मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

ईशपुत्र के शुभ विचार-1
"जीवन में 'सत्य का प्रकाश' मिलते ही आनंद के 'सुगन्धित पुष्प' ह्रदय वाटिका में 'महकने और खिलने' लगते हैं. ह्रदय के इस सौन्दर्य को दूसरा कोई भले ही न देख पाए किन्तु तुम अपने अंतस पर इसकी 'सुगंध और दिव्यता' अनुभव कर सकते हो-कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज"-कौलान्तक पीठ टीम-हिमालय.

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

सिद्ध योग साधना शिविर - 40 प्राणायाम
ईशपुत्र कौलान्तक नाथ नेँ जिन 40 प्राणायामोँ को सर्वप्रथम जगतहिताय सार्वजनिक किया है वो निम्नानुसार है ।
=== 1 ब्रह्म प्राणायाम 2 उद्गीथ प्राणायाम 3 अनुलोम-विलोम प्राणायाम 4 कपालभाति प्राणायाम 5 खण्ड प्राणायाम 6 मूर्च्छा प्राणायाम 7 भ्रामरी प्राणायाम 8 कुम्भक-रेचक-पूरक प्राणायाम 9 संक्षोभण प्राणायाम 10 बाह्य प्राणायाम 11 शीतली प्राणायाम 12 सूर्यभेदी प्राणायाम 13 शीतकारी प्राणायाम 14 चन्द्रभेदी प्राणायाम 15 नाडीशोधन प्राणायाम 16 उज्जायी प्राणायाम 17 कर्णरोगान्तक (कर्णभेदी) प्राणायाम 18 सप्तखण्ड प्राणायाम 19 कण्ठादिशोधन प्राणायाम 20 विश्राम प्राणायाम 21 पीडक प्राणायाम 22 केवली प्राणायाम 23 प्लावनी प्राणायाम 24 स्तंभकारी प्राणायाम 25 भस्त्रिका प्राणायाम 26 स्पन्दनकारी प्राणायाम 27 सुषुम्न प्राणायाम 28 जलधि प्राणायाम 29 चक्राति प्राणायाम 30 पद्मभेदन प्राणायाम 31 बाह्यवृत्ति प्राणायाम 32 अभ्यान्तरवृत्ति प्राणायाम 33 बाह्याभ्यान्तर-विषयापेक्षी प्राणायाम 34 त्रिकुटीभेदी प्राणायाम 35 लघु प्राणायाम 36 मूल प्राणायाम 37 मध्य प्राणायाम 38 उर्ध्व प्राणायाम 39 ब्रह्माण्डभेदी प्राणायाम 40 कपि प्राणायाम

आप इनको youtube पर भी देख सकते हैं ।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

उग्र कौल छिन्नमस्ता मंत्र
ये मंत्र छिन्नमस्ता साधना हेतु अति महत्त्वपूर्ण है। ये मंत्र 'कौलान्तक संप्रदाय' का बड़ा ही प्रसिद्घ 'छिन्नमस्ता' मन्त्र है।

।। उग्र कौल छिन्नमस्ता मंत्र।।

।। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं हुँ वज्रे वज्रिके हा हा हुं हुं श्रीं ह्रीं हुं श्रीं ऐं क्लीं क्लीं क्लीं डं डाकिनी सं संयुक्ते वामे वज्र नायिके छिन्ने छिन्नमस्तके हुं छिन्नमस्ते जाग्रय हा हा हुं हुं श्रीं ह्रीं हुं श्रीं ऐं
क्लीं क्लीं क्लीं उग्रे वज्रे स्वाहा।।

(ये मंत्र सम्प्रदायानुगत व गुरुगम्य है कृपया इस तांत्रिक मंत्र का उच्चारण व विधान परम्परा से ही लें-बताना हमारा कर्तव्य है)


आइये बिन्दुओं में जाने कैसे हों शिव प्रसन्न
शिव का ॐ कार स्वरुप में ध्यान करने से शिव सकल फल देते हैं
शिवलिंग के रूप में उपासना करने से भोग एवं मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं
शिवलिंग पर पंचामृत चढ़ाना सर्वोत्तम माना जाता है
शहद दूध और जल में चन्दन का लेप मिला कर अभिषेक से शिव प्रसन्न होते हैं
रुद्राक्ष धारण करने से व उनकी प्राण प्रतिष्ठा से शिव के तेज का स्थापन जागरण होता है
शिव संगीत व नृत्य प्रिय हैं गा कर व नृत्य से शिव प्रसन्न होते हैं
शिवलिंग पर भस्म को त्रन्त्रोक्त बीजों सहित लेपन से सारे पाप मिट जाते हैं
भस्मलेपन का तंत्रोक्त बीज मंत्र-ॐ ह्रौं ज़ूम सः
रक्त चन्दन अथवा विशेष निर्मित त्रिपुंड स्वयं और शिवलिंग पर लगाने से बाधाओं का नाश होता है
त्रिपुंड का मंत्र-ॐ त्रिलोकिनाथाय नम:
शिव को प्रसन्न करने के लिए डमरू जरूर बजाएं और बम बम भोले बम बम भोले कहने से कृपा मिलेगी
बिल्व पत्र व बिल्व फल चढाने से धन की प्राप्ति के साथ साथ शिव को सरलता से रिझाया जा सकता है
शिवरात्रि पर धतुरा,भांग,और आक चढ़ना शिव की पूरी साधना करने के बराबर फलदायी होता हैं
शिलिंग को प्रतिष्ठित कर करें शिवलिंग का पूजन तो जीवन सफल हो जाता है
ज्ञान एवं विद्वत्ता की इच्छा वाले साधकों को स्फटिक के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए
गृहस्थ सुख चाहने वालों को पत्थर के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए
मुकद्दमों एवं युद्ध में प्रतियोगिताओं में सफलता पाने वालों को अष्ट धातु शिवलिंग का पूजन करना चाहिए
सब सुख चाहने वाले को सोने चांदी अथवा रत्नों से बना शिवलिंग पूजना चाहिए
सबसे स्रेष्ठ तो केवल पारे का शिवलिंग होता है जिसकी पूजा से जन्म मरण से मुक्ति प्राप्त होती है शिव की अमोघ कृपा बरसती है
शिवरात्री के दिन शिव मंदिर के दर्शन,कैलाश मानसरोवर के दर्शन,शिवभक्तों के दर्शन अथवा सुमिरम से शिव भोले बरदान देते हैं
शिवरात्रि को शिवपुराण की पूजा और पाठ से शिव प्रसन्न हो कर अपने भक्त के साथ साथ रहने लगते हैं
इस पुराण में 24,000 श्लोक है तथा इसके क्रमश: 6 खण्ड है
पहला खंड -विद्येश्वर संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से समस्त भयों और अपशकुनो का नाश होता है
दूसरा खंड-रुद्र संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से अकाल मृत्यु टलती है और ज्ञान प्राप्त होता है
तीसरा खंड-कोटिरुद्र संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से भौतिक सुखों के साथ साथ अद्यात्म का ज्ञान भी मिलता है
चौथा खंड-उमा संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से शक्ति सिद्धियाँ तो मिलती ही हैं मायाजाल से बक्त मुक्त हो जाता है
पांचवा खंड-कैलास संहिता-जिसके पाठ से साधक मानव योनी से उपार हो कर शिव का गण हो जाता है तीनो लोकों में उसे निर्भयता प्राप्त होती है
छठा खंड-वायु संहिता-जिसके पाठ से धार अर्थ काम सहित मोक्षः मिलता है साधक शिव में समाहित हो पूरण हो जाता है
शिव को स्तुति प्रिय है अतः स्तुतियों से करें शिव आराधना
शिव सहस्त्रनामावली का पाठ करें
शिव की सबसे प्रचलित स्तुति है



ॐ कर्पूर गौरं करुणावतारं
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं
सदा वसन्तं हृदयारवृन्दे
भवं भवानी सहितं नमामि !!



देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व सब शिव को गा कर प्रसन्न करते है
रुद्राष्टक,पंचाक्षर,मानस,द्वादश ज्योतिर्लिंग जैसे स्तोत्रों का पाठ करने से अद्भुत कृपा प्राप्त होगी
सस्कृत स्तोत्र शीग्र फलदायी होते हैं
रुद्राष्टक स्तोत्र कुछ ऐसे है-
नमामिशमीशान निर्वाण रूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्किल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं।
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसारपारं नतोहं।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं।
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।

कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

नवग्रह वास्तु मंत्र और मोर पंख
कथा एवं महात्म्य
बाल्यकाल में जब बलराम और श्री कृष्ण को मुकुट पहनाया जा रहा था तो भगवान् कृष्ण मुकुट पहन ही नहीं रहे थे....अंतत: जब नन्द बाबा नें मोर पंख वाला मुकुट पहनाया तो उसे ही भगवान कृष्ण नें सर पर सुशोभित किया.....इससे मोर पंख का महत्त्व सामने आता है....प्राचीन काल से ही नजर उतारने व भगवान् कि प्रतिमा के आगे वातावरण को पवित्र करने के लिए भी मोर पंख का ही प्रयोग होता आया है.....निगम ग्रंथों में भगवान् शिव माँ पार्वती को कहते हैं कि देवी योगिनी मंडल के रहस्य वो नहीं जानता जिसने पक्षी शास्त्र में मोर का महत्त्व न जाना हो....तो पार्वती माता पूछती हैं कि भगवान मोर पंख का रहस्य क्या हैं तो शिव उत्तर देते हुए कहते हैं कि असुर कुल में संध्या नाम का प्रतापी दैत्य उत्त्पन्न हुआ.....लेकिन वो गुरु शुकाचार्य के कारण देवताओं का शत्रु बन बैठा....देवी वो परम शिव भक्त था.....उसने विन्द्यांचल पर्वत पर कठोर तप कर मुझे प्रसन्न किया....और अति बीर होने का वर प्राप्त किया.....ब्रह्मा जी भी उसके घोर तप से प्रसन्न हुए.....बर प्राप्त करने के बाद वो हर एक घर में अपना एक रूप बना कर विष्णु भक्तों को प्रताड़ित करने लगा....देवताओं पर आक्रमण कर उसने अलकापुरी जीत ली....देवताओं को बंदी बना वो शिव आराधना में फिर लीन हो गया....उसकी भक्ति के कारण भगवान् विष्णु भी उसका बध करने में समर्थ नहीं थे.......तो सभी देव देवताओं ने मिल कर एक रन नीति तैयार कि जब में महासमाधि में लीन था....उस समय संद्य दैत्य सागर के तट पर अपनी रानी के साथ विहार कर रहा था...तो देवताओं ने योगमाया को सहायता के लिए पुकारा....सभी मात्री शक्तियों के तेज से व नव ग्रहों सहित देवताओं के तेज से एक पक्षी पैदा हुया जो मोर कहलाया उस दिव्य मूर के पंखों में सभी देवी देवता चुप गए और शक्ति बढ़ाने लगे....अति विशाल मोर को आक्रमण करने आया देख संध्या दैत्य उससे युद्ध करने लगा लेकिन योगमाया भगवान् विष्णु सहित नव ग्रहों एवं देवताओं कि शक्ति से लड़ रही थी तो इसी कारण संध्या नाम का दैत्य युद्द में वीरगति को प्राप्त हुया......हे पार्वती तभी से मोर के पंखों में नव ग्रहों देवी देवताओं सहित अन्य शक्तियों के अंश समाहित हो गए.......इस लिए पक्षी शास्त्र में मोर...गरुड़ और उल्लूक के पंखों का महत्त्व हो गया.....किन्तु केवल वहीँ पंख इन गुणों को संजोता हैं जो स्वभावतय: पक्षी त्याग देता है.....
पक्षी शास्त्र में महत्त्व
जैसे उल्लूक तन्त्रं के ग्रन्थ में उल्लुओं का.....काक तन्त्रं नाम के ग्रन्थ में कौवे का महत्त्व दिया गया है उसी प्रकार देववाहिनी तन्त्रं में मोर....मोनाल और जुजुराना जैसे पक्षियों के पंखों का विवरण दिया गया है.....
बिभिन्न लाभ
वशीकरण...कार्यसिद्धि....भूत बाधा....रोग मुक्ति.....ग्रह वाधा....वास्तुदोष निग्रह आदि में बहुत ही महत्पूरण माना गया हैं...
सर पर धारण करने से विद्या लाभ मिलता है या सरस्वती माता के उपासक और विद्यार्थी पुस्तकों के मध्य अभिमंत्रित मोर पंख रख कर लाभ उठा सकते हैं.....मंत्र सिद्धि के लिए जपने वाली माला को मोर पंखों के बीच रखा जाता हैं....घर में अलग अलग स्थान पर मोर पंख रखने से घर का वास्तु बदला जा सकता है...नव ग्रहों की दशा से बचने के लिए भी होता है मोर पंख का प्रयोग......कक्ष में मोर पंख वातावरण को सकारात्मक बनाने में लाभदायक होता है......भूत प्रेत कि बाधा दूर होती है.....
 ग्रह बाधा से मुक्ति
यदि आप पर कोई ग्रह अनिष्ट प्रभाव ले कर आया हो....आपको मंगल शनि या राहु केतु बार बार परेशान करते हों तो मोर पंख को 21 बार मंत्र सहित पानी के छीटे दीजिये और घर में वाहन में गद्दी पर स्थापित कीजिये...कुछ प्रयोग निम्न हैं
सूर्य की दशा से मुक्ति
रविवार के दिन नौ मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे रक्तबर्ण मेरून रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ नौ सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ सूर्याय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
दो नारियल सूर्य भगवान् को अर्पित करें
लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाएं 

चंद्रमा की दशा से मुक्ति
सोमवार के दिन आठ मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे सफेद रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ आठ सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ सोमाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
पांच पान के पत्ते चंद्रमा को अर्पित करें
बर्फी का प्रसाद चढ़ाएं

मंगल की दशा से मुक्ति
मंगलवार के दिन सात मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे लाल रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ सात सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ भू पुत्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
दो पीपल के पत्तों पर अक्षत रख कर मंगल ग्रह को अर्पित करें
बूंदी का प्रसाद चढ़ाएं

बुद्ध की दशा से मुक्ति
बुद्धबार के दिन छ: मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे हरे रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ छ: सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ बुधाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
जामुन अथवा बेरिया बुद्ध ग्रह को अर्पित करें
केले के पत्ते पर मीठी रोटी का प्रसाद चढ़ाएं

बृहस्पति की दशा से मुक्ति
बीरवार के दिन पांच मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे पीले रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ पांच सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ ब्रहस्पते नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
ग्यारह केले बृहस्पति देवता को अर्पित करें
बेसन का प्रसाद बना कर चढ़ाएं

शुक्र की दशा से मुक्ति
शुक्रवार के दिन चार मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे गुलाबी रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ चार सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ शुक्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
तीन मीठे पान शुक्र देवता को अर्पित करें
गुड चने का प्रसाद बना कर चढ़ाएं

शनि की दशा से मुक्ति
शनिवार के दिन तीन मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे काले रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ तीन सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ शनैश्वराय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
तीन मिटटी के दिये तेल सहित शनि देवता को अर्पित करें
गुलाबजामुन या प्रसाद बना कर चढ़ाएं

राहु की दशा से मुक्ति
शनिवार के दिन सूर्य उदय से पूर्व दो मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे भूरे रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ दो सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ राहवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
चौमुखा दिया जला कर राहु को अर्पित करें
कोई भी मीठा प्रसाद बना कर चढ़ाएं

केतु की दशा से मुक्ति
शनिवार के दिन सूर्य अस्त होने के बाद एक मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे स्लेटी रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंख के साथ एक सुपारी रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ केतवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
पानी के दो कलश भर कर राहु को अर्पित करें
फलों का प्रसाद चढ़ाएं

वास्तु में सुधार
घर का द्वार यदि वास्तु के विरुद्ध हो तो द्वार पर तीन मोर पंख स्थापित करें , मंत्र से अभिमंत्रित कर पंख के नीचे गणपति भगवान का चित्र या छोटी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए
मंत्र है-ॐ द्वारपालाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:

यदि पूजा का स्थान वास्तु के विपरीत है तो पूजा स्थान को इच्छानुसार मोर पंखों से सजाएँ, सभी मोर पंखो को कुमकुम का तिलक करें व शिवलिं की स्थापना करें पूजा घर का दोष मिट जाएगा, प्रस्तुत मंत्र से मोर पंखों को अभी मंत्रित करें
मंत्र है-ॐ कूर्म पुरुषाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:

यदि रसोईघर वास्तु के अनुसार न बना हो तो दो मोर पंख रसोईघर में स्थापित करें, ध्यान रखें की भोजन बनाने वाले स्थान से दूर हो, दोनों पंखों के नीचे मौली बाँध लेँ, और गंगाजल से अभिमंत्रित करें
मंत्र-ॐ अन्नपूर्णाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:

और यदि शयन कक्ष वास्तु अनुसार न हो तो शैय्या के सात मोर पंखों के गुच्छे स्थापित करें, मौली के साथ कौड़ियाँ बाँध कर पंखों के मध्य भाग में सजाएं, सिराहने की और ही स्थापित करें, स्थापना का मंत्र है
मंत्र-ॐ स्वप्नेश्वरी देव्यै नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:

कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

श्री सर्वेश्वर आदिनाथ मंत्र
प्रस्तुत है 'कौलान्तक पीठ हिमालय' का सबसे चर्चित मंत्र जो 'कौल मत' के 'वैष्णव पक्ष' का मंत्र है। 'कौलान्तक पीठ' के 'सर्वकुल' नाम के कुल का प्रसिद्द मंत्र है। ये मंत्र 'सर्वेश्वर नाथ' यानि 'वैष्णव आदिनाथ' का प्रतीक भी है। वैसे तो 'आदिनाथ' स्वयं 'सदाशिव' को कहा जाता है जो 'शैव कौलकुल' के प्रथम बिंदु हैं। लेकिन शिव के कुल को आगे बढ़ाने का कार्य 'विष्णु पुरुष' का है। 'कौलान्तक पीठ' की एक प्रचलित कथा के अनुसार 'सर्वेश्वर नाथ' 'विष्णु पुरुष' ही हैं जो 'शिव पंथ' को बढ़ाने के लिए 'शिव स्वरुप' धारण करते हैं। हिमालय का 'गरुड़ासन पर्वत' उनका स्थल है। ये एक लम्बी कहानी है जिसे 'संप्रदाय' के भैरव-भैरवियाँ जानते हैं। हम विस्तार में ना जा कर 'वैष्णव आदिनाथ' का कौल मंत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। ये बताना जरूरी है कि 'शिव भेष' के कारण व प्रथम शिष्य व ज्ञान प्रदाता होने के कारण ही 'विष्णु पुरुष' को 'आदिनाथ' कह कर सम्बोधित किया गया है। बाकी कोई रहस्य भला आप सबसे छुप कहाँ सकता है ? आप जानते ही है कि इस संप्रदाय के लोग अभी भी अपनी मान्यताओं को आगे बढ़ा रहे हैं। ख़ैर छोड़िये प्रस्तुत है मंत्र-कौलान्तक पीठ

   ।।श्री सर्वेश्वर आदि नाथ मंत्र।।
धुं गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ गरुड़ासन पर्वताय
गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु गुरु कौल सिद्धाय
नं नं नं नं नं नं नं नं नं आदि नाथाय हुं


कुण्डलिनी शक्ति का पूरा सच
अधिकांश लोग ये समझते है कि कुण्डलिनी जागरण का तात्पर्य है, आत्मज्ञान प्राप्त हो जाना, परमात्मा में विलीन हो जाना और ध्यान कि गहराई में उतरकर समाधिस्थ हो जाना । अगर आप भी यही समझते है तो आप गलत है । कुण्डलिनी जागरण पूरी तरह से नास्तिक प्रणालि है । जो कुण्डलिनी जागरण करनेवाला साधक है वो ईश्वर को नहीं मानता, वो ईश्वर की सत्ता को चुनौति देता है, कहता है, "परमात्मा मेरे अतिरिक्त कोई नहीं है । मैं स्वयं में ही परमात्मा हूँ इसलिए मैं केवल अपने भीतर निहित शक्ति को जागृत करुंगा ।" और कुण्डलिनी क्या है ? कुण्डलिनी हमारे सात केन्द्र शरीर के भीतर है जिन्हें हमने सप्तचक्र कहा : मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार कमलदल । इनमें से सबसे मूल में अर्थात् सबसे निम्न चक्र में जिसे हम योनि अथवा लिंग कहते है और गुदाप्रदेश के भीतर ये शक्ति विद्यमान रहती है लेकिन इसका मूल केन्द्र मस्तिष्क ही है, मस्तिष्क से वो जुडी रहती है लेकिन उसका स्पंदन केन्द्र (चक्र) मूलाधार है; वही एक शक्ति मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार तक जाती है । लेकिन भगवान ने इस शक्ति को सहस्त्रार कमलदल में क्यों नहीं रखा ! कभी आपने सोचा ? ऐसा भी तो हो सकता था कि परमात्मा पहले ही इस कुण्डलिनी शक्ति को सहस्त्रार कमलदल में रखते लेकिन उन्होनें जब इस देह की रचना कि तो इस शक्ति को मूलाधार में रखा । मूलाधार में क्यों ? इस सृष्टि के लिए, सृष्टि को आगे बढाने के लिए, वासना के लिए और मूलाधार हमारा वासना (इच्छाओं) का केन्द्र है । हम संसार से जुडते है, हम पूरी दुनिया से जुडते है, कैसे ? मनुष्य के भीतर कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार चक्र में इसलिए स्थापित किया गया क्योंकि वो इच्छाएं उत्पन्न करने वाली है, वो वासना उत्पन्न करने वाली है, वो सृष्टि के साथ हमें जोड़ती है मूलाधार चक्र जो है वही प्रमुख चक्र माना गया और किसी प्रमुख चक्र के ऊपर ध्यान लगाकर इस कुंडलिनी शक्ति को ऊर्ध्वमुखी किया जाता है और कुंडलिनी जागरण है क्या ? कुंडलिनी जागरण उस मूलाधार चक्र के लिए जो मस्तिष्क के द्वारा शक्ति रखी गई है उस शक्ति को अपने मौलिक स्थान से, अपनी तो उसकी इंद्री है उस पर से हटा कर उसे धीरे-धीरे ऊपर की इंद्रियों की तरफ गतिशील किया जाता है, ये ठीक वैसे ही है जैसे मान लीजिए कि हिमालय पर्वत के ऊपर कहीं बर्फ का बड़ा हिमनद या ग्लेशियर है, वह अपने आप पिघलता है तो एक नदी बनती है वह नीचे की ओर जाती है लेकिन कुंडलिनी साधना का तात्पर्य है कि उस नदी पर एक बांध बना दिया जाए बड़ा, ताकि वह पानी धीरे-धीरे भरता जाए और उसमें शक्ति पैदा होती जाए और अंततः वह इतना भर जाए कि जहां से वह पानी आ रहा है वहीं तक वह जा कर पहुंच जाए वह पानी वापस । तो यह प्रणाली कुंडलिनी जागरण कहलाती है । वह मस्तिष्क के भीतर निहित हमारी ही शक्ति है कुंडलिनी, वह कोई नई शक्ति नहीं है लेकिन वह मस्तिष्क के भीतर, सहस्त्रार के भीतर जुड़ी होने के बावजूद स्वभावतया आज्ञा चक्र में स्पंदित होती है लेकिन मुख्यतया सबसे ज्यादा सक्रिय वह मूलाधार चक्र में है इसलिए लोग प्रेम करना चाहते हैं क्योंकि प्रेम में भी मूलाधार चक्र से और अनाहत चक्र से जुड़ा हुआ तत्व है, हृदय चक्र से जुड़ा हुआ तत्व है लेकिन उसमें मूलाधार का संपुट है. लोग वासना में अधिक से अधिक खोए और डूबे रहना चाहते हैं उसका केंद्र भी मूलाधार चक्र ही है. हम मन में इच्छा करते है कि अच्छे कपड़े पहने, राजसी दिखें, धन, वाहन, वैभव हमारे पास हो, बहुत सारे दास-दासियां, नौकर-चाकर हमारे पास हो; यह जो भावनाएं पैदा होती है और यह जो विचार पैदा होते हैं इन सबको हमारा मूलाधार प्रेरित करता है हमें, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था, कि क्रोध कैसे पैदा होता है ? काम से क्रोध पैदा होता है । तो जो काम अर्थात मूलाधार चक्र अर्थात वासनाएं अर्थात इच्छाएं । जब इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती है तो क्रोध पैदा होता है और क्रोध से अनेकों प्रकार के फिर क्रमशः विकार उत्पन्न होते जाते हैं, बढ़ते चले जाते है । ठीक वैसे ही कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क से संचालित होने के बावजूद हमारे मूलाधार चक्र में निवास करती है और अलग अलग कुंडलिनी चक्रों के साथ उसका संबंध है, जब हम उसको मुख्य चक्र से काट डालते हैं तो वह हमें अनेकों तरह के अनुभव देने लगती है, और वह तो देगी ही ! अब आप सोचिए की यह यह जो कुंडलिनी ऊर्जा है यह बनी किस चीज के लिए है ? यह बनी है मूलाधार चक्र के लिए, लेकिन हम उस ऊर्जा का मूलाधार चक्र में प्रयोग नहीं करके मस्तिष्क में भर देते हैं और आप सोच लीजिए हमारा मस्तिष्क पहले ही कितना बड़ा झंझाल हैं ! उसमें कितने तंतु है, उसमें कितनी उर्जा है, उसमें कितने विचार चल रहे हैं, वह सोचता भी है, समझता भी है, सुनता भी है, टेस्ट भी लेता है, रूप, रस, गंध को अनुभव करता है और निरंतर अपने जीवन को सुचारु रखने के लिए हमारा मस्तिष्क सौ तरह के षड्यंत्र तैयार करता है, निरंतर विचारशील है, स्वप्न में भी विचारशील है, निरंतर कार्यवान है, निरंतर कार्य करता रहता है । पहले ही इतने झंझट इस मस्तिष्क में है और ऊपर से हम मूलाधार चक्र को बंद करके उसकी ऊर्जा को ऊर्ध्वमुखी करते हैं इसीलिए आपने सुना होगा प्राचीन काल में बार-बार हिदायत दी जाती थी कि कुंडलिनी जागरण ना करें और करें तो अत्यंत योग्य गुरु के सानिध्य में और योग्य गुरु मिलते कहां है आजकल? और योग्य गुरु का तात्पर्य है जिसने स्वयं अपनी कुंडलिनी शक्ति को जगा लिया हो और आपने कहा कि भारत में तो बहुत सारे गुरु कुंडलिनी जागरण की दीक्षा दे रहे हैं और करवा रहे हैं, तो मेरा प्रश्न है, यदि उनकी स्वयं की कुंडलिनी जागृत हो गई है तो वह क्या कर रहे हैं? इस देश में इतना पाप बढ़ रहा है, इतना अधर्म बढ़ रहा है, देश में इतना संकट है, पूरी दुनिया में त्राहि-त्राहि मची हुई है तो उनको चाहिए ना कि वह अपनी कुंडलिनी शक्ति का प्रयोग करके कुछ तो सार्थक कर्म करें और आप उन गुरुओं को देखिए, उनके जीवन में तो कुछ है ही नहीं, कुंडलिनी ऊर्जा या कुंडलिनी जागृत हुई है ऐसा प्रतीत ही नहीं होता । ना तो उनकी आंखे देखकर आपको लगेगा कि इनमें कोई सिद्धि है, इनमें कोई तेजस्विता, ओजस्विता है, ना ही वह निर्भय है, ना ही वह निडर है, ना ही उनमें वह फक्कडपना है, बस केवल अभिनय मात्र है । तो जब उनकी स्वयं की ही कुंडलिनी जागृत नहीं हुई तो वह तुम्हारी कुंडलिनी कैसे जागृत करेंगे यह तो सवाल ही पैदा नहीं होता, तो ठीक उसी तरह कुंडलिनी ऊर्जा के संबंध में शास्त्रों ने भी कहा, किसी योग्य गुरु के दिशा-निर्देश मैं करें, इसका कारण यह है कि पहले ही मस्तिष्क इतनी सारी मुसीबतों से भरा पड़ा है और हमारे मूलाधार चक्र की उर्जा भी जब ऊपर आने लगती है तो मस्तिष्क इस उर्जा को संभाल नहीं पाता, मस्तिष्क उसके लिए निर्मित नहीं है, तैयार नहीं है और मस्तिष्क में तो पहले ही बहुत सारे झंझट और बखेडे है, तो मस्तिष्क के तंतु फटने लग जाते हैं, ऊर्जा इतनी प्रवाहित हो जाती है कि व्यक्ति विक्षिप्त हो जाता है, उसके मस्तिष्क के बहुत सारे हिस्सेे काम करना बंद कर देते है और यह एक तरह की आत्महत्या है और आपने देखा होगा कि भारत में तो एक तरीका है कि कोई भी आदमी साधु बन जाता है, पेड़ के नीचे बैठता है, वहां वह गाली भी दे रहा है! " तेरी मां की.... तेरी बहन की....हां तुम्हारे पिता की.... तुम्हारे परदादा की ऐसी की तैसी ।" लेकिन लोग कहते हैं, "अरे! यह तो संत महात्मा है, समाधि की अवस्था में कुछ भी बोलते हैं, यह तो प्रसाद ही होता है ।" अरे वह प्रसाद नहीं है, वह बेवकूफी है, कि अगर उसने हठयोग करके, जटिल योगासन करके, प्राणायाम करके अपनी कुंडलिनी ऊर्जा को ऊर्ध्वमुखी करने की कोशिश की तो उसका मस्तिष्क बावरा हो रहा है, विक्षिप्त अवस्था उसे कहा गया है, की मस्तिष्क कैसे विक्षिप्त अवस्था में है ? कि वह अपने आप को संभाल नहीं पा रहा, वह अपने आप को संभालना चाहता है, अपने आप को स्वस्थ रखना चाहता है पर उर्जा इतनी ज्यादा एकत्रित हो गई है कि बेचारे साधु सन्यासी गालियां देते फिर रहे हैं और लोग उनकी पूजा कर रहे हैं ! वह पूजा के लायक है ही नहीं क्योंकि उन्हें यह ही नहीं मालूम कि ऊर्जा को कैसे निर्मित किया जाता है ।
मैं कुंडलिनी साधना क्यों नहीं करवा रहा एकदम से इसका कारण है कि कोई तैयार ही कहां है ? यदि मैं करवाऊंगा तो मेरी तो रीति बिलकुल वैसी ही होगी जो ऋषि परंपरा की है, उन्होंने कहा कि, "मस्तिष्क में इतने विचार, इतनी चीजें भरी पड़ी है, मस्तिष्क इतने सारे क्रियाओं को एक साथ संपादित करता है कि उसके पास जगह नहीं है कि उसके पास समय नहीं है इस उर्जा को संभालने के लिए और उसमें इतने विचार इस संसार के भरे है कि वासना का जो केंद्र है जो व्यक्ति को भड़काता है., जैसे मान लीजिए एक सुंदर सी लड़की ने किसी सुंदर से लड़के को देखा तो उसके मन में वासना पैदा हुई; अब वह लड़की उस लड़के को जब देखती है तो उसे लगता है कि 'दुनिया का सबसे खूबसूरत पुरुष, सबसे सुंदर! मुझे तो किसी भी तरह इसकी बाहों में समा जाना है, मुझे तो बस इस से लिपट जाना है, इसके अंदर समाहित होकर एक हो जाना है ।' उसे और कुछ नहीं दिखाई देगा, कुछ नहीं सुनाई देगा । यहां तक की उस लड़के में बहुत सी बुराइयां हैं, तब भी वह बुराइयां बिल्कुल नजर नहीं आएगी । बस उसे प्रेम नजर आएगा प्रेम, आकर्षण, प्यार । वह बस उसके प्यार के लिए मर जाना चाहेगी, लेकिन जैसे ही उनके बीच दैहिक संबंध बनेंगे और शीर्ष पर जाने के बाद जो कुछ देर के लिए ढलान आएगा तब उस लड़की को एहसास होगा कि, हां मेरा प्यार बहुत अच्छा तो है लेकिन तब ढलान की प्यार का वह आकर्षण नहीं होगा, तब एकदम से परिस्थिति बदलेगी, फिर उसे तैयार होना पड़ेगा धीरे-धीरे उस ऊर्जा को संचित करना पड़ेगा ताकि पुनः वह युवक उसे उतना ही खूबसूरत लगे लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता । शादियां लंबे समय क्यों नहीं चलती ? चार-पांच सालों में वह ऊर्जा का जो ढलान है, ऊर्जा का ऊपर चढ़ना, नीचे आना वह असंतुलित हो जाता है, फिर पति पत्नी का संबंध सामाजिक संबंध रह जाता है, कि 'चलो ठीक है मेरी पत्नी है, मुझे जेलना होगा, मेरे पति है, जैसा भी है अब रहना तो साथ है, समाज जानता है इस बात को, कहीं और जाऊंगा तो गाली पड़ेगी इत्यादि इत्यादि लेकिन मन में वह आकर्षण नहीं रहा, वह संबंध नहीं रहा, क्यों? क्योंकि मूलाधार की ऊर्जा को व्यवस्थित करके चलाना उसे नहीं आया । सोचिए कि वह मूलाधार की ऊर्जा हमें इतना भड़काती है, तो जब वह मूलाधार की ऊर्जा पूरी तरह आपके मस्तिष्क पर छा जाएगी तो आपको कैसा बना देगी ? आपको ऐसी-ऐसी कल्पनाओं के उड़ानों में ले जाएगी कि आपको अनेकों चांद, सितारे, ब्रह्म लोक, देवलोक, ईश्वर के लोक, अप्सराओं का नाचना, गंधर्वों का गायन सुनाई देने लगेगा । मुझे हर रोज पता नहीं कैसे-कैसे लोग पत्र लिखते हैं या ईमेल करते हैं या बहुत सारे लोग मेरे पास आते हैं कि, "जी मैं ध्यान कर रहा था, मेरी पीठ में से कुछ उठा ऊपर, रीड की हड्डी में फस गया, अब तब से वह फंसा हुआ ही है, मुझे ना नींद आती है, ना मैं जागता हूं, न सो पाता हूं, मेरे लिए प्लीज कुछ कर दीजिए ।" तो मैं कहता हूं ठीक है, अब उसी व्यक्ति के पास जाओ जिसने तुम्हें यह ध्यान करने की विधि सिखाई थी कि कुंडलिनी ऊपर चढेगी, उसे कहो ना कि अब नीचे उतार क्योंकि जब तक वह उतरेगा नहीं तुम्हारी तो यही दुर्दशा रहेगी । कुछ कहते हैं कि मुझे 24 घंटे सिर में दर्द है, कुछ कहते हैं मुझे ढोल-नगाड़े, चिमटे, शंख, नाद, भूतों की आवाज, चिल्लाने की आवाज सुनाई देती है दिन रात, मैं पागल हो रहा हूं । पागल तो होंगे ही तुम क्योंकि कुंडलिनी उर्जा का मतलब ही है कि जो तुम हो मनुष्यत्व उससे अलग हो जाना, मनुष्य तत्व से अलग हो जाना । मनुष्य समय पर सोता है, समय पर जागता है, समय पर खाता है, समय पर सब कार्य करता है । अब जब कुंडलिनी जागरण हो जाएगा तो तुम मनुष्य नहीं रहोगे ना फिर ! तब तुम सो नहीं सकते? तो फिर अब मेरे पास आ कर क्यों कहते हो कि हम सोना चाहते हैं लेकिन नींद नहीं आती । अब जब कुंडलिनी जागृत हो गई है प्रभु जी ! तो फिर निद्रा कहां से आएगी ? नींद आने के लिए मनुष्य होना जरूरी है और उर्जा का सही केंद्रों में शीत होना जरूरी है । अब तुम्हारी कुंडलिनी तो मस्तिष्क पर आ गई, मस्तिष्क के तंतु अब भिनभिना रहे हैं, झानझना आ रहे हैं तो निद्रा कहां से आएगी ? तो शरीर का संतुलन तो खराब होगा ही ना ? और तुम कहते हो कि कुंडलिनी जागरण से मुझे यह

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

कौलासुर
एक संप्रदाय है ! हिन्दू धर्म का एक ऐसा संप्रदाय जिसे "महाहिन्दू" कहा जाता है । "महाहिन्दू" इसलिए क्योँकि वो केवल एकाध देवी-देवता पर नहीँ वरन् "तैत्तीस करोड देवी-देवताओँ" पर विश्वास करता है, उसे कहते है "कौलान्तक संप्रदाय" या "कौल संप्रदाय" ! हिमालय के नाथ-सिद्धोँ का ये प्रमुख संप्रदाय है । इसी से इस संपूर्ण पृथ्वी की शोभा बढती है कि ये ऐसा संप्रदाय है जो एक ओर आस्तिकता की बात करता है तो दुसरी ओर नास्तिकता की बात करता है ! एक ओर इस पीठ मेँ दैत्य, भूत, प्रेत, गण, राक्षस, कूष्माण्ड, भैरव, बेताल रहते है और दुसरी ओर यहीँ देवता, मनुष्य, गंधर्व, किन्नर, किरात, नाग इत्यादि सुशोभित होते है । इस पीठ के दोहरे पहलू है : एक स्थूल पीठ; जो हिमालय पर्वत के रुप मेँ आपको दिखाई देता है, जितना भी हिमालय पर्वत है सारा का सारा #कौलान्तक_पीठ है ! और एक महाहिमालय है, एक "महाकौलान्तक पीठ" है, जो कि सूक्ष्म हिमालय है, जिसे अदृश्य हिमालय कहा जाता है जो इन चर्मचक्षुओँ से नहीँ देखा जा सकता ! लेकिन यहाँ एक विशेष बात ये है कि, संपूर्ण विश्व को आध्यात्मिक रुप से प्रेरणा देनेवाला, अपनी ओर आकर्षित करनेवाला, बुलानेवाला जो संप्रदाय है वो हिमालय ही है, वो कौलान्तक संप्रदाय ही है । इस कौलान्तक संप्रदाय के योगियोँ नेँ जिनको सिद्ध, नाथ-सिद्ध योगी कहा गया उन्होँने सदियोँ से अनेकोँ धर्मगुरुओँ को अपनी ओर बुलाया है प्रेरणा देकर हिमालय; उन्हे थोडा-बहुत ज्ञान दिया और वापस भेजा धारा मेँ ! कि पुनः समाज मेँ जाओ, संसार मेँ जाओ और इसका भला और कल्याण करो । और जब-जब इस संसार मेँ आततायी और आसुरी शक्तियोँ को बल मिला है, उनको बढावा मिला है और वो सत्ता मेँ आई है, उनको शक्तियाँ प्राप्त हुई है तब-तब इस पीठ नेँ अपने किसी महाबली योद्धा को उनसे निपटने के लिए भेजा है । ये योद्धा अपने-अपने तरीकोँ से युद्ध लडते है ! कोई अस्त्र-शस्त्रोँ से, कोई त्याग-वैराग से, कोई योग से तो कोई युद्ध से, कोई सुदर्शन चक्र से तो कोई त्रिशूल से, कोई अपने वचनोँ से तो कोई अपने दिव्य कर्म और अपनी भूमिका से, प्रस्तावना से । हर युग मेँ धर्म की स्थापना का उत्तरदायित्व लेनेवाले इस कौलान्तक संप्रदाय के मध्य मेँ (जिसे आज तक बहुत कम लोग जानते इसलिए क्योँकि उसे "रहस्य पीठ" कहा जाता है, वो रहस्योँ के आवरण मेँ रहता है ।) उन्होँनेँ ये कहा कि, "कलियुग के आने पर दो ही तत्त्व इस संसार मेँ होंगे; एक है "कौल" और दुसरा है "कौलासुर" । मनुष्य केवल दो ही भागोँ मेँ विभक्त होंगे, या तो वो "कौल" होंगे या वो "कौलासुर" होंगे ! अर्थात् या तो वो "कौलान्तक संप्रदाय" को माननेवाले होंगे "कौलान्तक संप्रदाय" के साथ आगे बढनेवाले होंगे या फिर वो "कौलान्तक संप्रदाय" के विरोधी होंगे ।" जितनी भी ये आध्यात्मिक विरासत है इसे कौलान्तक संप्रदाय ही संचालित करता है । ये हो सकता है कि बहुत से लोग जलन के मारे या डाह के मारे या ईर्ष्या-द्वेष के वश इस बात को मानने से इनकार कर देँ कि उनका कौलान्तक पीठ या कौलान्तक संप्रदाय से कोई लेना-देना है लेकिन वास्तविकता ये है कि इस विश्व का कोई भी धर्म, जाति, संप्रदाय ऐसा नहीँ है जिसका संबंध महाहिमालय या कौलान्तक संप्रदाय से न रहा हो लेकिन खैर हमेँ अपनी मान्यता रखने का अधिकार है, उन्हेँ अपनी मान्यता रखने का अधिकार । लेकिन मैँ यहाँ जो विशेष बात जहाँ आपका ध्यान लाना चाहता हुँ वो है "एक मान्यता" जो मैने आपको बताई कि संपूर्ण पृथ्वी पर केवल दो ही तत्त्व होंगे या तो "कौल" या फिर "कौलासुर" इन दो के अतिरिक्त तीसरा कोई तत्त्व इस सृष्टि मेँ, इस संसार मेँ नहीँ होनेवाला । जैसे जैसे कलियुग प्रगाढ होता जाएगा ये दो विचारधाराएँ बहुत तेजी से विभक्त होने लगेगी । अब प्रश्न ये है कि "कौल" कौन है ? "कौलासुर" कौन है ? क्योँकि "कौल" शब्द से ही आपको लगेगा कि "कौल" कहने का तात्पर्य है "अन्तिम", "सर्वश्रेष्ठ" और "आनंद की, उच्चता की पराकाष्ठा" उस सीमा का समापन जहाँ हो जाए जिसे हम "अच्छाई" कहते है वो #कौल होता है, "महसिद्ध", "परमसिद्ध", "अलौकिक", "अमोघ" और "दिव्य" ! और जो #कौलासुर है, "कौलासुर" का सीधा सा तात्पर्य है "बुराईयोँ से घिरे हुए", "स्वार्थपरायण", "कलहप्रिय", "हमेशा तनाव मेँ रहनेवाले", "नकारात्मक तत्त्वोँ को पैदा करनेवाले", "नकारात्मक तत्त्वोँ के समर्थक", "हमेशा उलटी बातेँ, उलटी खबरेँ फैलानेवाले", "दुषित विचारोँ को संपूर्ण ब्रह्माण्ड मेँ फैलानेवाले" ऐसे लोगोँ को #कौलासुर कहा गया है, क्योँकि वो "कौलासुर" है और "असुर" का तात्पर्य है "नकारात्मक शक्ति" इसिलिए "मार्कण्डेय पुराण" मेँ भी महर्षि मार्कण्डेय कहते है भगवती की स्तुति करते हुए #कौलासुरविध्वंसिनी अर्थात् जो कौल-असुरोँ का वध करनेवाली है और जो कौलोँ के द्वारा पूजित होनेवाली है, "महाकौलाचारिणी" है । जिस भगवती को "कौलाचारिणी" कहा गया, अर्थात् "कौल कुल" के अनुसार जिनकी पूजा-पाठ होती है, "कौल कुल" के अनुसार हम जिनकी स्तुति, स्तवन करते है, "कौल कुल" के अनुसार हम जिनका वंदन करते है वही तो ये "माँ शक्ति" है...और कौल-असुर ? जो "अधर्म" की ओर है ! या तो धर्म है या अधर्म है, दो ही तत्त्व इस संपूर्ण पृथ्वी पर है तीसरा कोई तत्त्व नहीँ इसलिए #कौल का तात्पर्य होता है "श्रेष्ठ", "दीक्षित", "गुरु-प्रदत्त मार्गीय", "गुरु के बताये पदचिन्होँ का अनुसरण करनेवाला", "वेद, पुराण, शास्त्र, आगम, निगम को माननेवाला"।
क्योँकि एक शब्द है #हिन्दू जिसके संबंध मेँ ये कहा जाता है और बहुत सारे लोगोँ को पता ही नहीँ है कि "हिन्दू" शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई है ! कोई कहता है जी सिन्धु घाटी की सभ्यता के कारण हिन्दू है, कोई कहता है इस वजह से हिन्दू है, जबकि "हिन्दू" शब्द की उत्पत्ति "कौल" से ही हुई है ! कौल पंथ पर चलनेवाले व्यक्ति को ही हिन्दू अथवा महाहिन्दू कहा जाता है ! हिन्दू वो है जो सभी तत्त्वोँ का समावेश करता है अर्थात् जो अग्नि की उपासना करता है, जो वायु की उपासना करता है, जो पञ्च प्रधान तत्त्वोँ की साधना-आराधना करता है और उसी के माध्यम से ईश्वर की ओर गति चाहता है । हिन्दू उसे कहते है जो इस संसार मेँ रहते हुए ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, उत्सव, शोक, विरह सबको अनुभव करते हुए भी अपने जीवन के केन्द्रबिन्दू को ईश्वर और ईश्वरत्व पर स्थापित रखे इसलिए हिन्दू होना बहुत अमोघ है । "सिद्ध" होने के बाद ही कोई व्यक्ति हिन्दू हो सकता है और हम लोग अगर हिन्दू है तो ये जीवन की श्रेष्ठता है और मैँ कहता हुँ कि "सिद्ध" होना केवल किसी देशविशेष के नागरिकोँ का ही अधिकार नहीँ है बल्कि "सिद्ध" होने के लिए तो आप विश्व के किसी भी कोने मेँ जाइए, आप किसी भी देश के रहनेवाले ही क्योँ न होँ आप #सिद्ध हो सकते है ! इसलिए इस बात को अपने झहन मेँ बिठा लीजिए कि यदि आपके अंदर वो गुण है, आप यदि ईश्वर को प्राप्त करना चाहते है, यदि आपका ईश्वर मेँ विश्वास है और आप ईश्वर की सत्ता को स्वीकारते है और आप सभी कलाओँ को स्वीकारते है गीत, संगीत, साहित्य, ललितकलाएँ, इतिहास कुछ भी जो भी आपने संसार मेँ देखा हो विज्ञान भी; यदि सभी तत्त्वोँ को स्वीकारते है तो आप निश्चित ही आप "सिद्ध" है और वही "कौल" है । "कौल" का तात्पर्य है "कुलीन" अर्थात् जो सभी का सम्मान करना जानता हो । "कुलीन" व्यक्ति कौन होता है ? जो अपने "कुल" को मर्यादा के अनुसार आगे बढाए; जो अपने राष्ट्र को, विश्व को एक अच्छे पथ पर ले जाना चाहेँ; और वो जो सुख-शान्ति बाँटते हुए, आत्मचिन्तन करते हुए ईश्वर के पथ पर जाये उसे ही हमारे कुल मे "कुलीन" कहा जाता है और "कौल" का तात्पर्य है "आखरी", "अन्तिम" ! इस पृथ्वी का अन्तिम मनुष्य ही "कौल" कहलाता है क्योँकि ये कहा गया कि हर व्यक्ति जो शक्ल से मनुष्य जैसा दिखता है वास्तव मेँ वो "मनुष्य" होता नहीँ है और विदेशोँ मेँ तो ऐसा मैने सुना, किताबोँ मेँ भी पढाया जाता है कि बन्दरोँ से वो इन्सान बने है ! मुझे तो नहीँ लगता इन्सान बने भी है अभी तक तो बहुत सारे बेचारे बीच मेँ ही लटके है लेकिन हमारे यहाँ ऐसा नहीँ होता है ना ! इस बात को दिमाग मेँ बिठा लेना ! हमारे यहाँ पहले से ही हम मनुष्य है और मनुष्य ही रहेंगे, ये बन्दर- बन्दर बीच मेँ आते-जाते रहते है हम इनकी चिन्ता नहीँ करते क्योँकि आज भी बन्दर मेरी दृष्टि मेँ बन्दर ही है । तो "अन्तिम मनुष्य" अर्थात् इस सृष्टि का अन्तिम मनुष्य "कौल" कहलाता है क्योँकि शक्ल से भले ही मनुष्य जैसे सब दिखे लेकिन उनके अंदर जो मानवीय तत्त्व है, जो जो मानवीय गुण है, जो कलाएँ है, जो सौष्ठव है, जो उसकी पराकाष्ठा है, जो उसका आनंद है, जो उसकी मस्ती है, जो उसका आह्लाद है वो सब तो नष्ट हो जाते है मनुष्य मेँ ! जीवन मेँ प्रेम, सहिष्णुता, सौहार्द, भ्रातृत्व, स्नेह ये गुण तो रहे ही नहीँ और ये गुण केवल कौलोँ मेँ होते है ! कौल अर्थात् श्रेष्ठ ! और कौलाचारी, कौलान्तक संप्रदाय के साधक, भैरव, भैरवियाँ और इस संसार मेँ जो भी व्यक्ति इस संप्रदाय को मानता है ये विश्वास ऋषि-मुनियोँ का रहा है कि वही लोग #कौल है ! हालाँकि मेरी परिभाषा बहुत छोटी और सिमटी हुई है देखना, इसे आप अनेको प्रकार से वर्गीकृत कर सकते है । प्रश्न नं 1. क्या अगर कोई हिन्दू धर्म को नहीँ मानता और वो अच्छा और कुलीन नहीँ हो सकता ? और वो यदि अच्छे नियमोँ का पालन करता है सत्य, अहिंसा, त्याग, अपरिग्रह, प्रेम, आस्तेय इत्यादि तो क्या वो हिन्दू नहीँ है ? हम तो कहते है वो हिन्दू है भले ही वो किसी जाति, संप्रदाय, लिंग, वर्ण और किसी भी प्रकार का गोत्र का हो । तो शास्त्र कहता है "सत्य" की ओर जो जाये वो कौल है, वो सिद्ध है और जो "षड्यन्त्र" की ओर जाये...जैसे मान लीजिए एक कोई बेचारा कौल सिद्ध साधक अपने पथ पर बढ रहा है लेकिन लोग ये बताने के लिए कि न ये आदमी तो बहुत गलत है, उसके खिलाफ षड्यन्त्र करेंगे, उसके खिलाफ न जाने कैसी-कैसी बातेँ करेंगे और ये कहेंगे कि, "देखिये ! ये व्यक्ति अपने आपको सच्चाई का पूजारी कहता है लेकिन सत्य से दूर-दूर तक इस व्यक्ति का कोई लेना-देना नहीँ ।" तो आप समझ गये ! उस व्यक्ति को जो षड्यंत्र के तहत वो नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे है वही लोग दुष्ट है, वही लोग #कौलासुर है और #कौलासुरविध्वंसिनी अर्थात् वो शक्ति जो इन सब का विध्वंस करेगी; वही "माँ शक्ति" है और वो इस अद्भूत रणनीति के तहत इनका विध्वंस करेगी कि इन्हेँ खुद ही पता नहीँ चल पायेगा ! ये अपने महानगर बसाते जा रहे है, तो बसाओ; लेकिन एक दिन यही महानगर तुम्हारे अन्त के कारण बन जायेंगे इसलिए तुम्हेँ चाहिए कि तुम इस बात का निर्णय आज ही कर लो कि क्या तुम "कौल" हो या तुम "कौलासुर" हो । कौलासुर का तात्पर्य मैंने आपको पहले ही बता दिया, "नकारात्मक तत्व" । अपने भीतर नकारात्मकता ना आने दो क्योंकि ठीक उसी समय, उसी दिन, उसी क्षण तुम्हारा पतन शुरू हो जाता है जब तुम हीन भावनाओं से भर उठते हो, अपना विश्वास खो देते हो, ईश्वर के पथ को तुम नकार देते हो और अपने अस्तित्व को परम अस्तित्व मानना शुरू कर देते हो और एक बात सुन लीजिए, ईश्वर हो या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन इस बात से फर्क पड़ता है कि क्या आप अहंकारी है या नहीं ।

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

शाबर कुरुकुल्ला मंत्र
कौलान्तक सम्प्रदाय की प्रमुख देवी "रक्त तारा" जिसे "देवी कुरुकुल्ला" और "सुकुल्ला" या "तोतला" जैसे नामों से पुकारा जाता है। वे चमत्कारों और रहस्यों की देवी के रूप में विख्यात हैं व पूजी जाती हैं।  देवी अति शीघ्र प्रसन्न हो कर वरदान देती हैं।  कौलाचारियों की महाअराध्या देवी का मंत्र स्वयं "ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" की वाणी में प्रस्तुत है। शाबर कुरुकुल्ला मंत्र-ॐ नमो कुरुकुल्ले अन्न-धन वर्षिणी सकलकामाकर्षिणी सिद्ध हो-सिद्ध हो-सिद्ध हो माँ।


रुद्राक्ष के चमत्कारी महारह्स्य
भगवान शिव के प्रिय रुद्राक्ष में स्वयं शिव का अंश होता है, रुद्राक्ष को शिवाक्ष,शर्वाक्ष,भावाक्ष,फलाक्ष,भूतनाशन,पावन,हराक्ष, नीलकंठ,तृणमेरु,शिवप्रिय, अमर और पुष्पचामर भी कहते हैं, आयुर्वेद के ग्रंथों में भी रुद्राक्ष की महामहिमा का वर्णन है, आयुर्वेदिक ग्रंथों में रुद्राक्ष को महौषधि,दिव्य औषधि आदि कह कर इसके दिव्य गुणों को विस्तार से बताया गया है, रुद्राक्ष की जड़,छाल,फल,बीज और फूल सबमें औषधीय व दैवीय गुण छिपे हुये है. यदि आप तंत्र मंत्र जादू टोना अथवा किसी बुरे साए से परेशान हों! किसी की नजर ने जीना दूभर कर रखा हो! तरह तरह से ग्रहों की दशाओं ने जीवन की नैया को डावा-ड़ोल कर दिया हो! बुद्धि विवेक मस्तिष्क तनाव या किसी समस्या के कारण ठीक से काम न कर पा रहे हो! साथ ही आप यदि हृदय रोगों से परेशान हों, नक्षत्र दोष के कारण बनते काम बिगड़ रहे हों! तो अब समय आ गया है, "दुर्भाग्य के नाश का" और शिव की तरह प्रसन्न और मुक्त होने का. शिव पुराण में कहा गया है कि जिसने रुद्राक्ष धारण कर रखा हो, वो तो स्वयं शिव ही हो जाता है, जी हाँ ठीक सुना आपने जो भी व्यक्ति रुद्राक्ष धारण कर ले वो शिव के सामान ही दिव्य हो जाता है, लेकिन इसके लिए आपको जाननी होगी कुछ अतिगोपनीय विधियाँ,जो हम आज गहन अध्ययन केबाद आपके लिए ले कर आये हैं, अगर आपको लगता है कि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा, आप बहुत ही ज्यादा चंचल है और इस बजह से लगातार अपना नुक्सान कर रहे हैं, तो शिव के मन्त्रों से प्राण प्रतिष्ठा कर रुद्राक्ष धारण कीजिये, आपके जीवन में स्थिरता आने लगेगी. राहु, शनि, केतु, मंगल जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव से होने वाले रोगों व संकटों का नाश होगा, जीवन के संघर्षों से आपको राहत मिलेगी, साथ ही अकाल मृत्यु, दुर्घटनाओं को रोकेगा शिव का एक चमत्कारी रुद्राक्ष, सकन्ध पुराण और लिंग पुराण में कहा गया है कि रुद्राक्ष से आत्मविश्वास और मनोबल बढ़ता है, कार्य, व्यवसाय, व्यापार में अपार सफलता दिलवाता है, रुद्राक्ष सुख समृद्धि प्रदान करता है, साथ ही साथ पाप, शाप, ताप से भी भक्त की रक्षा करता है, हम आपको बता दें कि रुद्राक्ष भारत, नेपाल, जावा, मलाया जैसे देशों में पैदा होता है, भारत के असाम, बंगाल, देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में रुद्राक्ष पैदा होतें है, रुद्राक्ष का फल कुछ नीला और बैंगनी रंग का होता है जिसके अन्दर गुठली के रूप में स्थित होता है शिव का परम चमत्कारी दैविक रुद्राक्ष, लेकिन रुद्राक्ष का एक हमशक्ल भी होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, पर उसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते, शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष की क्षमता उसके मुखों के अनुसार ही होती है, रुद्राक्ष एक मुखी से ले कर इक्कीस मुखी तक प्राय: मिल जाते है, सबकी अलौकिकता एवं क्षमता अलग अलग होती है, हिमालय की तराइयों से प्राप्त रुद्राक्ष की महिमा सबसे बड़ी कही गई है, दस मुखी और चौदह मुखी रुद्राक्ष अतिदुर्लभ कहे गए है, पंद्रह से ले कर इक्कीस मुखी तक के रुद्राक्ष साधारणतय: नहीं मिल पाते, और एक मुखी की तो महिमा ही अपरम्पार है, जिसे मिल जाए उसे जीवन में फिर कुछ और पाना शेष नहीं रहता, वो केवल अत्यंत भाग्य वाले को ही मिल पाता है, रुद्राक्षों में नन्दी रुद्राक्ष, गौरी शंकर रुद्राक्ष, त्रिजूटी रुद्राक्ष, गणेश रुद्राक्ष, लक्ष्मी रुद्राक्ष, त्रिशूल रुद्राक्ष और डमरू रुद्राक्ष भी होते है, जो अंत्यंत दैविक माने गए हैं. रुद्राक्ष का प्रयोग औषधि के रूप में तो होता ही है साथ ही इसे धारण भी किया जाता है या पूजा के लिए,माला के रूप में प्रयुक्त होता है,स्फटिक शिवलिंग, बाण लिंग अथवा पारद शिवलिंग को स्थापित कर यदि रुद्राक्ष धारण कर लिया जाए तो वो व्यक्ति सम्राटों जैसा बैभव प्राप्त कर लेता है, रुद्राक्ष ऐसा तेजस्वी मनका है जिसका उपयोग बड़े बड़े योगी संत ऋषि मुनि महात्मा परमहंस तो करते ही है साथ ही साथ तांत्रिक अघोरी जैसी वाममार्गी विद्याओं के जानकार भी इसके चमत्कारी प्रभावों के कारण इसकी महिमा गाते फिरते है, भारत के सिद्ध रुद्राक्षों का प्रयोग तो आज विश्व के हर कोने में बैठा व्यक्ति कर ही रहा है, तो आप और हम इसके दिव्य गुणों से दूर क्यों रहें? स्कंध पुराण में कार्तिकेय जी भगवान शिव से रुद्राक्ष की महिमा और उत्पत्ति के बारे में प्रश्न पूछते है तो स्वयं शिव कहते है कि "हे षडानन कार्तिकेय ! सुनो, मैं संक्षेप में बताता हूँ, पूर्व काल में युद्ध में मुश्किल से जीता जाने वाला दैत्यों का राजा त्रिपुर था. उस दैत्यराज त्रिपुर नें जब सभी देवताओं को युद्ध में परास्त कर कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया. तो ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रमुख देवगण तथा पन्नग गण मेरे पास आ कर त्रिपुर का बध करने के लिए मेरी प्रार्थना करने लगे. देवताओं की प्रार्थना सुन कर संसार की रक्षा के लिए मैं बेग से अपने धनुष के साथ सर्व देवमय भयहारी कालाग्नि नाम के दिव्य अघोर अस्त्र को ले कर दैत्य राज त्रिपुर का बध करने के लिए चल पड़ा. लेकिन उसे हम त्रिदेवों से अनेक वर प्राप्त थे, इसलिए युद्ध में लम्बा समय लगा, एक हजार दिव्य वर्षों तक लगातार क्रोद्धमय युद्ध करने से व योगाग्नि के तेज के कारण अत्यंत विह्वल हुये मेरे नेत्रों से व्याकुल हो आंसू गिरने लगे, योगमाया की अद्भुत इच्छा से निकले वो आंसू जब धरा पर गिरे और बृक्ष के रूप में उत्त्पन्न हुये, तो रुद्राक्ष के नाम से विख्यात हो गए, ये षडानन रुद्राक्ष को धारण करने से महापुण्य होता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, रुद्राक्षों के दिव्य तेज से आप कैसे दुखों से मुक्ति पा कर सुखमय जीवन जीते हुये शिव कृपा पा सकते हैं
 विद्या बुद्धि एवं सफलता प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष
विद्या,ज्ञान व बुद्धि की प्राप्ति के लिए तीन मुखी व छ: मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इसे धारण करने से तीब्र बुद्धि होती है व अद्भुत स्मरण शक्ति प्राप्त होती है, जो पढाई में कमजोर हों वे इसे अवश्य धारण करें,बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा, तीन मुखी या छ: मुखी रुद्राक्ष धारण, करने से रचनात्मक कार्यों में भी बहुत लाभ मिलता है, जैसे यदि आप फैशन डिजाइनर हो, सौन्दर्य जगत से जुड़े हो, लेखक या सम्पादक हों, चित्रकार या अनुसंधानकर्ता हों तो ये रुद्राक्ष आपको बहुत लाभ प्रदान करेंगे,
  रोजगार,व्यक्तित्व विकास एवं इन्टरवियू में सफलता हेतु रुद्राक्ष
यदि आप अपना चौमुखी विकास करना चाहते हों तो या रोजगार पाना चाहते हों तो नौ मुखी, चार मुखी या फिर तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें, इसे धारण करने से सहनशीलता,बीरता,साहस,कर्मठता में बृद्धि होती है, इसका सबसे बड़ा गुण ये भी है की ये रुद्राक्ष संकल्प शक्ति में बृद्धि करते हैं जिससे आप अपने लक्ष्य तक जरूर पहुंचते ही है, बेरोजगार या नौकरी की तलाश कर रहे व्यक्ति को इससे उत्तम रोजगार प्राप्त होता है, यदि आप बार बार इन्टरवियू में असफल हो रहे हों तो इनमेंसे कोई एक रुद्राक्ष तुरंत धारण करेने से लाभ मिलेगा, यदि आप जीवन में आगे की बजाय पीछे की और जा रहे हों तो इन रुद्राक्षों को धारण करने से उन्नति अवश्य मिलेगी
सामाजिक,पारिवारिक समस्याओं एवं विवाह सम्बन्धी समस्याओं के लिए रुद्राक्ष
यदि आपका विवाह नहीं हो पा रहा है या विवाह के बाद गृहस्थी सुखी नहीं है, आपके सम्बन्ध अपने रिश्ते नाते वालों के साथ ठीक नहीं हैं या समाज में शत्रु ही शरु हो गए हों, तो आपको दो मुखी रुद्राक्ष या गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए,इसे धारण करने से घर में होने वाले परस्पर झगड़ों से मुक्ति पाई जा सकती है, ये रुद्राक्ष पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन,गुरु शिष्य अथवा मित्रों आदि के साथ के मतभेदों को दूर करता है, लड़के लड़कियों के विवाह में अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो तो इसे जरूर धारण करवाएं लाभ मिलेगा, आप मंगलबार के दिन इनमे से कोई भी रुद्राक्ष धारण करें
 दुर्घटना से बचाव, बुरी नजर, जादू-टोनों, बुरे ग्रहों से बचाव व अपनी सुरक्षा हेतु रुद्राक्ष
यदि आप अपनी सुरक्षा को ले कर बहुत चिंतित हों, वाहन चलने से घबराते हों, बार-बार दुर्घटनाएं होती हों, कुंडली हमेशा ही कोई नीच ग्रह या बाधा बनी रहती हो, भाग्य आपका साथ न दे रहा हो, जादू-टोनों से या फिर बुरी नजर से परेशान हों, भूत प्रेत अथवा सांप चूहे छिपकली से डर लगता हो, तो आपको ग्यारह मुखी या फिर दस मुखी रुद्राक्ष धारण काना चाहिए, यदि घर में बुरे साए का वास हो जो आपको परेशान करता हो तो सभी पारिवारिक सदस्य इसे धारण करें, यदि आप पवित्रता से रख सकते हैं तो वाहन अथवा तिजोरी की चाबी में छल्ले के रूप में भी आप इसका प्रयोग कर सकते हैं
 प्रेम प्राप्ति अथवा आकर्षण हेतु रुद्राक्ष
यदि आप किसी से प्रेम करते है और चाहते है की आपका प्रेम परिणित हो अथवा आप आकर्षण प्राप्त करना चाहते हों, तो छ: मुखी या तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करें, आप थियेटर या मंच से जुड़े हुये हों, धर्माचार्य हों या शिक्षक हों, मार्केटिंग या प्रचार माधयमों जैसे टीवी रेडिओ फिल्म आदि से जुड़े हैं तो आप ये रुद्राक्ष धारण कर लाभ पा सकते हैं, आपका प्रेम सम्बन्ध यदि टूट गया है, या आपके जीवन में कोई है जिसे आप खोना नहीं चाहते तो ये रुद्राक्ष फायदेमंद रहेगा
अखंड धन लाभ एवं कार्य व्यवसाय, व्यापार से लाभ प्राप्त करने हेतु रुद्राक्ष
यदि आप व्यापारी हैं कोई व्यवसाय करते हैं, कोई कंपनी चलाते है, या कोई निजी व्यवसाय करते है जिससे आपको धन लाभ की आकांक्षा है, तो आप सातमुखी, ग्यारह मुखी,गणेश रुद्राक्ष अथवा लक्ष्मी रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं, इन रुद्राक्षों को धारण करने से गरीवी का नाश होता है, जिस व्यवसाय में आप हैं उसी से आपको लाभ मिलने लगता है, आपका यश, मान, प्रतिष्ठा ऐसी बढती है की हर ओर से धन ही धन आने लगता है,आपके जीवन के सुखों में ओर अधिक बृद्धि होती है
रोगमुक्ति, स्वास्थ्य व लम्बी आयु हेतु रुद्राक्ष
यदि आप सदा तरह-तरह के रोगों से ही घिरे रहते हों, बीमारियाँ आपका पीछा ही नहीं छोड़ रही हों, यदि आप मानसिक रूप से भी परेशान ही रहते हों, चिंताएं खाए जा रही हों, कुंडली या क्रूर ग्रह अकाल मृत्यु का संकेत दे रहे हों तो आपको चौदह मुखी या आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, अकाल मृत्यु को टालने की इनमें अभूतपूर्व क्षमता है, रोग नाश के साथ-साथ जीवन की विकट परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करता है
समाजसेवा, शासन-प्रशासन, सत्ता या राजनीती में सफलता हेतु रुद्राक्ष
 यदि आप समाज सेवी हैं और अपने कार्यों को तीब्रता से करना चाहते हैं, शासन प्रशासन में अपनी पकड मजबूत करना चाहते हैं, आप युवा नेता या गहरे राजनीतिज्ञ हैं और अपने क्षेत्र के मुकाम को हासिल करना चाहते हैं, तो आपको बारह मुखी या सात मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इससे व्यक्ति की कीर्ति, यश, सूर्य के सामान चमकने लगती है, इसे धारण करने से बाणी में चातुर्य आता है संबोधन में आकर्षण पैदा होता है, आप अपनी गहरी छाप सब पर छोड़ सकते हैं
मुसीबत से या कोर्ट कचहरी मुकद्दमों से शीघ्र मुक्ति हेतु रुद्राक्ष
यदि आप पर कोई मुसीबत आन पड़ी हो कोई रास्ता न सूझ रहा हो या आप कोर्ट कचहरी के मामलों में फँस गए हों, आपका धैर्य जबाब देने लगा हो, जीवन केवल संघर्ष ही रह गया हो, अक्सर हर जगह अपमानित ही महसूस करते हों, तो आपको सात मुखी, पंचमुखी अथवा ग्यारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने चाहियें, समस्याओं के मध्य से भी तुरंत हल निकाल आएगा



कौलान्तक पीठाधीश्वर
महायोगी सत्येन्द्र नाथ