रविवार, 24 नवंबर 2019

क्षितिज न आवे हाथ
संत, योगी यति, संन्यासी, गुरु सभी का एकमात्र प्रयास है कि तुम साधना करो क्योँकि साधना से तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप क्षण मेँ नष्ट हो जाते है । शब्द आया है "क्षण मेँ" ! एक व्यक्ति था । उसने जीवन मेँ कभी भी अच्छा कार्य नहीँ किया ! वो बहुत ही अनैतिक व्यक्ति था, परम हिंसावादी था । वो डाकु बन गया और एक गाँव से दुसरे गाँव जानेवाले राहगीरोँ को लूटा करता था । यही उनकी दिनचर्या थी । ऐसे व्यक्ति के भीतर एक दिन परमात्मा को जानने की ललक किसी संत ने जगा दी । दरसल हुआ योँ कि उसी जंगल के मध्य मेँ से किसी योगी को गुजरना था, तो योगी तो अपनी मस्ती मेँ चलते हैँ । गाँववालोँ ने योगी को खुब समजाया कि, "बाबा ! देखो इधर से मत जाना क्योँकि गलती से तुम उस डाकु के हाथ मेँ पड गये तो तुम्हारे पास तो पहले ही कुछ नहीँ है तो क्रोध मेँ आकर वो तुम्हारा वध अवश्य कर देगा ।" लेकिन योगी भी अपनी मौज के मतवाले होते है । वे तो सृष्टि के प्रपंच को जाननेवाले होते हैँ । भला उनके लिए जीवन-मृत्यु का भय कहाँ अपनी स्थिति रखता है ? ये सब वस्तुएँ तो उसके सामने गौण होती है । वैसे ही वे परम दिव्य योगी ये जानने के बाद कि वो उनका वध कर देगा, वे उसी वन के मार्ग से होते हुए गुजर रहे थे । अचानक उस डाकु नेँ उसे आते देखा तो उसे उसने पकड लिया और कहा कि, "तुम्हारे पास जो कुछ है तुम मुझे दे दो ।" तो जोगी के पास एक कमण्डल था, उन्होने उसे वो पकडाया; कहा, " लो मेरे पास मात्र यही है ।" तो डाकु ने उसे ले लिया तो जोगी नेँ कहा, "देखो सावधान ! इस कमण्डल को रखने के बडे नियम है, बडे प्रपंच है, इसे हर कोई धारण नहीँ कर सकता ।" डाकु ने बडी-बडी मूछोँ को ताव देते हुए पूछा, "तू किसे डराने की चेष्टा कर रहा है ? और मैँ तेरी बातो मेँ नहीँ आनेवाला । तू भाग जा । मुझे तुम पर दया आ गयी है ।" वास्तव मेँ उसे कोई दया नहीँ आयी थी, वो योगी का प्रभाव, उसके भीतर की शक्ति का प्रभाव था कि उसके अंदर का हिंसक जानवर भी अहिंसक हो उठा था । उसके भीतर भी कहीँ प्रेम खडा हो गया था । तो योगी की बात पर उसने योगी को आँखे दिखाई तो योगी निर्भय रहते हुए पुनः बोला, "अगर तुम इसके नियम नहीँ अपनाओगे तो हानि तुम्हेँ अवश्य होगी ।" तो हानि के भय से वह पूछने लगा कि, "अच्छा ! चलो तुम कहते हो तो बता ही दो कि इसके क्या नियम है ?" उसने कहा कि, "जो भी व्यक्ति इस कमण्डल को अपने पास रखता है उसे प्रतिदिन एक ऐसा कार्य करना होता है जिस से वह परमात्मा की ओर थोडा सा बढ जाए ।" अब वो तो डाकु था, उसे परमात्मा से क्या लेना-देना ? लेकिन अब कमण्डल उसने ले लिया था और योगी ने कहा कि, "जो चीज मैँ तुम्हेँ एक बार दे चूका हुँ मैँ उसे वापिस नहीँ लेता ।" और ठाकु को इस बात का पता चला तो वो घबराया, उसने कहा, "मैँ परमात्मा को नहीँ मानता और तुम्हारे इन झंझट मेँ मैँ क्योँ पडुँ ? अपना कमण्डल पकडो और यहाँ से चलते बनो ।" लेकिन योगी ने कहा, "नहीँ ये कमण्डल अब मैँ तुम्हे दे चूका हुँ, अब मैँ किसी भी कीमत पर इसे वापिस नहीँ लुँगा और तुम्हेँ इसका जो नियम है वो मानना ही पडेगा, इसकी मर्यादा रखनी ही पडेगी और योगी की बात मेँ वो सम्मोहन, दिव्यता और गंभीरता थी कि उसे जुकना ही पडा । वो योगी तो चलते बने वहाँ से लेकिन फिर वह डाकु इस बात की चेष्टा मेँ प्रतिदिन रहता कि मैँ एक भला काम कर लुँ ताकि परमात्मा की ओर जा सकुँ और फिर वो इस बात की खोज करने लगा कि कौनसा माध्यम है जिसके द्वारा परमात्मा की ओर जाया जा सकता है और ऐसे पता करते करते एक दिन उसे पता चला कि गाँव मेँ कोई श्रेष्ठ भक्त आ रहा है, कोई भागवत का कार्यक्रम है । जिस समय भागवत हो रहा था तो वो डाकु अपने घोडे पर आया और उसने भागवताचार्य को एक हाथ से उठाया और घोडे पर बिठाकर जंगल मेँ ले गया । जंगल मेँ ले जाकर उसने पूछा कि, "देखो, डरने की कोई जरुरत नहीँ है । मैँ तुम्हेँ मारुँगा नहीँ मैँ तुम्हेँ वहीँ जाकर सुरक्षित छोड दुँगा किन्तु ये बताओ कि परमात्मा को पाया कैसे जा सकता है ?" अब भागवत का जिसने अध्ययन किया है भगवान तो उसके रोम-रोम मेँ बसा है और भागवताचार्य वो जिसने भगवान को भीतर उतार दिया है और उसका वह विवरण दे रहा हो । तो ऐसे दिव्य भागवताचार्य ने उसे बताया कि, "तुम तप करो, तुम ध्यान करो और भीतर उतरो ।" और उन्होनेँ उसे एक प्रणाली दी और एक पद्धति प्रदान कर दी और गुरुमन्त्र दे दिया । उसे परमात्मा के पथ पर दीक्षित कर दिया और एक क्रान्ति घटित हुई । भागवताचार्य को वापिस गाँव मेँ छोड दिया गया और वह डाकु एक सुमसान पर्वत पर चला गया, जहाँ पर मानवोँ का आवागमन बहुत दुर्लभ था । ऐसे पर्वत पर जा कर उसने अपनी साधना, अपना तप प्रारंभ कर दिया और वो अपना आत्मनिरीक्षण करता रहा । उसने देखा कि, आज मुझे दस दिन तप करते-करते हो गये है लेकिन मैँ हुँ अभी भी डाकु ही, आज एक माह हो चूका है लेकिन मै हूं अभी भी डाकू ही और जन्मो जन्म के पाप और इस जन्म के पाप मेरे साथ ही है, आज 4 माह हो चुके हैं लेकिन मैं हूं अभी भी डाकू ही, आज 1 वर्ष, 2 वर्ष, 5 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन हूं अभी भी मैं एक डाकू ही लेकिन कितनी महान बात थी कि, 8 वर्ष बीत गए और वह डाकू इसी पर्वत पर उस भागवताचार्य के बताएं तप को लगातार एकजुट भाव से करता रहा और बीच में क्रांति घटित हुई! अचानक उसे समाधि का बोध हुआ! समाधि के कपाट उसके लिए खुल गए! वो उस समाधि के द्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ और उस अलौकिक ब्रह्मांड को जानना उसने प्रारंभ कर दिया, वो परम विराट में जाकर खो गया उसके जन्मोजन्म के पाप क्षण मात्र में नष्ट हो गए! अगर किसी कालकोठरी में 25000 वर्षों से लगातार अंधकार है तो क्या जैसे ही उस कालकोठरी का किवाड़ खोला जाएगा तो प्रकाश को भीतर आने के लिए भी 25000 वर्ष लगेंगे? बिल्कुल नहीं। जैसे ही किवाड़ खुलेगा तुरंत अंधकार गायब और प्रकाश हो जाएगा। अमावस्या की रात्रि में जब कहीं कोई प्रकाश नहीं है, सर्वत्र अंधकार है, आकाश भी बादलों से आच्छादित है; ऐसे वातावरण में जब प्रकाश का कहीं नामोनिशान नहीं है; आप एक दिए को जलाते हैं तो क्या दिए को जलाते ही अंधकार नष्ट ना होगा? जैसे ही दिया जलेगा अंधकार तो उसी समय नष्ट हो गया! वैसे ही आपको तथ्य समझना होगा! उसी प्रकार जैसे ही परमात्मा का तुम्हें बोध होगा, तुम्हें ज्ञान मिलेगा तुम्हारे जन्म जन्मांतर के पाप तो स्वतः क्षणमात्र में नष्ट हो जाएंगे, देरी कहां है? तुम क्यों अपने आप को अंधकार में रख रहे हो? तुम क्यों इस तरह की मनघड़ंत बातें घड लेते हो?और ध्यान रहे, ये करना भी तुम्हारा खुद का है, तुम ही घड़ रहे हो; इसका भी कारण है, वो है तुम्हारा आलस्य, तुम्हारा जगत के प्रति खिंचाव । इस जगत ने तुम्हें अपनी और इतना खींच कर रखा है, इतना आकृष्ट कर के रखा है कि तुम इस जगत को त्यागना ही नहीं चाहते। जो चीज तुम्हें पसंद ना हो उसे ना करने के लिए तुम बहुत से बहाने खोज लेते हो। विद्यार्थियों में एक आदत होती है कि वह सुबह जल्दी नहीं उठ पाते। तो ऐसे विद्यार्थियों को यदि आप पूछेंगे कि, "तुम सुबह जल्दी क्यों नहीं उठते? क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त में उठने से तो स्मरण शक्ति बढ़ती है, तुम्हें आसानी से याद हो जाएगा।" तो वो कहेंगे, "नहीं, मुझे सुबह याद नहीं होता! मुझे रात को याद होता है इसलिए मैं रात के 11-12 1:00 बजे तक बैठ सकता हूं लेकिन प्रभात में नहीं उठ पाऊंगा।"
वास्तव में ऐसी कोई भी बात नहीं है कि रात्रि में उससे अधिक याद होने वाला है। प्रभात में उससे दुगना होगा और होगा ही यह सत्यता है। लेकिन वह सुबह उठना नहीं चाहता इसलिए उसने बहाना बना लिया है।
बस उसी प्रकार यह सब बहाने तुमने बना रखे हैं परमात्मा की ओर नहीं जाने के। कि मैंने जन्मो जन्म से पाप किए हैं तो जन्मो जन्म अब इन पापों को नष्ट करने में लग जाएंगे तो परमात्मा को प्राप्त करते-करते बहुत देर लग जाएगी। और तुम बहाना निकालते हो कि यह मेरे बस की नहीं है और अब यह मुझसे नहीं होने वाला इसलिए मैं साधना क्यों करूं? मैं तप क्यों करूं? मैं भक्ति क्यों करूं?
तुमने अपने आप को बचाने के बहुत से बहाने ढूंढ रखे हैं। लेकिन गलत गलत ही होता है। असत्य असत्य ही होता है। उसका आधार नहीं होता, वह निराधार होता है। उसी प्रकार आप का प्रश्न निराधार है।
मन की मूढ़ताओं से सावधान रहना, ये मन बहुत चालाक है!साधना से, तप से तुम्हे विमुख करने के लिए कोई ना कोई माध्यम, कोई ना कोई बहाना ढूंढ लेगा।
- महासिद्ध ईशपुत्र

रविवार, 13 अक्टूबर 2019

कर्म और साधना-भक्ति-तपस्या-पूजा
बहुत से लोग सोचते है जो धर्म पर विश्वास करते हैं की अब तो कर्म करने की कोई जरूरत ही नहीं क्योंकि अब तो भगवान् की पूजा कर ही ली है, सब अपने आप हो जायेगा, वैसे भी जो करता है वो तो भगवान् ही हैं। तो "ईशपुत्र" कहते हैं की ऐसा विचार ही पतन का कारण बनता है। अध्यात्म का सत्य निरूपण होना अनिवार्य है। कभी भी इहलौकिक कर्म का त्याग करके दिव्य कर्म तक नहीं पहुंचा जा सकता। क्योंकि वहां का मार्ग यहीं से हो कर गुजरता है। "कौलान्तक नाथ" साधक को समझाते हुए कहते हैं की भौतिक और आध्यात्मिक संसार दो नहीं हैं अपितु एक में ही दो स्थित हैं। इसलिए पूजा-पाठ, मंत्र-जाप, ध्यान-समाधी कर्म का विकल्प नहीं है। अत: चैतन्य सक्रीय साधना के रहस्य को समझना होगा। "कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज" नें विषय को स्पष्ट करते हुए क्या कहा है? प्रस्तुत है विडिओ-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

शनिवार, 31 अगस्त 2019

ईशपुत्र की विशेषता
"ईशपुत्र" की ये विशेषता है की वो कहीं भी कभी भी साधना और ध्यान की गहराइयों में उतर सकते हैं। उनके लिए स्थान और कोलाहल भी मायने नहीं रखता। जीवन की सत्य धारा के परम पथिक "कौलान्तक नाथ" साधकों के मन में इष्ट की भांति बसते हैं। लेकिन ये सब अकारण नहीं होता। इस आकर्षण का रहस्य महाप्रतिभाशाली साधक स्वयं जानते हैं। पीठ केवल अपने सम्प्रदायानुगत साधकों के निमित्त "कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज" के कुछ और चित्र प्रस्तुत करती है। आशा है साधक वृन्द के हृदय कमलों का इन चित्रों से विकास होगा और भक्ति साधना का आनंद होगा-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय।

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

विरह क्या है ?
"विरह सौभाग्य है, श्रेष्ठता है, पवित्रता है....विरह तो साक्षात् वरदान ही है...........होठों को थरथराहट आँखों को सजलता देता है.........सिसकारियों के बीच कविता उठने लगती हैं......विछोह के बीच मिलन के गीत उठने लगते हैं.....आंसुओं की झिलमिलाहट प्रिय दर्शन में सहयोगी हैं....ये एक ऐसा सौभाग्य है कि तुम्हें........मीरा.......सूर.......कबीर.......की श्रेणी में खड़ा कर पूर्णता प्रदान करेगा, विरह दुःख नहीं है....विरह शत्रु भी नहीं..."-'कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज"-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.

शुक्रवार, 3 मई 2019

क्या होती है प्रतीकोपासना ?
 प्रतीकोपासना का मतलब है "प्रतीक के रुप मेँ उपासना करना"। क्योँकि हम उस ब्रह्म की, उस भगवान की कोई मूर्ति नहीँ बना सकते, हम उसका कोई मन्दिर नहीँ बना सकते, हम उसका कोई तीर्थ नहीँ बना सकते क्योँकि वो तो इतना विराट है कि वो तो जानने मेँ नहीँ आता, जब वो जानने मेँ नहीँ आता तो उसका मन्दिर, किताबेँ, पुस्तक, ग्रंथ ये सब कैसे लिखा जा सकता है ? ये पुरी तरह से ढोंग है...लेकिन ये ढोंग तब सत्य होने लग जाता है जब आपकी बुद्धि, आपका समर्पण, आपका प्रेम उस पर कार्य करता है । क्योँ ? क्योँकि ये प्रतीकोपासना है । क्या होती है प्रतीकोपासना ? एक उदाहरण : जैसे भारत का झंडा आपने देखा होगा, तीन रंगोँवाला, तिरंगा, उसके मध्य मेँ चक्र है । इस झंडे की आन के लिए आप और हम अपनी जान तक कुरबान कर देना चाहते है ! हम मरने को तैयार है ! मर-मिटने को तैयार है ! किसके लिए ? एक तिरंगे झंडे के लिए ! आप कहेंगे, "क्या बेवकूफी है ? ये तो एक कपडे का टूकडा है, इसके लिए हम जान क्योँ देँ ?" लेकिन क्या आप ऐसा कहते है ? नहीँ । क्योँ ? क्योँकि ये आपकी और मेरी मातृभूमि का "प्रतीक" है इसलिए वो कपडे का टूकडा होने के बावजूद मेरे और आपके लिए इतना सम्मान का तत्त्व हो जाता है कि हम अपने सर कटवाने के लिए तैयार हो जाते है लेकिन उस तिरंगे को हम झूकता हुआ देखना नहीँ चाहते ! समझ मेँ आया ? ये है प्रतीकोपासना । ठीक उसी तरह हमारी मूर्तियाँ, हमारे धर्मग्रंथ, हमारे तीर्थस्थान वो भगवान नहीँ है, भगवान के प्रतीक है इसलिए हम प्रतीकोपासना करते है । - ईशपुत्र

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

अठारह पुराण
भारत की प्राचीन दिव्य संस्कृति के पदचिन्ह आपको कहाँ नजर आते है ? और उस दिव्य पदचिन्होँ के साथ साथ प्रत्येक सूचना धर्म और अध्यात्म की हम तक कैसे पहुँचती है ? और कौनसा वो तत्त्व है जहाँ हम अपनी इस अद्भुत संस्कृति की झलकियाँ देख सकते है ? वो है पुराण ! पुराण वैसे तो बेहद विकट और विराट शब्द है लेकिन एक साधारण से व्यक्ति को जिसे अभी कुछ भी नहीँ मालूम वो उसे कैसे समझ सकता है ? पुराण का अर्थ है : "पुरा" अर्थात् प्राचीन काल मेँ हुयी हुई घटनाओँ का संग्रह और विवरण । जो प्राचीन काल मेँ घटित हुआ है और जो प्राचीन काल का ज्ञान है उसे संकलित कर एक साथ एक स्थान पर उपलब्ध करवा दिया गया है और जिस ग्रंथ मेँ, जिस पुस्तक मेँ, जिस परंपरा मेँ उसे रखा गया उसे पुराण कहा गया । प्राचीन काल से लेकर अभी तक की सभी घटनाओँ का संकलन पुराणोँ मेँ है लेकिन पुराण तो प्रमुख तौर से अठ्ठारह कहे गये जिन्हेँ भगवान वेदव्यास नेँ रचा है और पुराणोँ के भीतर क्या है ? ये अलग अलग पुराण का अपना अलग अलग विषय है । मार्कण्डेय पुराण, अग्नि पुराण, स्कंद पुराण, वराह पुराण, कूर्म पुराण इस प्रकार से भागवत सहित न जानेँ कितने पुराण प्रमुख है ! जिनको अठारह कहा जाता है लेकिन इसके बाद भी उपपुराण है; लेकिन वास्तव मेँ पुराण अलिखित और अदृश्य सत्ता माने जाते है, आप कहेंगे कि ये मैँ क्या कह रहा हुँ ! जब कि स्वयं भगवान वेदव्यास नेँ तो उन्हेँ लिखवा दिया अर्थात् उन्होँनेँ देखकर उच्चरित किया और उस ज्ञान को स्वयं भगवान गजानन गणेश जी महाराज नेँ लिपिबद्ध किया है तो सब के सब पुराण तो लिखित हुए, लेकिन ये बात भी थोडी सी अधूरी है ! हालाँकि वेदव्यास भगवान नेँ जिनको बादरायण भी कहा जाता है उन्होनेँ पुराणोँ की रचना की, पुराणोँ को लिखा और हमारे सम्मुख आज पुराण है; लगभग 35 या 36 से भी अधिक और कुछ "गुप्त कुल" के पुराण है जो प्रकट नहीँ किये गये, अगर सबको मिलाया जाये तो तकरीबन वो 61 के करीब या 66 के करीब पुराण उपलब्ध होते है लेकिन हैरानी की बात ये है कि पुराण वास्तव मेँ अलिखित होते है और ये परंपरानुगत ज्ञान आपको तब मिलता है जब आप सिद्धोँ की कौल परंपरा से जुडते है, प्राचीन परंपराओँ से जुडते है तब आपको इस वास्तविकता का ज्ञान होता है । आखिर ये माजरा क्या है ? आखिर ये रहस्य क्या है ? आखिर इसके पीछे का राज क्या है ? वो ये है कि भगवान वेदव्यास जिन्हेँ "वेद-व्यास" कहा जाता है वो एक व्यक्तिविशेष नहीँ है अपितु अनेक व्यास अनेक मन्वंतरोँ मेँ उत्पन्न होते है जो धर्म को, पुराणोँ को अपने हिसाब से मानवता के लिए और इस सृष्टि के लिए प्रस्तुत करते है तब इन पुराणोँ की रचना होती है लेकिन ये पुराण कहाँ से आते है ? और पुराणोँ का मौलिक ज्ञान क्या है ये जानना और समजना बेहद जटिल है, इसे मैँ थोडा और अधिक खोलकर बताता हुँ कि आखिर इस प्रपञ्च को तुम कैसे समझोगे ! सबसे पहले पुराण की साधारण परिभाषा कि, "पुराण का अर्थ है वो घटनाएँ जो भूतकाल मेँ घटित हो चूकी है और वो सारी विद्याओँ का संकलन जो प्राचीन काल मेँ निहित थी उन्हेँ एक ग्रंथ के रुप मेँ या एक कृति के रुप मेँ या एक संकलन के रुप मेँ सहेजकर रखना पुराण कहलाता है ।" इस बात को तुम समझ गये ! अब इस बात को समझो ये दुसरा पहलू कि वो जो प्राचीन ज्ञान है वो कौनसा ज्ञान है ? क्या वो राजाओँ के वंश की कहानी है ? क्या वो सृष्टि की उत्पत्ति की कहानी है ? क्या वो राजकुमारो का विवरण है ? या फिर वो अवतारोँ के विवरण के लिए पुराणोँ की रचना होती है ? हालाँकि तुम यदि पुराण टटोलोगे तो उसमेँ नैमिषारण्य मेँ बैठे हुए ऋषिओँ का संवाद, सूत जी-शौनक जी का संवाद, अथवा मार्कण्डेय ऋषि के द्वारा कुछ उद्धत किया गया है, अग्नि के द्वारा अग्निदेव स्वयं कुछ कह रहे है, विष्णु भगवान कुछ कह रहे है, देवी माँ कुछ कह रही है, देवता कुछ कह रहे है इस प्रकार के प्रसंगोँ का बृहद् और अद्भुत सा विवरण है लेकिन ये केवल इतना ही पुराण नहीँ है ! पुराण इन रहस्य कथाओँ का संकलन अवश्य है लेकिन उसे समझना बेहद जटिल और दुरुह है इसलिए जहाँ सिद्धोँ की बात हम करते है, जहाँ कौलमत की हम बात करते है, जहाँ भारत की प्राचीनतम परंपराओँ की हम बात करते है वो आज भी कहता है कि, "पुराण अप्राप्य है, पुराण गोपनीय है, पुराण रहस्यमय है इसलिए सभी के सभी पुराण अभी तक अप्राप्य ही कहे जाते है !" हालाँकि ये बहुत ही अद्भुत बात हो जायेगी क्योँकि मैँ स्वयं पुराणोँ का प्रशंशक हुँ और मेरे पास भी पुराणोँ की आधुनिक प्रतिलिपियाँ है और मैँ उन्हेँ सहेजकर रखता हुँ और वास्तव मेँ उन पुराणोँ के भीतर जो ज्ञान है वो वास्तविक पुराणोँ जैसा ही है लेकिन फिर भी यही माना जाता है कि, ये वो पुराण नहीँ जो पुराण वास्तव मेँ हमारी परंपरा के पुराण थे ! तो जो उपलब्ध पुराण है और जो वास्तविक पुराण है उसके भीतर क्या अंतर है ? उन दोनोँ के मध्य क्या अंतर है ? हम उन्हेँ क्या समजेँ ? तो क्या इन पुराणोँ को हम ठुकरा देँ ? और कहेँ ये गलत है ? ऐसा तो नहीँ हो सकता । ऐसा कहना घोर अपराध होगा क्योँकि पुराण जो अभी तुम्हारे पास उपलब्ध है वो स्वयं भगवान वेदव्यास द्वारा रचित है, वो गलत नहीँ है और ना ही मैँ ये कह रहा हुँ कि वो गलत है लेकिन हमेँ उन्हेँ समजना होगा कि मैँ आखिर कहना क्या चाहता हुँ ।
दरसल मैँ ये समजाने की कोशिश कर रहा हुँ कि जो हर युग मेँ, हर कल्प मेँ अलग-अलग मन्वंतर मेँ अलग-अलग वेदव्यास पैदा होते है वो उस युग के अनुरुप उन चीजोँ का संकलन करके हमारे सम्मुख हमेँ प्रस्तुत कर देते है या परोस देते है जो हमारे युग के और हमारे कालखण्ड के अनुरुप होती है और जो हमारे समय मेँ पहले घटनाएँ घट चूकी है उनको और धर्मदर्शन को, नैतिकता को और मन्त्रोँ को, कर्मकाण्ड को, ज्योतीष को, रसायन को, पारद को, साहित्य को, ललितकलाओँ को इन सबको संजोकर के वो एक पुस्तक का, एक लयात्मकता का, एक ग्रंथ का, एक रचना का निर्माण करते है जो एक पुराणविशेष के नाम से प्रकट होते है; फिर उस पुराण की कथा किसी नायक से भी शुरु हो सकती है