गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

महायोगी जी जगत कल्याण के लिए भी हिमालय छोड़ कर नहीं आना चाहते थे

 महायोगी जी को इक्कीसवें वर्ष में "कौलान्तक पीठाधीश्वर"बनाया गया......वो भी साधना और ज्ञान में सबसे श्रेष्ट होने के कारण व अनेकों विद्याओं के जानकार होने के कारण....हालाँकि महायोगी जी जगत कल्याण के लिए भी हिमालय छोड़ कर नहीं आना चाहते थे.....वो अपने महागुरु जी सेवा में ही रहना चाहते थे लेकिन.....एक दीं महागुरु ने उनको अपने पास बुलाया और कहा कि अब तो तुम कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर हो गए हो सारे हिमालय के मालिक भी.....अब क्या इच्छा है?महायोगी जी ने कहा कि माता पिता के लिए कुछ करना चाहता हूँ.....और परिवार के साथ रहूँगा....विवाह करूँगा....और आपकी सेवा.....में हमेशा गुप्त ही रहना चाहूँगा......में नहीं चाहता कि कोई मुझे जाने.......आज जब लोग मुझे जानते तक नहीं तो भी न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं....अगर समाज में गया तो दुष्ट आत्माओं को सहन नहीं हो पायेगा.....महागुरु ने कहा.....तुम्हें कैसे पता कि समाज में दुष्ट आत्माएं हैं......महायोगी जी ने कहा मेरा अनुमान और अभी तक का साथ......गलत महागुरु ने कहा इसी भारतीय समाज में कभी में पैदा हुया था......आज तुम पैदा हुए हो......कल हिमालय किसी और को भेजेगा.....समाज दुष्ट नहीं अबोध है....जिसे हांकते हैं कुच्छ गलत हाथ.....ये हाथ हर क्षेत्र में हैं.....और अगर तुम जा कर सुधरने का प्रयास नहीं करोगे तो तुम्हारा क्या लाभ.....महायोगी जी ने कहा....गुरुदेव मैं ये सब नहीं जानता....बस मैंने जो फिसला किया है वो आपको बता दिया.....महागुरु ने महायोगी जी को समझाने कि हर संभव कोशिश कि कि तुम्हें समाज मैं जाना ही होगा...लेकिन महायोगी जी ने भी कह दिया चाहे जो भी हो जाए.......मैं नहीं जाऊंगा.....ये मेरा काम नहीं......जब बात नहीं बनी तो महागुरु ने कहा ठीक है......तुम्हारी शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुई.....तुम आज से मुक्त हो....लेकिन एक नियम हैं....जो तुमको पूरा करना है......महायोगी जी ने पूछा क्या......तो महागुरु ने कहा कि मेरी गुरु दक्षिणा.....महायोगी हाथ जोड़ कर खड़े हो गए कहने लगे गुरुदेव मेरे पास कुछ भी नहीं है......मैंने तो सब कुछ

 महायोगी जी किसी भी कीमत पर समाज में जाने को तैयार नहीं थे  
 अंततः उनको वही करना पड़ा जिसे वो नहीं करना चाहते थे  
आपसे ही पाया है...मैं भला क्या दे पाउँगा.....महागुरु बोले ये तो नियम है देना ही पड़ेगा....अंततः महायोगी को मानना ही पड़ा....महागुरु ने कहा हिमालय का सन्देश ले कर जगत में जाओ.......जिस कौलान्तक पीठ को लोग भूल चुके हैं उसकी गरिमा याद दिलाओ.....जब तुम्हे लगे कि ये काम पूरा हो गया तो लौट आना.....लेकिन कम से कम पंद्रह वर्षों तक मत लौटना.....यही गुरु दक्षिणा है......हट फिर कर वही हुआ जो महागुरु चाहते थे......चरण स्पर्श कर महायोगी अपने घर लौटे.......अपना सामान उठाया.....अपने एक मित्र से 300रुपये उधर ले कर निकल पड़े अपने "कौलान्तक पीठ" के महा अभियान में.......यहाँ महायोगी जी के बारे में केवल इतना बता सकता हूँ....वे अलौकिक है ......कहते हैं कि महायोगी जी को  पूर्व जन्म का कोई  एक अधूरा  काम भी  पूरा करना है.....जिसकी हमे कोई जानकारी नहीं कि वो क्या है....यहाँ ये बताना बहुत ही जरूरी है कि  महायोगी जी.....सामाजिकता नहीं जानते....इसलिए दुनियादारी में उलझ जाते हैं....उनको कोई भी बातों में फाँस सकता है बड़े ही सरल ह्रदय के हैं...और खुद पर खूब हँसते भी हैं...लेकिन ऐसे में ये बात हम सबको परेशां किये है कि दुष्ट लोगों से हम उनकी रक्षा कैसे कर सकते है......यहाँ ये भी बता दूँ कि सन 2008में महायोगी जी को ट्रक के नीचे कुचलने का प्रयास हो चूका है....2008 में ही उनके भोजन में फिर से विषाक्त तत्व मिला कर उनको मारने का प्रयास किया गया....लम्बे समय तक बिस्तर पर रहने के बाद ही महा योगी जी टीक हो पाए.....फिर 2009में उनको जान से मारे जाने कि धमकियाँ मिलने लगी.....2009में ही उनके वहां पर पत्थरों से हमला किया गया जिसमे महायोगी जी बाल बाल बच गए.......हिमाचल के समाचार पत्रों ने ये खबर बड़ी प्रमुखता से छापीं.....पुलिस में भी मामला दर्ज किया गया है......अब आप ही बताइए ऐसे में महायोगी जी कि रक्षा कैसे हो पाएगी.....लेकिन महायोगी निश्चिन्त हैं....उनको इन सब घटनाओं से जरा भी अंतर नहीं पड़ा.....अपने कार्यों में लगातार जुटे हैं.....सचमुच सिद्ध योगी है इसमें लेशमात्र संदेह नहीं.....आपके मन में ये प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि उन पर हमले होने का कारण क्या है.....वो है समाज के कुछ अराजक तत्वों को बुराई फैलाने से रोकना....इन बातों को आप इसी साईट के नए लिंक में पढ़ सकेंगे......लेकिन अभी तो शुरुआत है.....अभी आगे क्या होगा ये देखना है?ये उन लोगो का सौभाग्य  है जो महायोगी जी के पास रहते हैं......कि वे एक महापुरुष के साथ जी रहे हैं.......समाज के भी कुछ और लोग उनके साथ रहते तो हैं पर माया का पर्दा जो माता भ्रामरी ने ड़ाल रख्खा है उन्हें उनसे दूर रखता है....पर शिव और माता
  श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के दिव्य चरण कमलों के दर्शन
 जिन्होंने नदी नालो वृक्षों सहित हिमालय के दिव्य तीर्थों को छूआ है  
के भक्तों से महायोगी नहीं छुप पाते वे उनकी माया तोड़ कर उनको पहचान ही लेते हैं.....कौलान्तक पीठाधीश्वर के रूप में जबसे वे प्रतिष्ठित हुए है.......कौलान्तक पीठ गुप्त  रहस्यों के आवरण से निकल आया है.....आज विश्व इनके कारण ही कौलान्तक पीठ को जान रहा है......वो दिन दूर नहीं जब हिमाचल का कुल्लू क्षेत्र करोडो लोगो के आकर्षण का केंद्र हो जायेगा.....आज ही विश्व के कोने कोने तक ये सन्देश पहुंचना शुरू हो गया है.....हिमाचल के साथ साथ भारत के नाम की धर्म पाताका फिर लहरा रही है......शायद यही महायोगी जी का अति संक्षिप्त परिचय है.....मेरी आप सबसे पुनः प्रार्थना है कि.....यदि कहीं कोई गलती जाने अनजाने हो गयी हो तो आप सब मुझे करबद्ध क्षमा कर देंगे.....हिमालय के ऐसे दिव्य योगी का वृत्तांत लिख पाना या कह पाना सरल नहीं है......पर मैंने चेष्ठ कि है......में कौलान्तक पीठ कि टीम का धन्यवादी भी हूँ कि उन्होंने मुझे इस काबिल समझा कि में श्रद्देय महायोगी जी कि महिमा को चंद शब्द दे सकूँ.........ॐ नम: शिवाय.......
 -योगी लखन नाथ

सोमवार, 13 जुलाई 2020

साधना मार्ग : हिमालय में तप भाग - 1

साधना मार्ग अत्यंत विचित्र मार्ग है। यहाँ जो भी शिक्षा हम गुरु से ग्रहण करते है उसे स्वयं प्रयोगात्मक तौर पर हमें उतारना होता है। इसके लिए ये नितान्त अनिवार्य है कि हम स्वयं को तप की कसौटी पर कसे। साधना मार्ग साधक को निरंतर ऊर्जा एवं चेतना तभी प्रदान कर पाता है जब वो स्वयं इस पथ पर बढ़नेके लिए क़दम बढ़ाता है। तप का स्वरूप क्या है ? साधना का स्वरूप क्या है? ये गुह्य ज्ञान जब हम श्री गुरु से प्राप्त करते है तो उसे एकांत में हम अभ्यास पर लाने की कोशिश करते है। साधक जब सतत अभ्यास की प्रक्रिया जारी रखता है तब जाकर वो कहीं दुर्लभ मौक़े पर उस परम चेतना को अनुभव कर पाता है। प्रकृति में साधना करना ही एक श्रेष्ठतम उपाय है । साधक को अपनी बाह्य वृत्तियों का त्याग करना होता है, वो भोग विलासिता के जीवन को त्याग कर एक खोजी की भाँति निरंतर अपने मंत्र में, अपनी साधना में, अपने तप में जुटा रहे तभी वो भीतर के गहरे तलों से कुछ मोती प्राप्त कर पाता है।



साधक साधना काल में क्या करता है ये गुरु के मार्ग निर्देश पर निर्भर होता है । यदि साधक योगाभ्यास कर रहा हो, प्राणायाम के माध्यम से भीतर उतरने की चेष्ठा कर रहा हो तो ‘प्राण’ ही मंत्र बन जाते है। बस नेत्र बुंद कर पवित्र स्थान में खड़े होकर अपनी दोनों नासिकाओं से भीतर जाते स्वास को, वायु को, प्राण को अनुभव करते जाना है और भीतर जो वायु जाती है उसके साथ दिव्य पवित्रता को भीतर धारण करना है और पुनः श्वास को धीरे धीरे बाहर छोड़ते जाना है । जब हम श्वास पर लगातार नियंत्रण प्राप्त करने की कोशिश करते है तो वही साधना हो जाती है, वही प्राणायाम तप हो जाता है । साधक को निरंतर जिज्ञासु वृत्ति का होना चाहिए। एक जिज्ञासा के पश्चात दूसरी जिज्ञासा उत्पन्न हो जाए, क्रमशः तीसरी, चौथी, पाँचवी….तभी वो अनंत सूर्य के प्रकाश के रहस्यों को जान सकता है। सूर्य योगी सूर्य के प्रकाश को अपनी देह पर अनुभव करते है। एक स्थान पर खड़े होकर अपने शरीर के माध्यम से सौर मंडल से आनेवाली ऊर्जा को अपने भीतर समाहित करते जाते है। ये ठीक उसी प्रकार होता है जैसे स्याहीचूस ज़मीन पर पड़ी स्याही को चूस ले, या एक प्यासा धीरे धीरे जल को पी ले। सूर्य से आनेवाली रश्मियों को अपने देह के ऊपरी तलों (जैसे त्वचा, नेत्र) इनपर अनुभव करना है और उसका भीतर ही भीतर संग्रहण करते चले जाना है और धीरे धीरे हमारी देह इस कार्य में तल्लीन होती चली जाती है और हम सूर्य के प्रकाश के माध्यम से अपने शरीर के भीतर अथाह ऊर्जा का एक भंडार, एक कोष बना सकते है और वही कोष साधना पथ में हमें



वास्तव में तप शब्द योग के समान ही व्यापक शब्द है । अपने नेत्र आधे खोलकर और आधे बंद रखकर अपने हृदय में आनेवाले विचारों को लगातार देखते जाना, अपनी देह पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयास करना ये भी तप का एक भाग ही है क्योंकि हरेक साधक का स्वभाव भिन्न है, रूप भिन्न है, रंग भिन्न है, गुण भिन्न है, दृश्य शक्ति, श्रवण शक्ति भिन्न है अतः उसके लिए साधना पथ भी भिन्न भिन्न ही होते है। किंतु कौनसा मार्ग श्रेष्ठ है ये जानने के लिए साधक को स्वयं अनेकों प्रकार की प्रणालियों के मध्य से होकर गुझरना होता है, तब जाकर कहीं एक विशेष साधना मार्ग अथवा एक प्रक्रिया विशेष साधक को दिव्य उत्तेजना प्रदान करती है, वही उत्तेजना उसे साधना की सफलता की ओर गति प्रदान करती है। धीरज, संयम, विवेक, शांति और गुरु का आशीर्वाद नितान्त अनिवार्य है ।

महासिद्ध ईशपुत्र


बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

या श्री: स्वयं सुकृतिनां
या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

अर्थ :- जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मीरूप से, पापियों के यहाँ दरिद्रतारूप से, शुद्ध अन्त:करणवाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जारूप से निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं। देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का पालन कीजिये।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

महेंदी बदलेगी आपका भाग्य
आकर्षण, सौन्दर्य और आपका चहुँमुखी विकास हो सके इसके लिए शनिवार की सुबह मेँहदी का विधिवत् पूजन करके ही उसे हाथोँ मे धारण करना चाहिए । यदि आप नक्षत्र का चयन करना चाहते है तो पुनर्वसु नाम का नक्षत्र अत्यंत फलदायी, शीघ्र लाभ देनेवाला और उन्नति देनेवाला कहा गया है । तो पहले पंचोपचार पूजन संपन्न कीजिए धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य से; फिर मेंहदी को भस्म और कुमकुम को शहद मेँ मिश्रित करने के पश्चात जो तिलक बनता है वो पात्र मेँ चारोँ दिशाओँ मेँ तिलक लगाइए और हाथोँ और पाँव मेँ गोलाकार आकृतियाँ बनानी चाहिए अर्थात् बीच मेँ बिलकुल गोल आकृति वृत्त की वृताकार निर्मित करेँ और गोले को बीच मेँ खाली नहीँ रखना है अर्थात् जो वृत्त बनायेंगे उसे भी भीतर से मेंहदी के लाल रंग से रंग देना है । मेंहदी लगाते समय मन ही मन गणेश जी के एकदन्त स्वरुप का ध्यान करना चाहिए कि एक हाथ मेँ उन्होनेँ दाँत पकडा है और एक दाँत ही उनका है और साथ ही मानसिक रुप से लघुमन्त्र का आप जाप कीजिए, आपका लघुमन्त्र है : ॐ क्रीं भं हुं क्रौं नमो सुर सुन्दरी दैव्यै ॥ इस प्रकार से जब आप मन्त्र का जाप करेंगे तो आपकी ये मनोकामना भी मातारानी अवश्य पूर्ण करेंगी । - महासिद्ध ईशपुत्र

बुधवार, 1 जनवरी 2020

तीन वर्ष की आयु में ही महायोगी जी हिमालय की सिद्ध परम्परा में दीक्षित हो गए
जब महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज तीन बर्ष कुछ माह के हुए ही थे कि एक दिन उनके पिता जी के पास एक लम्बे कद का लम्बी दाढ़ी मूछों वाला साधू आया....और कहने लगा कि तुम्हारे घर पर एक बालक पैदा हुआ है.....जिसके बांये  पांव के अंगूठे के नीचे रेखाओं का गोल चक्र है....वो मेरा पिछले जन्म का शिष्य है....मुझे उसे देखना है......तब तक महायोगी जी के माता पिता ने भी बालक के पाँव के नीचे के चक्र को नहीं देखा था.....जब देखा तो बहुत ही हैरान हुए.....और वो साधू कहने लगा कि यह बालक उनको सौंप दिया जाये.....भला कोई माता पिता किसी के केवल इतना कहने से अपना बालक सौंप देंगे क्या?उनहोंने साधू को समझाया......लेकिन साधू नहीं माना....जिस कारण दोनों पक्षों में तनातनी हो गयी.....अंततः इस बात पर निर्णय हुआ कि बालक साधू को नहीं दिया जायेगा.......लेकिन बालक को दीक्षा दे कर साधू का शिष्य बनाया जायेगा.....ये साधू कोई और नहीं स्वयं "महागुरु कौलान्तक पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज"थे.....इस तरह तीन वर्ष कि आयु में ही महायोगी जी हिमालय कि सिद्ध परम्परा में दीक्षित हो गए....महागुरु का कोई चित्र नहीं है.....केवल एक मात्र रेखाचित्र ही है जिसकी महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज पूजा करते हैं.....यहाँ मैं वो चित्र दे रहा हूँ ताकि दादागुरु जी कि छवि का कुछ अनुमान आपको भी हो सके.....
 कौलान्तक पीठ शिरोमणि प्रातः स्मरणीय श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज
  कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के प्रथम गुरु महाराज

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

हे महादेव तू इतनी दया कर
हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
पाऊं मैं तेरा ध्यान हृदय में, ध्याऊं मैं तेरा ज्ञान।

निस दिन मैं तुझको बुलाता ही जाऊं, मिट जाए मेरी पहचान।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
मेरा मुझमें कुछ रह न पाए, तुझसी छबि मैं बनाऊं।

पागल सा बनकर मैं बढ़ता ही जाऊं, तुझको पुकारू मैं तुझको बुलाऊं।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
आगम निगम अब आंखे हो मेरी, शिव ही हो मेरे प्राण।

सब दोष गुण अब शिव को ही अर्पित, अर्पित ये मानव मान।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
गोपनीय रहस्य उजागर हो, सत्य का हो प्रकाश।

झूठे सारे असत्य संभाषण, पापों का हो जाए नाश।

हे महादेव तू इतनी दया कर, तुझमें समा सकूं।
- महासिद्ध ईशपुत्र

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

विज्ञान भैरव तंत्र परिचय

"ईश्वर सदाशिव महादेव" इस नाम में जो उच्चता है, जो गरिमा है, जो पवित्रता है वो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में किसी तत्व में नहीं। उनके अनंत नाम है और वे हिमालय के शिखरों पर विराजते है। एक और जहां हिमालय के मध्य में रत्न के समान कैलाश पर्वत चमकता है उसी प्रकार वह कैलाश पर्वत हर भक्त के भीतर उसके हृदय में, इसके आज्ञाचक्र में, ब्रह्मरंध्र और कपाल में भी स्थित है! यही विराट दिव्य कैलाश इस ब्रह्मांड के बाहर दिव्य ब्रह्मांड में भी अन्य अन्य रूपों में प्रकट होता रहता है! महादेव ज्ञान के वोे भंडार है, महादेव सृष्टि के वह प्रथम पुरुष है जहां से ज्ञान की ये अविरल धारा, ये दिव्य गंगा प्रवाहित होती है। एक ओर जहां योग है, अध्यात्म है, तपस्या है और गरिमा है वही महादेव अपने आपको इस ब्रह्मांड का नायक होने के बाद भी मनुष्य के रूप में, साधारण देह धारण करके मां पार्वती को भी उसी शरीर में आबद्ध कर के कैलाश के दिव्य शिखर पर ज्ञान प्रदान करते हैं! बहुत कम लोग ऐसे हैं जो यह जानते हैं कि, क्या महादेव ने मनुष्य शरीर धारण किया? यदि नहीं किया तो कैलाश के शिखर पर जो महादेव भस्म लगाए हुए हैं देह पर, चंद्रमा को धारण किए हुए हैं, बाघम्बर अपने शरीर पर धारण करने वाले हैं, त्रिशूल धारण करके जो मां पार्वती को ज्ञान दे रहे हैं, आगम और निगम की उत्पत्ति कर्ता वो महादेव कौन है? यह अपने आप में एक रहस्य है और इसे शायद वेद, पुराण, शास्त्र भी प्रकट नहीं करना चाहते! इस तथ्य को लेकर वह भी मौन रहना ही उत्तम समझते हैं।

किंतु प्रश्न यह भी है कि वह सदाशिव ईश्वर महादेव उस स्वरूप को कब और कैसे धारण करते हैं? क्या शिव में, महेश में, महादेव में कोई अंतर है? क्या रूद्र कोई और है और काल के नियंता महाकाल कोई और ? क्या सदाशिव कोई और है और पारब्रह्म ईश्वर कोई और? अनेकों प्रश्न है। और इनका उत्तर केवल एक है। और वह है कैलाश का रम्य शिखर। कैलाश का वह रम्य शिखर जहां साक्षात् योग माया, साक्षात जगत जननी, साक्षात सूक्ष्मा रूप में, शक्ति के रूप में सर्वत्र उपस्थित रहने वाली मां शक्ति स्वयं देवाधिदेव ईश्वर से प्रार्थना करती है और उनसे प्रश्न करती है; अपनी जिज्ञासाएं प्रकट करती है एक साधारण मनुष्य की भांति। और महादेव भी अपने पारब्रह्म वाले स्वरूप को भूलकर, अपने आप को गुरु के रूप में स्थित कर के एक एक शंका, प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करते हैं। जितने विचित्र महादेव है उतने ही विचित्र उनके अलंकरण है। जितनी अद्भुत और श्रेष्ठ मां पार्वती है, मां शक्ति है उतने ही अद्भुत उनके प्रश्न! ऐसा लगता है कि मां पार्वती आपका और मेरा प्रतिनिधित्व कर रही है! हमारे प्रश्नों को वह महादेव के सम्मुख रखती है, एक श्रेष्ठ गुरू के सम्मुख रखती है। और विचित्र अद्भुत, अवधूतेश्वर, महाकपालिक, परम तांत्रिक, परम योगी, समस्त विद्याओं को धारण करने वाले, 64 कलाओं के अधिपति, स्वयं भूत भावन महादेव समस्त प्रश्नों का उत्तर अपनी विचित्र रीति से प्रदान करते हैं !


एक अद्भुत ग्रंथ है जिसे कहा जाता है "विज्ञान भैरव"! याद रखिए यह ज्ञान भैरव नहीं है... विज्ञान भैरव। ज्ञान परिचर्चा का विषय है । मैंने आपको कुछ कहा, आपने सीख लिया यह ज्ञान है। लेकिन मैंने आपको कुछ दिया और उस प्रणाली से आपने कुछ प्राप्त कर लिया वह विज्ञान है! जो प्रयोगात्मक होता है वही विज्ञान होता है। और जो तथ्यात्मक होता है, परिचर्चा जिस पर की जा सके वह ज्ञान होता है! ज्ञान में भी कमियां हो सकती है लेकिन विज्ञान में कमी नहीं होती क्योंकि विज्ञान केवल तर्कों पर नहीं अपितु प्रयोगों पर चलता है, उसके पीछे पूरा एक गंभीर धरातल रहता है। तो प्रश्न ज्ञान के रूप में प्रकट होते हैं और उत्तर विज्ञान के रूप में दिए जाते हैं। अद्भुत ग्रंथ है विज्ञान भैरव। लेकिन क्या है विज्ञान भैरव? कौन है यह विज्ञान भैरव? वास्तव में स्वयं महादेव ही अपने आप को "भैरव" कहते हैं और मां शक्ति को "है भैरवी!" कहते हुए संबोधित करते हैं! और वही मां भैरवी.. भैरव रूप महादेव से प्रश्न करती है! किस महादेव के सहस्त्रों सहस्त्र नाम है। जिस महादेव का ना आदी है ना अंत है! जो अत्यंत प्रखरतम है! और जिनकी माया इतनी अभिभूत कर देने वाली है कि आज तक कोई मनुष्य इस धरा पर उत्पन्न नहीं हो सका जो महादेव के दिव्य स्वरूपों को जान सके! जितना जानते हैं उतना कम रहता है! जितना हम प्रयास करते हैं उतना अधूरा रह जाता है! महादेव जटा जूट थारी है, महादेव काल को संचालित करने वाली सत्ता है, महादेव आपके और मेरे भीतर है,वह सृष्टि को नष्ट करने का अद्भुत सौंदर्य तांडव के रूप में संजोकर रखते हैं! जो स्वयं नटराज है! स्वयं संगीत को धारण करने वाले हैं! जिनकी माया अपरंपार है वह स्वयं को महादेव, शिव, रूद्र, अथवा अन्य नामों से पुकारने की अपेक्षा, यह ज्यादा रुचिकर उनको लगता है, प्रतीत होता है कि उन्हें कोई "भैरव" कहे! साक्षात मां भैरवी, मां जोगमाया उनको भैरव कह कर पुकारती है।

जहां एक और पृथ्वी के कैलाश मंडल पर महादेव विराजमान है, वहीं आपके और मेरे भीतर के कैलाश मंडल पर भी वही महादेव विराजमान है! और वही महाभैरव इस ब्रह्मांड में अनेकों तत्वों के रूप में अन्य अन्य स्थानों पर भी प्रकट होते हैं!

भैरव-भयों से मुक्त जो है एकमात्र, न जीवन, ना मान अपमान, न मृत्यु, ना काल... हर तत्व से उस पार है; और वही महाभैरव अपनी शक्ति को भैरवी कहते हैं! इसी महा भैरव के द्वारा देवी को जो दिया गया वह ज्ञान नहीं है! आगम निगम में ज्ञान अवश्य दिखाई देता है लेकिन उसकी गहराई में उतर जाए तो वहां विज्ञान है! इसी कारण महादेव ने जो कहा, महा भैरव ने जो कहा वह महाविज्ञान अपने आप में "विज्ञान भैरव" बन जाता है! यह एक अभूतपूर्व ग्रंथ भी है! और प्रयोग का इतना सुंदर ग्रंथ कि महादेव देवी को ज्यों ज्यों वह प्रश्न करती है क्यों क्यों धीमे धीमे धीमे ध्यान के बारे में बताते चले जाते हैं! ध्यान के भीतर उतरकर जीवन के प्रश्नों को खोजने की और उनका चित्त प्रेरित करते हैं! महादेव देवी को ज्ञान नहीं देते! उन्हें सूत्र देते चले जाते हैं! उन्हें परंपराएं नहीं देते बल्कि उन्हें प्रयोग देते चले जाते हैं! यह एक प्राचीन विद्या है, प्राचीन परंपरा है और एक पुस्तक में 112 से अधिक ध्यान की परंपराओं, ध्यान की विधियों के बारे में स्वयं महादेव बताते हैं और देवी उस ज्ञान को धारण करती है! प्रश्न होते हैं, उसका उत्तर मिलता है, और प्रणालियां उतनी अद्भुत कि यह केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं है कि केवल पुरुष ही ध्यान में उतर जाए; स्त्रियों के लिए विशेष तौर पर एक अलग सी प्रणाली ध्यान की महादेव पार्वती माता को प्रदान करते हैं! उनके माध्यम से वह हमको, आपको, समस्त सृष्टि को प्राप्त होता है। तो वही ध्यान की प्रणालियां, वही योग की प्रणालियां, वही तंत्र की संपुटित प्रणालियां भेरवो के लिए है, भैरवियों के लिए है।

भैरव कौन? भैरवियां कौन?जिनको महादेव रूद्र से इतना प्रेम हो जाए कि वह अपने हृदय में महादेव का ही प्रतिबिंब देखने लग जाए; ऐसा ही ह्रदय अपने आप में भैरव हो जाता है! जो उस महाभैरव को देखकर कहें कि मैं भी भैरव हूं! उस शिव को देखकर कहे कि मैं भी शिव हूं! उस पार्वती को देखकर जो कहे कि मैं भी भैरवी हूं! उस पार्वती मां की झलक, उस शक्ति की झलक अपने हृदय प्रांगण में देख सके! वही भैरवी है। तो आपको भैरव और भैरवी तत्व को धारण करना है, इस हृदय को धारण करना है! और वह जो ग्रंथ है विज्ञान भैरव.. उसके भीतर की सूक्ष्म प्रणालियों को गुरु के सानिध्य में ग्रहण करना है! बेहद अद्भुत परंपराएं, रीतियां, उसके भीतर का सूक्ष्म ज्ञान आपको न जाने किस दूसरे आध्यात्मिक संसार में ले जा सकता है लेकिन उसके लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि आप के भीतर यह भैरव तत्व हो और दूसरा आपके भीतर विज्ञान नाम का तत्व भी हो! इस विज्ञान को अगर आप धारण करना चाहते हो,भीतर के इस विज्ञान को यदि आप समझना चाहते हैं तो शिव के सूत्रों को समझना होगा। शिव ज्ञान जाता है लेकिन ज्ञान धारण करने के लिए मां शक्ति बैठी है। आपको भी ज्ञान धारण करना होगा तो गुरु के चरणों में आपको बैठना ही पड़ेगा और गुरु के ज्ञान को शिव मानना होगा और स्वयं को मां शक्ति पार्वती की तरह हृदय प्रधान... क्योंकि मां पार्वती का ह्रदय ममता से भरा है, स्नेह से भरा है, प्रेम से भरा है... उसमें श्रद्धा है और समर्पण है महादेव के प्रति! आपको भी जब हृदय में इसी प्रकार गुरु के प्रति समर्पण, प्रेम, स्नेह और श्रद्धा अनुभव होने लगे तो विज्ञान भैरव के द्वार आपके लिए खुलने लगते हैं! किंतु विज्ञान भैरव का पात्र कौन? कौन पुरुष, कौन सा भैरव अपने भीतर इस विज्ञान भैरव नाम के इस दिव्य भैरव को उतार सकता है? कौन भैरव अपने नाम के आगे विज्ञान भैरव जोड़ सकता है? और कौन सा पुरुष इस पृथ्वी पर, भूमंडल पर है जो विचरण करें और समस्त संसार उसको विज्ञान भैरव के दृष्टिकोण से देखें! इसके लिए आपको अपने भीतर उतरना पड़ेगा!आपको अपने भीतर की यात्रा करनी होगी और उस यात्रा का प्रारंभ होता है विज्ञान भैरव नाम की दीक्षा से...

विज्ञान भैरव दीक्षा! एक दीक्षा तो वह है जो आपको भैरव बना देती है, एक दीक्षा वह है जो भैरव के मन मस्तिष्क के भीतर विज्ञान की दृष्टि उत्पन्न कर देती है! विज्ञान यदि ना हो तो भ्रमों का संसार है! आप ध्यान भी करेंगे तो किसी को रंग दिखाई देते हैं! किसी को सुगंध आती, है तो किसी को अमृत का स्वाद अनुभव होता है! किसी को कंप कंपी महसूस होती है, तो किसी के सभी चक्रों में स्पंदन होने लगता है... यह सभी भ्रम है, सत्य नहीं है और यदि आप इन भ्रमों में फंसे रह गए, यदि आपने इन भ्रमों को सत्य मान लिया तो आप ज्ञानी तो कहला सकते हो विज्ञानी नहीं कहलाने वाले; विज्ञान वह है जो अपने मस्तिष्क और मन के सारे तलों से उस पार विशुद्ध सत्य की ओर जाए, उसे नहीं लेना देना कि कौन सी गंध है, उसे नहीं लेना देना कि कौन सा अनुभव हो रहा है, उत्तर नहीं लेना देना कि मैं 4 घंटे या 10 घंटे समाधि में हूं, वह अपनी यात्रा जारी रखेगा और इन सभी तत्वों को असत्य के रूप में स्वीकार करेगा। विज्ञान बड़ा कठोर है, वह आपके हृदय की भावनाओं के बारे में सोचता नहीं है! आधुनिक विज्ञान से प्रेरणा लीजिए... आप आसमान में चंद्रमा देखते हो, बचपन से चंद्रमा की कहानी सुनाते हो, अपनी प्रेमिका को कहते हो तुम चांद सी सुंदर हो,बचपन में बालक को कहते हो कि यह चंदा तुम्हारे मामा है, न जाने चांद की कितनी कहानियां, चांद पर कैसी कैसी दादियां और नानियां है! लेकिन ज्यों ही आप बड़े होते हैं, विज्ञान से आप का सामना होता है तो आपकी सारी इन कहानियों को टूट जाना होगा, इनको गिर जाना होगा, इनको नष्ट हो जाना होगा क्योंकि यह चंद्रमा जो आपके हृदय में बसने वाला है, आपके हृदय में कल्पना के रूप में स्थापित है वह चंद्रमा छद्म है! विज्ञान उस काल्पनिक चंद्रमा को नष्ट कर देगा। आपको पीड़ा हो सकती है, आपके हृदय में चोट पहुंच सकती है किंतु विज्ञान इस तत्व की चिंता नहीं करेगा। वह तो कहेगा भले ही तुम पीड़ा में से गुजरो, भले ही तुम इस सत्य को न स्वीकारो लेकिन सत्य तो यही है कि यह चंद्रमा एक पिंड है और इस पृथ्वी के चारों तरफ घूमने वाला एक और छोटा लघु उपग्रह है!

आप अक्सर धर्मगुरुओं के पास, धर्मगुरुओं के सानिध्य में जाने वाले आध्यात्मिक लोगों के पास जाइए, न जाने कैसी कैसी कूड़ा करकट रूपी भ्रांतियों से भरे पड़े हैं उनके मस्तिष्क। कोई अपने आप को भगवान का अवतार मानता है, किसी को लगता है मैं ही शिव हूं, कोई अपने आप को भगवान विष्णु का अवतार बताने पर जुटा है, कोई अपने आपको कल्कि कहता है, तो कोई अपने आप को दैत्य या रावण कहने से से भी नहीं चुकता, कोई अपने आप को ऋषि मुनि बताता है, तो कोई अपने आप को दिव्य सत्ता बताता है...अजीबो गरीब किस्म के ये भ्रम मस्तिष्क में घर कर गए है। लगता है मनासोपचर की जगह मानस मानस के उपचार की आवश्यकता है...पूजन की नहीं चिकित्सा कि आवश्यकता है! मस्तिष्क के ततुओंं में न जाने ऐसे कौन कौन से भ्रम और ऐसे कौन कौन से तत्त्व और रसायन है जो अजीबो गरीब भ्रम पैदा कर देते हैं। योगी ध्यान कर रहे है और कहते है में ब्रह्मांड में गति कर रहा हूं, मेरे पांच शरीर बन गए हैं, मेरे सौ शरीर बन गए है...लेकिन शिव कहते है कि तुम्हे प्रयोग करना है उस प्रयोग में भीतर उतरते चले जाना है। विज्ञान भैरव कौन है? आप और हम विज्ञान भैरव है लेकिन कब? जब हमारे ये भ्रम जब हमारी ये भ्रांतियां एक ओर हो जाएं, हम इनसे दूर हो जाए, ये छन जाए, परिष्कृत हो जाए, संस्कारित हो जाए। अध्यात्म को छानते जाइए, भक्ति को छानते जाइए, श्रद्धा को छानते जाइए, हृदय को छानते जाइए, जिव्हा को छानते जाइए, अध्यात्म के तमाम रसों को छानते जाइए तो अंत में बुद्धि जो उत्पन्न होगी सत्यमय वह विज्ञानमय होगी।

तो आप और हम... वह सभी लोग जो शिव के भैरव है, अपने हृदय में शिव को प्राप्त करते हैं, शिव को मानते हैं और जो इस शिव की योगिनी कौल सिद्ध परंपरा से जुड़े हैं, जो कुल्लू की कौलांतक दिव्य परंपरा से जुड़े हैं, जो कौलांतक पीठ से जुड़े हैं, शास्त्र जिस कौलांतक पीठ को कुलांत पीठ कहकर संबोधित करता है; कुरुकुल्ला इत्यादि शक्तियां जिसकी नायिका है, चौसठ योगिनीयां जहां योग को प्रकट करने वाली है! एक एक योगिनी एक एक योग की परंपरा की नायिका शक्तियां है, तो 64 योग की परंपराएं उन योगिनियों ने संभाल कर रखी है और तंत्र ने उसका तांत्रिक स्वरूप सहेज कर रखा है लेकिन कितनों को आप और हम जानते हैं? इसका सा केवल वह भैरव धारण करता है जो गुरु रूपी शिव के सानिध्य में बैठकर सर्वप्रथम दीक्षा तत्व को शाक्त कुल से प्राप्त करता है...शैव कुल से नहीं! विज्ञान भैरव पुरुष प्रधान है लेकिन इसके ध्यान के भीतर जब जाएंगे...कुछ प्रणालियां केवल शाक्त प्रधान (स्त्री प्रधान) है। समझना होगा शिव अर्धनारीश्वर है, शक्ति भी स्वयं है और शिव के रूप में स्थूल भी स्वयं है! वही शिव आपके और मेरे भीतर भी विद्यमान है बस हमें उसकी यात्रा में उतरना है। विज्ञान रूपी ज्ञान प्राप्त करना है, छद्मता नहीं।

इसीलिए गुरु के पास जाकर विज्ञान भैरव दीक्षा प्राप्त करनी होगी! विज्ञान भैरव वह दीक्षा है जो आपके भीतर एक प्रणाली के रूप में बस जाएगी इसलिए उसे तंत्र का नाम दिया! तंत्र कोई खून खराबा नहीं है, कोई हिंसा नहीं है, कोई शोषण नहीं है, तंत्र एक पद्धति है! तो विज्ञान भैरव के इस तंत्र रूपी सिद्धांत को अपने भीतर दीक्षा के माध्यम से उतार लेना! शाक्ति दीक्षा आवश्यक है इसमें ! शाक्ति दीक्षा के माध्यम से आपके भीतर वह तत्व उतर जाए फिर योग को समझ लेना, 64 योग की परंपराओं को समझ लेना; की एक-एक योगिनी के पास आखिर कौन-कौन सा योग अवस्थित है, कौन सी योग की और तंत्र की वो परंपराएं है जिसकी वो नायिका शक्तियां है और क्यों शिव बिना उनका नाम लिए मां पार्वती को अत्यंत सहज सूत्र देते हैं लेकिन सहज दिखने वाले सूत्र की थाह  कितनी गहरी है! ज्यों ही दीक्षा घटित हुई त्यों ही योग की यात्रा में उतर आना, क्यों ही समाधि की ओर दृष्टिपात करना, त्यों ही कुंडलिनी को समझने की कोशिश करना, त्यों ही शिव और शक्ति को जानने के रहस्य में जूट जाना और त्यों ही विज्ञान भैरव तंत्र के अद्भुत ग्रंथ को सीने से लगा लेना! यह वह अद्भुत ग्रंथ है कि इस पृथ्वी पर महात्मा बुद्ध जैसे अवतार भी आए, उन्होंने भी विज्ञान भैरव तंत्र के सूत्र को अपना कर ध्यान के लिए उसी के सूत्र को अपने जीवन में उतारा है... हालांकि कालांतर में बहुत सारे लोग यह कहते हैं कि बौद्ध धर्म से यह सूत्र विज्ञान भैरव में आया... लेकिन याद रखिए, विज्ञान और भैरव है... भैरव याचक नहीं है; भैरव ज्ञान के किसी उपाय, किसी शैली, किसी पद्धति के याचक या उसे एकत्रित करने वाले, बीनने वाले काक अर्थात् कौवे नहीं है! भैरव सत्य के ऊपर चलने वाले, सत्य को अपने गंभीर मति से समझने वाले, और सत्य यदि समझ में ना आए तो अपने मस्तिष्क में नवीन नाड़ी तंत्र का विकास करने वाले अद्भुत शिव के गण होते हैं! आप और हम याचक नहीं है! आप और हम पुरुषार्थी है! कर्मयोग को समझने वाले हैं। इसलिए हम विज्ञान भैरव को एक नई दृष्टि से समझते हैं, हमारे भीतर विज्ञान भैरव का एक एक हिस्सा ऐसे बसा है, एक एक श्लोक, एक एक पन्ना, एक एक शब्द ऐसे बसा है जैसे हमारी इन नलिकाओं में रक्त बसा है! हम शिव की परंपराओं में पैदा होने वाले, पलने बढ़ने वाले वह नन्हे शिशु है जो युवा हो जाते है, फिर योगी बनते हैं, वृद्ध हो कर भी अपनी गरिमा को नष्ट नहीं होने देते, अपने इस विज्ञान को नष्ट नहीं होने देते,अपनी बुद्धि को भ्रमों में नहीं जाने देते! हम बाह्य आडंबरों से मुक्त है । हम विज्ञान भैरव को पढ़ते नहीं है, हम विज्ञान भैरव के सिद्धांतों को सीखते नहीं है हम उनको जीते हैं! हम गुरु से विज्ञान भैरव दीक्षा प्राप्त कर स्वयं को विज्ञान भैरव बनाने के पथ पर अग्रसर होते हैं और एक एक सांस हमारी अपने आप में विज्ञान भैरव के सूत्र है!

आपके जीवन में यह विज्ञान भैरव उतर जाए, आप यह समझ सके कि आपके भीतर भी एक स्त्री है, आप यह समझ जाए कि आपके भीतर भी एक पुरुष है, आप यह समझ जाए कि आप स्त्री और पुरुष के तत्व से भी ऊपर हो, आप किसी तत्व से भयभीत ना हो। कुछ लोग, कुछ धर्म ऐसे हैं मूर्तियों को देखकर कांप जाते हैं कहते हैं यह भगवान नहीं! और कुछ धर्म ऐसे हैं जो कहते हैं कि वह सूक्ष्म भगवान नहीं, कुछ जीवित मनुष्यों में भगवान को देखते हैं,कुछ प्रकृति के तत्वों में भगवान को देखते हैं लेकिन विज्ञान भैरव वह है जो कहीं भी भ्रमित नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से, परम प्रज्ञा से बेहद उत्तम, पवित्र, स्थिर बुद्धि से उस परम ज्ञान को समजते है, धारण करते है... इसीलिए वो विज्ञान भैरव है!

क्या आप विज्ञान भैरव हो? क्या आपके अंदर विज्ञान भैरव तत्व है? क्या आपके भीतर मां पार्वती, मां शक्ति, मां विज्ञान भैरवी आपके मस्तिष्क और हृदय में निवास करने वाली शक्ति है? जीवन में ग्रंथ केवल ग्रंथ नहीं है... याद रखिए तंत्र के ग्रंथ ग्रंथ या पुस्तकें नहीं है, कि कोई लेखक उसे लिख से और आप उसे पढ़ ले, या कोई तंत्र आचार्य या कोई तांत्रिक एक पुस्तक लिखे और कहे, "देखिए मैंने विज्ञान भैरव की व्याख्या लिख दी है और मै तुम्हे इसका उपदेश करता हूं, तुम इसे समझ जाओगे!"...गुरु का स्पर्श लीजिए ; यहां स्पर्श की अनिवार्यता है! ये तुम्हारी मनघड़ंत व्याख्याओं पर नहीं चलेगा, यहां तुम्हारे कुतर्क नहीं चलेंगे, यहां पर तुम्हारे बहाने नहीं चलेंगे! यहां को गुरु कहेगा वो तुम्हे धारण करना ही होगा। यहां जो शिव ने परंपरा दी उसको तुम्हे सत्य स्वरूप में स्वीकारना ही होगा! यहां तुम्हे इसे परंपरा के साथ इसे धारण करना होगा, तब ये ग्रंथ नहीं रहेगा, तब ये जीवित पुरुष हो जाएगा !विज्ञान भैरव तंत्र के भीतर इतने रहस्य छिपे हैं कि जानना बड़ा जटिल लगता है लेकिन परेशान होने की आवश्यकता नहीं है; गुरु शिष्य परंपरा है, मै अभी जीवित हूं! तुम भी अभी जीवित हो! मेरे बाद भी इस रहस्य को बतनेवाले हमारी परम्पराओं के पुरोधा आगे आएंगे! जिन पुरोधाओं से मैंने सीखा उन्होंने मेरे भीतर भी इसका बीज डालकर स्थापित किया था, आज अंकुरित है! आज मै चाहता हूं कि ये परंपरा मुझ तक न रहे; तुम इसे स्वीकारो, धारण करो। एक ओर भैरव जहां विकराल है वहीं सौंदर्यशाली! एक ओर जहां वो तांडव करते हैं वहीं को लास नृत्य में भी भगवती के स्वरूप के भीतर ही विद्यमान रहते हैं! जहां वो रूद्र वीणा धारण करनेवाले है, नाद और संगीत के अधिपति है, उस सदाशिव ईश्वर महादेव के बारे में मै केवल ये कह सकता हूं कि, "वही विज्ञान भैरव है!" उनके सूत्रों को समझने के लिए आपको भी विज्ञान भैरव ही होना होगा! इससे कम में समझौता होने की गुंजाइश नहीं है, संभावनाएं नहीं है; इसलिए जीवन में जितनी भी तकलीफें हो तुम्हारी मुझे नहीं पता; तुम भैरव हो लडो, पैदा ही लड़ने के लिए हुए हो; हारने के लिए नहीं। विज्ञान भैरव हो तो अपने भीतर की वीरता को जागृत रखना, अपने भयों को रोंद कर रखना और भयों से उस पार निकाल जाओ। आओ हम इस विज्ञान भैरव के एक एक पृष्ठ पर अपने आप को बिछा देते हैं! विज्ञान भैरव के एक एक शब्द को सत्य स्वरूप अपने भीतर प्रयोगात्मक रीति से उतारते है, इसे समझते हैं! मै गुरु के सानिध्य में इसे समझ रहा हूं, स्वीकार रहा हूं; तुम्हे अपने गुरु के सानिध्य में इसे समझना है! श्रेष्ठ गुरु..श्रेष्ठ शिष्य...महा भैरव.. महा भैरव के महा भैरव पुत्र... इसी प्रकार ये परंपरा आगे बढ़ रही है, बढ़ेगी। इसलिए विज्ञान भैरव को पढ़ना नहीं धारण करना! स्वीकारना नहीं आत्मसात् कर लेना! इसे गुरु से खरीद मत लेना, धारण कर लेना! आज्ञा चक्र से ब्रह्मरंध में स्थापित कर लेना, यहां से विज्ञान भैरव की शुरुआत होगी । पुस्तक से उस पार एक और विज्ञान भैरव आपकी प्रतीक्षा कर रहा है उसकी तलाश में निकल जाओ, अभी इसी समय।
- महासिद्ध ईशपुत्र

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 7


देश, काल, स्थान और स्वभाव के अनुरूप मंत्र, औषधि और तप भी भिन्न भिन्न परिणाम उत्पन्न करते हैं! इसी प्रकृति में रहकर संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जाता है! तथा उसे भोजपत्र और ताड़ पत्रों पर अंकित कर सभ्यता को दिया जाता है! और सभ्यता उन्हीं पन्नों के माध्यम से अलौकिक ज्ञान को समझने की चेष्टा करती है! हिमालय पर इनके अनेकों गुप्त स्थान होते हैं, जहां आम मानव न पहुंच सके! ऋतु परिवर्तन होने के साथ-साथ साधना का तरीका भी परिवर्तित होता चला जाता है! अक्सर योगी अपनी साधनाओं के लिए ऐसे ऐसे स्थान चुनते हैं जहां जाना बड़ा विकट हो! शीत ऋतु में योगी अपनी देह पर भस्म मल लेते हैं! हिमालयों की सीधी पगडंडियों पर चलकर यह अक्सर दरों के आर पार गुजर जाया करते हैं और कभी पतझड़ जैसी ऋतु आने पर यही जोगी शरीर पर मृदा का लेप कर अपने देह को विशेष प्रकार के वृक्षों के सूखे पत्तों में स्थिर कर समाधि लगाने का प्रयत्न करते हैं! जिसे देखते ही अपने आप में एक विचित्र अनुभूति होती है! संपूर्ण मानवीय धारणाओं को दरकिनार कर अपने मस्तिष्क के विभिन्न तंतुओं को जागृत कर ये अतीन्द्रिय हो जाते हैं! सदा अपनी क्रियाओं में एकाग्रता और एक निष्ठा रखना ही इनकी सफलता का परम रहस्य है! प्रकृति में जहां भी इन्हें सुंदर स्थान मिल जाए बस वही समाधि लगाने के लिए बैठ जाते हैं! फिर वह चाहे नदी हो, नाला हो, पर्वत हो, कंदरा हो या फिर घना वनप्रदेश! यहां तक कि वृक्षों के ऊपर, किसी विशाल चट्टान के नीचे, झाड़ियों के अंदर अथवा किसी भी शुद्ध स्थान में इन्हें समाधि लगाए देखा जा सकता है! क्यों क्या हम इस ऋषि परंपरा को भूल गए? शायद यही वह परंपरा है जिस पर चलकर सभी ऋषि-मुनियों ने ज्ञान प्राप्त किया था! किंतु अब शायद बहुत कम लोग शेष रह गए हैं जो इस विधा को जानने वाले हैं! आज सभ्यता प्रकृति से दूर होती जा रही है! कृत्रिम ता में लीन होती जा रही है! यही कारण है कि वे निरोगी नहीं है! वह स्वस्थ नहीं है! वह आत्म सत्ता से जुड़े नहीं है! अब वह जमाने शायद बीत गए जब एकांत में साधक आत्मचिंतन में तल्लीन नजर आता था! आज नदी, नाले, कंदराएं, गुफाएं, पठार और वृक्षों के कोटर रिक्त हो गए हैं क्योंकि आज वहां कोई आत्मा तितिक्षु नहीं है! ऐसा श्रेष्ठ ऋषि जीवन आखिर क्यों छूट गया? आखिर मानव के मन में मलिनता क्यों आ गई? मानव परमात्मा से, प्रकृति से और अपने आप से दूर क्यों हो गया?
क्योंकि वह योगी बनना ही भूल गया! वह साधना की विलक्षणताओं को ही भूल गया! आइए हम भी योगी बनने का प्रयास करें, हम भी ऐसा जीवन जीने का प्रयास करें ताकि हम विराट बन सके, हम उस शाश्वत सत्य को जान सके जिससे यह सृष्टि उत्पन्न होती है और अंततः जिसमें यह सृष्टि पूर्ववत समा जाती है! हम जान सके अध्यात्म के शीर्षतम सोपानों को! हम जीवन के उस पार देख सके! हम अथाह ज्ञान को प्राप्त कर अमृत मार्ग की ओर बढ़ सके! - महासिद्ध ईशपुत्र

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 6

आज हम वास्तविक मार्ग से च्यूत हो गए हैं। आज हमें वास्तविक मार्ग बताने वाला ही कोई ना रहा! आज स्वयं तपस्या करने वाला ही ना रहा! आज नैसर्गिक ज्ञान और अलौकिक ज्ञान को जानने वाला शायद कोई ना रहा! आज शीतलता और ग्रीष्मा को सहने वाले योगी ही न रहे! आज वैभव छोड़कर हिमालय विचरण करने वाले न रहे! शायद इसीलिए आज वास्तविक धर्म खो गया है और रह गया है मात्र नकली और बनावटी धर्म! योगियों की साधना पद्धति अपने आप में ही बड़ी विचित्र होती है! जितना भी हम जानने का प्रयास करें उतना ही कम पड़ता है! इस प्रक्रिया को शब्दों में बांध लेना एक मूढ़ प्रयास ही होगा ! हिमालय की गहरी तराइयों एवं घाटियों में रहने वाले यही योगी हमारी संस्कृति के प्रतीक है! हिमालय के आकाश के सूर्य है! तथा यही है वो विलक्षण मानव को मानवता का सन्देश देते है! और उस परमात्मा की ओर सोचने पर विवश कर देते हैं, जिसके अस्तित्व से हम आज शायद कट से गए हैं! अभी तक कोई समझ नहीं पाया इनके प्रकृति प्रेम को! अभी तक कोई जान नहीं पाया इनकी खोजों को! अभी तक कोई समझ नहीं पाया इन मायाधारियों की माया को! कभी यह महीनों एक स्थान पर रहकर समाधि लगाते हैं, तो कभी विचित्र क्रियाएं करते हैं! और प्रत्येक क्रिया का अपना एक गूढ़ विज्ञान होता है! सभ्यता से दूर रहकर सर्वदा अपने चित्र को परमात्मा की ओर लगाने वाले यह योगी अद्भुत अनुभवों से भरे होते हैं! यही कारण है कि इतिहास में योगियों को सर्वश्रेष्ठ माना गया है! प्रकृति के खूबसूरत प्रांगण में बसने वाले, शुद्ध वायु और जल का सेवन करने वाले, कठिन परिवेश में अपने जीवन को ढालने वाले योगी ही शाश्वत सत्य को जान पाते हैं! बाल्यावस्था से युवावस्था तक लगातार ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है! साथ ही योग, ध्यान, ज्योतिष, वास्तु, नक्षत्र विज्ञान, पारद विज्ञान, पशु शास्त्र, पक्षी तंत्र, तंत्र ग्रंथ, आगम-निगम, शावर इत्यादि वैदिक कर्मकांड जैसी अनेकों विधाओं का स्वयं अध्ययन करना पड़ता है!
- महासिद्ध ईशपुत्र

सोमवार, 9 दिसंबर 2019

योगी जीवन - 5
जहां घने जंगल होते हैं अथवा वन्य प्राणियों का भय रहता है वहां योगी अपनी साधना हेतु ऐसे स्थानों का चुनाव करते हैं जहां किसी प्रकार का पशु पक्षी तंग न कर सके और वो घंटों समाधि में लीन रह सके। आज इस जगत में धर्म अध्यात्म का यह सनातन मार्ग लगभग लुप्त हो चुका है! बड़ी बेदना है कि सभी लोग किताबी ज्ञान अथवा बौद्धिक चातुर्य को ही धर्म और अध्यात्म समझ बैठे हैं । हमें याद रखना चाहिए कि यदि हमें शाश्वत सत्य को जानना है तो हमें भी कुछ कुछ इसी तरह की प्रणाली में से होकर गुजरना होगा । प्रकृति को समझकर आत्मसात करना होगा। अपने भीतर की दुभितियों से मुक्त होना होगा। प्रकृति में इस कदर खो जाना होगा कि हम अपनी सत्ता को ही भूल जाए! और साथ ही अनेकों प्रयासों से अपनी चेतना को विकसित करना होगा। प्रकृति के एक एक हिस्से से हमें शिक्षा ग्रहण करनी होगी। जिस प्रकार योगी हिमालय के शिखरों पर साधना करते हैं उसी प्रकार वह भीतर की चेतना के उच्चतम सोपान पर होते हैं। आखिर वह क्या करते हैं? यह सब तो गुप्त है! लेकिन निश्चित ही उद्देश्य चेतना का विकास ही है। मार्ग अनेक हो सकते हैं लेकिन उद्देश्य एक ही होता है। कभी सूरज की तपती गर्मी, कभी हिमालय का निम्न तापमान, कभी तेज बरसात, कभी प्रकृति का कोप... सब सहते हुए योगियों को अपने मार्ग पर बढ़ना होता है! मार्ग में अनेकों परीक्षाएं होती है उन्हे लांघते हुए ही साधना में सफलता पाई जा सकती है। आज ऋषि परंपरा का सूर्य डूब रहा है! आज वास्तविक खोज के मार्ग अवरुद्ध हो चुके हैं! आज हमें खोजना होगा भारतीय ऋषि परंपरा को! हमें स्वयं तप करना होगा।
- महासिद्ध ईशपुत्र