इस अनुभव को..इस परिवर्तन को देख सकता है लेकिन जन साधारण के लिए कोई अनुभव..कोई परिवर्तन सुलभ नहीं !

-ईशपुत्र

बुधवार, 1 जनवरी 2020

तीन वर्ष की आयु में ही महायोगी जी हिमालय की सिद्ध परम्परा में दीक्षित हो गए
जब महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज तीन बर्ष कुछ माह के हुए ही थे कि एक दिन उनके पिता जी के पास एक लम्बे कद का लम्बी दाढ़ी मूछों वाला साधू आया....और कहने लगा कि तुम्हारे घर पर एक बालक पैदा हुआ है.....जिसके बांये  पांव के अंगूठे के नीचे रेखाओं का गोल चक्र है....वो मेरा पिछले जन्म का शिष्य है....मुझे उसे देखना है......तब तक महायोगी जी के माता पिता ने भी बालक के पाँव के नीचे के चक्र को नहीं देखा था.....जब देखा तो बहुत ही हैरान हुए.....और वो साधू कहने लगा कि यह बालक उनको सौंप दिया जाये.....भला कोई माता पिता किसी के केवल इतना कहने से अपना बालक सौंप देंगे क्या?उनहोंने साधू को समझाया......लेकिन साधू नहीं माना....जिस कारण दोनों पक्षों में तनातनी हो गयी.....अंततः इस बात पर निर्णय हुआ कि बालक साधू को नहीं दिया जायेगा.......लेकिन बालक को दीक्षा दे कर साधू का शिष्य बनाया जायेगा.....ये साधू कोई और नहीं स्वयं "महागुरु कौलान्तक पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज"थे.....इस तरह तीन वर्ष कि आयु में ही महायोगी जी हिमालय कि सिद्ध परम्परा में दीक्षित हो गए....महागुरु का कोई चित्र नहीं है.....केवल एक मात्र रेखाचित्र ही है जिसकी महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज पूजा करते हैं.....यहाँ मैं वो चित्र दे रहा हूँ ताकि दादागुरु जी कि छवि का कुछ अनुमान आपको भी हो सके.....
 कौलान्तक पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज
  कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के प्रथम गुरु महाराज

बुधवार, 19 जून 2019

आध्यात्मिक खोज
जीवन यूं ही तेजी से ढल जाता है....मनुष्य सोचता रहता है की अभी तो बहुत वक्त पड़ा है. इसलिए वो न तो जीवन ही जी पाता है और न ही उसे समझ पाता है. जीवन के सूत्र और उससे ऊपर उठ जाने की कला सहस्त्रों युगों से ऋषि-मुनि इंसान को बताते रहे पर तथाकथित आधुनिकता नें उससे ये अमूल्य और प्रमाणिक धरोहर भी छीन ली....अब हम विवश है व्यर्थ,निरुद्देश्य जीवन जीने के लिए और व्यर्थ की मौत मरने के लिए.........क्या ऋषिओं का विज्ञान आज के विज्ञान से तेज था....शायद नहीं किन्तु उनहोंने भौतिक खोज की जगह आध्यात्मिक खोज को महत्वपूर्ण पाया, लेकिन हम उनके वंशज, पशुत्व की लौट रहे हैं, प्रार्थना है की हम उसी तेज को,उसी गौरव को फिर प्राप्त कर सकें-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

रविवार, 16 जून 2019

कौलान्तक पीठ का प्रमुख शैव ध्वज
"कौलान्तक पीठ का प्रमुख शैव ध्वज" जो कौलान्तक सम्प्रदाय के सिद्धों की पहचान है. इस ध्वज के नीचे हम कैलाश मानसरोवर से भी आगे तक की सिद्ध योगियों की तपोभूमि की पुन: प्राप्ति की कामना करते हैं. जो भूखंड आज दूसरे देशों नें हमसे छीन लिया है. वो भारत वर्ष का अभिन्न अंग है, सिद्धों के प्राण उस भूमि पर बसते हैं. महाहिमालय का वो सारा क्षेत्र हमें पुन: प्राप्त हो. यही मंगल कामना-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय

गुरुवार, 30 मई 2019

अग्नि देवता का महत्व
"ISHPUTRA" this morning worshiped AGNI (FIRE) God and also the described the importance of AGNI god. "KAULANTAK NATH" says in VEDAS the worship of AGNI God is of the prime focus. AGNI is the main and visible god. The visible AGNI OR FIRE is just a small part of the big BRAHMA AGNI. AGNI resides in various forms like YOGAGNI, SURYAGNI, CHANDRAGNI, MULAGNI. The base of all YAGYA is AGNI itself. Everything is the manifestion of AGNI itself. AGNI resides in both dualities of heaven and hell, life and death. Because its the visible manifestion of "MAHAHIRANYAGARBHA" and it delivers the sacrifise of yagya to the gods so THE DIVINE AGNI is known as "JATABHEDA AGNI".Its due to this fact that the body is cremated in an open air and AGNI reducing the body to the ashes. One day the whole universe is going to be the sacrifise of AGNI God. This is why the worship of AGNI is done by the scholars. Its secrets and mysteries are only known by SIDDHAS. The most worshiped among all gods "AGNI" is the master of all wisdom and bestows activeness. The Divine god AGNI can be worshiped with this short mantra - OM AAM AGNE NAMAH. This mantra is used for both worshiping AGNI GOD and also for recitation. The worshiper of AGNI god is bestowed with all SIDDHIS (PERFECTIONS) and WISDOM-KAULANTAK PEETH TEAM - HIMALAYA.
"ईशपुत्र" नें आज प्रात: अग्नि देवता की स्तुति की और अग्नि देवता के महत्त्व पर प्रकाश डाला। "कौलान्तक नाथ" कहते हैं "वेदों में अग्निदेव की उपासना प्रधान विषय है। अग्नि मूल और प्रत्यक्ष देवता हैं। स्थूल अग्नि, ब्रह्म अग्नि का एक अंश मात्र है। योगाग्नि, सूर्याग्नी, चंद्राग्नी, मूलाग्नी आदि अनेक स्वरूपों में अग्नि विद्यमान हैं। प्रत्येक यज्ञ का मूल अग्नि ही है। स्वर्ग अग्नि है, नर्क भी अग्नि ही है, जीवन अग्नि है और मृत्यु भी अग्नि ही है। महाहिरण्यगर्भ का प्रत्यक्ष स्वरुप होने के कारण और देवताओं तक हवि पहुँचाने के कारण दिव्य अग्नि "जातवेद अग्नि" कहलाते हैं। यही कारण है की ईश्वर द्वारा प्रदत्त शरीर को अंतत: अग्नि देवता को ही सौंप दिया जाता है। एक दिन ये ब्रहमांड भी अग्नि देवता की हवि हो जाएगा। इसलिए अग्नि की उपासना श्रेष्ठों द्वारा की जाती है। अग्नि के रहस्य केवल सिद्ध जानते हैं। देवताओं में परम वन्दित अग्नि तेज देने वाले, समस्त विद्याओं के नायक है। ऐसे अग्नि देवता का लघु मंत्र-ॐ अं अग्ने नम: है। इसी मंत्र से उनकी उपासना व जाप किया जाना चाहिए। अग्नि का उपासक समस्त सिद्धियों व ज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है।" कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

बुधवार, 28 नवंबर 2018

क्या हनुमान जी, वेद व्यास जी स्थूल शरीर में है या सूक्ष्म शरीर में है ?
आशुतोष भैरव जी - साधक का एक और प्रश्न आया है कि, क्या हनुमान जी, वेद व्यास जी स्थूल शरीर में है या सूक्ष्म शरीर में है जी ?
ईशपुत्र - देखिए, सूक्ष्म शरीर में तो हर व्यक्ति है, सूक्ष्म में भी और स्थूल में भी, सदैव । जब भी कोई चीज दृश्यमान सत्ता से उस पार हो जाए उसको सूक्ष्म कहा जाता है और इस सूक्ष्म में तो ब्रह्मांड में बहुत कुछ घटित हो रहा है जो हमें इन चर्मचक्षुओं  से दृष्टिगोचर नहीं होता । आज तो विज्ञान भी जानता है, विज्ञान क्या आपको भी तो मालूम है, कितनी तरह की तरंगे, रेडिएशन, वाइब्रेशन हमारे ब्रह्मांड में घूम रही है, हम उनको देख नहीं पाते बिना यंत्र की सहायता से, तो यह सब चीजें सूक्ष्म है । और कुछ चीजें प्रत्यक्ष में हैं जैसे आप मुझे देख पा रहे हैं । इन महानतम हस्तियों के बारे में यह कहा गया है कि यह 'अवतारी पुरुष' है, सदेह इस पृथ्वी पर रहेंगे । अब कारण यह है कि यदि सदेह है तो यहां सेटेलाइट लगे हुए हैं ऊपर से, सर्च कर रहे हैं पृथ्वी को, एक-एक व्यक्ति का आजकल पासपोर्ट बन रहा है, उसके आईडी प्रूफ बन रहे हैं, सब चीजें बन रही है, किस गांव का है, किस एरिया में रहता है, हिमालय कितना है, तो हर जगह मिलिट्री लगी हुई है, सीमाएं बनी हुई है तो यह लोग कहां है ? अगर यह सशरीर है तो दिखाई क्यों नहीं देते ? ऐसी बातों का, ऐसे प्रश्नों का हम जैसे योगियों के पास या ऐसे योगियों के पास जो वहां जनता के बीच में रहते हैं, जब जनता, साधक या भैरव-भैरवी इस तरह के प्रश्न पूछते हैं तो उत्तर नहीं होता, तो अपने आप को बचाने के लिए यह कहा जाता है कि वह लोग सूक्ष्म शरीर में है । लेकिन आप शास्त्र और पुराणों को पढ़ेंगे उसमें लिखा गया है वह इसी देह में सदेह चिरंजीवी है, ना कि वो सूक्ष्म शरीर में चिरंजीवी है । सूक्ष्म शरीर में तो कोई भी चिरंजीवी हो सकता है इसलिए यह तर्क बिल्कुल गलत है । वह सदेह ही विद्यमान है लेकिन कहां है, कैसे हैं यह बताना अभी मेरा विषय नहीं है लेकिन मैंने आपको इशारा ये जरूर कर दिया है कि सूक्ष्म शरीर से उनका ज्यादा लेना-देना अभी नहीं है ।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

सिद्धों का सन्देश
आज मै एक "संदेश" देना चाहूंगा । वो संदेश "मेरा" नहीँ है, वो संदेश "सिद्धों का संदेश" है । इस संदेश को "विस्तृत" करके
समझिये । उसके लिए पहले हम "भूमिका" पर जाते हैं । एक समय
था जब मनुष्य अलग -अलग हिस्सों में बटकर मानव के विकास को सुनिश्चित करने के लिए कार्य कर रहा था । तब "सिद्धों" का एक ऐसा
समाज स्थापित हुआ, जिन्होने "योग", "ज्योतिष", "धर्म- आध्यात्म"
सहित "चिकित्सा", "कला", "युद्ध" और भी न जाने "गायन"
सहित कितनी "ललित कलाओं" और "विद्याओं" को
जन्म दिया । उन्होने मानव जीवन को "सुखी"
बनाने के लिए बड़े प्रयास किये । हालाँकि राजशाही के
दौरान इन परंपराओं का बहोत हद तक "निर्वहन" भी
होता रहा । लेकिन धीरे-धीरे राजशाही बहुत
छोटे-छोटे टुकड़ो में बट गई| छोटे-छोटे राजा हो गये । और
छोटी-छोटी उनकी सीमाएं और
उसके भीतर प्रजा । उनको "विकास" का वो समय
नही प्राप्त हो सका, जो उन्हें होना चाहिए था । इस
कारण "महान ज्ञान सम्राज्य" की
"खोज" उन "सिद्धों" ने की, वो सब तक जस का तस
नही पहुच सका । "नव नाथ", "चौरासी सिद्धों"
ने बहुत पूर्व में इन क्षेत्रों में "ज्ञान का प्रादुर्भाव" किया| उसको
जाना, समझा, "ऋषियों की परंपराओं" को अपने
जीवन में उतारा और "अनुभव" करके जब उन्हें "पूर्ण"
पाया, तो "मानवता की सेवा" में उन्हें "समर्पित" कर दिया ।
भारत में "सिद्धों का धर्म" एक ऐसा "धर्म" है, जो किसी
"दूसरे धर्म" की "निन्दा अथवा आलोचना" नहीँ
करता । उसे "किसी धर्म" से "नफरत" ही
नहीँ है । उसे "किसी धर्म" या "धर्म के
व्यक्ति", "उसके शीर्ष पे बैठे व्यक्तियों" से
भी कोई "परेशानी" नहीँ है ।
इस "सिद्धों" की "भूमि", जहाँ हम "समस्त सिद्ध",
"योगी" और "यति" रहते हैं, वो "हिमालय" है । इसके "दो
प्रारूप" हैं, एक तो वो प्रारूप जो नजर आ रहा है, ये स्थूल है ।
जब चेतना जागृत होती है, तो इसके उपर एक
"सूक्ष्म हिमालय" है । जिस पर अन्य "सिद्ध" रहते हैं । जहाँ जाने
के लिए "पात्रता" और "योग्यता" चाहिए । लेकिन सिद्धों की
उस भूमि में किसी "एक जाति", किसी "एक
धर्म", किसी "एक वर्ण" अथवा किसी "एक
लिंग" का "व्यक्ति" अथवा "साधक" नही है । अपितु
सभी धर्म के प्रधान, सभी धर्म के
उच्च कोटि के व्यक्ति वहाँ विद्यमान हैं ।
"सिद्धों" ने "समाज" को बाँटा
नही, नाथों ने समाज को "जातिप्रथा" नही
दी । उन्होंने कभी "वर्ण" और "व्यक्ति" में
"भेद" नहीं किया । उन्होंने "आस्तिक" और "नास्तिकों" में
भी भेद नही किया । लेकिन आज उनका
सन्देश हमारे कानोँ तक नहीँ पहुंच रहा । उन्होंने इस
"दिव्य" सिद्ध पीठ से, इस दिव्य "कौलान्तक
पीठ" से एक संदेश सदा प्रेषित किया है । वो है
"मनुष्य के कल्याण" का संदेश, मनुष्य के मध्य "प्रेम", "भ्रातृत्व",
"स्नेह" और "करूणा" का संदेश । लेकिन शायद "समाज",
हमारी "सभ्यता" इस संदेश को भूल गई है । आज वो
केवल "अपने धर्म" को ही "श्रेष्ठ" मानते हैं । और
दूसरों को "अधूरा और खोखला" । आज वो "अपने गुरू" को
ही "श्रेष्ठ" मानते हैं, दूसरे को "ढोंगी
अथवा कपटी" । आज वो केवल अपने "विचारधारा" को
ही प्रमुख मानते हैं । और दूसरे की
विचारधारा को "शून्य" । ये "सिद्धों का संदेश" शायद कहीं
विखण्डित हो गया है| टूट गया है और वो तुम तक
नही पहुंच पा रहा है । इसलिए तुम अपने "कथित
धर्म" को और "कथित सिद्धांत" को मजबूती से पकड़े
हुए हो । हालाँकि वो गलत हो सकता है । "गलत है", ये मै
नही कह रहा । "गलत हो सकता है" ये मैं कह
रहा हूं । तो सिद्धों ने कहा - "तुम सबको जानोँ, अपने
जीवन को और मनुष्य को सुखी बनाने का
प्रयास करो, लेकिन भातृत्व-स्नेह तो रखोँ !" वो तुम्हारे हृदय में
रहता ही नही है ! उन्होंने कुछ ऐसे
सिद्धांतों की बास कही थी, जो
बिल्कुल अलग और गोपनीय थे ।
"सिद्धों" ने "धर्म" को
"व्यापक" रूप से जाना और "धर्म की व्याख्या"
भी "व्यापक" रूप से की । इसलिए "सिद्ध पंथ"
में उत्पन्न हुए व्यक्ति और साधक किसी "एक विचार" और
"एक धर्म" तक ही "सीमित"
नहीँ रहे ।
केवल हम सिद्धों की एक ऐसी परम्परा
रही कि तुम यदि "अपने या अपने आसपास के"
किसी "धर्म" मे टटोलो, तो सिद्धों का कोई न कोई "एक
व्यक्ति" या "बहोत से व्यक्ति" वहाँ अवश्य मिल जायेंगे । जो कि इस
बात का प्रमाण है कि हमने "धर्मों" के साथ भी "भेदभाव"
नहीँ किया । लेकिन जब ये संसार अपने व्यापक दर्शन
अर्थात "भौतिकता" और उसके उन्नति में "लिप्त" हो गया । तब वो सिद्धों
का "मूल सन्देश" तुम तक नहीँ पहुँच पा रहा । पहले तो सिद्धों
का "स्थूल संदेश" है कि तुम अपने जीवन में एक
बहोत "उच्च कोटि का मस्तिष्क" रखोँ और "हृदय" रखोँ । "सबका
सम्मान करो" और अपनी दिव्य इच्छाओं का पालन करो
और संसार में "सबका सहयोग करते हुए" आगे बढ़ो । और "दूसरा"
उनका "संदेश" है कि सिद्धों की जो "भूमि" है, आपको
"प्रकाश" दे रही है| उसका, उस "स्थान" का आपको पता
करना होगा । उसकी "खोज" करके अपने
भीतर उसके "तत्वों" को स्थापित करना होगा । क्योंकि ये
तत्व सहज नही हैं, ये बड़े ही
"अलौकिक" तत्व हैं । इसलिए सिद्धों के पथ पर आगे आना होगा ।
इसलिए वो सदैव मनुष्य को "निमंत्रण" भेजते हैं ।
लेकिन आज वो निमंत्रण "निरर्थक" प्रतीत होता है ।
मनुष्य आज भी पशुओं की भांति
व्यवहार कर रहा है । छोटे-छोटे गाँव में श्वान अर्थात कुत्ते होते
हैं । लोगों ने अपनी रक्षा के लिए, अपने परिवार
की रक्षा के लिए और गाँव में खेती
बाड़ी की रक्षा के लिए कुत्तों को पाला होता
है । जो गडरिये हैं, भेड़ बकरी चराते हैं, चरवाहे हैं
अथवा जो पशुओं को लेकर वनों में जाते हैं । गल्ला लेकर बनों तक
प्रस्थान करते हैं, वो भी कुत्तों को पालते हैं, इसलिए
ताकि वो अपने मालिक की और अपने स्वामी
सहित उसके अन्य तत्वों की रक्षा कर सकें । ये
व्यक्ति और ये प्राणी दोनो ही एक दूसरे
के पूरक हैं । अर्थात मालिक और श्वान । श्वान अपने मालिक
की वफादारी करता है और मालिक अपने
श्वान को संरक्षण देता है । लेकिन श्वान में एक ऐसी
"वृत्ति" है, जिसके कारण "स्वामी भक्त" होने के बाद
भी उसे बहोत अधिक सम्मान का भाव
नही दिया गया, वो प्राप्त ही
नही हो सका । उसका कारण है उसकी
एक "वृत्ति" ।
वो वृत्ति ये है कि वो जिस छोटे से क्षेत्र में रहता है,
वहाँ किसी दूसरे श्वान को नही आने
देता । जैसे ही एक गांव के कुत्ते उसका एक झुण्ड
कहीं घूम रहा हो अपने गांव और अचानक
कहीं से कोई अपरिचित कुत्ता यदि वहां आ जाये, तो
सब टूटकर नोच-नोचकर उसके चिथड़े-चिथडे कर देंगे । जब तक कि वो
मर ही न जाय, उसे काटते रहेंगे ।
आज सिद्ध यही बात फिर हमें याद दिला रहे हैं कि
कहीं ऐसा तो नही कि इन पशुओं के
संगत में रहते-रहते इनके कुछ विचार हम मनुष्यों में
भी आ गये हों ?! न जाने क्यों जब भी
कोई समाज में अपना संदेश देने आता है । जब भी कोई
"सिद्ध" तुम्हें बताने की चेष्ठा करना चाहता है, तुम
तुरंत गुर्राने लगते हो, तुम तुरंत काट खाने को दौड़ते हो । और
तुम्हारे समाज में इस तरह के अनेक झुण्ड हैं । कोई
मीडिया के नाम पर झुण्ड, कोई शासन व्यव्स्था के नाम
पर झुण्ड और कोई व्यापार के नाम पर झुण्ड । इस तरह से
स्त्रियाँ अब अलग झुण्डों में बट गईं, पुरूष अब अलग झुण्डों में
बट गये, वृद्धों का अलग झुण्ड हो गया, युवाओं का अपना अलग
झुण्ड हो गया । कब तक तुम इन "श्वान वृत्तियों" में फसे रहोगे ?
और क्यों तुम इन श्वान-वृत्तियोंका परित्याग नही
कर पा रहे ?
एक उत्तम कोटि के साधक को और मनुष्य को, सिद्धों ने कहा कि वो "राजहंस"
जैसा हो जाये । राजहंसों के बारे नें कहा जाता है कि केबल राजहंस ऐसा
पक्षी है, कि जब उसके झुण्ड में दूर से उड़कर आया दूसरा झुण्ड मिल जाये
तो बिना किसी लड़ाई झगड़े के सहजता से एक दूसरे को स्वीकारते हैं | यहां
तक कि राजहंस के बारे में कहावत है कि यदि एक राजहंस की टांग टूट जाये,
तो अन्य राजहंस चारों तरफ उसकी रक्षा करते हैं । उसके दुख से दुखी होते
हैं । यदि एक राजहंस के बच्चों पर संकट आए, तो सभी राजहंस उसकी सहायता
करते हैं । इन स्वभावों के कारण कहा गया कि व्यक्ति या साधक "परमहंस" है
। परमहंस का तात्पर्य है जो सभी के दुखों को अपना मानता है । जो सभी धर्म
को लोगों को अपना सहयोगी मानता है । पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्यों
को, जीव जंतुओं को, स्थूल और सूक्ष्म तत्वों को अपना मानता है । और उनको
अपने से जुड़ा हुआ प्राप्त करता है, पाता है, वही राजहंस होता है । लेकिन
सिद्धों का ये संदेश कि "तुम परमहंस हो जाओ", वो कहीं न कहीं अब नष्ट
होता जा रहा है । और "श्वान वृत्तियाँ" हमारे भीतर हैं । हम अपने लिए ही
सबकुछ करना चाहते हैं । और ये श्वान वृत्ति? अपने लिए ही सोचते हैं, ये
"श्वान वृत्ति" है । इस श्वान वृत्ति से जब तक मुक्ति नहीँ मिलती, तब तक
साधक साधना के पथ पर आगे नही बढ़ता । और वो सिद्धों के दिये ज्ञान को नही
प्राप्त कर सकता ।
ज्ञान आध्यात्म का बहोत ही गोपनीय और गूढ़ होता है, कभी कभी हमें ये लगता
है कि जो मौलिक कर्तव्य हैं वही धर्म है । जैसे 'कभी झूठ नही बोलना', ये
केवल मौलिक कर्तव्य है । और वो धर्म भी हो सकता है । लेकिन "मूल
अध्यात्म" नही, मूल अध्यात्म उससे प्रेरित होता है । मूल आध्यात्म की वो
"आवश्यकता" है । अगर तुम झूठ बोलते हो, तो आध्यात्म में सफल नही हो
पाओगे, तुम चाहे जितने नाक रगड़ लो । इसलिए मूल आध्यात्म आगे नहीँ बढ़ पा
रहा । क्योंकि अब श्वान-वृत्तियाँ हैं । तुम्हारे अपने- अपने गुरू होंगे,
तुम्हारे अपने- अपने धर्म होंगे, तुम्हारे अपने- अपने जाति और सम्प्रदाय
होंगे । तुम्हारी अपनी- अपनी विचारधारा होगी । तुम उससे बाहर सोच ही नहीँ
सकते ।
शर्म की बात तो ये है कि मौलिक पद्धतियों में और भौतिक व्यवस्थाओं में
अगर ऐसा हो जाए तो वो सहा जा सकता है । लेकिन धर्म और आध्यात्म में भी जब
ऐसी वृत्तियाँ आ जाएं, तो क्या कहा जाए ? आज के समाज में कुछ धर्म पुरोधा
तो ये कहते हैं कि "जो मै कह रहा हूँ वही केवल सत्य है । क्योंकि मेरे
पास वो शक्तियां हैं, मेरे पास वो अनुभव है, वो अनुभूति है । और यदि तुम
मेरी अनुभूतियों को छोड़कर किसी दूसरी अनुभूति के मार्ग पर जाते हो, तो
सबकुछ खत्म हो जायेगा, सबकुछ नष्ट हो जायेगा ।" ये बड़ा भ्रमित करनेवाला
सिद्धांत है । जबकि सिद्धोँ ने सन्देश तुम्हे भेजा है । वो सन्देश ये है
कि "एक मार्ग का ज्ञान मत रखना ।" अगर तुम हिमालय पर घूम रहे हो और
तुम्हे केबल एक ही मार्ग का ज्ञान है, वो मार्ग कभी भी अवरूद्ध हो सकता
है । ये सृष्टि भी तो हिमालय ही है । तुम्हारा जीवन भी तो हिमालय ही है ।
इसलिए ऐसी परिस्थिति मेँ क्या करना चाहिए ? याद रखो उन्होंने कहा "एक
पर्वत में चढ़ने के सौ रास्ते हैं । ये आवश्यक नही कि तुम सौ में से सौ
रास्ते पर से जाओ । एक ही रास्ते से तुम वहाँ तक जा पहुंचोगे, किन्तु
उच्च कोटि का साधक वही है, जिसे उन सौ में से कम से कम आधे पचास मार्गों
का ज्ञान तो हो ।" ठीक वैसे ही आज बहोत से गुरू कहते हैं, बहोत से संत
कहते हैं कि "तुम मंत्र न जपो, मंत्र की जरूरत नहीँ । तंत्र की भी जरूरत
नहीँ । यंत्रों की भी जरूरत नहीँ । योग की जरूरत नहीँ । तुम बस मेरे पास
बैठ जाओ और तुम्हारा कल्याण होने लगेगा ।" ये बड़ी भ्रमित करने वाली बात
और सिद्धान्त है । सिद्धों ने तुम्हे सन्देश दिया था कि "तुम सभी तत्वों
को जानो । 'मंत्र' को, 'ज्योतिष' को, 'तंत्र' को, 'रसायन' को । " एक
व्यक्ति तुम्हे समझा रहा है कि "मै जो कुछ करता हूं, मेरा जो मार्ग है,
वो उत्तम है । " लेकिन उस व्यक्ति से पूछो, जो तुम्हे यह मार्ग दे रहा है
कि "तुम्हे यह मार्ग कैसे मिला?" अपने आप मिल गया ? तो ये मूर्खता है । सहस्त्रों- सहस्त्रों मे से एक व्यक्ति हो सकता है कि जिसे जन्मजात वह
मार्ग स्वतः मिल गया हो । लेकिन पर्दे के पीछे पूर्व जन्मों का सिद्धांत
वहाँ होगा । पूर्व जन्म में उसने भी 'मंत्र', 'योग', 'ज्योतिष', 'तंत्र',
'प्रार्थनाएं' और और भी न जाने कितने प्रकार के अभ्यास किये होंगे, तब
जाके वो इस स्थिति तक पहुंचा है । इस स्थिति पर आने के बाद वो तुम्हें कह
रहा है कि सब चीजें निरर्थक हैं । तो सिद्धों की बात को याद रखना कि "जब
तुम 'गुरूओं' का अनुसरण करते हो और 'ईश्वर के पुत्रों' का अनुसरण करते
हो, तो तुम्हें लगेगा कि कुछ करने की आवश्यकता नहीँ । क्योंकि उन्होंने
बस आशीर्वाद दे दिया, अपने अनुकम्पा से तुम्हे सर्वसमर्थ कर दिया,
तुम्हारे दुःखोँ का...... तो सब कुछ संभव हो गया ।
"
सिद्धों ने कहा, "ये झूठ है ! ये मृगमारीचिका है ! ये छद्मता है ! इससे
बचे रहना ! तुम्हें स्वयं उसी व्यक्ति जैसा हो जाना है, जो सहस्त्रों
लोगों को ये कह सकता है कि ईश्वर की अनुकम्पा मेरे माध्यम से तुम तक
होगी, तो तुम्हारे माध्यम से वो अन्यों तक क्यों नही हो सकती !" और वो
व्यक्ति कहेगा कि "तुम मेरे सिद्धांतों पर चलो ।" वो इसलिए कि कहीं तुम
उस व्यक्ति की जगह न आ जाओ, और बाकी तुम्हारे सिद्धांतो पर चलना न शुरू
कर दें । वो कभी ये नही चाहेगा कि तुम आम व्यक्ति से हटकर विशिष्ट
व्यक्ति हो जाओ । वो स्वयं विशिष्ट रहना चाहेगा । ये छद्मता श्वान वृत्ति
है, कि रोटी के अधिक टुकड़े मेरे पास हों, मै दूसरों को बाटकर नही दे
सकता । ऐसी परिस्थिति में सावधान रहना । याद रखना कि सभी मार्गों का
ज्ञान तुम्हे अवश्य प्राप्त करना है । तुम 'योग' भी सीखो । 'ज्योतिष' भी
सीखो । 'मंत्र' भी सीखो । 'साधनाएं' भी सीखो । सभी 'धर्मोँ और 'पंथों' का
ज्ञान भी प्राप्त करो । और फिर जो अपनी मौलिक साधनाएं हैं, अपना जो मौलिक
विचार है, उसकी तलाश में निकल जाओ । "याद रखना इस 'तत्व' को ।" 'वेद' का
ज्ञान लेने से, 'शास्त्र' का ज्ञान लेने से, 'धर्मों' का ज्ञान लेने से,
'योग', 'ज्योतिष', 'तंत्र', 'वास्तु', 'रसायन', 'पारद' किसी भी विधा का
ज्ञान लेने से, तुम्हारे जीवन में कोई विशेष परिवर्तन नही आयेगा । हां,
ये परिवर्तन जरूर आ सकता है कि समाज में तुम अपनी "विद्वत्ता" दिखा सको ।
कि देखो मै प्रवचन दे सकता हूँ , कि देखो मुझे इतने मंत्र आते हैं, देखो
मै इतने योगासन कर सकता हूं, मै अपनी हड्डी उतनी टेढ़ी कर सकता हूं कि
तुम्हारी तब तक टूट जाये । इससे "आध्यात्म" का कोई लेना देना नहीँ है |
हो सकता है तुम एक ही आसन पर दो- दो, चार- चार वर्ष बिना भोजन के और जल
के रह सको । लेकिन ये भी अध्यात्मिकता नहीँ है ।

सिद्धों ने कहा आध्यात्मिकता बड़ी ही सूक्ष्म और बड़ी ही महीन है । उसके
लिए तो तुम्हे तलाश स्वयं ही करनी होगी । तो गुरु तुम्हारी भाव भूमि
बनायेगा, लेकिन जब तुम कुछ और वृत्ति का परित्याग करते हो । वो वृत्तियां
हैं "वानर वृत्ति" । मनुष्य वानर वृत्ति पर रहना चाहता है । वो अपने
आसपास चीजें लेता है और उनको अपने पास ही रखना चाहता है । हालाँकि उनका
उपयोग नहीँ करता, उनका उपभोग नहीँ करता । उदाहरण... एक व्यक्ति को प्यास
लगी है और उसके पास दो पानी की बोतलें हैं | वो अपनी बोतल से थोड़ा सा
पानी पी लेता है | फिर दूसरी वोतल, वो भी खोलके पी जाता है | ये वानर
वृत्ति है | ऐसा व्यक्ति साधना में सफल नही हो सकता । वो सूक्ष्मता को
नही प्राप्त कर पायेगा | क्योंकि वो जो दूसरी बोतल थी, वो दूसरे व्यक्ति
को मिल सकती थी, दी जा सकती थी ।
आजकल आप किसी भी क्षेत्र में जाइये और मनुष्यों को भोजन करते देखिये ।
भोजन करते- करते आवश्यकता से अधिक भोजन लेगा । तत्पश्चात भोजन पड़ा रह
जायेगा । ऐसा व्यक्ति सूक्ष्म आध्यात्मिकता को प्राप्त कर ही नहीँ सकता ।
ये मै दावे से नहीँ, अपने जन्मों जन्मों के अनुभव से कह सकता हूँ ।
क्योंकि वो सूक्ष्म तत्व तक कभी नही पहुचेगा । पश्चिम में बहोत ऐसे
विद्वान हुए, दक्षिण में बहोत ऐसे विद्वान हुए, यदि अन्न का एक दाना बाहर
गिर जाये, तो सुई से उस दाने को बींधकर, पानी से धोकर उसका सेबन करते थे
। ऐसे व्यक्तियों के भीतर वानर तत्व नही होता । वो ईश्वर तत्व को जानते
हैं और वो सिद्धों की भाषा को समझते हैं ।
सिद्धों ने कहा उतना ही लो जितने की तुम्हे आवश्यकता है । लेकिन इन वानर
वृत्तियों से तुम मुक्त नही हो सकते । यदि तुम्हारे पास एक नौकरी है, तुम
चाहते हो कि तुम्हे दो मिल जाये और तुम दोनो को एक साथ रख सको । तुम्हारे
पास एक वाहन है, तुम चाहते हो कि चार वाहन तुम्हारे पास हों, ताकि तुम
वानर वृत्ति को और अधिक प्रदर्शित कर सको । तुम्हारे पास एक घर है, तुम
चाहते हो कि पचास घर हो जायें ! ये वानर वृत्ति जब तक तुम्हारी नष्ट नही
होगी, सिद्धों नेँ कहा तुम वास्तविक विकास को अनुभव नही कर पाये हो । और
तुम वास्तविक रूप से विकसित नही हो पा रहे ।
इन पशुजन्य वृत्तियों के बाद चीँटी जैसी वृत्तियों से भी तुम्हे मुक्त
होना होगा । और चीटियों को देखिए, वो एक रानी के लिए कार्य करती हैं । वो
सुबह से लेकर शाम तक इतना अधिक कार्य करती हैं कि वो हर क्षण कार्य करने
में लगी रहती हैं । वो सुबह से लेकर शाम तक इतना अधिक काम करती हैं कि हर
क्षण कार्य में लगी रहती हैं । और उनका गुण की, अपनी आवश्यकता से अधिक
उठाकर ले जाती हैं । अपने स्वरूप से भी अधिक उठाकर ले जाती हैं । अपने
स्वभाव से भी अधिक उठाकर ले जाती हैं । हमारा मन भी ऐसा ही है । हम जीवन
में चाहते हैं कि धर्म में भी सबकुछ हमे एक ही साथ मिल जाए, "एक ही क्षण"
। जब तक ये वृत्ति रहेगी, ये पिपिलिका जैसी वृत्तियां अर्थात चीटियों
जैसी वृत्तियां रहेंगी, तब तक कुछ नहीँ मिलेगा ।
लोग चाहते हैं कि मन्दिरों में जाएं तो लड़ते हैं । संतों के पास आते हैं
तो पाँव छूने के लिए एक दूसरे के उपर चढ जाते हैं । किसी इष्ट की प्रतिमा
के दर्शन करने के लिए सौ लोगों को रौदते हुए जा सकते हैं । अरे इससे
तुम्हारा क्या विकास होगा ? मै कहता हूं कि यदि तुम मंदिर के द्वार से
बिना ईष्ट के दर्शन किये ही लौट जाओ, तो तुम्हें पुण्य अवश्य मिलेगा ।
लेकिन यदि एक व्यक्ति को धक्का देकर, एक व्यक्ति के साथ छल करके, यदि
पंक्ति को तोड़कर तुम आगे गये तो तुमसे बड़ा मूर्ख इस पृथ्वी पर कोई नही
हो सकता । तो ये पीपिलिका जैसी वृत्ति कि, अधिक ले जाऊँ, पहले ले जाऊँ,
जब तक ये तुम्हारे भीतर हैं, तुम इस मानव जीवन का आनंद नही उठा पाओगे ।
तुम विकास को अनुभव ही नही कर पाओगे | तब "साधना" तुम्हारे लिए है ही
नहीँ | तब ये संसार, ये पृथ्वी भी तुम्हारे लिए है ही नहीँ ।
पृथ्वी तो उनके लिए है जो "सिद्ध" हो । जगत तो सिद्धों का है | यहां पर
रहने के लिए "सिद्ध वृत्तियाँ" चाहिए । प्रेम वृत्तियाँ चाहिए ।
सहिष्णुता चाहिए । जब ये छोटी-छोटी वृत्तियाँ तुम्हारे भीतर आयेंगी, तभी
तुम कुछ प्राप्त कर पाओगे ।
बहोत से साधक इन वृत्तियों को नहीँ समझ पाते । समझाने के बाद भी नहीँ समझ
पाते । इसलिए उनके लिए अनुशासन नाम का शब्द बना दिया गया । उनको कहा गया
ये "कर्मठ गुरू" है । कर्मकाण्ड का सिद्धांत है । ये "गुरू गीता" है ।
अर्थात गुरू के साथ कैसे संबंध स्थापित करें, कैसे आचरण करें, कैसे रहें
? ये सब गुरूगीता बताती है । "शिव मार्ग", शिव मार्ग एक ऐसा ग्रन्थ है जो
बताता है कि शिव के साथ कैसे रहना चाहिए । उनकी साधना और आराधना कैसे
होनी चाहिए ? "देव मार्ग" देवी देवताओं के सिद्धांत को बताता है । और
"कल्प मार्ग", वो सृष्टि में कैसे रहना है, समाज में कैसे रहना है ? इसके
बारे में हमे स्पष्ट निर्देश देता है ।
लेकिन हम इन सिद्धांतों, इन तत्वों को भूल गये हैं । इस कारण हमारा जीवन
बड़ा ही जटिल, बड़ा ही क्लिष्ट हो चुका है । हम प्रयास तो करते हैं,
लेकिन वो निरर्थक हो जाता है ।
इसलिए सिद्धों ने कहा कि इससे पहले कि तुम आध्यात्म में कदम रखोँ, तुम
हमारी ओर आना चाहो, तो तुम इन सिद्धांतो को, हमारे इन सन्देशों को जरा
सुन लेना । उनपर पहले अभ्यास कर लेना । फिर हम तुमसे कोई "भेद" नहीँ
रखेंगे । न जाति, न लिंग, न वर्ण, न धर्म, कुछ भी नहीँ । हम तो तुम्हारा स्वागत
करते हैं । क्योंकि जो अत्यंत सूक्ष्म विधाएं और ज्ञान है, जो तुम्हे
"ईश्वर का पुत्र" बना सकते हैं, वैसी "अनुभूति" तुम्हें दे सकते हैं । और
तुम इस छोटी सी पृथ्वी ही नहीँ, बरन इसके बाहर के ब्रह्माण्ड में स्थित
अन्य पृथ्वियों को भी देख सकते हो, ऐसी ऊर्जा और शक्ति हम देने को तैयार
हैं, लेकिन वो तब जब तुम साधक बन जाओ । जब तुम इन पशु वृत्तियों से मुक्त
होने लगो । जब गिद्ध जैसी वृत्तियाँ न रहे ।
गिद्ध का स्वभाव है और उस पक्षी की विशेषता है या उसकी आवश्यकता है कि वो
मरे हुए जीव पर निर्भर रहता है । हम भी वैसे ही हैं । हमारे ही साथ के
लोग मर रहे हैं । उन्हें दुःख उठाना पड़ रहा है । वो रो रहे हैं, चिल्ला
रहे हैं । दुःख से वेदनाओं से ग्रसित हैं, तड़प रहे हैं और हम सो रहे हैं
। वो परेशान हैं, भोजन नही है, वस्त्र नही है और हम शांत बैठे हैं । यदि
तुम ऐसी परिस्थिति में शांत रह सकते हो । तुम्हारे आसपास कोई व्यक्ति मर
गया है और तुम बिलकुल शांत बैठे हो, तो तुम "गिद्ध" जरूर बन सकते हो,
"सिद्ध" नहीँ बन सकते । तुम्हें ऐसी गिद्ध वृत्तियों से मुक्त होना होगा
।
गरीब व्यक्ति यदि व्यवसाय कर रहा हो, तो मैने देखा, उसका सहयोग करना तो
दूर उसे ये समाज आगे बढ़ने का एक अवसर तक नहीँ देता । ये गिद्ध वृत्ति
है, तुम नोच रहे हो उस व्यक्ति को । यदि तुम्हारी कोई स्थिति है, तो तुम
"किसी को नोचना मत" । "किसी को वेदना मत देना" । किसी की सहायता कर सको
तो ये तुम्हारी "सिद्ध वृत्ति" है । तुम "सिद्ध" हो और जिस क्षण तुम किसी
को दे न सको, केवल ले सको, अपने पास अपने लिए स्थापित करो, तो तुम
"गिद्ध" ही हो ।
छोटे छोटे बच्चे जब किसी ये प्रेम करते हैं, तो अपना खिलौना सबसे पहले उस
व्यक्ति को ले जाकर दिखाते हैं, देखो ये मेरा खिलौना है । और यदि उनका
प्रेम और घनीभूत होता है, तो वो अपना खिलौना उठाकर दूसरे व्यक्ति को दे
देता हैं । और उसको खेलते देखकर खुद ताली बजाते हुए वो बच्चा खुश होता है
। उस बालक के भीतर सहज सिद्धोँ की वृत्ति है । सिद्धों ने कहा तुम इस
वृत्ति को सीख लेना, तो हम तुमसे प्रेम करने लगेंगे ।
और यदि तुमने इन छोटी छोटी बातों को सीख लिया, तो उस "सूक्ष्म हिमालय" से
जो इस दृश्य हिमालय से भी बहोत पीछे है । वहाँ से कोई न कोई सिद्ध आकर
जरूर तुम्हारा हाथ थाम लेगा ।
और वो हाथ इतना मजबूत हाथ होता है कि भले
ही "विज्ञान", "तर्क", "शास्त्र", "ज्योतिष", "धर्म" और "संपूर्ण समाज"
ये कहे कि ये हाथ तुम्हारी रक्षा नहीँ कर पायेगा । केवल वही "सच्चा हाथ"
है जो तुम्हें अपने साथ ले जा सकता है । तुम्हें उच्च धरातल का बना सकता
है । और तुम्हें "पूर्णता" के मार्ग में ले जाकर "पूर्ण पुरूष" बना सकता
है । तुम सिद्धों के बहोत छोटे-छोटे ये दो- चार सन्देशों को यदि समझ जाते
हो तो ये "सिद्ध" फिर तुम्हारे लिए शुभकामनाएँ करते हैं । मंगल कामनाएँ
करते हैं । और तुम्हारी "प्रतीक्षा" करते हैं । सिद्धोँ के सूक्ष्म संदेश
में आज अभी इतना ही । ॐ नमः शिवाय ! प्रणाम ! -
…………………………कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज (ईशपुत्र)

रविवार, 5 अगस्त 2018

एक अनूठे व्यक्तित्व हैं कौलान्तक नाथ
(यहाँ पाठकों को ये बताना चाहेंगे की तुमड़ी बाबा काफी बड़ी आयु के सिद्ध योगी हैं,जो महायोगी जी को करीब चौदह सालों से जानते हैं,तथा महायोगी को अपना बरिष्ठ गुरु भी कहते हैं,क्योंकि महायोगी जी के 38 गुरुओं में से एक शान्किरी योगिनी के ये भी शिष्य हैं,ये महायोगी जी से मिलने आये हुए थे कि मुझे बात करने का सुअवसर मिल गया,इनके शब्दों को ही, जितना याद रहा, मैं लेख के रूप में दे रहा हूँ)
-कुमुदवल्ली

अरे लोगों के मन में साधू सन्यासी या योगियों की एक छवि होती है,लेकिन महायोगी की छवि बनाना किसी के बस में नहीं,इनका असली व्यक्तित्व तो बहुत ही छिपा और गोपनीय है, इनको कौलान्तक नाथ के नाम से हिमालयों पर इनको सब पहचानते हैं, इन विराट योगी का जीवन कई अद्भुत रहस्यों से भरा है,सबसे पहले तो ये कि सबसे पुरानी परंपरा से जुड़े हैं,ऐसी परम्परा से जिसे जानने वाले भी बहुत कम शेष बचे हैं,फिर गुप्त कुल की सभी शक्तियों की साधना कर इन्होंने साधना क्षेत्र में इतिहास कायम किया है,जिसका महत्त्व आंकने वाला कम से कम भौतिक संसार में कोई नहीं हो सकता,अपर मंडल कि 48 देवियाँ हों या परात्पर मंडल के 26 शिव,कहा जाता है कि हिमालय में लम्बा नाथ योगी, योगी हरिरस, त्रिजटा अघोरी, विशुद्धानंद, परमहंस निखिलेश्वरानंद, सुन्दर नाथ, गोला लामा , मुनि उज्जवल हंस, जैसे चुनिन्दा लोग ही परात्पर शिव कि साधना में परांगत हो सके थे, लेकिन इनमें से भी कोई अपर मंडल देवियों तक नहीं पहुँच पाया,लेकिन कौलान्तक नाथ को ये गौरव मिला है वो भी कठोर तप के बाद,कौलान्तक नाथ को आप महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज के नाम से जानते हैं,जो आम आदमी से भी साधारण लगते हैं, कौलान्तक नाथ बर्तमान भारत में साधना जगत के सर्वोत्तम रत्न हैं,लेकिन साधना काल में उनकी हठ धर्मिता ने जहाँ उनको साधना शिखर तक पहुंचा दिया वहीँ कुछ हानिया भी कौलान्तक नाथ की झोली में पड़ी, सबको सहते हुए योगी आज समाज में एक नये रूप में जीने का प्रयास कर रहे हैं,

लेकिन मुझे ये बताना अच्छा लगेगा कि महायोगी अनूठे व्यक्तित्व हैं,सबसे ऐसे मिलते हैं कि मानो उनका अपना ही हो,लेकिन बदले में समाज का रुख? हालांकि महायोगी पर गुरुओं ने ज्यादा लोगों से मिलने जुलने पर पावंदी लगाई हुई है,पर महायोगी ने इसका भी हल आखिर निकाल ही लिया जब पिछले दिनों कई सालों के बाद में कौलान्तक नाथ से मिला तो देखा कि अब तो वो टीवी पर आने लग गए हैं,लोग उनको खूब मानते भी हैं गृहस्थ भक्तों की भी कमी नहीं है ।

मुझ जैसे साधक को बस इतनी चिंता है की बस हमारे कौलान्तक नाथ को कोई दुःख न पहुंचे वो दुष्टों से बचे रहें, मैंने इनसे शक्तिपात लिया था और कई साधनाएँ सीखी हैं अब ब्रम्ह पात पाने की इच्छा है,न जाने कब इतनी कृपा होगी कि कौलान्तक नाथ मुझे इसके काविल समझें,पर ये जरूर है कि ऐसा महापुरुष कुछ सोच विचार कर ही संसार में विचरण करता है अन्यथा इनको हिमालय से उतरने कि जरूरत ही नहीं होती,काश मैं भी इनके साथ रह सकता,कितनी बार इनसे प्रार्थना कि पर मानते ही नहीं,और मुझे इनका साथ मिल ही नहीं पाटा,मिलता है तो इतना कम कि लगता है कि कुछ मिला ही नहीं,न जाने कितनी विद्याएँ इनके पास हैं,आप लोग किस्मत वाले हैं और महायोगी के लिए तो यही कहूँगा कि वो अनूठे व्यक्ति हैं और हिमालय की  शान हैं,हम सबके प्यारे हैं,
-तुमड़ी बाबा

सोमवार, 30 जुलाई 2018

कौलान्तक पीठ हिमालय
॥ ॐ महाकालाय विकर्तनाय मायाधराय नमो नमः॥


हिमालय की दिव्य भूमि में कुल्लूत नाम का एक प्राचीन देश.... जहाँ मां भगवती पाराम्बा का निवास माना गया तथा शिव की तंत्रमयी तपोभूमि मानी जाती है... में एक स्थान ऐसा भी था , जिसे कौलान्तक पीठ कहा जाता था। इस पीठ के पर्यायवाची नाम क्रमश: कुलांतर पीठ, कुलान्तक पीठ, कोलांतर पीठ, कौलांतर पीठ हैं। इस पीठ की स्थापना स्वयं शिव द्वारा की गयी मणि जाती है। क्योंकि माँ सती से सम्बन्धित होने के कारण भगवान शिव ने स्वयं हिमालय के एक भाग में इस पीठ की स्थापना की थी। इस पीठ के प्रथम पीठाधीश भगवान लोमेश ऋषि को माना जाता है। उसके बाद क्रमश: अनेक दिव्य ऋषियों ने इस पीठ को संभाला। कलयुग में वर्ष २००२ में हिमालय की दिव्य ऋषि परम्परा के द्योतक प्रातः स्मरणीय पूज्य पाद श्री सिद्धसिद्धांत नाथ जी महाराज ने इस पीठ पर श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज को पीठाधीश के रूप में प्रतिष्ठित किया गया व पहली बार महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज ने हिमालय की प्राचीन पीठ व भारत की सबसे प्राचीन पीठ कौलान्तक पीठ को पुन: विश्व भर में प्रसारित व प्रतिष्ठित करने का दायित्व स्वीकार किया। कौलान्तक पीठ तप , साधनाओं और अध्यात्म ज्ञान का भंडार है। यह एक मात्र ऐसा पीठ है जिसके साधकों को ६४ कला संपन्न होने का गौरव प्राप्त है। सांकेतिक रूप से शास्त्रों में इसी पीठ को ज्ञान गंज, सिद्धाश्रम व महा हिमालय कहा गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से हिमाचल के कुल्लू शहर के मध्य से बहती विपाशा नदी जिसे वर्तमान में व्यास नदी भी कहा जाता है के साथ लगता पूर्वी व उत्तरी क्षेत्र तिब्बत के अंतिम पठार तक कौलान्तक पीठ कहलाता है व नदी के दक्षिणीपश्चिमी भाग को जालंधर पीठ माना गया है जिसकी स्थापना काक भुशुण्डी जी महाराज ने की थी। रेशमी मार्ग पर आने वाले दुसरे देश के आक्रमणकारियों ने दोनों पीठों को नष्ट कर दिया था। किन्तु कौलान्तक पीठ को उस समय के पीठाधीश ज्ञानेंद्र नाथ जी महाराज ने पुनर्प्रतिष्ठित किया तथा यह भी कथा आती है की उस समय नव नाथ और चौरासी सिद्ध हिमालय भ्रमण करते हुए इस पीठ पर पहुंचे तथा उन्होंने इस पीठ के जीर्णोद्धार में सहायता की। इसी कारण इस पीठ पर नाथ सम्प्रदाय और सिद्ध संप्रदाय का भी अधिकार हो गया जो मत्स्येन्द्र नाथ जी महाराज व गुरु गोरख नाथ जी महाराज द्वारा स्थापित है। कौलान्तक पीठ में साधक अलग- अलग देशों, अलग - अलग द्वीपों से ज्ञान व विद्या प्राप्त करने आते थे। इस पीठ का पीठाधीश्वर बनने हेतु योग, ज्योतिष, तंत्र, वास्तु, कर्म कांड , आयुर्वेद सहित अनेक विषयों का ज्ञान होना अनिवार्य है व हिमालय के उच्चतम क्षेत्रों में हट साधनाओं को संपन्न करना होता है तथा गुरु शिष्य परम्परा के अनुकूल ही यह पीठ प्राप्त होती है। किन्तु खेद का विषय यह रहा की लगभग २००० सालों से कौलान्तक पीठ का परम्परा हिमालय के क्षेत्रों में आंशिक रूप से जीवित रही लेकिन उसी कल से जालंधर पीठ सहित अन्य चार दिव्य पीठें लुप्त हो गयी। संभवतः इसी आशय को जगद्गुरु भगवान शंकराचार्य जी ने समझा व हिमालय की इन लुप्त पीठों के बराबर की चार पीठों की स्थापना की। किन्तु सकल जगत के लिए यह प्रसन्नता का विषय है के महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज ने सबसे प्राचीन कौलान्तक पीठ की पुनर्स्थापना का बीड़ा उठाया है। महायोगी स्वयं इस परम्परा से जुड़े हैं व नाथ परम्परा से भी दीक्षित हैं।
हिमालय की कठोर हठ सधानाओं से हो कर गुजरे है व लुप्तप्राय: हो चुकी टन्करी लिपि व भूतलिपि आदि का ज्ञान रखते हैं । अध्यात्म की सभी विधाओं में निपुण हैं व बाल्यावस्था से साधनारत हैं ..... हिमालय के अनेक क्षेत्रों में साधनों एवं तप क्रियाओं को संपन्न कर चुके हैं। ऐसे में आपका इस पीठ से जुड़ना मानव जीवन का गौरव है। आपके द्वारा यह पीठ पुनर्प्रतिष्ठित हो पायेगी तथा आदिकाल की तरह ही अनेक राष्ट्रों व द्वीपों के साधकों को दिव्य ज्ञान प्रदान कर पाएगी तथा वास्तविक साधनात्मक जीवन का पुनर्स्थापन हो पायेगा। कौलान्तक पीठ से जुड़ कर आपने अपना अमूल्य सहयोग इस पीठ को प्रदान किया हैं। अतः पीट पूरण निष्ठां से आपको आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति के मध्यमो से अवगत करवाएगा। कौलान्तक पीठ का कार्य किसी प्रदेश अथवा देश का कार्य न हो कर एक वैश्विक कार्य है। अतः आप गणमान्य सदस्यों की राय अपेक्षित है। कौलान्तक पीठ का कार्य पूरी तरह पारदर्शी व धर्मनिष्ट है। कौलान्तक पीठ के इस वैश्विक महा यज्ञ में आपका सहयोग एह आहुति की तरह अमूल्य व गौरवमयी रहेगा। अतः सभी दिव्य पथ के साधकों से अनुरोध है की वे कौलान्तक पीठ की स्थापना में अपना सहयोग दें ..........और हिमालय के दिव्य ज्ञान से स्वयं जुड़ें तथा विश्व को जोड़ें।

बुधवार, 16 मई 2018

 कौल तन्त्र और वज्रयान तन्त्र
प्रश्न: तो हमारे तन्त्र और उनके (वज्रयान) तन्त्र मेँ क्या भिन्नता है ?
ईशपुत्र: अन्तर है । अन्तर कहाँ हो जाता है? हम मूलतया शिव और शक्ति को प्रमुख रखते है । क्यों ? क्योंकि हमारे पंथ की शुरुआत-प्रारम्भ स्वयं महादेव ने किया लेकिन वहां उनके सम्प्रदाय की शुरुआत महादेव ने स्वयं ने नहीं की है अपितु हमारे ही सम्प्रदाय से, मै उनका नाम नहीं लेना चाहता, फिर भी यदि आप जिज्ञासु लोग है और स्वयं खोजेंगे तो आपको ऐसे सिद्धों के नाम मिल जाएंगे जो हमारे ही हिमालय के योगी "सिद्ध-परम्परा" के बहुत पहले से सिद्ध थे लेकिन, निजी स्वार्थ होता है, राजनीति कहाँ नहीँ रहती ! धर्म और गद्दियों मेँ भी तो राजनीति है ! प्राचीन काल में हमारे सम्प्रदाय की प्रचलित बहुत महत्वपूर्ण कथा है कि, बहुत से सिद्धों ने हमारे ही पंथ से बगावत की । होता है...हर सम्प्रदाय में जो विशालकाय सम्प्रदाय हो वहां सब व्यक्तियों का तुष्टिकरण नहीं हो सकता और हमारे पंथ में पीठाधीश्वर बनने के नियम जितने कठिन है जितने जटिल है शायद ही किसी और पंथ और धर्म में ऐसे हो । ऐसा लगता है जब हम तैयारी करते है, कि मानो हम किसी युद्ध पर जानेवाले हो ! युद्धस्तर पर हम तैयारियां करते है तब जाकर के एक पीठाधीश्वर का युद्ध लड के उसकी गद्दी तक पहुंचना होता है । जबकि आज आप किसी भी सम्प्रदाय को देख लीजिए किसी भी गद्दी को, बस आपको सेवा ही करनी है और आपका नम्बर लग जायेगा और आप पीठाधीश्वर बन जाएंगे, लेकिन यहां ऐसा नहीं चलता... तो प्राचीन काल मेँ... जैसे मान लीजिए मेरा आश्रम है अब यहां पचास लोग होंगे, अब पचास के पचास तो पीठाधीश्वर नहीं बन सकते! तो एक व्यक्ति जब पीठाधीश्वर बनता है तो उसके साथ के दो-तीन उसके जो प्रतिस्पर्धी होते है उन्हें लगता है कि 'अरे ! हम मेँ इस से अधिक योग्यता थी !' और योग्यता तो सिद्ध कर के होती है ना ! जब वो अपनी योग्यता सिद्ध नहीं कर पाते तो वो पीठ का परित्याग कर देते है ! उसे हम असंतुष्ट लोग कहते है, मोहभंग जिन लोगों का हो जाता है... तो ऐसे ही सिद्ध प्राचीन काल मेँ भी रहे जिनका मोहभंग हो गया तब वो "कौलान्तक सम्प्रदाय" को और "महाहिन्दू पंथ" को निशाना बनाने के लिए तत्त्व ढूंढने लगे ! मै आज आपको दो "रहस्य" बता रहा हूं ! प्रथम रहस्य ये है कि यदि आप हमारे ही "हिन्दू धर्म" के वेद, पुराण, शास्त्रों और ग्रंथों को भी देखेंगे, उस मेँ से एक शब्द हटा ही दिया गया है वो है "हिन्दू" ! आप यदि हमारे पुराण, वेद, शास्त्र पढ़ेंगे वहां आपको "हिन्दू" नाम का शब्द बहुत ही कम इक्का-दुक्का स्थानों में ही देखने को मिलेगा ! वो शब्द कैसे हटाया गया ? इसमें कुछ ब्राह्मणों का षड्यंत्र था ! सभी ब्राह्मणों का नहीं क्योंकि ब्राह्मण तो इस पंथ को और इस विद्या को आगे पहुंचाने वाले है और वहां कुछ ब्राह्मणों के कारण और उन असंतुष्ट ब्राह्मणों और असंतुष्ट हमारी पीठ से गये सिद्धों ने मिलकर कई अन्य सम्प्रदाय खडे किए ! और उन्हीं अलग-अलग संप्रदायों का फिर अलग-अलग राग था ! क्योंकि देखिए जब आपको हम से अलग होना होगा...मान लीजिए आज आप हमारे भक्त है, कल को अगर आप को हमारा शत्रु बनना पड़े तो आप छोटी-छोटी बात कहेंगे जैसे कि इस व्यक्ति का चरित्र ठीक नहीं ! ये व्यक्ति शक्तिशाली नहीं ! ये व्यक्ति तपस्वी नहीं ! इस व्यक्ति मेँ कोई ज्ञान नहीं इत्यादि-इत्यादि...तो ठीक वैसे ही हुआ जब हमारे यहां से वो सिद्ध जो किसी स्थिति पर न पहुंच सके वो जाकर अन्य धर्मों मेँ मिल गये !

प्रश्न : तो क्या भविष्य में बौद्ध पंथ का अंत हो जाएगा ? जैसा कि वैष्णव ग्रंथों में कहा गया है ?
ईशपुत्र : मैने भी अपने गुरुओं से सुना है और जो वैष्णव ग्रंथ है हमारे भारतवर्ष के...उनमें विवरण दिया गया है कि "बौद्ध पंथ का अन्त हो जायेगा ।" लेकिन मैं इस वृत्ति का पीठाधीश्वर नहीं हूं । कारण ये है कि चाहे जो भी हो वो हमारे गर्भ से निकले हुए लोग है, हमारी संतानें है, हमारे पुत्र है । मैं बौद्ध धर्म की प्रत्येक शाखा को अपना पुत्र ही मानता हूं । बुद्ध से लेकर अभी तक जितने भी अलग अलग उनके प्रमुख लोग हुए है पैदा...उन सबको मैं अपना पुत्रवत् मानता हूं, छोटा मानता हूं और उनकी रक्षा करना अपना "धर्म" मानता हूं । लेकिन ये सब तभी तक सहा जा सकता है जब तक आप एक सीमा से बाहर ना जाओ । भगवान श्रीकृष्ण को जब तक एक साथ सौ गालियां नहीं दी गयी वो मुस्कुराते रहे...ठीक मेरा भी वही सिद्धांत है । सभी बौद्ध धर्म के मतावलंबी एक जैसे नहीं है... हमारी पीठ...क्योंकि ये भगवती माँ कुरुकुल्ला की पीठ है जिनको रक्त तारा अथवा रेड तारा कहा जाता है...तो दुनियाभर से लोग जो बौद्ध धर्म के माननेवाले है वो पीठ मेँ आते है और वो अपनी पद्धति से पूजा-पाठ करते है...अपने मंत्रों से,अपने तौर तरीकों से । हमने उन्हें कभी नहीं रोका...हम ये कहते ही नहीं की भगवती हमारी है । हम कौन होते है कहनेवाले ? ये तो जगत की है, ब्रह्मांड की है, जो आयेगा उसकी माँ है और जो चाहे आकर इनसे वरदान पाए क्योंकि ये तो चमत्कारों की देवी मानी जाती है । अनेकों चमत्कार इनके द्वार पर है और एक क्षण मेँ किसी का भी किस्मत बदलने का मादा रखती है अन्यथा इनकी अनुकंपा नहीं होती तो मेरे जैसा एक गांव का अतिशून्य परिवार मेँ पैदा हुआ व्यक्ति प्रखरतम मस्तिष्क प्राप्त करके सर्वोच्च पदवी तक जाने की सामर्थ्य नहीं रखता था । तो ये केवल भगवती की प्रेरणा से हुआ । तो बौद्ध मत के लोग भी यहां आते है । कुछ अच्छे लोग भी वहां है...तो हमने उन्हें कभी नहीं रोका...इसीलिए मै ये नहीं चाहता कि बौद्ध धर्म का कभी अन्त हो और बौद्ध धर्म को नष्ट किया जाए ! मै तो उनकी ओर "मैत्री" का हाथ बढाना चाहता हूं ! मै उनसे प्रेम करता हुँ ! मैँ तो ये कहता हुँ कि तुम लौट आओ अपने घर ! लेकिन इसका अर्थ ये नहीँ कि तुम बौद्ध पंथ को छोड दो, तुम बुद्ध को मानना छोड दो या तुम अपनी मिश्राचारी पद्धति को अपनाना छोड दो लेकिन अपनी मौलिक परम्परा से जुड जाओ । बडा लंबा समय हो गया है तुमने अपना घर छोड दिया है और तुम घर से बाहर भटक रहे हो । सुबह का भूला यदि सन्ध्या के समय घर लौट आये तो उसे भूला नहीँ कहा जाता ये हमारी भारतीय कहावत है...तो मेरा तो खुले ह्रदय से उनका स्वागत है, मेरा तो "मैत्रीपूर्ण हाथ" उनकी और मैने बढाया है...और ऐसा पहली बार होगा क्योँकि मुझसे पूर्व शंकराचार्य इस पृथ्वी पर आये, उनके जैसा धुरंधर व्यक्तित्व..जिससमय बौद्ध धर्म का तन्त्रयान पूरे देश मेँ फैल चूका था । हर ओर केवल एक ही नारा था "बुद्धं शरणं गच्छामि ।" जिस समय हर ओर, हर समय, हर दिशा मेँ ब्राह्मणोँ का अपयश फैल रहा था । लोग ब्राह्मणवाद को, वेदोँ को गलत कह रहे थे, पुराणोँ को गलत कह रहे थे और जहाँ भी ब्राह्मण दिखते उनको हटा देने, गिरा देने, नष्ट कर देने पर तुले हुए थे...तब भी एक सिँह की भाँति एक संन्यासी नेँ संपूर्ण पृथ्वी पर भारत पर से उस बौद्ध धर्म को इस प्रकार खदेडा कि भारत मेँ आपको देखने को ही बौद्ध धर्म नहीँ मिलता । बहुत चंद लोग मध्य मेँ रहते है और बाकी देश की सीमाओँ से बाहर रहते है जिन्हे खदेड दिया गया लेकिन मैँ खदेडने नहीँ आया हुँ ! और ना ही खदेडने की बात करता हुँ ! अभी तक जो भी आये उन्होँने बौद्ध धर्म को हटाने की ही बात की । मैँ प्रथम पुरुष हुँ जो उनकी ओर हाथ पुनः बढा रहा है । मैँ कहता हुँ मैने "मैत्री" का हाथ बढाया है तो तुम्हे मेरे हाथोँ मेँ हाथ देना चाहिए । तुम्हे अपनी मौलिक परम्परा मेँ लौटना चाहिए । तुम्हेँ शिव और शक्ति की निन्दा छोडकर मौलिकरुप से साधना समझनी चाहिए क्योँकि जीवन लडनेँ के लिए नहीँ है । जीवन बहुत छोटा है । उस जीवन को स्थायीत्व प्राप्ति के लिए, पूर्णता प्राप्ति के लिए हमेँ मौलिकरुप से साधना करनी चाहिए यही मेरा प्रस्ताव भी है और ऐसा उनको समझना भी चाहिए ।


विष्णु भैरव जी : याने कि आप "मैत्रीय प्रस्ताव" आगे बढाना चाहते हो ?
ईशपुत्र : बिलकुल, मेरा केवल उतना ही मन्तव्य है क्योँकि बौद्ध धर्म आज एक सुंदर रुप मेँ पनप रहा है...उसका कारण ये है कि अधिकांश परंपराएँ हम से ली गयी है...मैने तो ये भी नहीँ कहा कि, "चुराई गयी है !" मै तो कह रहा हुँ, "ली गयी है !"  क्योँकि उनके प्रमुख जो रहे आप उनको गौर से खोजिए तो आपको पता चलेगा की वो "सिद्ध" रहे है सारे के सारे । चौरासी सिद्ध होँ या अन्य सिद्ध होँ या उप सिद्ध होँ या महा सिद्ध होँ या हिमालय के योगी हो वो भारत के ही किसी प्रान्त से, कसबे से निकले है और जाकर उन्होँने बौद्ध पंथ मेँ जाकर के वो ज्ञान आगे बढाया है । तो वो सब मेरे लिए अनुज है, छोटे है तो मैँ उनको कभी हानि कैसे पहुँचा सकता हुँ और वैसे भी भारत की ऐसी मंशा कभी नहीँ रही । महामहिम दलाई लामा एक पंथ के प्रमुख है और हमारे ही हिमाचल प्रदेश मेँ उनको स्थान दिया गया है । आपने क्या कभी देखा कि हमने उन्हेँ किसी प्रकार से हानि पहुँचाई ? यहाँ तक कि जब तिब्बती समुदाय को कोई हानि पहुँचाई जाती है तब भी हमारा वरद हस्त उन पर रहेता है कि इनको कोई कष्ट ना पहुँचाओ क्योँकि हम उन्हेँ शिष्य की भाँति मानते है । ये बात अलग है कि उनमेँ से कुछ उद्दडं तत्व है जो हमेँ शत्रु की निगाह से देख रहे है...तो यदि तुम शत्रुता करोगे तो विपरित हो सकता है, मैँ अपना हाथ तुम्हारे उपर से खिंच लुंगा । मेरा कोई समर्थन तुम्हारी तरफ नहीँ रहेगा और मैँ तुम्हारे लिए कोई मंगल काम नहीँ करनेवाला हालाँकि मैँ कर रहा हुँ, विश्व के लिए कर रहा हुँ वो मैँ छोडुंगा नहीँ वो मेरी आदत है लेकिन यदि तुम "असत्य" कहोगे शिव के विरुद्ध कहोगे शक्ति के विरुद्ध कहोगे तो तुम्हारा विनाश होगा ! और शायद यही कारण है कि वैष्णव पंथ इस प्रकार की भविष्यवाणी करता है कि भविष्य मेँ बौद्ध संप्रदाय का अंत हो जायेगा लेकिन मैँ ये भविष्यवाणी करना चाहता हुँ कि इस तरह का अंत ना हो !! वहाँ से केवल उन लोगोँ का अंत हो जो नीच है, निकृष्ट है, शिवनिन्दक है, शक्ति के निन्दक है और जो वहाँ राजनीति कर रहे है..बौद्ध धर्म, तंत्र और कुलाचार, कौलाचार, समयाचार के नाम पे..उनको शान्त रहना चाहिए और मेरे "मैत्रीय प्रस्ताव" को स्वीकार करना चाहिए क्योँकि मेरा "मैत्रीय प्रस्ताव" पूर्वसुनियोजित है और मैँ चाहता हुँ कि वो "प्रकृति के इशारे" को समझे और अपने घर को वापिस लौट आये और अपनी साधनाओँ को आगे बढाते हुए जीवन को सुखमय करे ।