शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

सप्तम नवरात्र वर देंगी महाशक्ति कालरात्रि

मार्कंडेय पुराण के अनुसार सप्तम नवरात्र की देवी का नाम कालरात्रि है, शिव ने सृष्टि को बनाया शिव ही इसे नष्ट करेंगे, शिव की इस महालीला में जो सबसे गुप्त पहलू है वो है कालरात्रि । प्राचीन कथा के अनुसार एक बार शिव ने ये जानना चाहा कि वे कितने शक्तिशाली हैं, सबसे पहले उन्होंने सात्विक शक्ति को पुकारा तो योगमाया हाथ जोड़ सम्मुख आ गयी और उन्होंने शिव को सारी शक्तियों के बारे में बताया, फिर शिव ने राजसी शक्ति को पुकारा तो माँ पार्वती देवी दुर्गा व दस महाविद्याओं के साथ उपस्थित हो गयीं, देवी ने शिव को सबकुछ बताया जो जानना चाहते थे, तब शिव ने तामसी और सृष्टि कि आखिरी शक्ति को बुलाया तो कालरात्रि प्रकट हुई, काल रात्रि से जब शिव ने प्रश्न किया तो कालरात्रि ने अपनी शक्ति से दिखाया कि वो ही सृष्टि कि सबसे बड़ी शक्ति हैं गुप्त रूप से वही योगमाया, दुर्गा पार्वती है, एक क्षण में देवी ने कई सृष्टियों को निगल लिया, कई नीच राक्षस पल बर में मिट गए, देवी के क्रोध से नक्षत्र मंडल विचलित हो गया, सूर्य का तेज मलीन हो गया, तीनो लोक भस्म होने लगे, तब शिव नें देवी को शांत होने के लिए कहा लेकिन देवी शांत नहीं हुई, उनके शरीर से 64 कृत्याएं पैदा हुई; स्वर्ग सहित विष्णुलोक,  ब्रह्मलोक, शिवलोक व पृथ्वीमंडल कांपने लगे, 64 कृत्याओं ने महाविनाश शुरू कर दिया, सर्वत्र आकाश से बिजलियाँ गिरने लगी तब समस्त ऋषि मुनि ब्रह्मा-विष्णु देवगण कैलाश जा पहुंचे; शिव के नेतृत्व में सबने देवी की स्तुति करते हुये शांत होने की प्रार्थना की; तब देवी ने कृत्याओं को भीतर ही समां लिया; सभी को उपस्थित देख देवी ने अभय प्रदान किया । सबसे शक्तिशालिनी देवी ही कालरात्रि हैं जो महाकाली का ही स्वरुप हैं । जो भी साधक भक्त देवी की पूजा करता है पूरी सृष्टि में उसे अभय होता है; देवी भक्त पर कोई अस्त्र-शस्त्र मंत्र-तंत्र-कृत्या-औषधि-विष कार्य नहीं करता । देवी की पूजा से सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं ।

                                                             शिव ने सबसे बड़ी शक्ति को को जानने के लिए जिस देवी को उत्पन्न किया वही कालरात्रि हैं, महाशक्ति कालरात्रि स्वयं योगमाया ही हैं जो सृष्टि का आदि थी अब अंत है, उतपन्न करने तथा महाविनाश की शक्ति होने से प्रलयकाल की भाँती देवी को कालरात्रि कहा गया है, देवी के उपासक के जीवन में कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता, देवी कि स्तुति करने वाले भक्त पर देवी शीघ्र प्रसन्न हो कृपा बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए सातवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का पाठ करना चाहिए ।
पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें । आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवार्ण महामंत्र का जाप करते रहें ।

महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे ।

देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए सातवें दिन का प्रमुख मंत्र है,

मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै नम: ।।

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे 'स्वाहा' शब्द का प्रयोग करें,

जैसे मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै स्वाहा ।।

माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा हकीक की माला श्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लें ।

            यन्त्र-



यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को काले रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप, ऋतुफल व दक्षिणा अर्पित करें, कालरात्रि देवी का श्रृंगार काले वस्त्रों से किया जाता है । लाल रंग के ही फूल चढ़ाना श्रेष्ठ माना गया है । माता को वस्त्र, श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं । माता की मंत्र सहित पूजा रात्रि को ही की जा सकती है, संध्या की पूजा का समय देवी कालरात्रि की साधना के लिए विशेष माना गया है; मंत्र जाप के लिए भी शाम के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें । नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक व चौमुखा दिया जला लेना चाहिए । पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व गंगाजल के छींटे देने चाहिए, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधे व अक्षत चढ़ाएं; ध्वजा को हमेशा कुछ ऊंचे स्थान पर रखना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें । यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो, रोगी हों तो आपको सातवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए।

मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल

मंत्र को चलते, फिरते, काम करते हुए भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है । देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को नारियल, उर्द की दाल व काली मिर्च आदि अर्पित करना चाहिए; मंदिर में मीठी रोटी का भोग चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है । सहस्रार चक्र में देवी का ध्यान करने से सातवां चक्र जागृत होता है और ध्यानपूर्वक  मंत्रजप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं । प्रायश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में अदरक का रस , लौंग व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए ।

चंडिका मंत्र-ॐ नमश्चण्डिकायै ।।

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं । सातवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा समुद्र का जल लाना बड़ा पुण्यदायक माना जाता है; दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम- क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए । यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें; स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी । चाहे शत्रुओं कि समस्या हो या बार बार धन हानि होने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं । देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र - 

ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै नम: ।।
नम: की जगह यज्ञ में 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करें ।
व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें -
ॐ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरीविनाशनम् ।।

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा सातवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी कालिका शक्ति पीठ पर जाना चाहिए । देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज सातवें नवरात्र को सात कन्याओं का पूजन करें; कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ भोजन पात्र जैसे कि थाली, गिलास आदि देने चाहिए; जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी। सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहिए। सातवें नवरात्र को अपने गुरु से "सहस्रारभेदन दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन की पूर्णता को अनुभव कर सकें व वैखरी वाणी की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं । सातवें नवरात्र पर होने वाले हवन में पंचमेवा व काली मिर्च की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए । व्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं; एक समय व्रत रखने वाले सातवें नवरात्र का व्रत ठीक आठ बाबन पर खोलेंगे । व्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर व फलों का प्रसाद बांटना चाहिए । आज सुहागिन स्त्रियों को लाल, पीले व चमकीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए । पुरुष साधक भी साधारण और लाल, पीले व चमकीले वस्त्र धारण कर सकते हैं । भजन व संस्कृत के सरल स्तोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए । प्रतिदिन देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए ।

-कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

3 Comments:

संतोष मिश्रा ने कहा…

यन्त्र-
090 010 070
080 030 020
040 050 060
और
यंत्र
00 09 01
08 05 02
04 07 00
क्या दोनों 1 ही है या अलग अलग । धन्यवाद

devin12 ने कहा…

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अलग- अलग है।