'कौलान्तक पीठ हिमालय' प्रस्तुत करता है 'षोडशस्वरीय अष्ट सिद्धि मंत्र'। प्रस्तुत मंत्र की साधना व जाप और श्रवण से अष्टसिद्धियाँ योगियों को प्राप्त होती है। ये मंत्र दो भागों में विभक्त होता है जिसे शिव-शक्ति क्रम कहते हैं। अष्टसिद्धियों का ये मंत्र भैरव-भैरवियों को उच्चता प्रदान करेगा। इसी कामना के साथ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।
'षोडशस्वरीय अष्ट सिद्धि मंत्र'
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ अणिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ महिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लघिमा सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ प्राप्ति सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ र्इषिता सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ वशित्व सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ प्राकाम्य सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ कामवसायिता सिद्धे हिरण्यगर्भिणी हुं
कहते हैं कि कलियुग में कोई भी अति पवित्र हो ये हो ही नहीं सकता......जब राजा परीक्षित जैसे महारथी भी कलियुग से बच न सके तो अन्यों कि विसात क्या....यही सोच कर महायोगी अपने महागुरु के पास गए....और उनसे कहने लगे कि मेरे जीवन में न जाने क्या क्या घटा हैं....मन:स्थिति जितना संभालना चाहूँ रह रह कर फूटती है.....मुझे लगता है कि पर्वतों को रौंद दूँ....आकाशों में उड़ जाऊं....संसार में जितने लोग पाप फैला रहे हैं उनको जा कर सबक सिखाऊं......पता नहीं क्यों दुनिया में कमिय ही बहुत नजर आती हैं......महागुरु ताड़ गए कि कुण्डलिनी शक्ति के उर्धवमुखी गति के कारण इस तरह के बाव पैदा हो रहे हैं.....महायोगी जी को महागुरु ने कुछ दिन अपने पास ही ठहरने को कहा....लेकिन महायोगी जी कि बैचैनी बढ़ती ही गयी....यहाँ ये बताना आवश्यक है कि महायोगी जी निद्राजई हैं......अपनी नींद पर उनका मनचाहा नियंत्रण है......लेकिन बैचैनी के कारण उन्हें....कुछ होने लगा...हाथ पाँव कांपने लागे....शरीर पर नियंत्रण नहीं रहा....कभी जोर-जोर से साँसे भीतर खींचते....तो कभी बाहर छोड़ देते....भस्त्रिका प्राणायाम कि भांति सांस लेते-लेते अचानक जमीन पर लोट-पोट होने लगते....कूदते...चिल्लाते....जोर-जोर से हँसते....फिर रोने लग जाते.....जब हालत बहुत ही ख़राब हो गए तो महागुरु ने एक बड़ा पत्थर नाले के पास देख कर महायोगी जी को कहा कि इसे गुफा तक ले जाना था पर कैसे हममे से तो कोई भी इसे हिला नहीं सकता....तुम्हारे बाकि गुरुभाइयों को भी कहना पड़ेगा....कह कर महागुरु गुफा कि और चले गए...महायोगी जी के अन्दर शक्ति का उबाल सा आ रहा था....महायोगी जी ने उस पत्थर को पलटना शुरू किया....अकेले ही वो भी चढ़ाई में...खुद पत्थर के नीचे...मानों आत्महत्या करने का पूरा बंदोबस्त कर रखा हो......पर माने नहीं चलते गए...तबतक बाकि गुरु भाई भी पहुँच गए और पत्थर को गुफा तक ले गए......पत्थर पर बल लगा कर महायोगी जी को बहुत ही शांति अनुभव हुई....जैसे ही बैचैनी बढ़ती महायोगी जी पत्थर पलटना शुरू कर देते....फिर महागुरु ने महायोगी जी के सर पर बर्फ के पानी से भीगा हुआ कपड़ा रखा....और पावों को आग से गरम करने लगे....दोनों गुरुभाइयों ने हाथ कस कर पकड़ लिए....और दो गुरुभाई चिकनी मिटटी जिसमें कुछ औषधि मिली हुई थी महायोगी जी के पीठ पर रगड़ने लगे......महायोगी कि हालत मरते हुए प्राणी जैसी हो गयी....लेकिन कुच्छ देर बाद महागुरु ने नेत्रों से महायोगी जी पर शक्तिपात किया...और महायोगी जी योग निंद्रा कि अवस्था में चले गए....इस तरह महायोगी जी को अद्भुत कुण्डलिनी जागरण का रहस्यमयी लाभ प्राप्त हुआ.....महायोगी जी उठे और त्रिबंध लगा कर घंटों समाधी में बैठने लगे.....अब महायोगी जी कि चलने कि गति अचानक बहुत तेज हो गयी....काम करने कि गति भी बहुत तेज हो गयी.....बात भी महायोगी जी जल्दी जल्दी करने लगे....स्वभाव में इन परिवर्तनों ने महायोगी जी को बदल कर रख दिया....धीर गंभीर महायोगी चपल हो गए....हसने खिल खिलाने लगे....बहुत बोलने भी लगे....अब महागुरु ने उन पर अंकुश लगाने के लिए सबसे विचित्र उपाय निकाला....ये उपाय था कि महायोगी जी को ऐसे बस्तर पहनाये जाएँ जिनमे स्त्रियों के गुण हों....ताकि महायोगी जी के भीतर उमड़ रहे पुरुष को अति पुरुष होने से रोका जा सके.....अन्यथा महायोगी पेड़ कि छोटी पर होते.....कभी पहाड़ी के बीच में....कभी ऊँची छलांग लगा रहे होते...नदियों में कूद पड़ते....यहाँ तक कि चारो ओर आग जला कर बीच में बैठ जाते....सापों को पकड़ लेते....जंगल से गीदड़ पकड़ कर लाते.....अब क्या क्या बताऊँ....ऐसी ऐसी माया है कि बताई भी नहीं जा सकती.....इस घटना के कारण जंगली जीवों से महायोगी जी कि मित्रता हो गयी...एक बार तो महागुरु को इतना क्रोध आया कि महायोगी जी कि डंडे से खूब पिटाई हुई....महायोगी जी सबसे ऊँचे देवदार के बृक्ष पर चढ़ गए ओर सबसे ऊँची टहनी पर पाँव मोड़ कर रस्सी से बांध दिए और उलटे लटक गए.....यदि थोड़ी सी चूक हो जाती तो गहरी खाई में जा गिरते....जहाँ से हड्डियाँ लाना भी संभव नहीं था....महागुरु ने खूब लताड़ा और कहा ये हाल हैं हिमालय के सबसे बड़े योगी के.....और मार मार कर हड्डियाँ ढीली कर दीं....कहा तुमारा काम जीवो की रक्षा करना है न की उनको प्रताड़ित करना......तबसे जंगली जानवरों को शायद रहत मिली....ये महागुरु का ही दिया संस्कार है की आज महायोगी जी वन्य प्राणियों के संरक्षक के रूप में मने जाते हैं......लेकिन कुछ चीजों पर शायद कोई खास असर नहीं हुआ.....महायोगी जी अब भी छुप-छुप कर बड़े-बड़े पत्थरों और चट्टानों पर चढ़ते रहते हैं.....आज का "राक क्लाइंबर" भी शरमा जाए....महायोगी जी को तुरंत औरतों की साड़ी जैसे वस्त्र पहना दिए गए.....जिससे बहुत कुछ अंकुश तो लगा.....पर राज कि बात ये है....कि ये घटना क्रम अब भी जारी हैं......कहते हैं कि महायोगी जी के अन्दर कोई पुरुष रसायन कुण्डलिनी जागरण के कारण अनियंत्रित हो गया है....जिस कारण वो इसी रासायनिक दवाब में आ कर ऐसी-ऐसी दुसाहसिक क्रियाएं करते हैं....पर सत्तर प्रतिशत तो उनको बस्त्रों ने ही रोक रखा है.....हालाँकि बात जंचती नहीं है....पर इससे सिद्ध हुआ की वस्त्र भी जीवन शैली पर गहरा प्रभाव डालते हैं........बाकि गहरी बात तो मनोवैज्ञानिक ही जान सकते है की महागुरु ने ऐसा क्यों किया......ये है महायोगी जी के विचित्र वस्त्रों का असली भेद....हालाँकि अब महायोगी जी ने इन सब पर काफी हद तक रोक लगा ली है....पर जंगल के शेर के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल ही है....जब भी हिमालय जाते हैं तो फिर पकड़ना स्वप्न ही है....हमें प्रार्थना करते हुए ही कि धीरे चलिए कहते कहते साथ चलना पड़ता है..... - साभार लखन नाथ जी
आन्तरराष्ट्रीय कौलान्तक सिद्ध विद्यापीठ वज्र योगिनी तंत्र पर आगामी पाठ्यक्रम की घोषणा करते हुए प्रसन्नता अनुभव कर रही है।
इस धरा पर वज्र योगिनी तंत्र की विशालता को समाहित करने वाला यह अभूतपूर्व कोर्स है। वज्र योगिनी तंत्र की शिक्षाओं और ज्ञान के विस्तार को किसी भी परंपरा में इससे पहले कभी गहराई से नहीं बताया गया है।
वज्र योगिनी तंत्र जो हिंदू धर्म, बुद्धाचार और कई अन्य परंपराओं में संदर्भित है, वज्र योगिनी तंत्र की विशालता का केवल कुछ पहलू मात्र है।
आइए और सिद्ध धर्मानुसार सीखिए वज्र योगिनी के विशाल तंत्र, उनके विभिन्न रूप, वज्र योगिनी तांत्रिक नृत्य, डाकिनी गीत, उनकी गुप्त मुद्रा माला, शामानिक शाबर मंत्र परंपरा और जानिए उनके बारह भैरवों और उनके मुखौटों के बारे में ।
आप यह भी सीखेंगे कि वज्र योगिनी भाव समाधि को कैसे प्राप्त किया जाए और वज्र वैरोचिनी, उग्रा तारा और वज्र वाराही के साथ उसका क्या संबंध है।
इस सर्टिफिकेशन कोर्स में संपूर्ण वज्र योग और इसकी उत्पत्ति, नास्तिकों की तांत्रिक और यौगिक परंपरा भी सिखाई जाएगी।
आप कुल कुंडलिनी के साथ वज्र योगिनी का संबंध और कैसे वज्र योगिनी अपने साधकों के भीतर सुप्त अनंत शक्ति को जागृत करती है यह भी जानेंगे।
तांत्रिक वज्र योग और वज्र योगिनी का यन्त्र और वज्रयोगिनी का दर्शन भी इस पाठ्यक्रम में समाहित होगा।
आप यह भी सीखेंगे की वज्रयोगिनी का अपने दैनिक जीवन में कैसे उपयोग करें । यह पाठ्यक्रम आपको अपने जीवन में नकारात्मकता और भय को दूर करने और नेतृत्व के गुणों को विकसित करने के लिए सहायक सिद्ध होगा।
महासिद्ध ईशपुत्र इस भ्रम को स्पष्ट करेंगे कि वज्र योगिनी योगिनी है या डाकिनी या देवी या यक्षिणी।
आन्तरराष्ट्रीय कौलान्तक सिद्ध विद्यापीठ के इस कोर्स को प्रायोजित और सहप्रयोजित महासिद्ध ईशपुत्र के मार्गदर्शन में कौलान्तक पीठ, हिमालय द्वारा किया गया है।
आशुतोष भैरव जी - साधक का एक और प्रश्न आया है कि, क्या हनुमान जी, वेद व्यास जी स्थूल शरीर में है या सूक्ष्म शरीर में है जी ?
ईशपुत्र - देखिए, सूक्ष्म शरीर में तो हर व्यक्ति है, सूक्ष्म में भी और स्थूल में भी, सदैव । जब भी कोई चीज दृश्यमान सत्ता से उस पार हो जाए उसको सूक्ष्म कहा जाता है और इस सूक्ष्म में तो ब्रह्मांड में बहुत कुछ घटित हो रहा है जो हमें इन चर्मचक्षुओं से दृष्टिगोचर नहीं होता । आज तो विज्ञान भी जानता है, विज्ञान क्या आपको भी तो मालूम है, कितनी तरह की तरंगे, रेडिएशन, वाइब्रेशन हमारे ब्रह्मांड में घूम रही है, हम उनको देख नहीं पाते बिना यंत्र की सहायता से, तो यह सब चीजें सूक्ष्म है । और कुछ चीजें प्रत्यक्ष में हैं जैसे आप मुझे देख पा रहे हैं । इन महानतम हस्तियों के बारे में यह कहा गया है कि यह 'अवतारी पुरुष' है, सदेह इस पृथ्वी पर रहेंगे । अब कारण यह है कि यदि सदेह है तो यहां सेटेलाइट लगे हुए हैं ऊपर से, सर्च कर रहे हैं पृथ्वी को, एक-एक व्यक्ति का आजकल पासपोर्ट बन रहा है, उसके आईडी प्रूफ बन रहे हैं, सब चीजें बन रही है, किस गांव का है, किस एरिया में रहता है, हिमालय कितना है, तो हर जगह मिलिट्री लगी हुई है, सीमाएं बनी हुई है तो यह लोग कहां है ? अगर यह सशरीर है तो दिखाई क्यों नहीं देते ? ऐसी बातों का, ऐसे प्रश्नों का हम जैसे योगियों के पास या ऐसे योगियों के पास जो वहां जनता के बीच में रहते हैं, जब जनता, साधक या भैरव-भैरवी इस तरह के प्रश्न पूछते हैं तो उत्तर नहीं होता, तो अपने आप को बचाने के लिए यह कहा जाता है कि वह लोग सूक्ष्म शरीर में है । लेकिन आप शास्त्र और पुराणों को पढ़ेंगे उसमें लिखा गया है वह इसी देह में सदेह चिरंजीवी है, ना कि वो सूक्ष्म शरीर में चिरंजीवी है । सूक्ष्म शरीर में तो कोई भी चिरंजीवी हो सकता है इसलिए यह तर्क बिल्कुल गलत है । वह सदेह ही विद्यमान है लेकिन कहां है, कैसे हैं यह बताना अभी मेरा विषय नहीं है लेकिन मैंने आपको इशारा ये जरूर कर दिया है कि सूक्ष्म शरीर से उनका ज्यादा लेना-देना अभी नहीं है ।
कुण्डलिनी शक्ति मनुष्य की सबसे रहस्यमयी और बेहद शक्तिशाली उर्जा है.जिसके जाग जाने से व्यक्ति पुरुष से परम पुरुष हो जाता है.
कुण्डलिनी शक्ति को जगाना कोई आसन काम नहीं. बड़े-बड़े योगियों की भी उम्र बीत जाती है. तब जा कर कहीं कुण्डलिनी को जगा पाते हैं. किन्तु आप के लिए एक सरल उपाय भी है. जो इसको जगा कर आपको महापुरुष बना सकती है. अपने गुरु से शक्तिपात ले कर या आशीर्वाद ले कर मंत्र सहित कुण्डलिनी ध्यान करना शुरू करें. कुछ दिनों के प्रयास से ही कुण्डलिनी उर्जा अनुभव होने लगेगी. किन्तु इसका एक नियम भी है वो ये है की आपको नशों से दूर रहना होगा. मांस मदिरा या किसी तरह का नशा गुटका, खैनी, पान, तम्बाकू, सिगरेट-बीडी, मदिरा सेवन से बचते हुए ही ये प्रयोग करें, तो सफलता जरूर मिलेगी. इस प्रयोग को सुबह और शाम दोनों समय किया जा सकता है. ढीले वस्त्र पहन कर गले में कोई भी माला धारण कर लें और हाथों में मौली बाँध लें जो आपको मनो उर्जा देगी. फिर सुखासन में बैठ जाएँ, पर जमीन पर एक आसन जरूर बिछा लें. यदि संभव हो तो आसन जमीन से ऊंचा रखें. अब आँखें बंद कर तिलत लगाने वाले स्थान पर यानि दोनों भौवों के बीच ध्यान लगाते हुए मंत्र गुनगुनाये.
मंत्र-हुं यं रं लं वं सः हं क्षं ॐ
इस मंत्र में प्रणव यानि की ॐ का उच्चारण मंत्र के अंत में होता है जबकि आमतौर पर ये सबसे पहले लगाया जाने वाला प्रमुख बीज है. अब लगातार लम्बी और गहरी सांसे लेते हुए मंत्र का उच्चारण करते रहें तो आप देखेंगे की तरह-तरह के अनुभव आपको इस कुण्डलिनी मंत्र से होने लगेंगे. धीरे-धीरे स्पन्दन बढ़ने लगेगा. इस अवस्था में फिर गुरु का मार्गदर्शन मिल जाए तो ये उर्जा किसी भी कार्य में लगायी जा सकती है. भौतिक जगत में लगा कर आप अनेक प्रकार के भोग-भोग सकते हैं या चाहें तो योगिओं की भांति अनन्त का ज्ञान प्राप्त कर दुखों से मुक्त हो परम आनदमय मृत्यु रहित जीवन जी सकते है. कुण्डलिनी उर्जा का प्रयोग सदा अच्छे कार्यों में ही करना चाहिए अन्यथा उद्दंडता करने पर ये प्रकृति आपका विनाश भी कर सकती है.
-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज
प्रकृति नेँ मानव को शरीर दिया और शरीर को "देव-मन्दिर" कहा गया । मानवदेह को सर्वश्रेष्ठ इसलिए भी कहा गया क्योँकि इसी देह को साधकर हम मोक्ष अथवा निर्वाण तक का अपना सफर तय कर पाते है किन्तु जब तक हम "देह कौशल" को भली प्रकार साध नहीँ लेते तब तक साधना दुरुह जान पडती है । हालाँकि हमारा शरीर बहुत सीमित और छोटा दिखता है किन्तु इसे ब्रह्माण्ड के सदृश विराट और अनसुलजा माना गया है । मानव देह मेँ विराट क्षमताएँ है । उसके भीतर दिव्य कुण्डलिनी नामक शक्ति विद्यमान है जो अनेकोँ-अनेकोँ अणुओँ की शक्तियोँ से भी अधिक विराट है ! जिसकी कोई सीमा अथवा कोई परिकल्पना नहीँ ! किन्तु एक साधक अपने आप को बिलकुल लघु पाता है क्योँकि पहले वो अपनी देह को ही नहीँ जानता इसलिए साधक सर्वप्रथम अपनी देह को साधने का प्रयास करेँ । किसी भी प्रकार की साधना हो साधक उसे दैहिक तल से ही शुरु करता है । प्राचीन ऋषि परंपरा से लेकर आज तक लगभग सभी साधकोँ ने अपनी देह को साधने का कोई न कोई अभ्यास अथवा कोई न कोई प्रयोग अवश्य किया है, कोई इसे योग के द्वारा साधता है, कोई व्यायाम करता है, कोई अपने शरीर के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग करता है । कभी कभी योगी काँटोँ पर सो जाते है, कभी तेज धूप मेँ तपते है, कभी शीतल जल मेँ डूबकियाँ लगाते है । प्रकृति के मध्य रहकर प्रकृति को आत्मसात् करने का प्रयास करते है । देह भौतिक जगत से जुडे रहने का माध्यम है लेकिन अध्यात्म का मानना है कि यदि हम देह को शोधित न करेँ, उसे पुष्ट एवं दिव्य ना बनाएँ तो व्यक्ति भीतर की यात्रा मेँ नहीँ उतर सकता इसीलिए आचार, व्यवहार, भोजन, यम, नियम ये सब आचरण इसीलिए तो बताए जाते है ताकि आप उन्हेँ साधकर अपने आप को एक विराट वृक्ष बना सको । जब साधक साधना क्षेत्र मेँ पदार्पण करता है तो अपने आप को बहुत लघु पाता है क्योँकि देह के साथ मन भी जुडा रहता है । मन तरह-तरह की दुर्भितियोँ से ग्रसित है, अनेकोँ भावनाओँ के अधीन है अतः उस मन के साथ देह का सम्बन्ध होना देह को अपनी विराटता का बोध प्रदान करवाने का अवसर ही प्रदान नहीँ करता ऐसे मेँ साधक का कर्तव्य है कि वो गुरु द्वारा प्रदत्त मार्ग पर योगाभ्यास करेँ, हठयोग करेँ, तप करेँ ताकि वो अपने आप को तराश सके । इस परंपरा की सबसे बडी जो विशेषता है वो यही तो है कि एक ओर जहाँ हम अपने शरीर को तराश रहे है वहीँ साथ ही साथ अन्तः तलोँ पर आप मन और बुद्धि को भी साथ ही साथ तराशते चले जाते है । साधना की कोई भी शैली या रीत हो, यहाँ तक कि भजन-किर्तन भी करना हो तो नाम-सुमिरन करने के लिए भी आपकी देह वो भली प्रकार स्वस्थ तथा सुंदर होनी चाहिए । अपनी काया को भली प्रकार सुव्यवस्थित रखने का रास्ता अपना-अपना हो सकता है किन्तु मूलरुप से यह तथ्य साधक की समझ मेँ आना चाहिए कि शरीर एक दिव्य ब्रह्माण्ड है; जितना विशाल, जितना अनन्त ये बाह्य विशाल ब्रह्माण्ड है उतना ही हमारे भीतर का ब्रह्माण्ड भी विशाल और अनन्त है । बाहरी ब्रह्माण्ड से हम शक्तियाँ प्राप्त कर बाह्य जगत की वस्तुओँ को जोडकर हम भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्रियोँ का निर्माण करते है; उसी प्रकार भीतर के ब्रह्माण्ड से भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियाँ और सामग्रियाँ एकत्रित कर हम विराट विश्व को अपने भीतर समझ सकते है और अपनी शक्तियोँ के माध्यम से अपनी अनन्त यात्रा तक गति प्राप्त कर सकते है किन्तु देह का शोधन प्रत्येक साधक को करना ही होगा क्योँकि देह और इसकी माया बडी विचित्र सी है । यदि हम इस देह के साथ थोडी जोर-जबरजस्ती करे तो ये देह हमारे साथ मित्रता का सम्बन्ध निभाती है किन्तु यदि इस शरीर को हम सुख मेँ, आराम मेँ और आनंद मेँ रखने की कोशिश करते है तो यही शरीर हमारे साथ शत्रुता निभाना शुरु कर देता है अतः शरीर के साथ मित्रवत् व्यवहार कम से कम करना चाहिए । मूलरुप से कहने का तात्पर्य ये है कि हमेँ आलस्य और प्रमाद का त्याग कर योगाभ्यास के चरणोँ मेँ उतरना चाहिए । देह कौशल के माध्यम से हमारे भीतर गहरे तलोँ तक परिवर्तन आता है, जैसे एक व्यक्ति जिस प्रकार के व्यायाम, जिस प्रकार का भोजन अथवा जिस प्रकार के वातावरण मेँ रहता है उसका प्रभाव उसके व्यक्तित्त्व, मन, शरीर, बुद्धि सब पर पडता है और अन्ततः यही परिवर्तन जब धीरे-धीरे हमारे भीतर देह के सूक्ष्म अवयवोँ तक पहुँच जाते है तो वही आगे सन्तानोत्पत्ति के समय अपना गुण उत्पन्न करते है, तब जो सन्तान उत्पन्न होती है उस सन्तान के भीतर कुछ गुण स्वतः ही विद्यमान होते है, वे गुण हमारे ही द्वारा पूर्व मेँ निर्मित किये गये है । अतः हमेँ दिव्य साधनाएँ, योग और देह-कौशल की क्रियाओँ को भली प्रकार सीखना होगा क्योँकि जब हम इस प्रकार देह-शोधन करते है, प्रकृति के मध्य रहते है और स्वच्छ प्राणवायु. स्वच्छ अन्न, स्वच्छ जल इन सब का सेवन करते है, बीजमन्त्रोँ से अपने मस्तिष्क का शोधन करते है तब अनेकोँ रोग नष्ट होते है । हम अपने भीतर स्वच्छता, तीव्रता और पवित्रता जैसे गुणोँ को धारण करते है । धीरे-धीरे ये गुण देवत्व का स्वरुप धारण करते है और क्रमशः हमारे देह के भीतर सूक्ष्म तलोँ तक प्रविष्ट हो जाते है । ऐसी स्थिति मेँ जब कोई योगी, साधक, पुरुष या स्त्री सन्तानोत्पत्ति करती है तो वे गुण सहज ही सन्तान तक पहुँचते ही है । इस प्रकार मानव के भीतर देवत्व का उदय होता है । तो देह-कौशल मात्र स्वयं के लिए ही अवश्यक नहीँ अपितु आनेवाली मानव-सभ्यता और भविष्य के लिए भी नितान्त आवश्यक एवं अनिवार्य तत्त्व है । हम देह-कौशल को प्रमुख आठ भागोँ मेँ बाँटते है, इन भागोँ का एक-एक जो प्रखण्ड है अपने भीतर विशेषतया अनेकोँ रासायणिक परिवर्तनोँ को लिए हुए रहता है किन्तु यह ज्ञान गुढतम है इसीलिए प्राचीन काल मेँ हठयोगी अधिकतया देह-कौशल के प्रयोग किया करते थे । कभी महिनोँ भूखे रहना, कभी काँटोँ पर समाधि लगा लेना, कभ साँस रोककर भूमि के भीतर कई दिनोँ तक ध्यानस्थ रहना, कभी अत्यन्त शीतल वातावरण को सहना ये भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग हठयोग का एक अंग बन गये अपितु हठयोग का तात्पर्य जिद करना नहीँ होता ! लेकिन हठयोग का देह कौशल के साथ संबंध अवश्य है । किन्तु ये अभ्यास, यह साधना मूलरुप से कैसी है यह हमेँ जानना चाहिए क्योँकि जब हम हठात् अपनी मूढ बुद्धि से इन प्रयोगोँ को करते है तो वे व्यर्थ जान पडते है; अतः हमेँ दिव्य गुरु के आश्रय मेँ रहकर इस दिव्य ज्ञान को पुनः अर्जित करना होगा । हमेँ संरक्षण करना होगा इस दिव्य पद्धति का ताकि चिकित्सीय और मानवीय जगत मेँ एक क्रान्ति पुनः प्रविश्ट हो सके, मानव जीवन मेँ उल्लास, आनंद, दिव्यता आ सके । इन सभी आठोँ अंगो का अध्ययन करना होगा, साथ ही हमेँ आनेवाली पीढी को यह दिव्य ज्ञान आगे देना होगा, तभी हम स्वस्थ और सुन्दर विश्व की परिकल्पना कर सकेंगे । देह कौशल ध्यान मेँ उतरने की एक सुन्दर सीढी है । जिस प्रकार कोई व्यक्ति किसी सुन्दर मन्दिर मेँ प्रविश्ट होने के लिए उसकी सुन्दर सीढियोँ पर धीरे-धीरे कदम रखता हुआ ऊपर चढता जाता है, ठीक उसी प्रकार जब हम देह कौशल के आठोँ अंगोँ को समझ लेते है तब भीतर उतरना कितना सहज...कितना सरल हो जाता है ! हम रुपान्तरित हो जाते है ! सच्चा रुपान्तरण अब शुरु हो जाता है और ये रुपान्तरण "स्थायी रुपान्तरण" है, हम इस रुपान्तरण को अपनी अगली पीढियोँ तक दे सकते है । हम मानव को और दिव्य, और स्वस्थ, और ह्रष्टपुष्ट, और ओज से भरा हुआ बना सकते है । अपने आप को इस दिव्य रीत से बांधना, इस वैली मेँ उतारना कितना सुखद एहसास है ! तो जीवन पूर्ण एवं सफल बन सकेगा । अपने भीतर की क्रान्ति को जागृत करने का एक अवसर देना चाहिए ।
हमारे भीतर लय, सुर, ताल, संगीत सब है किन्तु वो हम से ही छिपा है; हम स्वयं अपने आप से ही बेगाने से है । तो हम किस प्रकार अपने आप को जान पाएँ उसकी पहली सीडी है देह कौशल अर्थात् अपने शरीर को जानना, समझना और उसे स्वस्थ तथा सुंदर बनाने का प्रयास करना । प्राचीन ऋषि परंपरा मेँ प्रत्येक साधक के लिए इसीलिए योगाभ्यास नितान्त अनिवार्य था क्योँकि देह का ह्रष्टपुष्ट होना मस्तिष्क के तंतुओँ का ह्रष्टपुष्ट होना चेतना को अनंत बनाने मेँ सहायक होता है । योग ने छोटे-छोटे आसनोँ को जोड-जोडकर विशेष-विशेष प्रकार की पद्धतियोँ का निर्भाण किया; इन्हीँ पद्धतियोँ से जुडकर प्रत्येक साधक देह कौशल प्राप्त कर सकता है । साधारण व्यायाम और देह कौशल मेँ ये अंतर है कि साधारण व्यायाम जल्दी-जल्दी और अव्यवस्था से किया जाता है किन्तु योग मेँ प्रत्येक आसन धीमी श्वास, लय, गति, ताल और बीजमन्त्रोँ के साथ किया जाता है; साथ ही ह्रदय मेँ पवित्रता, देवत्व, ईश्वरत्व का भाव समाहित रहता है; साधक भी स्वयं को मानवीय तलोँ से ऊपर पाता है; तब ये व्यायाम न होकर दिव्य आसन हो जाते है, जिस से देह कौशल का प्रादुर्भाव होता है । आप जहाँ भी रहे अपने आप को देह कौशल से जोडे रखेँ । देह के भीतर होनेवाले अनेकोँ परिवर्तनोँ को आप स्वयं संचालित कर सकते है । आप धारणा, इच्छाशक्ति, संकल्प, सूक्ष्म व्यायामोँ, योगासनोँ तथा अलग-अलग परंपराओँ के माध्यम से अपने भीतर के विकास को स्वयं प्रभावित कर सकते है; भीतर हो रहे परिवर्तनोँ पर आप स्वयं अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकते है । देह को कैसे चलना है, देह के भीतर किन परिवर्तनोँ की आवश्यकता है, देह को किस तत्त्वोँ की आवश्यकता है ये सब चुनाव आपके भीतर ही होना चाहिए और इस प्रक्रिया को ठीक रखना ही समस्त रोगोँ से मुक्त रहना है । बहुत से रोग हमेँ सिर्फ इसलिए ग्रसित करते है क्योँकि हम इन्हेँ अपने भीतर आने का अवसर प्रदान करते है । यदि हम संक्षिप्त व्यायाम नित्य करेँ, देह कौशल मेँ उतरे तो आप पाएँगे कि थोडी जटिलता तो है, शरीर के साथ कुछ जबरजस्ती भी करनी ही पडेगी; इसके लिए आलस्य-प्रमाद का त्याग भी करना होगा किन्तु यही परंपरा आपको दिव्य और रोगमुक्त बना देती है; चाहे वो रीड की हड्डी होए, चाहे गरदन की, चाहे आपके बाजु होँ अथवा आपका चेहरा या जांघे सब जगह जब तक कंपन उत्पन्न न हो जाए, जब तक रक्त का प्रवाह न पहुँच जाए तब तक व्यायाम या देहकौशल को भली प्रकार हुआ नहीँ जानना चाहिए । देह कौशल मेँ श्वास की गति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । हमेँ बहुत सहज गति से धीरे-धीरे श्वास को लेना और छोडना होता है । हम किस प्रकार श्वास के लय को समझेँ ये अभ्यास गुरु के सानिध्य मेँ करना चाहिए; साथ ही यदि हम अभ्यास मेँ बीजमन्त्रोँ का संपुट देँ तो यह घटना क्रान्तिकारी स्वरुप धारण कर लेती है । मस्तिष्क के दिव्य तन्तुओँ मेँ तीव्र विद्युत प्रवाहित होने लगती है और नये विचारोँ और नये तन्तुओँ का स्फुरण होने लगता हैः विश्व नया सा जान पडता है और ऐसी दिव्य देह ही अध्यात्म के विराट ज्ञान को समझ सकती है । ज्ञान को दो भागोँ मेँ बाँटा गया : एक विद्या, दुसरा अविद्या । विद्या वो जो आपको इस जगत से पार ले जाकर सत्य को उपलब्ध करवाएँ । अविद्या वो जो आपको इस जगत का ज्ञान और इस मायारुपी प्रपञ्च मेँ उलझाकर उस प्रपञ्च का सार प्रदान करेँ । किन्तु ज्ञान तो ज्ञान ही है, चाहे वो विद्या हो अथवा अविद्या; दोनोँ की प्राप्ति देह कौशल के बिना संभव नहीँ । किसी भी प्रकार के तप, साधना, मन्त्रजप, हठयोग सब के लिए देह को साधना अत्यंत आवश्यक बताया गया । शास्त्रोँ ने तो यहाँ तक कहा कि मनुष्य देह करोडोँ योनियोँ के पश्चात प्राप्त होती है इसलिए हमेँ इस देह की अमूल्यता को समझना होगा । हम विश्राम, आलस्य और प्रमाद तक ही सीमित न रहे, इस से मानवजाति का अनिष्ट होने की संभावना है क्योँकि मानव जितना कर्मठ कर्मशील, पवित्र और दिव्य होगा उसके भीतर वो परिवर्तन स्थायी होते चले जायेंगे । - ईशपुत्र